Adhyaya 47
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 4720 Verses

Adhyaya 47

Brahmopadeśa on Saṃnyāsa, Tapas, and Jñāna (ब्रह्मोपदेशः—संन्यासतपोज्ञानविमर्शः)

Upa-parva: Mokṣa–Saṃnyāsa Upadeśa (Brahmopadeśa) — Philosophical Discourse Segment

Brahmā articulates a graded doctrine in which elders of settled insight equate true austerity with renunciation, and identify supreme Brahman as known through knowledge. Brahman is described as proximate yet subtle—beyond dualities, attributeless, eternal, inconceivable, and esoteric. The disciplined see that state through jñāna and tapas, purified of darkness and passion. The teaching valorizes tapas as an illuminant and right conduct as dharma-supporting, yet ranks knowledge as supreme and saṃnyāsa as the highest tapas. Liberation is tied to realizing the self as present in all beings, perceiving coexistence and withdrawal, and holding unity and multiplicity without distress. The liberated disposition is non-desiring and non-disparaging, leading to brahma-bhāva even while embodied. A concise soteriological profile follows: knower of guṇas and principles, free of possessiveness and egoism, moving toward the attributeless through tranquility. A cosmological metaphor depicts embodied existence as an ancient ‘brahma-tree’ grown from the unmanifest seed, with intellect, ego, senses, elements, and differentiated branches bearing auspicious/inauspicious fruits; it is to be cut with the supreme sword of knowledge, abandoning death and birth. The chapter closes with a two-birds motif and a kṣetrajña formulation: the inner conscious principle transcends the guṇas and is released from the death-bond.

Chapter Arc: गुरु-शिष्य संवाद में ब्रह्म का वचन उठता है—वह ब्रह्म जो वेदविद्या का आश्रय है, पर अज्ञानियों को ‘अतिदूर’ प्रतीत होता है: निर्द्वन्द्व, निर्गुण, नित्य, अचिन्त्य। → शिष्य के भीतर जिज्ञासा तीव्र होती है: यदि ब्रह्म इतना सूक्ष्म और निर्गुण है, तो साधक उसे कैसे पाए? उत्तर में संन्यास-तप, मन की शुद्धि, रजोगुण-त्याग, निर्ममता और निरहंकार की कठोर साधना का क्रम उभरता है। → देह-रूपी वृक्ष का विराट रूपक प्रकट होता है—अव्यक्त-योनि से उत्पन्न, बुद्धि-स्कन्ध, महाहंकार-विटप, इन्द्रिय-कोटर, महाभूत-शाखाएँ, शुभाशुभ फल; और फिर निर्णायक विधान: ‘ज्ञान-खड्ग’ से इस वृक्ष को काटकर ही परम पद का साक्षात्कार। → ब्रह्म-प्राप्ति का निष्कर्ष स्पष्ट किया जाता है: जो प्रधान-प्रकृति, गुण और तत्त्व को जानकर निर्ममो, निरहंकारी, निर्द्वन्द्व और प्रशान्त होता है, वह निःसंदेह मुक्त होता है—यह मार्ग प्रशम (शान्ति) में ले जाता है।

Shlokas

Verse 1

/ भीकम (2 अमान सप्तचत्वारिशो<् ध्याय: मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान-खड्गसे उसे काटनेका वर्णन ब्रह्मोवाच संन्यासं तप इत्याहुर्वृद्धा निश्चितवादिन: । ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिस्था ज्ञान ब्रह्म परं विदु:,ब्रह्माजीनी कहा-महर्षियो! निश्चित बात कहनेवाले और वेदोंके कारणरूप परमात्मामें स्थित वृद्ध ब्राह्मण संन्यासको तप कहते हैं और ज्ञानको ही परब्रह्मका स्वरूप मानते हैं

ବ୍ରହ୍ମା କହିଲେ—ହେ ମହର୍ଷିମାନେ! ନିଶ୍ଚିତ ମତରେ ଦୃଢ଼ ବୃଦ୍ଧମାନେ ସନ୍ନ୍ୟାସକୁ ହିଁ ତପ ବୋଲି କହନ୍ତି। ଏବଂ ଯେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ବ୍ରହ୍ମୟୋନିରେ, ଅର୍ଥାତ୍ ବ୍ରହ୍ମର ଉତ୍ସରେ, ସ୍ଥିତ—ସେମାନେ ଜ୍ଞାନକୁ ହିଁ ପରବ୍ରହ୍ମର ସ୍ୱରୂପ ବୋଲି ଜାଣନ୍ତି।

