
Uttanka’s Inquiry and Vāsudeva’s Adhyātma Exposition (Guṇa–Ritual–Immanence Teaching)
Upa-parva: Uttanka–Vāsudeva Saṃvāda (Adhyātma and Aśvamedha-Ritual Identification Episode)
Uttanka requests a precise exposition of adhyātma from Keśava, indicating that the response will determine whether he offers praise or a curse—an opening that establishes the high stakes of doctrinal clarity. Vāsudeva replies by locating tamas, rajas, and sattva as states dependent on him, and by asserting mutual indwelling: all beings are in him and he is in all beings. The discourse extends this derivation to classes of entities (Rudras, Vasus, Daityas, Yakṣas, Rākṣasas, Nāgas, Gandharvas, Apsarases), and to ontological pairs (sat/asat, avyakta/vyakta, akṣara/kṣara), presenting them as aspects of his own nature. He then identifies the four āśrama-dharmas and sacrificial actions as similarly grounded in him. The chapter further connects Vedic revelation to Oṃkāra and equates key Aśvamedha components—Soma, yūpa, priestly functions, hymns, offerings, and expiatory rites—with divine presence. Vāsudeva describes dharma as his ‘mind-born’ beloved principle characterized by compassion toward all beings, and explains his repeated entry into diverse yonis and forms across the three worlds for dharma’s protection and re-establishment. He closes by portraying adaptive conduct in each birth-category and by reframing the Kuru catastrophe: those aligned with adharma were overcome under the law of time, while the Pāṇḍavas attain renown; the inquiry is declared answered in full.
Chapter Arc: मार्ग में अर्जुन बार-बार वृष्णिवंशी सखा श्रीकृष्ण को आलिंगन करता है; रथ दूर होते ही वह कठिनता से दृष्टि समेटता है—वियोग की छाया में कथा एक नए प्रसंग, उत्तंक-मुनि, की ओर मुड़ती है। → उत्तंक ब्राह्मणश्रेष्ठ मधुसूदन का सत्कार कर कुशल पूछता है और तीखे प्रश्न उठाता है—क्या कौरव-पाण्डव कुल में अविचल सौहार्द स्थापित हुआ? क्या सब राजा अपने-अपने राष्ट्रों में सुख से रहेंगे? कृष्ण के उत्तरों से संकेत मिलता है कि शांति-प्रयास हुए, पर विनाश टल न सका। → कृष्ण के कथन सुनते ही उत्तंक क्रोध से उबल पड़ता है, रोष से नेत्र फैल जाते हैं; वह कृष्ण को दोषी मानकर शाप देने को उद्यत होता है—यहीं संवाद का ताप चरम पर पहुँचता है। → कृष्ण उत्तंक को रोकते हैं: पहले अध्यात्म-तत्त्व सुनने का आग्रह करते हैं और कहते हैं कि उसके बाद भी इच्छा हो तो शाप दे देना; साथ ही वे स्पष्ट करते हैं कि कौरवों को शांत करने का उन्होंने भरसक प्रयत्न किया, पर वे विनाश की ओर ही बढ़े। → उत्तंक का क्रोध अभी शांत नहीं; अध्यात्म-उपदेश के बाद क्या वह शाप देगा या विवेक से लौटेगा—यह अनिश्चितता अगले अध्याय की देहरी पर छोड़ दी जाती है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ *लोक मिलाकर कुल ५८ ३ “लोक हैं) >>: >> | अ>॥ की स्नॉसीिस्स त्रिपञज्चाशत्तमो<ड्ध्याय: मार्गमें श्रीकृष्णसे कौरवोंके विनाशकी बात सुनकर उत्तड़ मुनिका कुपित होना और श्रीकृष्णका उन्हें शान्त करना वैशम्पायन उवाच तथा प्रयान्तं वार्ष्णेयं द्वारकां भरतर्षभा: । परिष्वज्य न्यवर्तन्त सानुयात्रा: परंतपा:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! इस प्रकार द्वारका जाते हुए भगवान् श्रीकृष्णको हृदयसे लगाकर भरतवंशके श्रेष्ठ वीर शत्रुसंतापी पाण्डव अपने सेवकों-सहित पीछे लौटे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏହିପରି ଦ୍ୱାରକାକୁ ଯାଉଥିବା ବାର୍ଷ୍ଣେୟ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ହୃଦୟପୂର୍ବକ ଆଲିଙ୍ଗନ କରି, ଶତ୍ରୁସନ୍ତାପୀ ପାଣ୍ଡବମାନେ ନିଜ ଅନୁଚରମାନଙ୍କ ସହିତ ପଛକୁ ଫେରି ନିଜ ସ୍ଥାନକୁ ପ୍ରତ୍ୟାବର୍ତ୍ତନ କଲେ।
Verse 2
पुन: पुनश्च वार्ष्णेयं पर्यष्वजत फाल्गुन: । आ चरक्षुविषयाच्चैनं स ददर्श पुन: पुन:,अर्जुनने वृष्णिवंशी प्यारे सखा श्रीकृष्णको बारंबार छातीसे लगाया और जबतक वे आँखोंसे ओझल नहीं हुए, तबतक उन्हींकी ओर वे बारंबार देखते रहे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଫାଲ୍ଗୁନ (ଅର୍ଜୁନ) ବାରମ୍ବାର ବାର୍ଷ୍ଣେୟ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)ଙ୍କୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କଲେ। ଏବଂ ସେ ଚକ୍ଷୁସୀମାରୁ ଅଦୃଶ୍ୟ ହେବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଅର୍ଜୁନ ବାରମ୍ବାର ତାଙ୍କ ଦିଗକୁ ଦେଖୁଥିଲେ।
Verse 3
कृच्छेणैव तु तां पार्थो गोविन्दे विनिवेशिताम् । संजहार ततो दृष्टिं कृष्णश्वाप्पपराजित:,जब रथ दूर चला गया, तब पार्थने बड़े कष्टसे श्रीकृष्णकी ओर लगी हुई अपनी दृष्टिको पीछे लौटाया। किसीसे पराजित न होनेवाले श्रीकृष्णकी भी यही दशा थी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପାର୍ଥ ଗୋବିନ୍ଦଙ୍କ ଉପରେ ନିବେଶିତ ଥିବା ନିଜ ଦୃଷ୍ଟିକୁ ବହୁ କଷ୍ଟରେ ପଛକୁ ଟାଣିନେଲେ। ଏବଂ ଅପରାଜିତ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କର ମଧ୍ୟ ସେହି ଅବସ୍ଥା—ତାଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦୃଷ୍ଟି ଫେରାଇବା କଷ୍ଟକର ହେଲା।
Verse 4
तस्य प्रयाणे यान्यासन् निमित्तानि महात्मन: । बहुन्यद्भुतरूपाणि तानि मे गदतः शृणु,महामना भगवान्की यात्राके समय जो बहुत-से अद्भुत शकुन प्रकट हुए, उन्हें बताता हूँ, सुनो
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେହି ମହାତ୍ମାଙ୍କ ପ୍ରସ୍ଥାନ ସମୟରେ ଅନେକ ଅଦ୍ଭୁତ ରୂପର ନିମିତ୍ତ-ଶକୁନ ପ୍ରକଟ ହେଲା; ମୁଁ କହୁଛି, ଶୁଣ।
Verse 5
वायुर्वेगेन महता रथस्य पुरतो ववौ । कुर्वन्नि:शर्करं मार्ग विरजस्कमकण्टकम्,उनके रथके आगे बड़े वेगसे हवा आती और रास्तेकी धूल, कंकण तथा काँटोंको उड़ाकर अलग कर देती थी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରଥର ଆଗରେ ମହାବେଗରେ ବାୟୁ ବହିଲା; ସେ ମାର୍ଗକୁ କଙ୍କଡ଼-ରହିତ, ଧୂଳି-ରହିତ ଓ କଣ୍ଟକ-ରହିତ କରିଦେଉଥିଲା।
Verse 6
