Adhyaya 43
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 4345 Verses

Adhyaya 43

Brahmopadeśa: Adhipatitva-kathana, Dharma-lakṣaṇa, and Kṣetra–Kṣetrajña Viveka (Book 14, Chapter 43)

Upa-parva: Āśvamedhika-parva — Brahmopadeśa on Dharma-lakṣaṇa and Kṣetrajña (Chapter 43 context unit)

Brahmā enumerates representative ‘chiefs’ or archetypal exemplars across categories (social orders, animals, trees, mountains, celestial bodies, deities), using adhipati/rāja language to map an ordered cosmos. The discourse then turns normative: dharma is defined by ahiṃsā, while adharma is defined by hiṃsā; kings are urged to protect dvijas and sādhus, with stated consequences for neglect versus protection. Next, the text supplies lakṣaṇas of elements and faculties—ākāśa as sound, vāyu as touch, waters as taste, earth as smell—alongside speech, mind (cintā), and buddhi (vyavasāya/decisive determination). It advances toward a sāṃkhya-leaning metaphysics: yoga is characterized by pravṛtti (disciplined engagement), jñāna by saṃnyāsa-lakṣaṇa, and liberation is described as transcending dualities. The latter portion distinguishes avyakta kṣetra (the field where guṇas arise and dissolve) from the nirguṇa kṣetrajña (knower), portrayed as unmarked (aliṅga), steady, and beyond ritualized self-assertion; the teaching culminates in the recommendation to relinquish attachment to guṇas and enter the standpoint of the kṣetrajña through knowledge and renunciation.

Chapter Arc: गुरु-शिष्य संवाद में ब्रह्माजी की वाणी से जगत के ‘अधिपतियों’ का क्रम खुलता है—चराचर प्राणियों, वृक्षों, ग्रह-नक्षत्रों और समाज-व्यवस्थाओं तक, मानो सृष्टि का शासन-मानचित्र सामने रख दिया गया हो। → सूची मात्र नहीं, एक सूक्ष्म संकेत उभरता है: बाह्य जगत में अधिपति-व्यवस्था जितनी स्पष्ट है, उतनी ही कठिन है भीतर के राज्य (मन-बुद्धि) का शासन। योग, ज्ञान और संन्यास के लक्षणों पर आते-आते प्रश्न तीखा होता है—किस मार्ग से मनुष्य द्वन्द्व, जरा और मृत्यु को लाँघे? → निर्णायक उद्घोष: ‘प्रवृत्तिलक्षणो योगो, ज्ञानं संन्यासलक्षणम्’—बुद्धिमान को ज्ञान को अग्रणी रखकर संन्यास (वैराग्य/त्याग-बुद्धि) की ओर झुकना चाहिए; ज्ञानयुक्त संन्यासी द्वन्द्वातीत होकर तम, मृत्यु और जरा को पार करता है। → अध्याय मन-बुद्धि के भेद-लक्षणों (चिन्तन मन का, निश्चय बुद्धि का) और धर्म-रक्षा से राज्य-कल्याण की परिणति (श्रेष्ठ पुरुषों की रक्षा करने वाले नरेश का लोक में आनंद) के साथ स्थिर निष्कर्ष देता है—बाह्य शासन का आदर्श भीतर की साधना से पुष्ट होता है।

Shlokas

Verse 1

>> ह््न हि कमी त्रिचत्वारिशो<् ध्याय: चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता ब्रह्मोवाच मनुष्याणां तु राजन्य: क्षत्रियो मध्यमो गुण: । कुण्जरो वाहनानां च सिंहश्लारण्यवासिनाम्‌,ब्रह्माजीनी कहा--महर्षियो! मनुष्योंका राजा तो रजोगुणसे युक्त क्षत्रिय है। सवारियोंमें हाथी, बनवासियोंमें सिंह, समस्त पशुओंमें भेड़ और बिलमें रहनेवालोंमें सर्प, गौओंमें बैल एवं स्त्रियोंमें पुरुष प्रधान है

ବ୍ରହ୍ମା କହିଲେ—ହେ ମହର୍ଷିମାନେ! ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ରାଜଧର୍ମର ଅଧିକାରୀ କ୍ଷତ୍ରିୟ; ତାହାରେ ମଧ୍ୟମ ଗୁଣ—ରଜୋଗୁଣ—ପ୍ରଧାନ। ବାହନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ହାତୀ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଏବଂ ଅରଣ୍ୟବାସୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସିଂହ ସର୍ବୋପରି।

Verse 2

अवि: पशाूनां सर्वेषामहिस्तु बिलवासिनाम्‌ | गवां गोवृषभश्चैव स्त्रीणां पुरुष एव च,ब्रह्माजीनी कहा--महर्षियो! मनुष्योंका राजा तो रजोगुणसे युक्त क्षत्रिय है। सवारियोंमें हाथी, बनवासियोंमें सिंह, समस्त पशुओंमें भेड़ और बिलमें रहनेवालोंमें सर्प, गौओंमें बैल एवं स्त्रियोंमें पुरुष प्रधान है

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ସମସ୍ତ ପଶୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଭେଡ଼ା ପ୍ରଧାନ; ବିଲବାସୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସର୍ପ ଶ୍ରେଷ୍ଠ। ଗୋମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବୃଷଭ ସର୍ବୋପରି; ଏବଂ ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପୁରୁଷକୁ ପ୍ରଧାନ ମନାଯାଏ।

Verse 3

न्यग्रोधो जम्बुवृक्षश्ष पिप्पल: शाल्मलिस्तथा । शिंशपा मेषशृज्ञश्न तथा कीचकवेणव:

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ନ୍ୟଗ୍ରୋଧ (ବଟ), ଜମ୍ବୁବୃକ୍ଷ, ପିପ୍ପଳ (ଅଶ୍ୱତ୍ଥ) ଓ ଶାଲ୍ମଳି; ଏବଂ ଶିଂଶପା, ମେଷଶୃଙ୍ଗୀ ତଥା କୀଚକ-ବେଣୁ (ବାଁଶ)।

Verse 4

हिमवान्‌ पारियात्रश्न सह्यो विन्ध्यस्त्रिकूटवान्‌,हिमवान्‌, पारियात्र, सहा, विन्ध्य, त्रिकूट, श्वेत, नील, भास, कोष्ठवान्‌ पर्वत, गुरुस्कन्ध, महेन्द्र और माल्यवान्‌ पर्वत--ये सब पर्वत पर्वतोंके अधिपति हैं। गणोंके मरुद्गण, ग्रहोंके सूर्य और नक्षत्रोंके चन्द्रमा अधिपति हैं

