Adhyaya 21
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 2127 Verses

Adhyaya 21

Vāc–Manas Saṃvāda: Prāṇa-Apāna and the Primacy Debate (वाक्–मनस् संवादः)

Upa-parva: Anugītā / Brahmaṇa–Brāhmaṇī Saṃvāda (Didactic Discourse Segment)

A Brahmaṇa introduces an ancient exemplum and proceeds to describe a subtle model of cognition and embodiment, linking citta (mind-stuff), jñāna (knowing), and the embodied knower. The discourse employs ritual imagery (gārhapatya and āhavanīya fires; offering of haviṣ) to suggest ordered transformation from embodied support to articulated action. A Brāhmaṇī then questions the apparent sequence and causality between speech (vāc) and mind (manas), asking by what cognitive integration (vijñāna-yoga) intention becomes effective and what restrains it. The Brahmaṇa replies by explaining the role of apāna and its governance, situating mati (intellect/intent) in relation to manas. The narrative shifts to a formal dispute: vāc and manas approach Bhūtātman to decide superiority. Bhūtātman assigns mind a foundational status while acknowledging speech’s domain over the mobile (jaṅgama) through mantra, phoneme, and intonation. Speech is portrayed as dependent on breath—standing between prāṇa and apāna—and unable to function without inhalation/exhalation, leading to an account of prāṇa, apāna, udāna, and vyāna as systemic supports. The chapter concludes by distinguishing mind’s ‘stability’ (sthāvara) and speech’s ‘mobility’ (jaṅgama), presenting a complementary hierarchy rather than a simple exclusion.

Chapter Arc: ब्राह्मण देवता प्रिये से कहते हैं कि विद्वान इस रहस्य को समझाने हेतु एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं—जैसे दस होता मिलकर यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं। → वे ‘दस होताओं’ को देह-इन्द्रियों के रूप में स्थापित करते हैं—कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा/वाक्, नासिका, चरण, कर, उपस्थ, और वायु/प्राण—और बताते हैं कि इनके ‘दस हवि’ हैं: शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, वाणी, क्रिया, गति, तथा रेत-मूत्र-पुरीष का त्याग। फिर मन के दो पक्षों (स्थावर/जंगम; जड़/अजड़) और वाणी के सूक्ष्म भेदों की ओर संवाद बढ़ता है। → वाणी के दो रूप—घोषिणी (स्पष्ट, श्रव्य) और निर्घोषा (अश्रव्य/अन्तर्वाणी)—का निर्णायक विवेचन होता है; ब्राह्मण देवता सूक्ष्म प्रवाहमान वाणी के अन्तर को दिखाते हुए निर्घोषा को अधिक ‘गरीयसी’ ठहराते हैं, और बताते हैं कि वाक् प्राण-अपान-उदान-व्यान-समान के क्रम से देह में स्थित होकर कार्य करती है। → अध्याय का निष्कर्ष यह बनता है कि बाह्य कर्म-इन्द्रिय-यज्ञ के पीछे एक सूक्ष्म यज्ञ चल रहा है—जहाँ मन और वाणी के स्तर (स्थावर/जड़ बनाम सूक्ष्म/निर्घोष) साधक की आन्तरिक श्रेष्ठता का मानदण्ड हैं; इन्द्रियों के हवि-त्याग और प्राण-चक्र की समझ से आत्मानुशासन का मार्ग स्पष्ट होता है।

Shlokas

Verse 1

ब्राह्मण कहते हैं--प्रिये! इस विषयमें विद्वान्‌ पुरुष इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। दस होता मिलकर जिस प्रकार यज्ञका अनुष्ठान करते हैं, वह सुनो

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—ପ୍ରିୟେ! ଏହି ବିଷୟରେ ବିଦ୍ୱାନ ପୁରୁଷମାନେ ଏକ ପ୍ରାଚୀନ ଇତିହାସର ଉଦାହରଣ ଦେଇଥାନ୍ତି। ଦଶ ହୋତା ଏକତ୍ର ହୋଇ ଯେପରି ଯଜ୍ଞର ଅନୁଷ୍ଠାନ କରନ୍ତି, ତାହା ଶୁଣ।