ववर्ष वासवश्वैव तोयं शुचि सुगन्धि च । दिव्यानि चैव पुष्पाणि पुरत: शार्डधन्वचन:,इन्द्र श्रीकृष्णके सामने पवित्र एवं सुगन्धित जल तथा दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करते थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର) ଶାର୍ଙ୍ଗଧନ୍ବା ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ପବିତ୍ର ସୁଗନ୍ଧିତ ଜଳ ଓ ଦିବ୍ୟ ପୁଷ୍ପର ବର୍ଷା କରାଇଲେ।
Verse 7
स प्रयातो महाबाहु: समेषु मरुधन्वसु । ददर्शाथ मुनिश्रेष्ठमुत्तडकममितौजसम्,इस प्रकार मरुभूमिके समतल प्रदेशमें पहुँचकर महाबाहु श्रीकृष्णने अमिततेजस्वी मुनिश्रेष्ठ उत्तंकका दर्शन किया
ଆଗକୁ ଯାଇ ମହାବାହୁ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ମରୁଭୂମିର ସମତଳ ପ୍ରଦେଶରେ ପହଞ୍ଚିଲେ। ସେଠାରେ ସେ ଅପରିମିତ ତେଜସ୍ବୀ ମୁନିଶ୍ରେଷ୍ଠ ଉତ୍ତଙ୍କଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କଲେ।
Verse 8
स तं सम्पूज्य तेजस्वी मुनिं पृुथुललोचन: । पूजितस्तेन च तदा पर्यपृच्छदटनामयम्,विशाल नेत्रोंवाले तेजस्वी श्रीकृष्ण उत्तंक मुनिकी पूजा करके स्वयं भी उनके द्वारा पूजित हुए। तत्पश्चात् उन्होंने मुनिका कुशल-समाचार पूछा
ବିଶାଳନେତ୍ର ତେଜସ୍ବୀ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ମୁନି ଉତ୍ତଙ୍କଙ୍କୁ ଯଥାବିଧି ପୂଜା କଲେ, ଏବଂ ସେମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ନିଜେ ମଧ୍ୟ ପୂଜିତ ହେଲେ। ପରେ ଯାତ୍ରାକାଳରେ ମୁନିଙ୍କ କୁଶଳ-ମଙ୍ଗଳ ପଚାରିଲେ।
Verse 9
स पृष्ट: कुशल तेन सम्पूज्य मधुसूदनम् । उत्तड़को ब्राह्मणश्रेष्ठस्तत: पप्रच्छ माधवम्,उनके कुशल-मंगल पूछनेपर विप्रवर उत्तंकने भी मधुसूदन माधवकी पूजा करके उनसे इस प्रकार प्रश्न किया--
ତାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା କୁଶଳ ପଚାରାଯିବା ପରେ ବ୍ରାହ୍ମଣଶ୍ରେଷ୍ଠ ଉତ୍ତଙ୍କ ପ୍ରଥମେ ମଧୁସୂଦନ ମାଧବଙ୍କୁ ଯଥାବିଧି ପୂଜା କଲେ। ପରେ ପ୍ରଣାମ କରି ଏଭଳି ପ୍ରଶ୍ନ କଲେ।
Verse 10
कच्चिच्छौरे त्वया गत्वा कुरुपाण्डवसझ तत् | कृतं॑ सौश्रात्रमचलं तन्मे व्याख्यातुमहसि,'शूरनन्दन! क्या तुम कौरवों और पाण्डवोंके घर जाकर उनमें अविचल भ्रातृभाव स्थापित कर आये? यह बात मुझे विस्तारके साथ बताओ
ଶୌରି! ତୁମେ କୁରୁ–ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସଭାକୁ ଯାଇ ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅଚଳ ଭ୍ରାତୃଭାବ ସ୍ଥାପନ କରି ଆସିଛ କି? ଏହା ମୋତେ ବିସ୍ତାରରେ କହ।
Verse 11
अपि संधाय तान् वीरानुपावृत्तोडसि केशव । सम्बन्धिन: स्वदयितान् सतत वृष्णिपुड्रव,केशव! क्या तुम उन वीरोंमें संधि कराकर ही लौट रहे हो? वृष्णिपुंगव! वे कौरव, पाण्डव तुम्हारे सम्बन्धी तथा तुम्हें सदा ही परम प्रिय रहे हैं
କେଶବ! ସେହି ବୀରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସନ୍ଧି କରାଇ ତୁମେ ଫେରୁଛ କି? ହେ ବୃଷ୍ଣିପୁଙ୍ଗବ! କୌରବ ଓ ପାଣ୍ଡବମାନେ ତୁମର ସମ୍ବନ୍ଧୀ; ସେମାନେ ସଦା ତୁମକୁ ପରମ ପ୍ରିୟ।
Verse 12
कच्चित् पाण्डुसुता: पञठ्च धृतराष्ट्रस्य चात्मजा: । लोकेषु विहरिष्यन्ति त्वयवा सह परंतप
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପରନ୍ତପ! ପାଣ୍ଡୁଙ୍କ ପାଞ୍ଚ ପୁତ୍ର ଓ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ମଧ୍ୟ, ତୁମ ସହିତ କିମ୍ବା ତୁମ ରକ୍ଷାରେ, ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଏପରି ଭାବେ ବିହରିବେ କି?