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ହିମବାନ, ପାରିୟାତ୍ର, ସହ୍ୟ, ବିନ୍ଧ୍ୟ, ତ୍ରିକୂଟ, ଶ୍ୱେତ, ନୀଳ, ଭାସ, କୋଷ୍ଠବାନ, ଗୁରୁସ୍କନ୍ଧ, ମହେନ୍ଦ୍ର ଓ ମାଲ୍ୟବାନ—ଏ ସମସ୍ତେ ପର୍ବତମାନଙ୍କ ଅଧିପତି। ଗଣମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମରୁଦ୍ଗଣ, ଗ୍ରହମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସୂର୍ଯ୍ୟ, ଏବଂ ନକ୍ଷତ୍ରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଚନ୍ଦ୍ରମା ଅଧିପତି।

Verse 5

श्वैतो नीलक्ष भासश्न कोष्ठवांश्रैव पर्वत: । गुरुस्कन्धो महेन्द्रश्न माल्यवान्‌ पर्वतस्तथा,हिमवान्‌, पारियात्र, सहा, विन्ध्य, त्रिकूट, श्वेत, नील, भास, कोष्ठवान्‌ पर्वत, गुरुस्कन्ध, महेन्द्र और माल्यवान्‌ पर्वत--ये सब पर्वत पर्वतोंके अधिपति हैं। गणोंके मरुद्गण, ग्रहोंके सूर्य और नक्षत्रोंके चन्द्रमा अधिपति हैं

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ— ଶ୍ୱୈତ, ନୀଳ, ଭାସ ଓ କୋଷ୍ଠବାନ; ତଥା ଗୁରୁସ୍କନ୍ଧ, ମହେନ୍ଦ୍ର ଓ ମାଲ୍ୟବାନ; ଏବଂ ହିମବାନ, ପାରିୟାତ୍ର, ସହ୍ୟ, ବିନ୍ଧ୍ୟ, ତ୍ରିକୂଟ— ଏମାନେ ପର୍ବତମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅଧିପତି। ଗଣମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମରୁଦ୍ଗଣ ପ୍ରଧାନ; ଗ୍ରହମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସୂର୍ଯ୍ୟ ଅଧିପତି; ନକ୍ଷତ୍ରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଚନ୍ଦ୍ର ଅଧିପତି।

Verse 6

एते पर्वतराजानो गणानां मरुतस्तथा । सूर्यो ग्रहाणामधिपो नक्षत्राणां च चन्द्रमा:,हिमवान्‌, पारियात्र, सहा, विन्ध्य, त्रिकूट, श्वेत, नील, भास, कोष्ठवान्‌ पर्वत, गुरुस्कन्ध, महेन्द्र और माल्यवान्‌ पर्वत--ये सब पर्वत पर्वतोंके अधिपति हैं। गणोंके मरुद्गण, ग्रहोंके सूर्य और नक्षत्रोंके चन्द्रमा अधिपति हैं

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ— ଏମାନେ ପର୍ବତରାଜ; ଗଣମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମରୁଦ୍ଗଣ ମଧ୍ୟ ପ୍ରଧାନ। ଗ୍ରହମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସୂର୍ଯ୍ୟ ଅଧିପତି, ନକ୍ଷତ୍ରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଚନ୍ଦ୍ର ଅଧିପତି।

Verse 7

यम: पितृणामधिप: सरितामथ सागर: । अम्भसां वरुणो राजा मरुतामिन्द्र उच्यते,यमराज पितरोंके और समुद्र सरिताओंके स्वामी हैं। वरुण जलके और इन्द्र मरुदगणोंके स्वामी कहे जाते हैं

ବାୟୁ କହିଲେ— ଯମ ପିତୃମାନଙ୍କ ଅଧିପତି; ନଦୀମାନଙ୍କ ଅଧିପତି ସାଗର। ଜଳମାନଙ୍କ ରାଜା ବରୁଣ; ମରୁଦ୍ଗଣମାନଙ୍କ ଅଧିପତି ଇନ୍ଦ୍ର ବୋଲି କୁହାଯାଏ।

Verse 8

अरको<धिपतिरुष्णानां ज्योतिषामिन्दुरुच्यते । अग्निर्भूतपतिर्नित्यं ब्राह्मणानां बृहस्पति:,उष्णप्रभाके अधिपति सूर्य हैं और ताराओंके स्वामी चन्द्रमा कहे गये हैं। भूतोंके नित्य अधीश्वर अग्निदेव हैं तथा ब्राह्मणोंके स्वामी बृहस्पति हैं

ବାୟୁ କହିଲେ— ଉଷ୍ଣତାର ଅଧିପତି ଅର୍କ (ସୂର୍ଯ୍ୟ); ଜ୍ୟୋତିଷ୍ମାନଙ୍କ ଅଧିପତି ଇନ୍ଦୁ (ଚନ୍ଦ୍ର) ବୋଲି କୁହାଯାଏ। ଭୂତମାନଙ୍କ ନିତ୍ୟ ଅଧିପତି ଅଗ୍ନି; ଏବଂ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଅଧିପତି ବୃହସ୍ପତି।

Verse 9

ओषधीनां पति: सोमो विष्णुर्बलवतां वर: । त्वष्टाधिराजो रूपाणां पशूनामीश्वर: शिव:,ओषधियोंके स्वामी सोम हैं तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ विष्णु हैं। रूपोंके अधिपति सूर्य और पशुओंके ईश्वर भगवान्‌ शिव हैं

ବାୟୁ କହିଲେ— ଔଷଧୀମାନଙ୍କ ଅଧିପତି ସୋମ; ବଳବାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବିଷ୍ଣୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ। ରୂପମାନଙ୍କ ଅଧିରାଜ ତ୍ୱଷ୍ଟା; ପଶୁମାନଙ୍କ ଈଶ୍ୱର ଶିବ।

Verse 10

दीक्षितानां तथा यज्ञो दैवानां मघवा तथा । दिशामुदीची विप्राणां सोमो राजा प्रतापवान्‌,दीक्षा ग्रहण करनेवालोंके यज्ञ और देवताओंके इन्द्र अधिपति हैं। दिशाओंकी स्वामिनी उत्तर दिशा है एवं ब्राह्मणोंके राजा प्रतापी सोम हैं