Verse 2

अतिदूरात्मकं ब्रह्म वेदविद्याव्यपाश्रयम्‌ । निर्द्धन््धं निर्गुणं नित्यमचित्त्यगुणमुत्तमम्‌

ବାୟୁ କହିଲେ—ବ୍ରହ୍ମ ଅତିଦୂରଗମ ସ୍ୱଭାବର, ବେଦବିଦ୍ୟା ଓ ସତ୍ୟଜ୍ଞାନର ଆଶ୍ରୟରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ। ସେ ଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱରହିତ, ନିର୍ଗୁଣ, ନିତ୍ୟ ଓ ପରମ—ତାଙ୍କ ଗୁଣ ମନରେ ମଧ୍ୟ ଅଚିନ୍ତ୍ୟ।

Verse 3

निर्णिक्तमनस: पूता व्युत्क्रानन्‍तरजसो5मला:,जिनके मनकी मैल धुल गयी है, जो परम पवित्र हैं, जिन्होंने रजोगुणको त्याग दिया है, जिनका अन्तःकरण निर्मल है, जो नित्य संन्यासपरायण तथा ब्रह्मके ज्ञाता हैं, वे पुरुष तपस्याके द्वारा कल्याणमय पथका आश्रय लेकर परमेश्वरको प्राप्त होते हैं

ଯାହାଙ୍କ ମନ ଧୋଇଯାଇଛି, ଯେମାନେ ପରମ ପବିତ୍ର ଓ ନିଷ୍କଳଙ୍କ, ଯେମାନେ ରଜୋଗୁଣର ଅନ୍ତର୍ଧୂଳି ତ୍ୟାଗ କରିଛନ୍ତି, ଯାହାଙ୍କ ଅନ୍ତଃକରଣ ନିର୍ମଳ—ନିତ୍ୟ ସନ୍ନ୍ୟାସରେ ରତ ଓ ବ୍ରହ୍ମଜ୍ଞ ଏମିତି ପୁରୁଷମାନେ ତପସ୍ୟା ଦ୍ୱାରା କ୍ଷେମମୟ ପଥର ଆଶ୍ରୟ ନେଇ ପରମେଶ୍ୱରଙ୍କୁ ପ୍ରାପ୍ତ କରନ୍ତି।

Verse 4

तपसा क्षेममध्वानं गच्छन्ति परमे श्वरम्‌ । संन्यासनिरता नित्यं ये च ब्रह्म॒ुविदो जना:,जिनके मनकी मैल धुल गयी है, जो परम पवित्र हैं, जिन्होंने रजोगुणको त्याग दिया है, जिनका अन्तःकरण निर्मल है, जो नित्य संन्यासपरायण तथा ब्रह्मके ज्ञाता हैं, वे पुरुष तपस्याके द्वारा कल्याणमय पथका आश्रय लेकर परमेश्वरको प्राप्त होते हैं

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ଯେମାନେ ନିତ୍ୟ ସନ୍ନ୍ୟାସରେ ରତ ଓ ବ୍ରହ୍ମକୁ ଯଥାର୍ଥ ଜାଣନ୍ତି, ସେମାନେ ତପସ୍ୟା ଦ୍ୱାରା କ୍ଷେମମୟ ଶୁଭପଥରେ ଅଗ୍ରସର ହୋଇ ପରମେଶ୍ୱରଙ୍କୁ ପ୍ରାପ୍ତ କରନ୍ତି।

Verse 5

तप: प्रदीप इत्याहुराचारो धर्मसाधकः । ज्ञानं वै परमं विद्यात्‌ संन्यासं तप उत्तमम्‌,ज्ञानी पुरुषोंका कहना है कि तपस्या (परमात्म-तत्त्वको प्रकाशित करनेवाला) दीपक है, आचार धर्मका साधक है, ज्ञान परब्रह्मका स्वरूप है और संन्यास ही उत्तम तप है

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ଜ୍ଞାନୀମାନେ କହନ୍ତି, ତପସ୍ୟା ହେଉଛି ଦୀପ; ସଦାଚାର ହେଉଛି ଧର୍ମସାଧକ। ଜ୍ଞାନକୁ ପରମ ତତ୍ତ୍ୱ ଭାବେ ଜାଣ; ସନ୍ନ୍ୟାସକୁ ହିଁ ଉତ୍ତମ ତପ ଭାବେ ବୁଝ।