Verse 13
“परंतप! क्या पाण्डुके पाँचों पुत्र और धृतराष्ट्रके भी सभी आत्मज संसारमें तुम्हारे साथ सुखपूर्वक विचर सकेंगे? ।। स्वराष्ट्रे ते च राजान: कच्चित् प्राप्स्यन्ति वै सुखम् । कौरवेषु प्रशान्तेषु त्वया नाथेन केशव,“केशव! तुम-जैसे रक्षक एवं स्वामीके द्वारा कौरवोंके शान्त कर दिये जानेपर अब पाण्डवनरेशोंको अपने राज्यमें सुख तो मिलेगा न?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପରନ୍ତପ! ପାଣ୍ଡୁଙ୍କ ପାଞ୍ଚ ପୁତ୍ର ଓ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସମସ୍ତ ପୁତ୍ରମାନେ, ତୁମ ସହିତ ଶାନ୍ତି ଓ ସୁଖରେ ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବିହରିପାରିବେ କି? ଏବଂ ହେ କେଶବ! ତୁମେ ରକ୍ଷକ ଓ ସ୍ୱାମୀ ହୋଇ କୌରବମାନଙ୍କୁ ପ୍ରଶାନ୍ତ କରିଦେଇଥିବା ପରେ, ସେହି ପାଣ୍ଡବ ରାଜାମାନେ ନିଜ ସ୍ୱରାଜ୍ୟରେ ସତ୍ୟସତ୍ୟ ସୁଖ ପାଇବେ କି?
Verse 14
या मे सम्भावना तात त्वयि नित्यमवर्तत । अपि सा सफला तात कृता ते भरतान् प्रति,“तात! मैं सदा तुमसे इस बातकी सम्भावना करता था कि तुम्हारे प्रयत्नसे कौरव- पाण्डवोंमें मेल हो जायगा। मेरी जो वह सम्भावना थी, भरतवंशियोंके सम्बन्धमें तुमने वह सफल तो किया है न?”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାତ! ତୁମ ବିଷୟରେ ମୋ ମନରେ ସଦା ଏହି ଆଶା ଥିଲା ଯେ ତୁମ ପ୍ରୟାସରେ କୌରବ ଓ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମେଳ ହେବ। ତାତ! ଭରତବଂଶୀମାନଙ୍କ ସମ୍ବନ୍ଧରେ ମୋର ସେଇ ଆଶାକୁ ତୁମେ ସଫଳ କରିଛ କି?
