Adhyaya 5
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 529 Verses

Adhyaya 5

Marutta–Indra Rivalry and Bṛhaspati’s Priestly Refusal (मरुत्तेन्द्रस्पर्धा—बृहस्पतेः पौरोहित्यनिश्चयः)

Upa-parva: Āśvamedhika-parva (Genealogical-Rivalry Prelude: Marutta–Indra–Bṛhaspati Episode)

Yudhiṣṭhira asks Vyāsa how a certain exemplary king acquired extraordinary prowess and how he became associated with immense gold, and where that wealth is now located and how it might be obtained. Vyāsa begins a genealogical and etiological account: Dakṣa’s prolific progeny (devas and asuras) are introduced as mutually competitive, establishing spardhā as a recurring driver of history. The narrative then focuses on the brothers Bṛhaspati and Saṃvarta—both ascetic equals—whose rivalry leads Saṃvarta to withdraw into forest life after repeated obstruction by the elder. Indra, after securing his status, appoints Bṛhaspati as divine purohita. A royal line is outlined: Karaṃdhama (noted for unmatched vigor and dhārmic conduct) and his successors, culminating in Marutta, a king whose merit and power invite continuous rivalry with Indra. Unable to surpass Marutta by distinction, Indra convenes the gods and warns Bṛhaspati not to perform Marutta’s rites. Bṛhaspati responds with formal praise of Indra’s cosmic role and states an explicit refusal to take sacrificial implements for a mortal patron, reinforcing the exclusivity of his priestly allegiance; Indra, hearing this, becomes free of envy and withdraws.

Chapter Arc: युधिष्ठिर व्यास से पूछते हैं—राजा मरुत्त का यज्ञ-वैभव कैसे उत्पन्न हुआ, और वह ‘जातरूप’ (स्वर्ण-धन) अब कहाँ है कि आज भी उसे पाया जा सके? → व्यास देव-दानवों की पुरानी प्रतिस्पर्धा और राजाओं की यज्ञ-प्रतिष्ठा की कथा छेड़ते हैं; मरुत्त के यज्ञ की कीर्ति इन्द्र के मन में असह्य मत्सर जगाती है। इन्द्र देवताओं सहित बढ़ नहीं पाते और बृहस्पति को बुलाते हैं—मरुत्त का यज्ञ किसी भी प्रकार सम्पन्न न कराया जाए। → इन्द्र के दबाव के सामने बृहस्पति की प्रतिज्ञा कठोर हो उठती—वे कहते हैं कि चाहे अग्नि शीतल हो जाए, पृथ्वी उलट जाए, सूर्य प्रकाश न करे, पर उनका सत्य नहीं डिगेगा; वे मरुत्त का यज्ञ नहीं कराएँगे। → बृहस्पति के सत्य-वचन को सुनकर इन्द्र का मत्सर शान्त होता है; वह उनकी प्रशंसा कर अपने भवन लौटता है। कथा-धारा में मरुत्त-यज्ञ के धन और उसकी परम्परा का संकेत बना रहता है, जिससे युधिष्ठिर के प्रश्न का उत्तर आगे खुलने को तैयार होता है। → मरुत्त के यज्ञ का वह अपार द्रव्य—जिसे युधिष्ठिर पाना चाहते हैं—अभी भी ‘कहाँ’ और ‘कैसे’ का रहस्य बनकर अगले प्रसंग की ओर ले जाता है।

Shlokas

Verse 1

पञठ्चमो<ध्याय: इन्द्रकी प्रेरणासे बृहस्पतिजीका मनुष्यको यज्ञ न करानेकी प्रतिज्ञा करना युधिछिर उवाच कथंवीर्य:ः समभवत्‌ स राजा वदतां वर । कथं च जातरूपेण समयुज्यत स द्विज,युधिष्ठटिरने पूछा--वक्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! राजा मरुत्तका पराक्रम कैसा था? तथा उन्हें सुवर्णकी प्राप्ति कैसे हुई? इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रवमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक पॉचवाँ अध्याय प्रा हुआ ॥/ ५ ॥। ऑपन--माजल बछ। अप ऋालज षष्ठो 5 ध्याय: नारदजीकी आज्ञासे मरुत्तका उनकी बतायी हुई युक्तिके अनुसार संवर्तसे भेंट करना व्यास उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ | बृहस्पतेश्व संवादं मरुत्तस्य च धीमत:ः

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ବକ୍ତାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ମହର୍ଷେ! ସେ ରାଜାଙ୍କର ପରାକ୍ରମ କିପରି ଥିଲା? ଏବଂ ହେ ଦ୍ୱିଜ, ସେ ସୁବର୍ଣ୍ଣରେ କିପରି ସମ୍ପନ୍ନ ହେଲେ?