ଦୀକ୍ଷା ଗ୍ରହଣ କରିଥିବାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଯଜ୍ଞ ହିଁ ଅଧିପତି; ଦେବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଘବା (ଇନ୍ଦ୍ର) ଅଧିପତି। ଦିଗମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଉତ୍ତର ଦିଗ ସ୍ୱାମିନୀ; ଏବଂ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରତାପଶାଳୀ ସୋମରାଜା ପ୍ରଧାନ ମନାଯାନ୍ତି।

Verse 11

कुबेर: सर्वरत्नानां देवतानां पुरंदर: । एव भूताधिप: सर्ग: प्रजानां च प्रजापति:,सब प्रकारके रत्नोंके स्वामी कुबेर, देवताओंके स्वामी इन्द्र और प्रजाओंके स्वामी प्रजापति हैं। यह भूतोंके अधिपतियोंका सर्ग है

ସମସ୍ତ ରତ୍ନର ଅଧିପତି କୁବେର; ଦେବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପୁରନ୍ଦର (ଇନ୍ଦ୍ର) ଅଧିପତି; ଏବଂ ପ୍ରଜାମାନଙ୍କ ଅଧିପତି ପ୍ରଜାପତି। ଏହିପରି ସୃଷ୍ଟିରେ ଭୂତ-ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କ ପାଇଁ ନିର୍ଦ୍ଦିଷ୍ଟ ଅଧିପତି ନିୟତ।

Verse 12

सर्वेषामेव भूतानामहं ब्रह्ममयो महान्‌ । भूतं परतरं मत्तो विष्णोर्वापि न विद्यते,मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंका महान्‌ अधीश्वर और ब्रह्ममय हूँ। मुझसे अथवा विष्णुसे बढ़कर दूसरा कोई प्राणी नहीं है

ମୁଁ ହିଁ ସମସ୍ତ ଭୂତ-ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କର ମହାନ୍ ଅଧୀଶ୍ୱର, ବ୍ରହ୍ମମୟ। ମୋଠାରୁ—କିମ୍ବା ବିଷ୍ଣୁଠାରୁ ମଧ୍ୟ—ଉଚ୍ଚତର କୌଣସି ଭୂତ ନାହିଁ।

Verse 13

राजाधिराज: सर्वेषां विष्णुब्रह्ममयों महान्‌ । ईश्वरत्वं विजानी ध्वं कर्तारमकृतं हरिम,ब्रह्ममय महाविष्णु ही सबके राजाधिराज हैं, उन्हींको ईश्वर समझना चाहिये। वे श्रीहरि सबके कर्ता हैं, किंतु उनका कोई कर्ता नहीं है

ବିଷ୍ଣୁ-ବ୍ରହ୍ମମୟ ସେଇ ମହାନ୍ ପ୍ରଭୁ ହିଁ ସମସ୍ତଙ୍କର ରାଜାଧିରାଜ; ତାଙ୍କୁ ହିଁ ସତ୍ୟ ଈଶ୍ୱର ଭାବେ ଜାଣ। ଶ୍ରୀହରି ସମସ୍ତ କର୍ମର କର୍ତ୍ତା; କିନ୍ତୁ ସେ ନିଜେ ଅକୃତ—ତାଙ୍କର କୌଣସି କର୍ତ୍ତା ନାହିଁ।

Verse 14

नरकिन्नरयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम्‌ । देवदानवनागानां सर्वेषामीश्वरो हि सः,वे विष्णु ही मनुष्य, किन्नर, यक्ष, गन्धर्व, सर्प, राक्षस, देव, दानव और नाग सबके अधीश्वर हैं

ସେଇ (ବିଷ୍ଣୁ) ମନୁଷ୍ୟ, କିନ୍ନର, ଯକ୍ଷ, ଗନ୍ଧର୍ବ, ସର୍ପ, ରାକ୍ଷସ, ଦେବ, ଦାନବ ଓ ନାଗ—ସମସ୍ତଙ୍କର ହିଁ ଈଶ୍ୱର।

Verse 15

भगदेवानुयातानां सर्वासां वामलोचना । माहेश्वरी महादेवी प्रोच्यते पार्वती हि सा,कामी पुरुष जिनके पीछे फिरते हैं, उन सबमें सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्री प्रधान है। एवं जो माहेश्वरी, महादेवी और पार्वती नामसे कही जाती हैं, उन मंगलमयी उमादेवीको स्त्रियोंमें सर्वोत्तम जानो तथा रमण करने योग्य स्त्रियोंमें स्वर्णविभूषित अप्सराएँ प्रधान हैं

ବାୟୁ କହିଲେ—କାମନାରେ ପ୍ରେରିତ ପୁରୁଷମାନେ ଯେ ସମସ୍ତ ସ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ପଛେ ଚାଲନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସୁନ୍ଦର ନୟନା ତାହାই ଶ୍ରେଷ୍ଠା; ଯାହାକୁ ମାହେଶ୍ୱରୀ, ମହାଦେବୀ ଓ ପାର୍ବତୀ ବୋଲି କୁହାଯାଏ। ସେଇ ମଙ୍ଗଳମୟୀ ଉମାଦେବୀଙ୍କୁ ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସର୍ବୋତ୍ତମ ଜାଣ; ଏବଂ ରମଣୀୟା ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସୁବର୍ଣ୍ଣାଭୂଷଣରେ ଭୂଷିତ ଅପ୍ସରାମାନେ ପ୍ରଧାନ।

Verse 16

उमां देवीं विजानी ध्वं नारीणामुत्तमां शुभाम्‌ । रतीनां वसुमत्यस्तु स्त्रीणामप्सरसस्तथा,कामी पुरुष जिनके पीछे फिरते हैं, उन सबमें सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्री प्रधान है। एवं जो माहेश्वरी, महादेवी और पार्वती नामसे कही जाती हैं, उन मंगलमयी उमादेवीको स्त्रियोंमें सर्वोत्तम जानो तथा रमण करने योग्य स्त्रियोंमें स्वर्णविभूषित अप्सराएँ प्रधान हैं