Verse 2

श्रोत्रं त्वक्‌ चक्षुषी जिह्नवा नासिका चरणौ करौ । उपस्थ॑ वायुरिति वा होतृणि दश भामिनि,भामिनि! कान, त्वचा, नेत्र, जिह्ला (वाक्‌ और रसना), नासिका, हाथ, पैर, उपस्थ और गुदा--से दस होता हैं

ଭାମିନୀ! କାନ, ଚର୍ମ, ଚକ୍ଷୁ, ଜିହ୍ୱା, ନାସିକା, ଦୁଇ ପାଦ, ଦୁଇ ହାତ, ଉପସ୍ଥ ଓ ଗୁଦ—ଏହି ଦଶ ହୋତା।

Verse 3

शब्दस्पर्शों रूपरसौ गन्धो वाक्य क्रिया गति: । रेतोमूत्रपुरीषाणां त्यागो दश हवींषि च,शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, वाणी, क्रिया, गति, वीर्य, मूत्रका त्याग और मल-त्याग-- ये दस विषय ही दस हविष्य हैं

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—ଶବ୍ଦ ଓ ସ୍ପର୍ଶ, ରୂପ ଓ ରସ, ଏବଂ ଗନ୍ଧ; ବାଣୀ, କ୍ରିୟା ଓ ଗତି; ତଥା ବୀର୍ୟ, ମୂତ୍ର ଓ ମଳର ତ୍ୟାଗ—ଏହି ଦଶଟିକୁ ଦଶ ହବିଷ୍ୟ ବୋଲି ଗଣାଯାଏ। ଅର୍ଥାତ୍ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ-ନିଗ୍ରହ ଓ ଦେହ-ସଂଯମ ହିଁ ଅନ୍ତର୍ଯଜ୍ଞର ଆହୁତି, ଯାହା ସାଧାରଣ ପ୍ରବୃତ୍ତିକୁ ଧର୍ମମୟ ଆତ୍ମ-ନିୟମର ପଥରେ ପରିଣତ କରେ।

Verse 4

दिशो वायू रविश्वन्द्र: पृथ्व्यग्नी विष्णुरेव च । इन्द्र: प्रजापतिर्मित्रमग्नयो दश भामिनि,भामिनि! दिशा, वायु, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, अग्नि, विष्णु, इन्द्र, प्रजापति और मित्र--ये दस देवता अनिनि हैं

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—ହେ ଭାମିନି! ଦିଗମାନ, ବାୟୁ, ସୂର୍ଯ୍ୟ, ଚନ୍ଦ୍ର, ପୃଥିବୀ, ଅଗ୍ନି, ବିଷ୍ଣୁ, ଇନ୍ଦ୍ର, ପ୍ରଜାପତି ଓ ମିତ୍ର—ଏହି ଦଶଜଣ ଦିବ୍ୟ ସାକ୍ଷୀ। ଏହା ଜଣାଏ ଯେ କର୍ମ କେବେ ଲୁଚେ ନାହିଁ; ବିଶ୍ୱ ନିଜେ ତାହାର ଅଧିଷ୍ଠାତୃ ଶକ୍ତିସହ ସାକ୍ଷୀ—ତେଣୁ ସତ୍ୟ, ସଂଯମ ଓ ଦାୟିତ୍ୱ ଅବଲମ୍ବନୀୟ।

Verse 5

दशेन्द्रियाणि होतृणि हवींषि दश भाविनि । विषया नाम समिधो हूयन्ते तु दशाग्निषु,भाविनि! दस इन्द्रियरूपी होता दस देवतारूपी अग्निमें दस विषयरूपी हविष्य एवं समिधाओंका हवन करते हैं (इस प्रकार मेरे अन्तरमें निरन्तर यज्ञ हो रहा है; फिर मैं अकर्मण्य कैसे हूँ?)

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—ହେ ଭାବିନି! ଦଶ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ହିଁ ହୋତା; ହବିଷ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଦଶ ପ୍ରକାର। ବିଷୟମାନ ସମିଧା ସଦୃଶ ହୋଇ ଦଶ ଅଗ୍ନିରେ ଆହୁତି ରୂପେ ହୋମ ହୁଅନ୍ତି। ଏଭଳି ମୋ ଅନ୍ତରେ ନିରନ୍ତର ଯଜ୍ଞ ଚାଲିଛି—ତେବେ ମୁଁ ଅକର୍ମଣ୍ୟ କିପରି?