Verse 15
श्रीभगवानुवाच कृतो यत्नो मया पूर्व सौशाम्ये कौरवान् प्रति । नाशक्यन्त यदा साम्ये ते स्थापयितुमज्जसा
ଶ୍ରୀଭଗବାନ କହିଲେ—ପୂର୍ବେ ମୁଁ କୌରବମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ସନ୍ଧି ଓ ଶାନ୍ତି ପାଇଁ ଯତ୍ନ କରିଥିଲି; କିନ୍ତୁ ଯେତେବେଳେ ସେମାନଙ୍କୁ ସହଜରେ ସାମ୍ୟରେ ଦୃଢ଼ଭାବେ ସ୍ଥାପିତ କରିହେଲା ନାହିଁ, ସେତେବେଳେ ସେଇ ସମନ୍ୱୟ ଧରିରହିଲା ନାହିଁ।
Verse 16
न दिष्टमप्यतिक्रान्तुं शक््यं बुद्धया बलेन वा,महर्षे! प्रारब्धके विधानको कोई बुद्धि अथवा बलसे नहीं मिटा सकता। अनघ! आपको तो ये सब बातें मालूम ही होंगी कि कौरवोंने मेरी, भीष्मजीकी तथा विदुरजीकी सम्मतिको भी ठुकरा दिया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ମହର୍ଷି! ଦୈବଦ୍ୱାରା ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ଯାହା, ତାହାକୁ ନ ବୁଦ୍ଧିରେ ଅତିକ୍ରମ କରାଯାଏ, ନ ବଳରେ। ଫଳ ଦେବାକୁ ଆରମ୍ଭ କରିଥିବା ପ୍ରାରବ୍ଧକୁ କେହି ମିଟାଇପାରେ ନାହିଁ। ହେ ଅନଘ! ଏ ସବୁ ଆପଣ ଜାଣନ୍ତି—କୌରବମାନେ ମୋର, ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ଓ ବିଦୁରଙ୍କ ପରାମର୍ଶକୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରତ୍ୟାଖ୍ୟାନ କରିଥିଲେ।
Verse 17
महर्षे विदितं भूय: सर्वमेतत् तवानघ । तेडत्यक्रामन् मतिं महां भीष्मस्य विदुरस्यथ च,महर्षे! प्रारब्धके विधानको कोई बुद्धि अथवा बलसे नहीं मिटा सकता। अनघ! आपको तो ये सब बातें मालूम ही होंगी कि कौरवोंने मेरी, भीष्मजीकी तथा विदुरजीकी सम्मतिको भी ठुकरा दिया
ମହର୍ଷେ, ଅନଘ! ଏ ସବୁ କଥା ଆପଣଙ୍କୁ ପୁନଃପୁନଃ ଜଣା। ପ୍ରାରବ୍ଧର ବିଧାନକୁ କୌଣସି ବୁଦ୍ଧି କିମ୍ବା ବଳ ଦ୍ୱାରା ମିଟାଇହେବ ନାହିଁ। କୌରବମାନେ ମୋ, ଭୀଷ୍ମ ଓ ବିଦୁରଙ୍କ ମହାନ ପରାମର୍ଶକୁ ମଧ୍ୟ ଅସ୍ୱୀକାର କରିଥିଲେ।
Verse 18
ततो यमक्षयं जग्मु: समासाद्येतरेतरम् । पज्चैव पाण्डवा: शिष्टा हतामित्रा हतात्मजा: । धार्रराष्ट्रश्न निहता: सर्वे ससुतबान्धवा:,इसीलिये वे आपसमें लड़-भिड़कर यमलोक जा पहुँचे। इस युद्धमें केवल पाँच पाण्डव ही अपने शत्रुओंको मारकर जीवित बच गये हैं। उनके पुत्र भी मार डाले गये हैं। धृतराष्ट्रके सभी पुत्र, जो गान्धारीके पेटसे पैदा हुए थे, अपने पुत्र और बान्धवोंसहित नष्ट हो गये
ତେଣୁ ସେମାନେ ପରସ୍ପର ଲଢ଼ି-ଭିଡ଼ି ଯମଲୋକକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ। ସେହି ଯୁଦ୍ଧରେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ବଧ କରି କେବଳ ପାଞ୍ଚ ପାଣ୍ଡବ ଜୀବିତ ରହିଲେ; କିନ୍ତୁ ସେମାନଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ମଧ୍ୟ ନିହତ ହେଲେ। ଗାନ୍ଧାରୀଗର୍ଭଜ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସମସ୍ତ ପୁତ୍ର ପୁତ୍ର-ବାନ୍ଧବ ସହିତ ନଷ୍ଟ ହେଲେ।