ଶୁଭା ଓ ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସର୍ବୋତ୍ତମ ଉମାଦେବୀଙ୍କୁ ଜାଣ। ଏବଂ ରତି-ଭୋଗର ବିଷୟ ଭାବେ ଗଣ୍ୟ ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଧନ-ଐଶ୍ୱର୍ଯ୍ୟରେ ସୁଶୋଭିତ ଅପ୍ସରାମାନେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରଧାନ।

Verse 17

धर्मकामाश्ष राजानो ब्राह्मणा धर्मसेतव: । तस्माद्‌ राजा द्विजातीनां प्रयतेत सम रक्षणे,राजा धर्म-पालनके इच्छुक होते हैं और ब्राह्मण धर्मके सेतु हैं। अत: राजाको चाहिये कि वह सदा ब्राह्मणोंकी रक्षाका प्रयत्न करे

ରାଜାମାନେ ଧର୍ମ ଓ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ପ୍ରତି ନିବିଡ଼; ଏବଂ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଧର୍ମର ସେତୁ। ତେଣୁ ରାଜା ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ସମ୍ୟକ୍ ରକ୍ଷା ପାଇଁ ସଦା ପ୍ରୟତ୍ନ କରୁ।

Verse 18

राज्ञां हि विषये येषामवसीदन्ति साधव: । हीनास्ते स्वगुणै: सर्व: प्रेत्य चोन्‍्मार्गगामिन:,जिन राजाओंके राज्यमें श्रेष्ठ पुरुषोंको कष्ट होता है, वे अपने समस्त राजोचित गुणोंसे हीन हो जाते और मरनेके बाद नीच गतिको प्राप्त होते हैं

ଯେ ରାଜାମାନଙ୍କ ରାଜ୍ୟରେ ସାଧୁଜନ ଦୁଃଖରେ ପଡ଼ନ୍ତି, ସେମାନେ ନିଜ ସମସ୍ତ ରାଜୋଚିତ ଗୁଣରୁ ହୀନ ହୋଇଯାନ୍ତି; ଏବଂ ମୃତ୍ୟୁ ପରେ କୁପଥଗାମୀ ହୋଇ ନୀଚ ଗତିକୁ ପ୍ରାପ୍ତ କରନ୍ତି।

Verse 19

राज्ञां हि विषये येषां साधव: परिरक्षिता: । तेडस्मिल्लोके प्रमोदन्ते सुखं प्रेत्य च भुज्जते

ଯେ ରାଜାମାନଙ୍କ ରାଜ୍ୟରେ ସାଧୁଜନ ସୁରକ୍ଷିତ ରହନ୍ତି, ସେମାନେ ଏହି ଲୋକରେ ଆନନ୍ଦିତ ହୁଅନ୍ତି; ଏବଂ ମୃତ୍ୟୁ ପରେ ମଧ୍ୟ ସୁଖ ଭୋଗ କରନ୍ତି।

Verse 20

अत ऊर्ध्व॑ प्रवक्ष्यामि नियतं धर्मलक्षणम्‌,अब मैं सबके नियत धर्मके लक्षणोंका वर्णन करता हूँ। अहिंसा सबसे श्रेष्ठ धर्म है और हिंसा अधर्मका लक्षण (स्वरूप) है। प्रकाश देवताओंका और यज्ञ आदि कर्म मनुष्योंका लक्षण है

ବାୟୁ କହିଲେ—ଏବେ ମୁଁ ଧର୍ମର ନିଶ୍ଚିତ ଲକ୍ଷଣଗୁଡ଼ିକ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବି। ଅହିଂସା ପରମ ଧର୍ମ, ହିଂସା ଅଧର୍ମର ଲକ୍ଷଣ। ଦେବମାନଙ୍କର ଲକ୍ଷଣ ପ୍ରକାଶ, ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କର ଲକ୍ଷଣ କର୍ମ—ବିଶେଷତଃ ଯଜ୍ଞାଦି।

Verse 21

अहिंसा परमो धर्मो हिंसा चाधर्मलक्षणा । प्रकाशलक्षणा देवा मनुष्या: कर्मलक्षणा:,अब मैं सबके नियत धर्मके लक्षणोंका वर्णन करता हूँ। अहिंसा सबसे श्रेष्ठ धर्म है और हिंसा अधर्मका लक्षण (स्वरूप) है। प्रकाश देवताओंका और यज्ञ आदि कर्म मनुष्योंका लक्षण है

ବାୟୁ କହିଲେ—ଏବେ ମୁଁ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ନିୟତ କର୍ତ୍ତବ୍ୟର ଲକ୍ଷଣ ବର୍ଣ୍ଣନା କରୁଛି। ଅହିଂସା ପରମ ଧର୍ମ; ହିଂସା ଅଧର୍ମର ଚିହ୍ନ। ଦେବମାନେ ପ୍ରକାଶରେ ଚିହ୍ନିତ, ମନୁଷ୍ୟମାନେ କର୍ମରେ—ବିଶେଷତଃ ଯଜ୍ଞାଦି ବିଧିକର୍ମରେ—ଚିହ୍ନିତ।

Verse 22

शब्दलक्षणमाकाशं वायुस्तु स्पर्शलक्षण: । ज्योतिषां लक्षणं रूपमापश्ष रसलक्षणा:,शब्द आकाशका, वायु स्पर्शका, रूप तेजका और रस जलका लक्षण है

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ଶବ୍ଦ ଆକାଶର ଲକ୍ଷଣ; ସ୍ପର୍ଶ ବାୟୁର ଲକ୍ଷଣ; ରୂପ (ଦୃଶ୍ୟତା) ତେଜର ଲକ୍ଷଣ; ରସ ଜଳର ଲକ୍ଷଣ।

Verse 23

धारिणी सर्वभूतानां पृथिवी गन्धलक्षणा । स्वरव्यज्जनसंस्कारा भारती शब्दलक्षणा,गन्ध सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली पृथ्वीका लक्षण है तथा स्वर-व्यंजनकी शुद्धिसे युक्त वाणीका लक्षण शब्द है

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ସମସ୍ତ ଭୂତକୁ ଧାରଣ କରୁଥିବା ପୃଥିବୀର ଲକ୍ଷଣ ଗନ୍ଧ। ଏବଂ ସ୍ୱର-ବ୍ୟଞ୍ଜନର ଶୁଦ୍ଧ ସଂସ୍କାରରେ ସଂସ୍କୃତ ଭାରତୀ (ବାଣୀ)ର ଲକ୍ଷଣ ଶବ୍ଦ।