Verse 2

क्व च तत्‌ साम्प्रतं द्रव्यं भगवन्नवतिष्ठते । कथं च शक्‍्यमस्माभिस्तदवाप्तुं तपोधन,भगवन! तपोधन! वह द्रव्य इस समय कहाँ है? और हम उसे किस तरह प्राप्त कर सकते हैं?

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଭଗବନ୍! ସେଇ ଧନ ଏବେ କେଉଁଠି ଅବସ୍ଥିତ? ଏବଂ ହେ ତପୋଧନ! ଆମେ ତାହା କିପରି ପ୍ରାପ୍ତ କରିପାରିବୁ?

Verse 3

व्यास उवाच असुराश्नैव देवाश्नव दक्षस्यासन्‌ प्रजापते: । अपत्यं बहुलं तात संस्पर्धन्त परस्परम्‌,व्यासजीने कहा--तात! प्रजापति दक्षके देवता और असुर नामक बहुत-सी संतानें हैं, जो आपसमें स्पर्धा रखती हैं

ବ୍ୟାସ କହିଲେ—ତାତ! ପ୍ରଜାପତି ଦକ୍ଷଙ୍କର ଦେବ ଓ ଅସୁର ନାମକ ଅନେକ ସନ୍ତାନ ଥିଲେ; ସେମାନେ ପରସ୍ପର ସ୍ପର୍ଧାରେ ଲିପ୍ତ ଥିଲେ।

Verse 4

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रवमेधिकपरववके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ,तथैवाज्धिरस: पुत्रौ व्रततुल्यौं बभूवतु: । बृहस्पतिर्बहत्तेजा: संवर्तश्ष तपोधन: इसी प्रकार महर्षि अंगिराके दो पुत्र हुए, जो व्रतका पालन करनेमें एक समान हैं। उनमेंसे एक हैं महातेजस्वी बृहस्पति और दूसरे हैं तपस्याके धनी संवर्त

ସେହିପରି ମହର୍ଷି ଅଙ୍ଗିରାଙ୍କର ଦୁଇ ପୁତ୍ର ହେଲେ; ବ୍ରତପାଳନରେ ଉଭୟ ସମାନ—ଏକ ମହାତେଜସ୍ବୀ ବୃହସ୍ପତି, ଅନ୍ୟ ତପୋଧନ ସଂବର୍ତ୍ତ।

Verse 5

तावतिस्पर्थिनौ राजन्‌ पृथगास्तां परस्परम्‌ । बृहस्पति: स संवर्त बाधते सम पुन: पुन:,राजन! वे दोनों भाई एक-दूसरेसे अलग रहते और आपसमें बड़ी स्पर्धा रखते थे। बृहस्पति अपने छोटे भाई संवर्तको बारंबार सताया करते थे इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये पडचमो< ध्याय:

ହେ ରାଜନ୍! ସେଇ ଦୁଇ ଭାଇ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ ରହୁଥିଲେ; ତଥାପି ପରସ୍ପର ସ୍ପର୍ଧାରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲେ। ବୃହସ୍ପତି ତାଙ୍କ ଛୋଟ ଭାଇ ସଂବର୍ତ୍ତକୁ ପୁନଃପୁନଃ ପୀଡ଼ା ଦେଉଥିଲେ।

Verse 6

स बाध्यमान: सतत भ्रात्रा ज्येष्देन भारत । अर्थनुत्सृज्य दिग्वासा वनवासमरोचयत्‌,भारत! अपने बड़े भाईके द्वारा सदा सताये जानेपर संवर्त धन-दौलतका मोह छोड़ घरसे निकल गये और दिगम्बर होकर वनमें रहने लगे। घरकी अपेक्षा वनवासमें ही उन्होंने सुख माना

ହେ ଭାରତ! ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ଭାଇଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସଦା ପୀଡ଼ିତ ହୋଇ ସଂବର୍ତ୍ତ ଧନ-ସମ୍ପତ୍ତିର ମୋହ ତ୍ୟାଗ କଲେ, ଘର ଛାଡ଼ିଲେ, ଏବଂ ଦିଗମ୍ବର ହୋଇ ବନବାସକୁ ହିଁ ରୁଚିକର ମନେ କଲେ।