Verse 6

चित्तं ख्रुवश्न वित्तं च पवित्र ज्ञानमुत्तमम्‌ । सुविभक्तमिदं सर्व जगदासीदिति श्रुतम्‌,इस यज्ञमें चित्त ही खुवा तथा पवित्र एवं उत्तम ज्ञान ही धन है। यह सम्पूर्ण जगत्‌ पहले भलीभाँति विभक्त था--ऐसा सुना गया है

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—ଏହି ଯଜ୍ଞରେ ଚିତ୍ତ ହିଁ ଧ୍ରୁବ ଆଧାର; ପବିତ୍ର ଓ ଉତ୍ତମ ଜ୍ଞାନ ହିଁ ସତ୍ୟ ଧନ। ଶ୍ରୁତିରେ ଏହା ମଧ୍ୟ ଶୁଣାଯାଏ ଯେ ଏହି ସମଗ୍ର ଜଗତ୍ ଏକଦା ସୁବ୍ୟବସ୍ଥିତ ଭାବେ ଯଥାଯଥ ଭାଗରେ ବିଭକ୍ତ ଥିଲା।

Verse 7

सर्वमेवाथ विज्ञेयं चित्तं ज्ञानमवेक्षते | रेत:शरीरभृत्काये विज्ञाता तु शरीरभूृत्‌,जाननेमें आनेवाला यह सारा जगत्‌ चित्तरूप ही है, वह ज्ञानकी अर्थात्‌ प्रकाशककी अपेक्षा रखता है तथा वीर्यजनित शरीर-समुदायमें रहनेवाला शरीरधारी जीव उसको जाननेवाला है

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—ଜାଣିବାଯୋଗ୍ୟ ସମସ୍ତ କିଛି ପ୍ରକୃତରେ ଚିତ୍ତସ୍ୱରୂପ; ତାହାର ପ୍ରକାଶ ପାଇଁ ଜ୍ଞାନ—ଅର୍ଥାତ୍ ଆଲୋକକ—ର ଆଶ୍ରୟ ଦରକାର। ଏବଂ ବୀର୍ୟଜନିତ ଶରୀରସମୂହରେ ବସୁଥିବା ଦେହଧାରୀ ଜୀବ ହିଁ ତାହାର ଜ୍ଞାତା।

Verse 8

शरीरभद्‌ गार्हपत्यस्तस्मादन्य: प्रणीयते । मनश्नलाहवनीयस्तु तस्मिन्‌ प्रक्षिप्पते हवि:,वह शरीरका अभिमानी जीव गार्हपत्य अग्नि है। उससे जो दूसरा पावक प्रकट होता है, वह मन है। मन आहवनीय अग्नि है। उसीमें पूर्वोक्त हविष्यकी आहुति दी जाती है

ଦେହାଭିମାନୀ ଜୀବକୁ ଗାର୍ହପତ୍ୟ ଅଗ୍ନି କୁହାଯାଏ। ସେଠାରୁ ଆଉ ଗୋଟିଏ ଅଗ୍ନି ଉଦ୍ଭବ ହୁଏ—ସେହି ମନ। ମନ ହିଁ ଆହବନୀୟ ଅଗ୍ନି; ପୂର୍ବୋକ୍ତ ହବି ସେଥିରେ ଆହୁତି ହୁଏ।

Verse 9

ततो वाचस्पतिर्जज्ञे त॑ं मन: पर्यवेक्षते । रूपं भवति वैवर्ण समनुद्रवते मन:,उससे वाचस्पति (वेदवाणी)-का प्राकट्य होता है। उसे मन देखता है। मनके अनन्तर रूपका प्रादुर्भाव होता है, जो नील-पीत आदि वर्णोंसे रहित होता है। वह रूप मनकी ओर दौड़ता है

ତାପରେ ବାଚସ୍ପତି—ବେଦବାଣୀ—ପ୍ରକଟ ହୁଏ; ମନ ତାହାକୁ ସାବଧାନରେ ଅବଲୋକନ କରେ। ମନ ପରେ ରୂପର ଉଦ୍ଭବ ହୁଏ—ନୀଳ, ପୀତ ଆଦି ବର୍ଣ୍ଣଭେଦରହିତ ରୂପ। ସେହି ରୂପ ମନ ଦିଗକୁ ଧାଉଁଥାଏ।