Verse 6

यस्तु वेद निराधारं ज्ञानं तत्त्वविनिश्चयात्‌ | सर्वभूतस्थमात्मानं स सर्वगतिरिष्यते,जो तत्त्वका पूर्ण निश्चय करके ज्ञानस्वरूप, निराधार और सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर रहनेवाले आत्माको जान लेता है, वह सर्वव्यापक हो जाता है

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ତତ୍ତ୍ୱର ପୂର୍ଣ୍ଣ ନିଶ୍ଚୟ ସହିତ ଜ୍ଞାନସ୍ୱରୂପ, ନିରାଧାର ଏବଂ ସମସ୍ତ ଭୂତମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅବସ୍ଥିତ ଆତ୍ମାକୁ ଯେ ଜାଣେ, ସେହି ‘ସର୍ବଗତି’—ସର୍ବବ୍ୟାପୀ—ବୋଲି ଗଣ୍ୟ ହୁଏ।

Verse 7

यो विद्वान्‌ सहवासं च विवासं चैव पश्यति । तथैवैकत्वनानात्वे स दुःखात्‌ प्रतिमुच्यते,जो विद्वान संयोगको भी वियोगके रूपमें ही देखता है तथा वैसे ही नानात्वमें एकत्व देखता है, वह दुःखसे सर्वथा मुक्त हो जाता है

ବାୟୁ କହିଲେ—ଯେ ଜ୍ଞାନୀ ସହବାସକୁ ମଧ୍ୟ ବିୟୋଗସ୍ୱଭାବ ଭାବେ ଦେଖେ ଏବଂ ନାନାତ୍ୱରେ ମଧ୍ୟ ଏକତ୍ୱକୁ ଦର୍ଶନ କରେ, ସେ ଦୁଃଖରୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ମୁକ୍ତ ହୁଏ।

Verse 8

यो न कामयते किंचिन्न किंचिदवमन्यते । इहलोकस्थ एवैष ब्रह्म भूयाय कल्पते,जो किसी वस्तुकी कामना तथा किसीकी अवहेलना नहीं करता, वह इस लोकमें रहकर भी ब्रह्मस्वरूप होनेमें समर्थ हो जाता है

ବାୟୁ କହିଲେ—ଯେ କିଛି ମଧ୍ୟ କାମନା କରେନାହିଁ ଓ କିଛିକୁ ଅବମାନ କରେନାହିଁ, ସେ ଏହି ଲୋକରେ ରହି ମଧ୍ୟ ବ୍ରହ୍ମଭାବକୁ ଯୋଗ୍ୟ ହୁଏ।

Verse 9

प्रधानगुणतत्त्वज्ञ: सर्वभूतप्रधानवित्‌ । निर्ममो निरहंकारो मुच्यते नात्र संशय:,जो सब भूतोंमें प्रधान--प्रकृतिको तथा उसके गुण एवं तत्त्वको भलीभाँति जानकर ममता और अहंकारसे रहित हो जाता है, उसके मुक्त होनेमें संदेह नहीं है

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ଯେ ପ୍ରଧାନ (ପ୍ରକୃତି), ତାହାର ଗୁଣ ଓ ତତ୍ତ୍ୱକୁ ଯଥାର୍ଥ ଜାଣେ, ଏବଂ ସମସ୍ତ ଭୂତର ଆଧାର ଭାବେ ପ୍ରଧାନକୁ ବୁଝି ମମତା ଓ ଅହଂକାର ତ୍ୟାଗ କରେ, ସେ ନିଶ୍ଚୟ ମୁକ୍ତ ହୁଏ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।

Verse 10

निर्द्धदद्ों निर्ममस्कारो नि:ःस्वधाकार एव च । निर्गुणं नित्यमद्धन्द्ध प्रशमेनेव गच्छति,जो द्वल्घोंसे रहित, नमस्कारकी इच्छा न रखने-वाला और स्वधाकार (पितृ-कार्य) न करनेवाला संन्यासी है, वह अतिशय शान्तिके द्वारा ही निर्गुण, द्वन्द्धातीत, नित्यतत्त्वको प्राप्त कर लेता है