Verse 7

वासवो<प्यसुरान्‌ सर्वान्‌ विजित्य च निपात्य च । इन्द्रत्वं प्राप्प लोकेषु ततो वब्रे पुरोहितम्‌

ବ୍ୟାସ କହିଲେ—ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର) ମଧ୍ୟ ସମସ୍ତ ଅସୁରଙ୍କୁ ଜୟ କରି ଓ ପତିତ କରି, ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଇନ୍ଦ୍ରତ୍ୱ ଲାଭ କଲେ। ତାପରେ ସେ ପୁରୋହିତଙ୍କୁ ବରଣ କଲେ।

Verse 8

याज्यस्त्वज्धिरस: पूर्वमासीद्‌ राजा करंधम:,इसके पहले अंगिराके यजमान राजा करन्धम थे। संसारमें बल, पराक्रम और सदाचारके द्वारा उनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं था। वे इन्द्रतुल्य तेजस्वी, धर्मात्मा और कठोर व्रतका पालन करनेवाले थे

ବ୍ୟାସ କହିଲେ—ପୂର୍ବକାଳରେ ଅଙ୍ଗିରସ ଋଷିମାନଙ୍କ ଯଜ୍ଞର ଯଜମାନ ଥିଲେ ରାଜା କରନ୍ଧମ। ଜଗତରେ ବଳ, ପରାକ୍ରମ ଓ ସଦାଚାରରେ ତାଙ୍କ ସମାନ ଅନ୍ୟ କେହି ନଥିଲେ। ସେ ଇନ୍ଦ୍ରତୁଲ୍ୟ ତେଜସ୍ବୀ, ଧର୍ମାତ୍ମା ଏବଂ କଠୋର ବ୍ରତପାଳନରେ ଅଟଳ ଥିଲେ।

Verse 9

वीर्येणाप्रतिमो लोके वृत्तेन च बलेन च | शतक्रतुरिवौजस्वी धर्मात्मा संशितव्रत:,इसके पहले अंगिराके यजमान राजा करन्धम थे। संसारमें बल, पराक्रम और सदाचारके द्वारा उनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं था। वे इन्द्रतुल्य तेजस्वी, धर्मात्मा और कठोर व्रतका पालन करनेवाले थे

ବ୍ୟାସ କହିଲେ—ପରାକ୍ରମ, ସଦ୍ବୃତ୍ତ ଓ ବଳରେ ସେ ଜଗତରେ ଅପ୍ରତିମ ଥିଲେ। ଶତକ୍ରତୁ (ଇନ୍ଦ୍ର) ପରି ଓଜସ୍ବୀ, ସେ ଧର୍ମାତ୍ମା ଏବଂ କଠୋର ବ୍ରତରେ ଦୃଢ଼ ଥିଲେ।

Verse 10

वाहनं यस्य योधाश्र्‌ मित्राणि विविधानि च । शयनानि च मुख्यानि महाहाणि च सर्वश:,राजन! उनके लिये वाहन, योद्धा, नाना प्रकारके मित्र तथा श्रेष्ठ और सब प्रकारकी बहुमूल्य शय्याएँ चिन्तन करनेसे और मुखजनित वायुसे ही प्रकट हो जाती थीं। राजा करन्धमने अपने गुणोंसे समस्त राजाओंको अपने वशमें कर लिया था

ବ୍ୟାସ କହିଲେ—ତାଙ୍କ ପାଇଁ ବାହନ, ଯୋଧା, ନାନାପ୍ରକାର ମିତ୍ର, ଏବଂ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଓ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମୂଲ୍ୟବାନ ଶୟ୍ୟା—ସବୁ ପ୍ରକାରେ—ଉପଲବ୍ଧ ଥିଲା।

Verse 11

ध्यानादेवाभवद्‌ राजन्‌ मुखवातेन सर्वश: । स गुणै: पार्थिवान्‌ सर्वान्‌ वशे चक्रे नराधिप:,राजन! उनके लिये वाहन, योद्धा, नाना प्रकारके मित्र तथा श्रेष्ठ और सब प्रकारकी बहुमूल्य शय्याएँ चिन्तन करनेसे और मुखजनित वायुसे ही प्रकट हो जाती थीं। राजा करन्धमने अपने गुणोंसे समस्त राजाओंको अपने वशमें कर लिया था