Verse 24

मनसो लक्षण चिन्ता चिन्तोक्ता बुद्धिलक्षणा । मनसा चिन्तितानर्थान्‌ बुद्धया चेह व्यवस्यति

ବାୟୁ କହିଲେ—ମନର ଲକ୍ଷଣ ‘ଚିନ୍ତା’; ସେହି ଚିନ୍ତା ଭାବରୂପେ ପ୍ରକଟ ହୁଏ। ବୁଦ୍ଧିର ଲକ୍ଷଣ ‘ନିଶ୍ଚୟ’; ଏଠାରେ ବୁଦ୍ଧି, ମନ ଯାହା ଚିନ୍ତା କରିଛି ସେଇ ଅର୍ଥ ଓ ଲକ୍ଷ୍ୟକୁ ଦୃଢ଼ଭାବେ ନିର୍ଣ୍ଣୟ କରେ।

Verse 25

लक्षणं मनसो ध्यानमव्यक्त साधुलक्षणम्‌,मनका लक्षण ध्यान है और श्रेष्ठ पुरुषका लक्षण बाहरसे व्यक्त नहीं होता (वह स्वसंवेद्य हुआ करता है)। योगका लक्षण प्रवृति और संन्यासका लक्षण ज्ञान है। इसलिये बुद्धिमान पुरुषको चाहिये कि वह ज्ञानका आश्रय लेकर यहाँ संन्यास ग्रहण करे

ବାୟୁ କହିଲେ—ମନର ଲକ୍ଷଣ ଧ୍ୟାନ; ଏବଂ ସତ୍ପୁରୁଷର ଲକ୍ଷଣ ହେଉଛି ତାହା ବାହାରେ ପ୍ରକାଶିତ ହୁଏନାହିଁ—ସ୍ୱସଂବେଦ୍ୟ ଭାବେ ଅନ୍ତରେ ଜଣାଯାଏ। ଯୋଗର ଲକ୍ଷଣ ଧର୍ମକର୍ମରେ ପ୍ରବୃତ୍ତି, ସନ୍ନ୍ୟାସର ଲକ୍ଷଣ ଜ୍ଞାନ। ତେଣୁ ଜ୍ଞାନକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ବୁଦ୍ଧିମାନ ଏହି ଜୀବନରେ ସନ୍ନ୍ୟାସ ଗ୍ରହଣ କରୁ।

Verse 26

प्रवृत्तिलक्षणो योगो ज्ञानं संन्यासलक्षणम्‌ | तस्माजज्ञानं पुरस्कृत्य संन्यसेदिह बुद्धिमान्‌,मनका लक्षण ध्यान है और श्रेष्ठ पुरुषका लक्षण बाहरसे व्यक्त नहीं होता (वह स्वसंवेद्य हुआ करता है)। योगका लक्षण प्रवृति और संन्यासका लक्षण ज्ञान है। इसलिये बुद्धिमान पुरुषको चाहिये कि वह ज्ञानका आश्रय लेकर यहाँ संन्यास ग्रहण करे

ଯୋଗର ଲକ୍ଷଣ ପ୍ରବୃତ୍ତି, ସନ୍ନ୍ୟାସର ଲକ୍ଷଣ ଜ୍ଞାନ। ତେଣୁ ଜ୍ଞାନକୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି ବୁଦ୍ଧିମାନ ଏହି ଜୀବନରେ ସନ୍ନ୍ୟାସ ଗ୍ରହଣ କରୁ—ବାହ୍ୟ ଚିହ୍ନ ନୁହେଁ, ଅନ୍ତର୍ଦୃଷ୍ଟି ହେଉ ଆଧାର।

Verse 27

संन्यासी ज्ञानसंयुक्तः प्राप्रोति परमां गतिम्‌ | अतीतो द्वन्द्मभ्येति तमोमृत्युजरातिग:,ज्ञानयुक्त संन्यासी मौत और बुढ़ापाको लाँचकर सब प्रकारके द्वन्द्दोंसे परे हो अज्ञानान्धकारके पार पहुँचकर परमगतिको प्राप्त होता है

ବାୟୁ କହିଲେ—ଜ୍ଞାନସଂଯୁକ୍ତ ସନ୍ନ୍ୟାସୀ ପରମ ଗତି ପାଏ। ସେ ଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱକୁ ଅତିକ୍ରମ କରି ଅଜ୍ଞାନର ଅନ୍ଧକାର ପାର କରେ, ଏବଂ ମୃତ୍ୟୁ ଓ ଜରାକୁ ଲଂଘି ପରମ ଅବସ୍ଥାରେ ପହଞ୍ଚେ।

Verse 28

धर्मलक्षणसंयुक्तमुक्त वो विधिवन्मया । गुणानां ग्रहणं सम्यग्‌ वक्ष्माम्यहमत: परम्‌,महर्षियो! यह मैंने तुमलोगोंसे लक्षणोंसहित धर्मका विधिवत्‌ वर्णन किया। अब यह बतला रहा हूँ कि किस गुणको किस इन्द्रियसे ठीक-ठीक ग्रहण किया जाता है

ବାୟୁ କହିଲେ—ହେ ମହର୍ଷିମାନେ! ମୁଁ ବିଧିପୂର୍ବକ ଲକ୍ଷଣସହିତ ଧର୍ମକୁ ତୁମମାନଙ୍କୁ କହିଛି। ଏବେ ପରେ ମୁଁ ସ୍ପଷ୍ଟ କରି କହିବି—କେଉଁ ଗୁଣ କେଉଁ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ଦ୍ୱାରା ଯଥାର୍ଥରେ ଗ୍ରହଣ ହୁଏ।

Verse 29

पार्थिवो यस्तु गन्धो वै घप्राणेन हि स गृहाते । प्राणस्थश्न तथा वायुर्गन्धज्ञाने विधीयते,पृथ्वीका जो गन्ध नामक गुण है, उसका नासिकाके द्वारा ग्रहण होता है और नासिकामें स्थित वायु उस गन्धका अनुभव करानेमें सहायक होती है

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ପୃଥିବୀତତ୍ତ୍ୱର ‘ଗନ୍ଧ’ ନାମକ ଗୁଣ ନାସିକା ଦ୍ୱାରା ଗ୍ରହଣ ହୁଏ। ଏବଂ ଘ୍ରାଣେନ୍ଦ୍ରିୟରେ ଅବସ୍ଥିତ ପ୍ରାଣବାୟୁ ସେହି ଗନ୍ଧଜ୍ଞାନ ଘଟାଇବାକୁ ନିଯୁକ୍ତ।