Verse 10

ब्राह्मण्युवाच कस्माद्‌ वागभवत्‌ पूर्व कस्मात्‌ पश्चान्मनो5भवत्‌ | मनसा चिन्तितं वाक्यं यदा समभिपद्यते,ब्राह्मणी बोली--प्रियतम! किस कारणसे वाक्‌की उत्पत्ति पहले हुई और क्‍यों मन पीछे हुआ? जब कि मनसे सोचे-विचारे वचनको ही व्यवहारमें लाया जाता है

ବ୍ରାହ୍ମଣୀ କହିଲେ—ପ୍ରିୟତମ! କେଉଁ କାରଣରୁ ବାକ୍ ପ୍ରଥମେ ଉତ୍ପନ୍ନ ହେଲା ଏବଂ ମନ ପରେ କାହିଁକି ହେଲା? କାରଣ ବ୍ୟବହାରରେ ତ ମନେ ଚିନ୍ତା କରାଯାଇଥିବା ବାକ୍ୟକୁ ହିଁ ଗ୍ରହଣ କରାଯାଏ।

Verse 11

केन विज्ञानयोगेन मतिक्षित्तं समास्थिता । समुन्नीता नाध्यगच्छत्‌ को वै तां प्रतिबाधते,किस विज्ञानके प्रभावसे मति चित्तके आश्रित होती है? वह ऊँचे उठायी जानेपर विषयोंकी ओर क्यों नहीं जाती? कौन उसके मार्गमें बाधा डालता है?

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—କେଉଁ ବିଜ୍ଞାନ-ଯୋଗର ପ୍ରଭାବରେ ମତି ଚିତ୍ତରେ ଦୃଢ଼ଭାବେ ସ୍ଥିର ହୁଏ? ଏବଂ ତାହାକୁ ଉପରକୁ ଉଠାଇଲେ ସେ କାହିଁକି ବିଷୟମାନଙ୍କ ଦିଗକୁ ଧାଉଁନାହିଁ? ପ୍ରକୃତରେ କିଏ ତାହାର ପଥ ରୋକି ନିୟମିତ କରେ?

Verse 12

ब्राह्मण उवाच तामपान: पतिर्भूत्वा तस्मात्‌ प्रेषत्यपानताम्‌ । तां गतिं मनसः प्राहुर्मनस्तस्मादपेक्षते,ब्राह्मणने कहा--प्रिये! अपान पतिरूप होकर उस मतिको अपानभावकी ओर ले जाता है। वह अपानभावकी प्राप्ति मनकी गति बतायी गयी है, इसलिये मन उसकी अपेक्षा रखता है

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—ପ୍ରିୟେ! ଅପାନ ପତିରୂପ ହୋଇ ସେହି ମତିକୁ ଅପାନଭାବ ଦିଗକୁ ପ୍ରେରଣ କରେ। ଅପାନଭାବର ଏହି ପ୍ରାପ୍ତିକୁ ମନର ଗତି କୁହାଯାଏ; ତେଣୁ ମନ ତାହାକୁ ଅପେକ୍ଷା କରେ।

Verse 13

प्रश्न॑ तु वाइमनसोर्मा यस्मात्‌ त्वमनुपृच्छसि । तस्मात्‌ ते वर्तयिष्यामि तयोरेव समाह्दयम्‌,परंतु तुम मुझसे वाणी और मनके विषयमें ही प्रश्न करती हो, इसलिये मैं तुम्हें उन्हीं दोनोंका संवाद बताऊँगा

କିନ୍ତୁ ତୁମେ ମୋତେ ବିଶେଷକରି ମନ ଓ ବାଣୀ ବିଷୟରେ ହିଁ ପଚାରୁଛ; ତେଣୁ ମୁଁ ସେଇ ଦୁହିଁଙ୍କ ସଂବାଦର ସାର—ତାଙ୍କ କଥୋପକଥନର ହୃଦୟାର୍ଥ—ତୁମକୁ କହିବି।

Verse 14

उभे वाड्मनसी गत्वा भूतात्मानमपृच्छताम्‌ | आवयो: श्रेष्ठमाचश्व छिन्धि नौ संशयं विभो,मन और वाणी दोनोंने जीवात्माके पास जाकर पूछा--'प्रभो! हम दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है? यह बताओ और हमारे संदेहका निवारण करो”