ବ୍ୟାସ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! କେବଳ ଧ୍ୟାନମାତ୍ରେ ଏବଂ ମୁଖରୁ ନିଷ୍କ୍ରାନ୍ତ ବାୟୁଦ୍ୱାରା ସବୁକିଛି ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ପ୍ରକଟ ହୁଏ। ସେ ନରାଧିପ ରାଜା କରନ୍ଧମ ନିଜ ଗୁଣବଳରେ ସମସ୍ତ ପାର୍ଥିବ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ବଶ କଲେ।

Verse 12

संजीव्य कालमिष्टं च सशरीरो दिवं गत: । बभूव तस्य पुत्रस्तु ययातिरिव धर्मवित्‌,कहते हैं राजा करन्धम अभीष्ट कालतक इस संसारमें जीवन धारण करके अन्तमें सशरीर स्वर्गलोकको चले गये थे। उनके पुत्र अविक्षित्‌ ययातिके समान धर्मज्ञ थे। उन्होंने अपने पराक्रम और गुणोंके द्वारा शत्रुओंपर विजय पाकर सारी पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया था। वे राजा अपनी प्रजाके लिये पिताके समान थे

ବ୍ୟାସ କହିଲେ—ରାଜା କରନ୍ଧମ ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ଓ ଇଚ୍ଛିତ କାଳ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଏହି ଲୋକରେ ଜୀବନ ଧାରଣ କରି, ଶେଷରେ ସଶରୀର ସ୍ୱର୍ଗକୁ ଗଲେ। ତାଙ୍କ ପୁତ୍ର ଅବିକ୍ଷିତ୍ ଯୟାତି ସମ ଧର୍ମଜ୍ଞ ହୋଇ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ହେଲେ। ପରାକ୍ରମ ଓ ଗୁଣରେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ଜିତି ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ବଶ କଲେ; ପ୍ରଜାଙ୍କ ପାଇଁ ସେ ପିତା ସମ—ରକ୍ଷକ, ନ୍ୟାୟବାନ୍ ଓ ଧାରକ—ଥିଲେ।

Verse 13

अविक्षिन्नाम शत्रुंजित्‌ स वशे कृतवान्‌ महीम्‌ । विक्रमेण गुणैश्वैव पितेवासीत्‌ स पार्थिव:,कहते हैं राजा करन्धम अभीष्ट कालतक इस संसारमें जीवन धारण करके अन्तमें सशरीर स्वर्गलोकको चले गये थे। उनके पुत्र अविक्षित्‌ ययातिके समान धर्मज्ञ थे। उन्होंने अपने पराक्रम और गुणोंके द्वारा शत्रुओंपर विजय पाकर सारी पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया था। वे राजा अपनी प्रजाके लिये पिताके समान थे

ବ୍ୟାସ କହିଲେ—ଅବିକ୍ଷିତ୍ ନାମକ ସେ ଶତ୍ରୁଞ୍ଜୟ ରାଜା ପରାକ୍ରମରେ ପୃଥିବୀକୁ ବଶ କଲେ। ପରାକ୍ରମ ଓ ଗୁଣ—ଦୁହିଁରେ ସେ ନୃପତି ପ୍ରଜାଙ୍କ ପାଇଁ ପିତା ସମ ଥିଲେ।

Verse 14

तस्य वासवतुल्यो< भून्मरुत्तो नाम वीर्यवान्‌ | पुत्रस्तमनुरक्ता भूत्‌ पृथिवी सागराम्बरा,अविक्षितके पुत्रका नाम मरुत्त था, जो इन्द्रके समान पराक्रमी थे। समुद्ररूपी वस्त्रसे आच्छादित हुई यह सारी पृथ्वी--समस्त भूमण्डलकी प्रजा उनमें अनुराग रखती थी

ବ୍ୟାସ କହିଲେ—ତାଙ୍କ ପୁତ୍ର ମରୁତ୍ତ ନାମକ ପରାକ୍ରମୀ, ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର) ସମ ଥିଲେ। ସମୁଦ୍ରରୂପ ବସ୍ତ୍ରରେ ଆବୃତ ଏହି ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ତାଙ୍କ ପ୍ରତି ଅନୁରକ୍ତ ହେଲା।