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ଯେ ସନ୍ନ୍ୟାସୀ ଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱରହିତ, ନମସ୍କାର-ମାନର ଆଶା ରଖେନାହିଁ ଏବଂ ସ୍ୱଧାକାର (ପିତୃକାର୍ଯ୍ୟ) ତ୍ୟାଗ କରିଛି, ସେ କେବଳ ଗଭୀର ପ୍ରଶାନ୍ତି ଦ୍ୱାରା ନିର୍ଗୁଣ, ଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱାତୀତ, ନିତ୍ୟ ତତ୍ତ୍ୱକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ।

Verse 11

हित्वा गुणमयं सर्व कर्म जन्तु: शुभाशुभम्‌ | उभे सत्यानृते हित्वा मुच्यते नात्र संशय:,शुभ और अशुभ समस्त त्रिगुणात्मक कर्मोंका तथा सत्य और असत्य--इन दोनोंका भी त्याग करके संन्यासी मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है

ବାୟୁ କହିଲେ—ଗୁଣମୟ ସମସ୍ତ କର୍ମ—ଶୁଭ ହେଉ କି ଅଶୁଭ—ତ୍ୟାଗ କରି, ଏବଂ ସତ୍ୟ ଓ ଅସତ୍ୟ—ଏ ଦୁଇଟିକୁ ମଧ୍ୟ ଆସକ୍ତିର ବିଷୟ ଭାବେ ଛାଡ଼ିଦେଲେ, ସନ୍ନ୍ୟାସୀ ମୁକ୍ତ ହୁଏ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।

Verse 12

अव्यक्तयोनिप्रभवो बुद्धिस्कन्धमयो महान्‌ | महाहंकारविटप इन्द्रियाडुकुरकोटर:

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ଏହି ମହାନ୍ (ବିଶ୍ୱ) ବୃକ୍ଷ ଅବ୍ୟକ୍ତ ଉତ୍ସରୁ ଉତ୍ପନ୍ନ; ବୁଦ୍ଧି ଏହାର କାଣ୍ଡ (ତଣ୍ଡ) ଅଟେ। ମହା-ଅହଂକାର ଏହାର ବଡ଼ ଶାଖା, ଏବଂ ଭିତରର କୋଟର-ଗୁହାମାନେ ଇନ୍ଦ୍ରିୟଗୁଡ଼ିକ।

Verse 13

महाभूतविशालश्न विशेषयति शाखिन: । सदापत्र: सदापुष्प: शुभाशुभफलोदय:

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ମହାଭୂତମାନଙ୍କର ସେହି ବିଶାଳ ବିସ୍ତାର ଏହି ବୃକ୍ଷମାନଙ୍କୁ ପୃଥକ୍ କରି ପ୍ରକଟ କରେ। ଏହା ସଦାପତ୍ର, ସଦାପୁଷ୍ପ ଓ ଶୁଭ-ଅଶୁଭ ଫଳର ଉଦୟ ଘଟାଏ।

Verse 14

आजीव्य: सर्वभूतानां ब्रह्म॒वृक्ष: सनातन: । एनं छित्त्वा च भित्त्वा च तत्त्वज्ञानासिना बुध:

ବାୟୁ କହିଲେ—ଏହି ସନାତନ ବ୍ରହ୍ମବୃକ୍ଷ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କର ଜୀବନାଧାର ଓ ଜୀବିକା। କିନ୍ତୁ ବୁଦ୍ଧିମାନ୍ ତତ୍ତ୍ୱଜ୍ଞାନର ଅସିଦ୍ୱାରା ଏହାକୁ କାଟି ଓ ଚିରି (ମୋହମୂଳକୁ) ଛିନ୍ନ କରେ।

Verse 15

हित्वा सड़मयान्‌ पाशान्‌ मृत्युजन्मजरोदयान्‌ । निर्ममो निरहड्कारो मुच्यते नात्र संशय:

ବାୟୁ କହିଲେ—ମୃତ୍ୟୁ, ଜନ୍ମ ଓ ଜରାର ଉଦୟକୁ ନେଇଯାଉଥିବା ଷଡ୍ବିଧ ପାଶମାନଙ୍କୁ ତ୍ୟାଗ କରି, ଯେ ନିର୍ମମ ଓ ନିରହଂକାର, ସେ ମୁକ୍ତ ହୁଏ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।