ମନ ଓ ବାଣୀ—ଦୁହେଁ—ଜୀବାତ୍ମାଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ ପଚାରିଲେ: “ହେ ବିଭୋ! ଆମ ଦୁହିଁଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ କିଏ ଶ୍ରେଷ୍ଠ? କହନ୍ତୁ ଏବଂ ଆମ ସନ୍ଦେହ ଛେଦନ କରନ୍ତୁ।”

Verse 15

मन इत्येव भगवांस्तदा प्राह सरस्वती । अहं वै कामधुक्‌ तुभ्यमिति तं प्राह वागथ,तब भगवान्‌ आत्मदेवने कहा--“मन ही श्रेष्ठ है।। यह सुनकर सरस्वती बोलीं--*मैं ही तुम्हारे लिये कामधेनु बनकर सब कुछ देती हूँ।” इस प्रकार वाणीने स्वयं ही अपनी श्रेष्ठता बतायी

ତେବେ ଭଗବାନ୍ ସରସ୍ୱତୀଙ୍କୁ କହିଲେ—“ମନ ହିଁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ।” ଏହା ଶୁଣି ସରସ୍ୱତୀ—ବାଣୀରୂପା—କହିଲେ: “ମୁଁ ହିଁ ତୁମ ପାଇଁ କାମଧେନୁ; ମୁଁ ତୁମକୁ ସବୁ କିଛି ଦେଉଛି।” ଏଭଳି ଭାବେ ବାଣୀ ନିଜ ଶ୍ରେଷ୍ଠତା ପ୍ରକାଶ କଲା।

Verse 16

ब्राह्मण उवाच स्थावरं जड़म॑ चैव विद्धयुभे मनसी मम । स्थावरं मत्सकाशे वै जड़मं विषये तव,ब्राह्मण देवता कहते हैं--प्रिये! स्थावर और जंगम ये दोनों मेरे मन हैं। स्थावर अर्थात्‌ बाह्य इन्द्रियोंसे गृहीत होनेवाला जो यह जगत्‌ है, वह मेरे समीप है और जंगम अर्थात्‌ इन्द्रियातीत जो स्वर्ग आदि है, वह तुम्हारे अधिकारमें है

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—“ପ୍ରିୟେ! ‘ସ୍ଥାବର’ ଓ ‘ଜଡ’—ଏ ଦୁହିଁ ମୋ ମନର ଦୁଇ ରୂପ। ସ୍ଥାବର ଅର୍ଥାତ୍ ବାହ୍ୟ ଇନ୍ଦ୍ରିୟରେ ଗ୍ରାହ୍ୟ ଜଗତ ମୋ ନିକଟରେ; ଜଡ ଅର୍ଥାତ୍ ଇନ୍ଦ୍ରିୟାତୀତ—ସ୍ୱର୍ଗାଦି ସଦୃଶ—ତୁମ ବିଷୟରେ ପଡ଼େ।”

Verse 17

यस्तु तं विषयं गच्छेन्मन्त्रो वर्ण: स्वरोडपि वा | तन्‍मनो जड़मो नाम तस्मादसि गरीयसी,जो मन्त्र, वर्ण अथवा स्वर उस अलौकिक विषयको प्रकाशित करता है, उसका अनुसरण करनेवाला मन भी यद्यपि जंगम नाम धारण करता है तथापि वाणीस्वरूपा तुम्हारे द्वारा ही मनका उस अतीन्द्रिय जगतमें प्रवेश होता है। इसलिये तुम मनसे भी श्रेष्ठ एवं गौरवशालिनी हो

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—“ମନ୍ତ୍ର, ବର୍ଣ୍ଣ କିମ୍ବା ସ୍ୱର ଦ୍ୱାରା ଯେ ଅତୀନ୍ଦ୍ରିୟ ବିଷୟ ପ୍ରାପ୍ୟ, ସେଥିପାଇଁ ଯାଉଥିବା ମନକୁ ମଧ୍ୟ ‘ଜଡ’ ବୋଲି କୁହାଯାଏ। ଏବଂ ବାଣୀ-ସ୍ୱରୂପା ତୁମ ଦ୍ୱାରା ହିଁ ମନ ସେଇ ପରାତ୍ପର ଲୋକରେ ପ୍ରବେଶ ପାଏ; ତେଣୁ ତୁମେ ମନଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଅଧିକ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଓ ପୂଜ୍ୟ।”