Verse 19
इत्युक्तवचने कृष्णे भूशं क्रोधसमन्वित: । उत्तड़क इत्युवाचैनं रोषादुत्फुल्ललोचन:,भगवान् श्रीकृष्णके इतना कहते ही उत्तंक मुनि अत्यन्त क्रोधसे जल उठे और रोषसे आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगे। उन्होंने श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा
ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଏପରି କହିବାମାତ୍ରେ ଉତ୍ତଙ୍କ ମୁନି ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧରେ ଜ୍ୱଳି ଉଠିଲେ। ରୋଷରେ ଚକ୍ଷୁ ବିସ୍ତାର କରି ସେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଏପରି କହିଲେ।
Verse 20
उत्तडुक उवाच यस्माच्छक्तेन ते कृष्ण न त्राता: कुरुपुड्रवा: । सम्बन्धिन: प्रियास्तस्माच्छप्स्ये5हं त्वामसंशयम्,उत्तंक बोले--श्रीकृष्ण! कौरव तुम्हारे प्रिय सम्बन्धी थे, तथापि शक्ति रखते हुए भी तुमने उनकी रक्षा न की। इसलिये मैं तुम्हें अवश्य शाप दूँगा
ଉତ୍ତଙ୍କ କହିଲେ—ହେ କୃଷ୍ଣ! ଶକ୍ତି ଥାଇ ସୁଦ୍ଧା ତୁମେ କୁରୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ତୁମ ପ୍ରିୟ ସମ୍ବନ୍ଧୀମାନଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କଲ ନାହିଁ। ତେଣୁ ନିଶ୍ଚୟ ମୁଁ ତୁମକୁ ଶାପ ଦେବି।
Verse 21
नच ते प्रसभं यस्मात् ते निगृह निवारिता: । तस्मान्मन्युपरीतस्त्वां शप्स्यामि मधुसूदन,मधुसूदन! तुम उन्हें जबर्दस्ती पकड़कर रोक सकते थे, पर ऐसा नहीं किया। इसलिये मैं क्रोधमें भरकर तुम्हें शाप दूँगा
ମଧୁସୂଦନ! ତୁମେ ସେମାନଙ୍କୁ ବଳପୂର୍ବକ ଧରି ରୋକିପାରୁଥିଲ; କିନ୍ତୁ ତାହା କଲ ନାହିଁ। ତେଣୁ କ୍ରୋଧରେ ଆବୃତ ହୋଇ ମୁଁ ତୁମକୁ ଶାପ ଦେବି।
Verse 22
त्वया शक्तेन हि सता मिथ्याचारेण माधव । ते परीताः कुरुश्रेष्ठा नश्यन्तः सम ह्ुपेक्षिता:,माधव! कितने खेदकी बात है, तुमने समर्थ होते हुए भी मिथ्याचारका आश्रय लिया। युद्धमें सब ओरसे आये हुए वे श्रेष्ठ कुरुवंशी नष्ट हो गये और तुमने उनकी उपेक्षा कर दी
ମାଧବ! ତୁମେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସମର୍ଥ ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ମିଥ୍ୟାଚାରର ଆଶ୍ରୟ ନେଲ। ଯୁଦ୍ଧରେ ସବୁଦିଗରୁ ଘେରାଯାଇଥିବା କୁରୁବଂଶର ସେଇ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷମାନେ ନଶ୍ଟ ହେଲେ, ଏବଂ ତୁମେ ଉଦାସୀନଭାବେ ଦେଖି ଉପେକ୍ଷା କଲ। ହାୟ, କେତେ ଖେଦଜନକ କଥା!