Verse 16

यह देह एक वृक्षके समान है। अज्ञान इसका मूल (जड़) है, बुद्धि स्कन्ध (तना) है, अहंकार शाखा है, इन्द्रियाँ अंकुर और खोखले हैं तथा पञचमहाभूत इसको विशाल बनानेवाले हैं और इस वृक्षकी शोभा बढ़ाते हैं। इसमें सदा ही संकल्परूपी पत्ते उगते और कर्मरूपी फूल खिलते रहते हैं। शुभाशुभ कर्मोसे प्राप्त होनेवाले सुख-दुःखादि ही इसमें सदा लगे रहनेवाले फल हैं। इस प्रकार ब्रह्म॒रूपी बीजसे प्रकट होकर प्रवाहरूपसे सदा मौजूद रहनेवाला यह देहरूपी वृक्ष समस्त प्राणियोंके जीवनका आधार है। बुद्धिमान्‌ पुरुष तत्त्वज्ञानरूपी खड़गसे इस वृक्षको छिन्न-भिन्न कर जब जन्म-मृत्यु और जरावस्थाके चक्करमें डालनेवाले आसक्तिरूप बन्धनोंको तोड़ डालता है तथा ममता और अहंकारसे रहित हो जाता है, उस समय उसे अवश्य मुक्ति प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं है ।। द्वाविमौ पक्षिणौ नित्यौ संक्षेपौ चाप्पयचेतनौ । एताभ्यां तु परो योअन्यश्लेतनावान्‌ स उच्यते

ବାୟୁ କହିଲେ—ଏହି ଦେହ ବୃକ୍ଷସଦୃଶ। ଅଜ୍ଞାନ ଏହାର ମୂଳ, ବୁଦ୍ଧି ଏହାର କାଣ୍ଡ (ତଣ୍ଡ), ଅହଂକାର ଏହାର ଶାଖା, ଇନ୍ଦ୍ରିୟମାନେ ଏହାର ଅଙ୍କୁର ଓ କୋଟର; ପଞ୍ଚମହାଭୂତ ଏହାକୁ ବିଶାଳ କରି ଶୋଭା ବଢ଼ାନ୍ତି। ଏଥିରେ ସଦା ସଙ୍କଳ୍ପରୂପ ପତ୍ର ଉଗେ, କର୍ମରୂପ ପୁଷ୍ପ ଫୁଟେ; ଶୁଭାଶୁଭ କର୍ମଫଳଜ ସୁଖ-ଦୁଃଖାଦି ହିଁ ଏହାର ନିତ୍ୟ ଫଳ। ବ୍ରହ୍ମରୂପ ବୀଜରୁ ପ୍ରକଟ ହୋଇ ପ୍ରବାହରୂପେ ସଦା ଅବସ୍ଥିତ ଏହି ଦେହବୃକ୍ଷ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ଜୀବନାଧାର। ବୁଦ୍ଧିମାନ୍ ପୁରୁଷ ତତ୍ତ୍ୱଜ୍ଞାନର ଖଡ୍ଗଦ୍ୱାରା ଏହାକୁ କାଟି-ଚିରି, ଜନ୍ମ-ମୃତ୍ୟୁ-ଜରାଚକ୍ରରେ ପକାଇଦେଉଥିବା ଆସକ୍ତିର ବନ୍ଧନ ଭାଙ୍ଗିଦିଏ; ଏବଂ ମମତା ଓ ଅହଂକାରରହିତ ହୋଇ ନିଶ୍ଚୟ ମୋକ୍ଷ ପାଏ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ। ପୁନଃ ବାୟୁ କହିଲେ—ଦୁଇ ପକ୍ଷୀ ନିତ୍ୟ ଅଛନ୍ତି—ସୂକ୍ଷ୍ମ ଏବଂ ନିଜେ ଅଚେତନ; କିନ୍ତୁ ସେ ଦୁଇଠାରୁ ପରେ ଆଉ ଏକ ଉଚ୍ଚ ତତ୍ତ୍ୱ ଅଛି—ଯେ ଚେତନ; ସେହିଁକୁ ଚେତନ ସତ୍ୟ ବୋଲି କୁହାଯାଏ।

Verse 17

इस वृक्षपर रहनेवाले (मन-बुद्धिरूप) दो पक्षी हैं, जो नित्य क्रियाशील होनेपर भी अचेतन हैं। इन दोनोंसे श्रेष्ठ अन्य (आत्मा) है, वह ज्ञानसम्पन्न कहा जाता है ।। अचेतन: सत्त्वसंख्याविमुक्त: सत्त्वात्‌ परं चेतयतेडन्तरात्मा । स क्षेत्रवित्‌ सर्वसंख्यातबुद्धि- गुणातिगो मुच्यते सर्वपापै:,संख्यासे रहित जो सत्त्व अर्थात्‌ मूलप्रकृति है, वह अचेतन है। उससे भिन्न जो जीवात्मा है, उसे अन्तर्यामी परमात्मा ज्ञानसम्पन्न करता है। वही क्षेत्रको जाननेवाला जब सम्पूर्ण तत्त्वोंको जान लेता है, तब गुणातीत होकर सब पापोंसे छूट जाता है