Verse 15

स्पर्थते स सम सततं देवराजेन नित्यदा । वासवो5पि मरुत्तेन स्पर्थते पाण्डुनन्दन,पाण्डुनन्दन! राजा मरुत्त सदा देवराज इन्द्रसे स्पर्धा रखते थे और इन्द्र भी मरुत्तके साथ स्पर्धा रखते थे

ବ୍ୟାସ କହିଲେ—ହେ ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ! ରାଜା ମରୁତ୍ତ ସଦା ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ସହ ସ୍ପର୍ଧା କରୁଥିଲେ; ଏବଂ ବାସବ ଇନ୍ଦ୍ର ମଧ୍ୟ ମରୁତ୍ତଙ୍କ ସହ ନିତ୍ୟ ସ୍ପର୍ଧା କରୁଥିଲେ।

Verse 16

शुचि: स गुणवानासीन्मरुत्त: पृथिवीपति: । यतमानो<पि यं शक्रो न विशेषयति सम ह,पृथ्वीपति मरुत्त पवित्र एवं गुणवान्‌ थे। इन्द्र उनसे बढ़नेके लिये सदा प्रयत्न करते थे तो भी कभी बढ़ नहीं पाते थे

ବ୍ୟାସ କହିଲେ—ପୃଥିବୀପତି ମରୁତ୍ତ ଶୁଚି ଓ ଗୁଣବାନ୍ ଥିଲେ। ଶକ୍ର ଇନ୍ଦ୍ର ତାଙ୍କୁ ଅତିକ୍ରମ କରିବାକୁ ଯେତେ ଚେଷ୍ଟା କଲେ ମଧ୍ୟ, କେବେ ତାଙ୍କୁ ମେଳାଇ ପାରିଲେ ନାହିଁ।

Verse 17

सो5शवक्नुवन्‌ विशेषाय समाहूय बृहस्पतिम्‌ उवाचेदं वचो देवै: सहितो हरिवाहन:,जब देवताओंसहित इन्द्र किसी तरह बढ़ न सके, तब बृहस्पतिको बुलाकर उनसे इस प्रकार कहने लगे--

ଦେବମାନଙ୍କ ସହିତ ହରିବାହନ ଇନ୍ଦ୍ର ଯେତେବେଳେ ଆଉ ଆଗକୁ ବଢ଼ିପାରିଲେ ନାହିଁ, ସେତେବେଳେ ସେ ବିଶେଷ ପରାମର୍ଶ ପାଇଁ ବୃହସ୍ପତିଙ୍କୁ ଡାକି ଏହିପରି କହିଲେ।

Verse 18

बृहस्पते मरुत्तस्य मा सम कार्षी: कथंचन । दैवं कर्माथ पित्र्यं वा कर्तासि मम चेत्‌ प्रियम्‌,“बृहस्पतिजी! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो राजा मरुत्तका यज्ञ तथा श्राद्धकर्म किसी तरह न कराइयेगा

“ହେ ବୃହସ୍ପତି! ଯଦି ତୁମେ ମୋର ପ୍ରିୟ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛ, ତେବେ ରାଜା ମରୁତ୍ତଙ୍କ ଯଜ୍ଞ—ଦେବକର୍ମ ହେଉ କି ପିତୃକର୍ମ—କୌଣସି ପରିସ୍ଥିତିରେ କରିବ ନାହିଁ।”

Verse 19

अहं हि त्रिषु लोकेषु सुराणां च बृहस्पते । इन्द्रत्वं प्राप्तवानेको मरुत्तस्तु महीपति:,“बृहस्पते! एकमात्र मैं ही तीनों लोकोंका स्वामी और देवताओंका इन्द्र हूँ। मरुत्त तो केवल पृथ्वीके राजा हैं

“ହେ ବୃହସ୍ପତି! ତିନି ଲୋକରେ ଦେବମାନଙ୍କ ଉପରେ ଇନ୍ଦ୍ରତ୍ୱ ମୋତେ ଏକାକୀ ମିଳିଛି; ମରୁତ୍ତ ତ ମାତ୍ର ପୃଥିବୀର ରାଜା।”

Verse 20

कथं ह्ामर्त्य ब्रह्मंस्त्वं याजयित्वा सुराधिपम्‌ । याजयेरमत्युसंयुक्त मरुत्तमविशड्कया,“ब्रह्म! आप अमर देवराजका यज्ञ कराकर-देदवेन्द्रके पुरोहित होकर मरणथधर्मा मरुत्तका यज्ञ कैसे निःशंक होकर कराइयेगा?

“ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ଅମର ଦେବାଧିପତିଙ୍କ ଯଜ୍ଞ କରାଇ ତାଙ୍କର ପୁରୋହିତ ହୋଇ, ମରଣଧର୍ମା ମରୁତ୍ତଙ୍କ ଯଜ୍ଞ ତୁମେ କିପରି ନିର୍ଭୟ ଭାବେ କରାଇବ?”

Verse 21

मां वा वृणीष्व भद्रें ते मरुत्त वा महीपतिम्‌ । परित्यज्य मरुत्तं वा यथाजोषं भजस्व माम्‌,“आपका कल्याण हो। आप मुझे अपना यजमान बनाइये अथवा पृथ्वीपति मरुत्तको। या तो मुझे छोड़िये या मरुत्तको छोड़कर चुपचाप मेरा आश्रय लीजिये”

“ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ଯଜମାନ ଭାବେ ମୋତେ ବାଛ, କିମ୍ବା ପୃଥିବୀପତି ମରୁତ୍ତଙ୍କୁ। ମରୁତ୍ତଙ୍କୁ ତ୍ୟାଗ କରି ଯଥେଷ୍ଟ ମୋର ଆଶ୍ରୟ ନିଅ; ନଚେତ୍ ମୋତେ ଛାଡ଼ି ମରୁତ୍ତଙ୍କ ପକ୍ଷରେ ରୁହ।”

Verse 22

एवमुक्त: स कौरव्य देवराज्ञा बृहस्पति: । मुहूर्तमिव संचिन्त्य देवराजानमब्रवीत्‌,कुरुनन्दन! देवराज इन्द्रके ऐसा कहनेपर बृहस्पतिने दो घड़ीतक सोच-विचारकर उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया--

ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ର ଏପରି କହିଲେ—ହେ କୁରୁନନ୍ଦନ—ବୃହସ୍ପତି କ୍ଷଣମାତ୍ର ଚିନ୍ତା କରି ପରେ ଦେବରାଜଙ୍କୁ ଏଭଳି ଉତ୍ତର ଦେଲେ।

Verse 23

त्वं भूतानामधिपतिस्त्वयि लोका: प्रतिषछ्ठिता: । नमुचेर्विश्वरूपस्य निहन्ता त्वं बलस्य च,“देवराज! तुम सम्पूर्ण जीवोंके स्वामी हो, तुम्हारे ही आधारपर समस्त लोक टिके हुए हैं। तुम नमुचि, विश्वरूप और बलासुरके विनाशक हो

ଦେବରାଜ! ତୁମେ ସମସ୍ତ ଭୂତମାନଙ୍କର ଅଧିପତି; ତୁମ ଉପରେ ଲୋକମାନେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ। ତୁମେ ନମୁଚି, ବିଶ୍ୱରୂପ ଓ ବଲାସୁରଙ୍କ ସଂହାରକ।

Verse 24

त्वमाजहर्थ देवानामेको वीरश्रियं पराम्‌ । त्वं बिभर्षि भुवं द्यांच सदैव बलसूदन,“बलसूदन! तुम अद्वितीय वीर हो। तुमने उत्तम सम्पत्ति प्राप्त की है। तुम पृथ्वी और स्वर्ग दोनोंका भरण-पोषण एवं संरक्षण करते हो

ହେ ବଲସୂଦନ! ଦେବମାନଙ୍କ ପାଇଁ ପରମ ବୀରଶ୍ରୀ ତୁମେ ଏକା ହିଁ ଆଣିଛ। ତୁମେ ସଦା ପୃଥିବୀ ଓ ଦ୍ୟୁଲୋକ—ଦୁହେଁକୁ ଧାରଣ କରି ରକ୍ଷା କର।

Verse 25

पौरोहित्यं कथं कृत्वा तव देवगणेश्वर । याजयेयमहं मर्त्य मरुत्त पाकशासन,'देवेश्वरर पाकशासन! तुम्हारी पुरोहिती करके मैं मरणधर्मा मरुत्तका यज्ञ कैसे करा सकता हूँ

ହେ ଦେବଗଣେଶ୍ୱର, ପାକଶାସନ! ତୁମ ପୌରୋହିତ୍ୟ ଗ୍ରହଣ କରି ମୁଁ ମର୍ତ୍ୟ ମରୁତ୍ତଙ୍କୁ ଯଜ୍ଞ କିପରି କରାଇପାରିବି?