Verse 30

अपां धातू रसो नित्यं जिद्नया स तु गृहाते । जिद्दास्थश्न तथा सोमो रसज्ञाने विधीयते,जलका स्वाभाविक गुण रस है, जिसको जिद्ल्ाके द्वारा ग्रहण किया जाता है और जिह्लामें स्थित चन्द्रमा उस रसके आस्वादनमें सहायक होता है

ବାୟୁ କହିଲେ—ଜଳତତ୍ତ୍ୱର ନିତ୍ୟ ସାର ‘ରସ’; ତାହା ଜିହ୍ୱା ଦ୍ୱାରା ଗ୍ରହଣ ହୁଏ। ଜିହ୍ୱାରେ ଅଧିଷ୍ଠିତ ସୋମ (ଚନ୍ଦ୍ର) ରସଜ୍ଞାନ ଓ ଆସ୍ୱାଦନରେ ସହାୟକ ଭାବେ ନିୟୁକ୍ତ।

Verse 31

ज्योतिषश्च गुणो रूप॑ चक्षुषा तच्च गृहाते । चक्षु:स्थश्व॒ सदा55दित्यो रूपज्ञाने विधीयते,तेजका गुण रूप है और वह नेत्रमें स्थित सूर्यदेवताकी सहायतासे नेत्रके द्वारा सदा देखा जाता है

ବାୟୁ କହିଲେ—ତେଜ (ଆଲୋକ) ତତ୍ତ୍ୱର ଗୁଣ ‘ରୂପ’; ତାହା ଚକ୍ଷୁ ଦ୍ୱାରା ଗ୍ରହଣ ହୁଏ। ଚକ୍ଷୁରେ ସଦା ଅଧିଷ୍ଠିତ ଆଦିତ୍ୟ (ସୂର୍ଯ୍ୟ) ରୂପଜ୍ଞାନ ପାଇଁ ଦିବ୍ୟ ସହାୟକ ଭାବେ ନିୟୁକ୍ତ।

Verse 32

वायव्यस्तु सदा स्पर्शस्त्वाचा प्रज्ञायते च सः । त्वक्स्थश्वैव सदा वायु: स्पर्शने स विधीयते,वायुका स्वाभाविक गुण स्पर्श है, जिसका त्वचाके द्वारा ज्ञान होता है और त्वचामें स्थित वायुदेव उस स्पर्शका अनुभव करानेमें सहायक होता है

ବାୟୁ କହିଲେ—ବାୟୁତତ୍ତ୍ୱର ସ୍ୱାଭାବିକ ଗୁଣ ‘ସ୍ପର୍ଶ’; ତାହା ତ୍ୱଚା ଦ୍ୱାରା ଜଣାଯାଏ। ତ୍ୱଚାରେ ଅଧିଷ୍ଠିତ ବାୟୁ ସ୍ପର୍ଶାନୁଭବର ସାଧନ ଭାବେ ନିୟୁକ୍ତ।

Verse 33

आकाश स्य गुणो होष श्रोत्रेण च स गृहाते । श्रोत्रस्थाश्व दिश: सर्वा: शब्दज्ञाने प्रकीर्तिता:,आकाशके गुण शब्दका कानोंके द्वारा ग्रहण होता है और कानमें स्थित सम्पूर्ण दिशाएँ शब्दके श्रवणमें सहायक बतायी गयी हैं

ବାୟୁ କହିଲେ—ଆକାଶତତ୍ତ୍ୱର ଗୁଣ ‘ଶବ୍ଦ’; ତାହା ଶ୍ରୋତ୍ର ଦ୍ୱାରା ଗ୍ରହଣ ହୁଏ। ଶ୍ରୋତ୍ରରେ ଅଧିଷ୍ଠିତ ସମସ୍ତ ଦିଗ ଶବ୍ଦଜ୍ଞାନ ଓ ଶ୍ରବଣରେ ସହାୟକ ବୋଲି କୁହାଯାଏ।

Verse 34

मनसश्च गुणश्रिन्ता प्रज्ञया स तु गृहाते । हृदिस्थश्लेतनो धातुर्मनोज्ञाने विधीयते,मनका गुण चिन्तन है, जिसका बुद्धिके द्वारा ग्रहण किया जाता है और हृदयमें स्थित चेतन (आत्मा) मनके चिन्तन-कार्यमें सहायता देता है

ବାୟୁ କହିଲେ—ମନର ଗୁଣ ‘ଚିନ୍ତନ’; ତାହା ପ୍ରଜ୍ଞା (ବୁଦ୍ଧି) ଦ୍ୱାରା ଗ୍ରହଣ ହୁଏ। ହୃଦୟରେ ଅଧିଷ୍ଠିତ ଚେତନ ତତ୍ତ୍ୱ—ଆତ୍ମା—ମନର ଜ୍ଞାନ ଓ ଚିନ୍ତନକ୍ରିୟାରେ ସହାୟକ ଭାବେ ନିୟୁକ୍ତ।

Verse 35

बुद्धिरध्यवसायेन ज्ञानेन च महांस्तथा । निश्चित्य ग्रहणाद्‌ व्यक्तमव्यक्तं नात्र संशय:,निश्चयके द्वारा बुद्धिका और ज्ञानके द्वारा महत्तत्त्वका ग्रहण होता है। इनके कार्योंसे ही इनकी सत्ताका निश्चय होता है और इसीसे इन्हें व्यक्त माना जाता है, किंतु वास्तवमें तो अतीन्द्रिय होनेके कारण ये बुद्धि आदि अव्यक्त ही हैं, इसमें संशय नहीं है

ବାୟୁ କହିଲେ— ଅଧ୍ୟବସାୟରୂପ ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟଦ୍ୱାରା ବୁଦ୍ଧି ଗ୍ରହଣ ହୁଏ, ଏବଂ ଜ୍ଞାନଦ୍ୱାରା ମହତ୍ତତ୍ତ୍ୱ ମଧ୍ୟ ନିର୍ଣ୍ଣୟ ହୁଏ। ତାଙ୍କର କାର୍ଯ୍ୟରୁ ହିଁ ସତ୍ତାର ନିଶ୍ଚୟ ହୁଏ, ତେଣୁ ‘ବ୍ୟକ୍ତ’ ବୋଲି କୁହାଯାଏ; କିନ୍ତୁ ପ୍ରକୃତରେ ଇନ୍ଦ୍ରିୟାତୀତ ଥିବାରୁ ବୁଦ୍ଧି ଆଦି ସବୁ ‘ଅବ୍ୟକ୍ତ’ ହିଁ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।