ବାୟୁ କହିଲେ— ଏହି ବୃକ୍ଷରେ ଦୁଇଟି ପକ୍ଷୀ ବସେ—ମନ ଓ ବୁଦ୍ଧିର ପ୍ରତୀକ; ସେମାନେ ନିତ୍ୟ କ୍ରିୟାଶୀଳ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ସ୍ୱୟଂ ଅଚେତନ। ଏହି ଦୁଇଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଆଉ ଗୋଟିଏ ଅଛି—ଆତ୍ମା—ଯାହାକୁ ଜ୍ଞାନସମ୍ପନ୍ନ କୁହାଯାଏ। ସଂଖ୍ୟାତୀତ ମୂଳପ୍ରକୃତି (ସତ୍ତ୍ୱ) ଅଚେତନ; ତାହାଠାରୁ ଭିନ୍ନ ଜୀବାତ୍ମାକୁ ଅନ୍ତର୍ୟାମୀ ପରମାତ୍ମା ଜାଗ୍ରତ ଓ ପ୍ରକାଶିତ କରନ୍ତି। କ୍ଷେତ୍ରଜ୍ଞ ଯେତେବେଳେ ସମସ୍ତ ତତ୍ତ୍ୱ ଜାଣିନେଇଥାଏ, ସେ ଗୁଣାତୀତ ହୋଇ ସର୍ବପାପରୁ ମୁକ୍ତ ହୁଏ।

Verse 23

ज्ञानेन तपसा चैव धीरा: पश्यन्ति तत्‌ परम्‌ । वह वेदविद्याका आधार ब्रह्म (अज्ञानियोंके लिये) अत्यन्त दूर है। वह निर्द्धन्द्, निर्गुण, नित्य, अचिन्त्य गुणोंसे युक्त और सर्वश्रेष्ठ है। धीर पुरुष ज्ञान और तपस्याके द्वारा उस परमात्माका साक्षात्कार करते हैं

ଜ୍ଞାନ ଓ ତପସ୍ୟା ଦ୍ୱାରା ଧୀରମାନେ ସେହି ପରମକୁ ଦେଖନ୍ତି। ବେଦବିଦ୍ୟାର ଆଧାର ବ୍ରହ୍ମ ଅଜ୍ଞମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୂର ପରି ଲାଗେ; ସେ ନିର୍ଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱ, ନିର୍ଗୁଣ, ନିତ୍ୟ, ଅଚିନ୍ତ୍ୟ ଓ ସର୍ବୋତ୍କୃଷ୍ଟ। ଧୀରମାନେ ଜ୍ଞାନ-ତପସ୍ୟାରେ ସେହି ପରମାତ୍ମାଙ୍କ ସାକ୍ଷାତ୍କାର କରନ୍ତି।

Verse 46

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଆଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବର ଅନ୍ତର୍ଗତ ଅନୁଗୀତା ପର୍ବରେ ଗୁରୁ-ଶିଷ୍ୟ-ସଂବାଦବିଷୟକ ଛିଆଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 47

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे सप्तचत्वारिंशो5ध्याय:

ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତେ ଆଶ୍ୱମେଧିକେ ପର୍ବଣି ଅନୁଗୀତାପର୍ବଣି ଗୁରୁ-ଶିଷ୍ୟ-ସଂବାଦେ ସପ୍ତଚତ୍ୱାରିଂଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ।

Frequently Asked Questions

The implicit dilemma is the hierarchy of spiritual means: whether liberation is best pursued through action-based austerity and conduct, or through renunciant non-attachment grounded in discriminative knowledge; the chapter resolves by subordinating conduct and tapas to jñāna-oriented saṃnyāsa.

Liberation is associated with realizing the self as all-pervading, transcending dualities and guṇas, and dissolving possessiveness and egoism; tranquility and knowledge are presented as the decisive instruments for cutting the structure of conditioned existence.

No explicit phalaśruti formula is stated; instead, the chapter embeds its result-claim doctrinally—freedom from sorrow, release from the death-bond, and cessation of birth and death through knowledge and non-attachment.