Verse 18

यस्मादपि समाधिस्ते स्वयमभ्येस्त शो भने । तस्मादुच्छवासमासाद्य प्रवक्ष्यामि सरस्वति,क्योंकि शोभामयी सरस्वति! तुमने स्वयं ही पास आकर समाधान अर्थात्‌ अपने पक्षकी पुष्टि की है। इससे मैं उच्छवास लेकर कुछ कहूँगा

ହେ ଦୀପ୍ତିମୟୀ ସରସ୍ୱତୀ! ତୁମେ ନିଜେ ଆଗେଇ ଆସି ସମାଧାନ—ଅର୍ଥାତ୍ ବିବାଦିତ ବିଷୟର ପୁଷ୍ଟି—କରିଛ। ତେଣୁ ମୁଁ ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଧରି, ଉଚ୍ଛ୍ୱାସ ନେଇ, ଏବେ କହୁଛି।

Verse 19

प्राणापानान्तरे देवी वाग्‌ वै नित्यं सम तिष्ठति । प्रेयमाणा महाभागे विना प्राणमपानती । प्रजापतिमुपाधावत्‌ प्रसीद भगवज्निति,महाभागे! प्राण और अपानके बीचमें देवी सरस्वती सदा विद्यमान रहती हैं। वह प्राणकी सहायताके बिना जब निम्नतम दशाको प्राप्त होने लगी, तब दौड़ी हुई प्रजापतिके पास गयी और बोली--“भगवन्‌! प्रसन्न होइये”

ମହାଭାଗେ! ପ୍ରାଣ ଓ ଅପାନର ମଧ୍ୟରେ ଦେବୀ ବାକ୍ ସଦା ଅବସ୍ଥିତ ରହନ୍ତି। କିନ୍ତୁ ପ୍ରାଣ-ଅପାନର ଆଧାର ବିନା ସେ ଯେତେବେଳେ ନିମ୍ନତମ ଦଶାକୁ ଢଳିବାକୁ ଲାଗିଲେ, ସେ ଦୌଡ଼ି ପ୍ରଜାପତିଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲେ ଏବଂ କହିଲେ—“ଭଗବନ୍! ପ୍ରସନ୍ନ ହୁଅନ୍ତୁ।”

Verse 20

ततः प्राण: प्रादुरभूद्‌ वाचमाप्याययन्‌ पुनः । तस्मादुच्छवासमासाद्य न वाग्‌ वदति कहिचित्‌,तब वाणीको पुष्ट-सा करता हुआ पुन: प्राण प्रकट हुआ। इसीलिये उच्छवास लेते समय वाणी कभी कोई शब्द नहीं बोलती है

ତେବେ ବାକ୍‌କୁ ପୁନର୍ବାର ପୋଷଣ କରୁଥିବା ପ୍ରାଣ ପ୍ରକଟ ହେଲା। ତେଣୁ ଉଚ୍ଛ୍ୱାସ ନେବା ସମୟରେ ବାକ୍ କେବେ ମଧ୍ୟ କୌଣସି ଶବ୍ଦ କହେ ନାହିଁ।

Verse 21

घोषिणी जातनिर्घोषा नित्यमेव प्रवर्तते । तयोरपि च घोषिण्या निर्घोषैव गरीयसी,वाणी दो प्रकारकी होती है--एक घोषयुक्त (स्पष्ट सुनायी देनेवाली) और दूसरी घोषरहित, जो सदा सभी अवस्थाओंमें विद्यमान रहती है। इन दोनोंमें घोषयुक्त वाणीकी अपेक्षा घोषरहित ही श्रेष्ठतम है (क्योंकि घोषयुक्त वाणीको प्राणशक्तिकी अपेक्षा रहती है और घोषरहित उसकी अपेक्षाके बिना भी स्वभावत: उच्चरित होती रहती है)

ବାକ୍ ଦୁଇ ପ୍ରକାର—ଏକ ଘୋଷଯୁକ୍ତ, ଯାହା ସ୍ପଷ୍ଟ ଶୁଣାଯାଏ; ଅନ୍ୟଟି ଘୋଷରହିତ, ଯାହା ସମସ୍ତ ଅବସ୍ଥାରେ ସଦା ପ୍ରବର୍ତ୍ତିତ। ଏହି ଦୁଇଟିରେ ଘୋଷଯୁକ୍ତଠାରୁ ଘୋଷରହିତ ବାକ୍‌ ହିଁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ।