Verse 23
वायुदेव उवाच शृणु मे विस्तरेणेदं यद् वक्ष्ये भुगुनन्दन । गृहाणानुनयं चापि तपस्वी हासि भार्गव,श्रीकृष्णने कहा--भृगुनन्दन! मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे विस्तारपूर्वक सुनिये। भार्गव! आप तपस्वी हैं, इसलिये मेरी अनुनय-विनय स्वीकार कीजिये
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ଭୃଗୁନନ୍ଦନ! ମୁଁ ଯାହା କହିବାକୁ ଯାଉଛି, ତାହାକୁ ବିସ୍ତାରରେ ଶୁଣ। ହେ ଭାର୍ଗବ! ତୁମେ ତପସ୍ବୀ; ତେଣୁ ମୋର ଏହି ବିନୟପୂର୍ଣ୍ଣ ଅନୁରୋଧକୁ ମଧ୍ୟ ଗ୍ରହଣ କର।
Verse 24
श्रुत्वा च मे तदध्यात्मं मुज्चेथा: शापमद्य वै । न च मां तपसाल्पेन शक्तोडभिभवितुं पुमान्
ବାୟୁ କହିଲେ—ମୋ ପାଖରୁ ସେଇ ଅଧ୍ୟାତ୍ମ-ତତ୍ତ୍ୱ ଶୁଣିଲେ ତୁମେ ଆଜି ନିଶ୍ଚୟ ଶାପରୁ ମୁକ୍ତ ହେବ। ଏବଂ ଅଳ୍ପ ତପସ୍ୟାର ବଳରେ କୌଣସି ମନୁଷ୍ୟ ମୋତେ ପରାଜିତ କରିପାରିବ ନାହିଁ।
Verse 25
तपस्ते सुमहद्दीप्तं गुरवश्ञापि तोषिता:,आपका तप और तेज बहुत बढ़ा हुआ है। आपने गुरुजनोंको भी सेवासे संतुष्ट किया है। द्विजश्रेष्ठट आपने बाल्यावस्थासे ही ब्रह्मचर्यका पालन किया है। ये सारी बातें मुझे अच्छी तरह ज्ञात हैं। इसलिये अत्यन्त कष्ट सहकर संचित किये हुए आपके तपका मैं नाश कराना नहीं चाहता हूँ
ବାୟୁ କହିଲେ—ତୁମର ତପ ଓ ତେଜ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମହାନ୍ ଓ ଦୀପ୍ତିମାନ; ଏବଂ ସେବାଦ୍ୱାରା ତୁମେ ଗୁରୁଜନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ କରିଛ। ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ବାଲ୍ୟାବସ୍ଥାରୁ ତୁମେ ବ୍ରହ୍ମଚର୍ୟ ପାଳନ କରିଆସୁଛ—ଏ ସବୁ ମୋତେ ଭଲଭାବେ ଜଣା। ତେଣୁ, ହେ ମହାଭାଗ! ଅତ୍ୟନ୍ତ କଷ୍ଟ ସହି ସଞ୍ଚିତ କରିଥିବା ତୁମ ତପକୁ ମୁଁ ବ୍ୟର୍ଥ ହେବାକୁ ଦେବାକୁ ଚାହେଁନି।
Verse 26
कौमारं ब्रह्मचर्य ते जानामि द्विजसत्तम | दुःखार्जितस्य तपसस्तस्मान्नेच्छामि ते व्ययम्,आपका तप और तेज बहुत बढ़ा हुआ है। आपने गुरुजनोंको भी सेवासे संतुष्ट किया है। द्विजश्रेष्ठट आपने बाल्यावस्थासे ही ब्रह्मचर्यका पालन किया है। ये सारी बातें मुझे अच्छी तरह ज्ञात हैं। इसलिये अत्यन्त कष्ट सहकर संचित किये हुए आपके तपका मैं नाश कराना नहीं चाहता हूँ
ବାୟୁ କହିଲେ—ହେ ଦ୍ୱିଜସତ୍ତମ! ତୁମର କୌମାର୍ୟକାଳରୁ ପାଳିତ ବ୍ରହ୍ମଚର୍ୟକୁ ମୁଁ ଜାଣେ। ତେଣୁ, ଦୁଃଖ ସହି ଅର୍ଜିତ ତୁମ ତପର କ୍ଷୟ ମୁଁ ଚାହେଁନି।
Verse 52
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपरववके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकाकी प्रस्थानविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଆଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଅନୁଗୀତାପର୍ବରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ଦ୍ୱାରକା-ପ୍ରସ୍ଥାନବିଷୟକ ବାଉନତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 53
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तड़कोपाख्याने कृष्णोत्तड़कसमागमे त्रिपड्चाशत्तमो5ध्याय:
ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଆଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବର ଅନୁଗୀତାପର୍ବରେ ଉତ୍ତଙ୍କୋପାଖ୍ୟାନରେ କୃଷ୍ଣ-ଉତ୍ତଙ୍କ ସମାଗମବିଷୟକ ତେପନତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।
Verse 153
ततस्ते निधन प्राप्ता: सर्वे ससुतबान्धवा: । श्रीभगवानने कहा--महर्षे! मैंने पहले कौरवोंके पास जाकर उन्हें शान्त करनेके लिये बड़ा प्रयत्न किया, परंतु वे किसी तरह संधिके लिये तैयार न किये जा सके। जब उन्हें समतापूर्ण मार्गमें स्थापित करना असम्भव हो गया, तब वे सब-के-सब अपने पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित युद्धमें मारे गये
ତାପରେ ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ପୁତ୍ର ଓ ବାନ୍ଧବମାନଙ୍କ ସହିତ ନିଧନ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲେ। ଶ୍ରୀଭଗବାନ କହିଲେ—ମହର୍ଷେ! ମୁଁ ପୂର୍ବେ କୌରବମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ ସେମାନଙ୍କୁ ଶାନ୍ତ କରିବା ପାଇଁ ବହୁତ ଚେଷ୍ଟା କରିଥିଲି; କିନ୍ତୁ ସେମାନେ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ସନ୍ଧି ପାଇଁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହେଲେ ନାହିଁ। ଯେତେବେଳେ ସେମାନଙ୍କୁ ସମତାମୟ ମାର୍ଗରେ ସ୍ଥାପିତ କରିବା ଅସମ୍ଭବ ହେଲା, ସେତେବେଳେ ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ପୁତ୍ର ଓ ସ୍ୱଜନମାନଙ୍କ ସହିତ ଯୁଦ୍ଧରେ ନିହତ ହେଲେ।
Verse 243
न च ते तपसो नाशमिच्छामि तपतां वर । मैं आपको अध्यात्मतत्त्व सुना रहा हूँ। उसे सुननेके पश्चात् यदि आपकी इच्छा हो तो आज मुझे शाप दीजियेगा। तपस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ महर्ष!ी आप यह याद रखिये कि कोई भी पुरुष थोड़ी-सी तपस्याके बलपर मेरा तिरस्कार नहीं कर सकता। मैं नहीं चाहता कि आपकी तपस्या नष्ट हो जाय
ହେ ତପସ୍ବୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମୁଁ ତୁମ ତପସ୍ୟାର ନାଶ ଇଚ୍ଛା କରେନି। ମୁଁ ତୁମକୁ ଅଧ୍ୟାତ୍ମତତ୍ତ୍ୱ କହିବି; ତାହା ଶୁଣି ସାରିଲା ପରେ ଯଦି ତୁମ ଇଚ୍ଛା ଥାଏ, ଆଜି ମୋତେ ଶାପ ଦିଅ। କିନ୍ତୁ ସ୍ମରଣ ରଖ, ମହର୍ଷେ, ତପସ୍ବୀମାନଙ୍କ ଅଗ୍ରଗଣ୍ୟ—ଅଳ୍ପ ତପସ୍ୟାର ବଳରେ କେହି ମୋତେ ତିରସ୍କାର କରିପାରିବ ନାହିଁ। ମୁଁ ଚାହେଁନି ଯେ ତୁମ ତପସ୍ୟା ନଷ୍ଟ ହେଉ।
Uttanka frames the exchange as contingent on truthful doctrinal disclosure—implying that misalignment between teaching and reality warrants moral censure—thereby positioning adhyātma as a criterion for legitimate authority.
A non-dualizing claim of comprehensive immanence: guṇas, beings, and ontological categories (manifest/unmanifest, perishable/imperishable) are grounded in Vāsudeva, and ritual order is a recognizable expression of that same ground.
Rather than a formal phalaśruti, it ends with a closure formula—Vāsudeva states that the entirety of what was asked has been explained—signaling doctrinal completeness and integrating the teaching into the epic’s post-war dharma-restoration frame.