Verse 36

एते द्रुमाणां राजानो लोके5स्मिन्‌ नात्र संशय: । बरगद, जामुन, पीपल, सेमल, शीशम, मेषशुंग (मेढ़ासिंगी) और पोले बाँस--ये इस लोकमें वृक्षोंके राजा हैं, इसमें संदेह नहीं है,अलिड्डग्रहणो नित्य: क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मक: । तस्मादलिड्: क्षेत्रज्ञ: केवलं ज्ञानलक्षण: नित्य क्षेत्रज्ञ आत्माका कोई ज्ञापक लिंग नहीं है; क्योंकि वह (स्वयंप्रकाश और) निर्गुण है। अतः: क्षेत्रज्ष अलिंग (किसी विशेष लक्षणसे रहित) है; अतः केवल ज्ञान ही उसका लक्षण (स्वरूप) माना गया है

ବାୟୁ କହିଲେ— ଏହି ଲୋକରେ ଏମାନେ ହିଁ ବୃକ୍ଷମାନଙ୍କର ରାଜା; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ। ନିତ୍ୟ କ୍ଷେତ୍ରଜ୍ଞ ଆତ୍ମା କୌଣସି ବାହ୍ୟ ଲିଙ୍ଗଦ୍ୱାରା ଗ୍ରହଣ ହୁଏ ନାହିଁ, କାରଣ ସେ ନିର୍ଗୁଣ। ତେଣୁ କ୍ଷେତ୍ରଜ୍ଞ ଅଲିଙ୍ଗ; ଶୁଦ୍ଧ ଜ୍ଞାନ (ଚେତନା) ହିଁ ତାହାର ଲକ୍ଷଣ ବୋଲି ମନାଯାଏ।

Verse 37

अब्यक्तं क्षेत्रमुद्दिष्टं गुणानां प्रभवाप्ययम्‌ । सदा पश्याम्यहं लीनो विजानामि शृणोमि च,गुणोंकी उत्पत्ति और लयके कारणभूत अव्यक्त प्रकृतिको क्षेत्र कहते हैं। मैं उसमें संलग्न होकर सदा उसे जानता और सुनता हूँ

ବାୟୁ କହିଲେ— ଅବ୍ୟକ୍ତ (ପ୍ରକୃତି)କୁ ‘କ୍ଷେତ୍ର’ ବୋଲି କୁହାଯାଇଛି, କାରଣ ଗୁଣମାନଙ୍କର ଉତ୍ପତ୍ତି ଓ ଲୟର କାରଣ ସେଇ। ମୁଁ ତାହାରେ ଲୀନ ହୋଇ ସଦା ତାକୁ ଦେଖେ; ତାକୁ ଜାଣେ, ଏବଂ (ତାହାର ସତ୍ୟ) ଶୁଣେ ମଧ୍ୟ।

Verse 38

पुरुषस्तद्‌ विजानीते तस्मात्‌ क्षेत्रज्ञ उच्यते । गुणवृत्तं तथा वृत्तं क्षेत्रज्ञ: परिपश्यति,आत्मा क्षेत्रको जानता है, इसलिये वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है। क्षेत्रज्ष आदि, मध्य और अन्तसे युक्त समस्त उत्पत्तिशील अचेतन गुणोंके कार्यको और उनकी क्रियाको भी भलीभाँति जानता है, किंतु बारंबार उत्पन्न होनेवाले गुण आत्माको नहीं जान पाते

ବାୟୁ କହିଲେ— ପୁରୁଷ (ଆତ୍ମା) ସେଇ କ୍ଷେତ୍ରକୁ ଜାଣେ; ତେଣୁ ସେ ‘କ୍ଷେତ୍ରଜ୍ଞ’ ବୋଲି କୁହାଯାଏ। କ୍ଷେତ୍ରଜ୍ଞ ଗୁଣମାନଙ୍କର ବୃତ୍ତି ଓ ସେମାନଙ୍କର ସମସ୍ତ କ୍ରିୟାକୁ ସ୍ପଷ୍ଟ ଭାବେ ଦେଖେ-ଜାଣେ; କିନ୍ତୁ ଗୁଣମାନେ ପୁନଃପୁନଃ ଉତ୍ପନ୍ନ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଆତ୍ମାକୁ ଜାଣିପାରନ୍ତି ନାହିଁ।

Verse 39

आदिमध्यावसानान्तं सृज्यमानमचेतनम्‌ । न गुणा विदुरात्मानं सृज्यमाना: पुनः पुन:,आत्मा क्षेत्रको जानता है, इसलिये वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है। क्षेत्रज्ष आदि, मध्य और अन्तसे युक्त समस्त उत्पत्तिशील अचेतन गुणोंके कार्यको और उनकी क्रियाको भी भलीभाँति जानता है, किंतु बारंबार उत्पन्न होनेवाले गुण आत्माको नहीं जान पाते

ବାୟୁ କହିଲେ— ଯାହା କିଛି ସୃଷ୍ଟି ହୁଏ ତାହା ଅଚେତନ; ତାହାର ଆଦି, ମଧ୍ୟ ଓ ଅନ୍ତ ଥାଏ। କିନ୍ତୁ ଗୁଣମାନେ ପୁନଃପୁନଃ ଉତ୍ପନ୍ନ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଆତ୍ମାକୁ ଜାଣିପାରନ୍ତି ନାହିଁ। କ୍ଷେତ୍ରଜ୍ଞ ହିଁ ଏହି ସମଗ୍ର ଅଚେତନ କ୍ଷେତ୍ରର ଉଦ୍ଭବ, ପ୍ରବୃତ୍ତି ଓ ଲୟକୁ ସ୍ପଷ୍ଟ ଭାବେ ଜାଣେ।

Verse 40

न सत्यं विन्दते वक्षित क्षेत्रज्ञस्त्वेव विन्दति । गुणानां गुणभूतानां यत्‌ परं परमं महत्‌,जो गुणों और गुणोंके कार्योंसे अत्यन्त परे है, उस परम महान्‌ सत्यस्वरूप क्षेत्रज्ञको कोई नहीं जानता, परंतु वह सबको जानता है