Verse 22

गौरिव प्रसवत्यर्थान्‌ रसमुत्तमशालिनी । सतत स्यन्दते होषा शाश्रृतं ब्रह्मवादिनी,शुचिस्मिते! घोषयुक्त (वैदिक) वाणी भी उत्तम गुणोंसे सुशोभित होती है। वह दूध देनेवाली गायकी भाँति मनुष्योंके लिये सदा उत्तम रस झरती एवं मनोवांछित पदार्थ उत्पन्न करती है और ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली उपनिषद्वाणी (शाश्वत ब्रह्म)-का बोध करानेवाली है। इस प्रकार वाणीरूपी गौ दिव्य और अदिव्य प्रभावसे युक्त है। दोनों ही सूक्ष्म हैं और अभीष्ट पदार्थका प्रस्रव करने-वाली हैं। इन दोनोंमें क्या अन्तर है, इसको स्वयं देखो

ହେ ଶୁଚିସ୍ମିତେ! ଘୋଷଯୁକ୍ତ ବାକ୍‌ ମଧ୍ୟ ଉତ୍ତମ ଗୁଣରେ ଶୋଭିତ। ଦୁଧ ଦେଉଥିବା ଗାଈ ପରି ସେ ଅର୍ଥକୁ ପ୍ରସବ କରେ, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରସ ଝରାଏ; ତାହାର ଘୋଷ ସତତ ବହେ ଏବଂ ସେ ଶାଶ୍ୱତ ବ୍ରହ୍ମକୁ ପ୍ରତିପାଦନ କରେ।

Verse 23

दिव्यादिव्यप्र भावेण भारती गौ: शुचिस्मिते । एतयोरन्तरं पश्य सूक्ष्मयो: स्यन्दमानयो:,शुचिस्मिते! घोषयुक्त (वैदिक) वाणी भी उत्तम गुणोंसे सुशोभित होती है। वह दूध देनेवाली गायकी भाँति मनुष्योंके लिये सदा उत्तम रस झरती एवं मनोवांछित पदार्थ उत्पन्न करती है और ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली उपनिषद्वाणी (शाश्वत ब्रह्म)-का बोध करानेवाली है। इस प्रकार वाणीरूपी गौ दिव्य और अदिव्य प्रभावसे युक्त है। दोनों ही सूक्ष्म हैं और अभीष्ट पदार्थका प्रस्रव करने-वाली हैं। इन दोनोंमें क्या अन्तर है, इसको स्वयं देखो

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—ହେ ଶୁଚିସ୍ମିତେ! ଭାରତୀ—ବାଣୀ—ଦୁଧ ଦେଉଥିବା ଗାଈ ପରି ଦିବ୍ୟ ଓ ଅଦିବ୍ୟ—ଉଭୟ ପ୍ରଭାବରେ ଯୁକ୍ତ ଏବଂ ଉତ୍ତମ ଗୁଣରେ ଶୋଭିତ। ସେ ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସଦା ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରସ ସ୍ରବଣ କରେ, ମନୋବାଞ୍ଛିତ ପଦାର୍ଥ ଉତ୍ପନ୍ନ କରେ, ଏବଂ ବ୍ରହ୍ମକୁ ପ୍ରତିପାଦନ କରୁଥିବା ଉପନିଷଦ୍-ବାଣୀ ଶାଶ୍ୱତ ବ୍ରହ୍ମବୋଧ ଦେଇଥାଏ। ଏହିପରି ବାଣୀରୂପ ଗାଈ ଦିବ୍ୟ-ଅଦିବ୍ୟ ପ୍ରଭାବଯୁକ୍ତ। ଉଭୟ ସୂକ୍ଷ୍ମ, ଉଭୟ ଅଭୀଷ୍ଟ ଫଳ ପ୍ରସ୍ରବଣକାରୀ। ଏହି ଦୁଇଟିରେ କି ଅନ୍ତର, ତୁମେ ନିଜେ ଦେଖ।

Verse 24

ब्राह्मण्युवाच अनुत्पन्नेषु वाक्येषु चोद्यमाना विवक्षया । किन्नु पूर्व तदा देवी व्याजहार सरस्वती,ब्राह्मणीने पूछा--नाथ! जब वाक्य उत्पन्न नहीं हुए थे, उस समय कुछ कहनेकी इच्छासे प्रेरित की हुई सरस्वती देवीने पहले क्या कहा था?