Verse 26

समाश्च॒सिहि देवेन्द्र नाहं मर्त्यस्य कर्हिचित्‌ । ग्रहीष्यामि ख्रुवं यज्ञे शूणु चेदं वचो मम,देवेन्द्र! धैर्य धारण करो। अब मैं कभी किसी मनुष्यके यज्ञमें जाकर ख्रुवा हाथमें नहीं लूँगा। इसके सिवा मेरी यह बात भी ध्यानसे सुन लो

ହେ ଦେବେନ୍ଦ୍ର! ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଧର। ଏବେଠାରୁ ମୁଁ କେବେ ମର୍ତ୍ୟଙ୍କ ଯଜ୍ଞକୁ ଯାଇ ହାତରେ ଖ୍ରୁବା (ଯଜ୍ଞ-କରଚା) ଧରିବି ନାହିଁ। ଏବଂ ମୋର ଏହି କଥା ମଧ୍ୟ ଧ୍ୟାନଦେଇ ଶୁଣ।

Verse 27

हिरण्यरेता नोष्ण: स्यात्‌ परिवर्तेत मेदिनी । भासं तु न रवि: कुर्यान्न तु सत्यं चलेन्मयि,“आग चाहे ठण्डी हो जाय, पृथ्वी उलट जाय और सूर्यदेव प्रकाश करना छोड़ दें; किंतु मेरी यह सच्ची प्रतिज्ञा नहीं टल सकती”

ବ୍ୟାସ କହିଲେ— “ଯଦି ଅଗ୍ନିର ତାପ ଶୀତଳ ହୋଇଯାଏ, ପୃଥିବୀ ଓଲଟିଯାଏ ଏବଂ ସୂର୍ଯ୍ୟ ଆଲୋକ ଦେବା ବନ୍ଦ କରେ—ତଥାପି ମୋ ମନରେ ଥିବା ସତ୍ୟ-ପ୍ରତିଜ୍ଞା ଡଗମଗିବ ନାହିଁ।”

Verse 28

वैशम्पायन उवाच बृहस्पतिवच: श्रुत्वा शक्रो विगतमत्सर: । प्रशस्यैनं विवेशाथ स्वमेव भवनं तदा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! बृहस्पतिजीकी बात सुनकर इन्द्रका मात्सर्य दूर हो गया और तब वे उनकी प्रशंसा करके अपने घरमें चले गये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଜନମେଜୟ! ବୃହସ୍ପତିଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ମତ୍ସର୍ୟ ଦୂର ହେଲା। ପରେ ସେ ତାଙ୍କୁ ପ୍ରଶଂସା କରି ସେହି ସମୟରେ ନିଜ ଭବନକୁ ପ୍ରବେଶ କଲେ।

Verse 73

पुत्रमज्धिरसो ज्येष्ठं विप्रज्येष्ठ बृहस्पतिम्‌ । इसी समय इन्द्रने समस्त असुरोंको जीतकर मार गिराया तथा त्रिभुवनका साम्राज्य प्राप्त कर लिया। तदनन्तर उन्होंने अंगिराके ज्येष्ठ पुत्र विप्रवर बृहस्पतिको अपना पुरोहित बनाया

ବ୍ୟାସ କହିଲେ— ଇନ୍ଦ୍ର ସମସ୍ତ ଅସୁରଙ୍କୁ ଜୟ କରି ସଂହାର କରି ତ୍ରିଭୁବନର ସାମ୍ରାଜ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତ କଲେ। ତଦନନ୍ତରେ ଅଙ୍ଗିରାଙ୍କ ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ପୁତ୍ର, ବିପ୍ରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୃହସ୍ପତିଙ୍କୁ ସେ ନିଜ ପୁରୋହିତ କଲେ।

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns competing loyalties in ritual governance: whether Bṛhaspati may officiate for a mortal king (Marutta) whose prestige rivals Indra, despite being appointed as Indra’s exclusive priest.

Prestige rivalry destabilizes institutions unless constrained by role-dharma and vow-consistency; legitimacy derived from ritual requires ethical discipline from both patrons and officiants.

No explicit phalaśruti appears in this unit; its meta-function is etiological—explaining how rivalry, priestly allegiance, and ritual authorization shape the transmission and control of exceptional wealth and status.