ବାୟୁ କହିଲେ— ଗୁଣମାନଙ୍କୁ ଓ ଗୁଣଜନିତ ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟକୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଅତିକ୍ରମ କରିଥିବା ସେଇ ପରମ ମହାନ୍ ସତ୍ୟସ୍ୱରୂପ କ୍ଷେତ୍ରଜ୍ଞକୁ କେହି ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ ଜାଣିପାରେ ନାହିଁ, ନ ତାଙ୍କର ପୂର୍ଣ୍ଣ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିପାରେ। କିନ୍ତୁ ସେଇ ପରମାତ୍ମା ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ଓ ସମସ୍ତ ବିଷୟକୁ ଜାଣନ୍ତି।

Verse 41

तस्माद्‌ गुणांश्नव सत्त्वं च परित्यज्येह धर्मवित्‌ | क्षीणदोषो गुणातीत): क्षेत्रज्ञ प्रविशत्यथ,अतः इस लोकमें जिसके दोषोंका क्षय हो गया है, वह गुणातीत धर्मज्ञ पुरुष सत्त्व (बुद्धि) और गुणोंका परित्याग करके क्षेत्रज्ञके शुद्ध स्वरूप परमात्मामें प्रवेश कर जाता है

ଏହେତୁ ଏହି ଲୋକରେ ଧର୍ମଜ୍ଞ ପୁରୁଷ ଗୁଣମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଆସକ୍ତି—ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସତ୍ତ୍ୱ (ବୁଦ୍ଧିର ପ୍ରସାଦ) ପ୍ରତି ଆସକ୍ତିକୁ ମଧ୍ୟ—ତ୍ୟାଗ କରିବା ଉଚିତ। ଦୋଷ କ୍ଷୀଣ ହେଲେ ସେ ଗୁଣାତୀତ ହୋଇ କ୍ଷେତ୍ରଜ୍ଞଙ୍କ ଶୁଦ୍ଧ ସ୍ୱରୂପ ପରମାତ୍ମାରେ ପ୍ରବେଶ କରେ।

Verse 42

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,निर्द्धदद्वों निर्ममस्कारो नि:ःस्वाहाकार एव च | अचलकश्चानिकेतत्ष क्षेत्रज्ञ: स परो विभु: क्षेत्रज् सुख-दुखादि द्वन्द्ोंसे रहित, किसीको नमस्कार न करनेवाला, स्वाहाकाररूप यज्ञादि कर्म न करनेवाला, अचल और अनिकेत है। वही महान्‌ विभु है

ବାୟୁ କହିଲେ— କ୍ଷେତ୍ରଜ୍ଞ ସୁଖ-ଦୁଃଖାଦି ଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱରୁ ମୁକ୍ତ; ସେ କାହା ପ୍ରତି ପରାଧୀନ ହୋଇ ନମସ୍କାର କରେ ନାହିଁ, ‘ସ୍ୱାହା’ ଉଚ୍ଚାରଣସହିତ ଯଜ୍ଞାଦି କର୍ମରେ ବନ୍ଧା ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ। ସେ ଅଚଳ ଓ ଅନିକେତ—ସେଇ ପରମ ସର୍ବବ୍ୟାପୀ ବିଭୁ।

Verse 43

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे त्रिचत्वारिंशो 5ध्याय:

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଆଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଅନୁଗୀତା ପର୍ବରେ ଗୁରୁ-ଶିଷ୍ୟ ସଂବାଦର ତ୍ରିଚତ୍ୱାରିଂଶ (43ତମ) ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 193

प्राप्रुवन्ति महात्मान इति वित्त द्विजर्षभा: । द्विजवरो! जिनके राज्यमें श्रेष्ठ पुरुषोंकी सब प्रकारसे रक्षा की जाती है, वे महामना नरेश इस लोकमें आनन्दके भागी होते हैं और परलोकमें अक्षय सुख प्राप्त करते हैं, ऐसा समझो

ବାୟୁ କହିଲେ— ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ, ଏହା ଜାଣ: ଯେ ରାଜ୍ୟରେ ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାରେ ରକ୍ଷା କରାଯାଏ, ସେହି ମହାମନା ନରେଶମାନେ ଏହି ଲୋକରେ ସୁଖର ଭାଗୀ ହୁଅନ୍ତି ଏବଂ ପରଲୋକରେ ଅକ୍ଷୟ ସୁଖ ପ୍ରାପ୍ତ କରନ୍ତି।

Verse 243

बुद्धिह्हि व्यवसायेन लक्ष्यते नात्र संशय: । चिन्तन मनका और निश्चय बुद्धिका लक्षण है; क्योंकि मनुष्य इस जगतमें मनके द्वारा चिन्तन की हुई वस्तुओंका बुद्धिसे ही निश्चय करते हैं, निश्चयके द्वारा ही बुद्धि जाननेमें आती है, इसमें संदेह नहीं है

ବାୟୁ କହିଲେ— ବୁଦ୍ଧି ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟଶକ୍ତି ଦ୍ୱାରା ଚିହ୍ନଟ ହୁଏ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ। ମନ ନାନା ଚିନ୍ତା ଓ ସମ୍ଭାବନା ଉଠାଏ, କିନ୍ତୁ କ’ଣ ଗ୍ରହଣୀୟ ତାହା ବୁଦ୍ଧି ହିଁ ନିର୍ଣ୍ଣୟ କରି ସ୍ଥିର କରେ। ତେଣୁ ନିଶ୍ଚିତତା ଓ ଦୃଢ଼ ନିଷ୍ପତ୍ତି ହିଁ ବୁଦ୍ଧିର ଲକ୍ଷଣ।

Frequently Asked Questions

The chapter frames the ethical choice as governance through protection and non-harm: rulers must decide whether to uphold ahiṃsā-informed dharma by safeguarding sādhus and dvijas, or fall into adharma characterized by hiṃsā and neglect of moral dependents.

The listener is guided to diagnose reality via lakṣaṇas and to shift identification from guṇa-conditioned processes (kṣetra/avyakta) to the unmarked knower (kṣetrajña), cultivating knowledge and renunciation that culminate in freedom from dualities.

Rather than a formal phalaśruti formula, the chapter embeds outcome-statements: protecting the virtuous yields welfare here and favorable post-mortem results, while knowledge-linked saṃnyāsa leads to the ‘paramā gati’ described as beyond darkness, death, and aging.