ବ୍ରାହ୍ମଣୀ ପଚାରିଲେ—ନାଥ! ଯେତେବେଳେ ବାକ୍ୟ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଉତ୍ପନ୍ନ ହୋଇନଥିଲା, ସେତେବେଳେ କହିବା ଇଚ୍ଛାରେ ପ୍ରେରିତ ଦେବୀ ସରସ୍ୱତୀ ପ୍ରଥମେ କ’ଣ ଉଚ୍ଚାରଣ କରିଥିଲେ?

Verse 25

ब्राह्मण उवाच प्राणेन या सम्भवते शरीरे प्राणादपानं प्रतिपद्यते च । उदानभूता च विस्‌ज्य देहं व्यानेन सर्व दिवमावृणोति,ब्राह्मणने कहा--प्रिये! वह वाक्‌ प्राणके द्वारा शरीरमें प्रकट होती है, फिर प्राणसे अपानभावको प्राप्त होती है। तत्पश्चात्‌ उदानस्वरूप होकर शरीरको छोड़कर व्यानरूपसे सम्पूर्ण आकाशको व्याप्त कर लेती है। तदनन्तर समान वायुमें प्रतिष्ठित होती है। इस प्रकार वाणीने पहले अपनी उत्पत्तिका प्रकार बताया था।” इसलिये स्थावर होनेके कारण मन श्रेष्ठ है और जंगम होनेके कारण वाग्देवी श्रेष्ठ हैं

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—ପ୍ରିୟେ! ଯେ ବାକ୍ ପ୍ରାଣ ଦ୍ୱାରା ଶରୀରରେ ପ୍ରକଟ ହୁଏ, ସେ ପ୍ରାଣରୁ ଅପାନଭାବକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ। ତାପରେ ଉଦାନରୂପ ହୋଇ ଦେହ ଛାଡ଼ି, ବ୍ୟାନରୂପେ ସମଗ୍ର ଆକାଶକୁ ବ୍ୟାପି ନେଉଛି।

Verse 26

तत: समाने प्रतितिष्ठतीह इत्येव पूर्व प्रजजल्प वाणी । तस्मान्मन: स्थावरत्वाद्‌ विशिष्ट तथा देवी जड़मत्वाद्‌ विशिष्टा,ब्राह्मणने कहा--प्रिये! वह वाक्‌ प्राणके द्वारा शरीरमें प्रकट होती है, फिर प्राणसे अपानभावको प्राप्त होती है। तत्पश्चात्‌ उदानस्वरूप होकर शरीरको छोड़कर व्यानरूपसे सम्पूर्ण आकाशको व्याप्त कर लेती है। तदनन्तर समान वायुमें प्रतिष्ठित होती है। इस प्रकार वाणीने पहले अपनी उत्पत्तिका प्रकार बताया था।” इसलिये स्थावर होनेके कारण मन श्रेष्ठ है और जंगम होनेके कारण वाग्देवी श्रेष्ठ हैं

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—ଅନ୍ତେ ‘ସମାନରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ହୁଏ’—ଏହି କଥା ବାଣୀ ପୂର୍ବେ କହିଥିଲା। ତେଣୁ ସ୍ଥାବରତ୍ୱ ହେତୁ ମନ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ମନାଯାଏ, ଏବଂ ଜଙ୍ଗମ ଓ କ୍ରିୟାଶୀଳ ହେବାରୁ ବାଗ୍ଦେବୀ ମଧ୍ୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ମନାଯାଏ।

Verse 231

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु एकविंशो<5ध्याय:

ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତେ ଆଶ୍ୱମେଧିକେ ପର୍ବଣି, ଅନୁଗୀତା-ପ୍ରକରଣେ, ବ୍ରାହ୍ମଣଗୀତାସୁ ଏକବିଂଶ ଅଧ୍ୟାୟଃ ସମାପ୍ତଃ।

Frequently Asked Questions

It examines how intention (mati/citta) becomes effective in action and communication, and whether mind or speech should be treated as primary in regulating conduct.

Speech is depicted as powerful yet conditional: it requires prāṇa-apāna support and should be governed by mind, implying that disciplined breath and cognition are prerequisites for responsible articulation.

Yes. By framing the debate as an ancient exemplum and tying it to ritual order and vital functions, it presents the doctrine as practically relevant for self-regulation—linking inner hierarchy (mind/breath) to outward dharmic behavior.