Adhyaya 12
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 1216 Verses

Adhyaya 12

व्याधि-गुण-साम्योपदेशः | Discourse on Affliction, Guṇa-Equilibrium, and the Inner Battle

Upa-parva: Āśvamedhika-parva — Vāsudevopadeśa (Discourse on bodily and mental afflictions)

Vāsudeva opens by classifying affliction (vyādhi) as twofold—physical (śārīra) and mental (mānasa)—and notes their mutual causality, rejecting a clean separation. He defines bodily well-being through the balance of physical qualities (śīta/uṣṇa/vāyu) and mental well-being through equilibrium among sattva, rajas, and tamas. He illustrates emotional counteraction (harṣa and śoka obstruct one another) and explains that remembrance and mood are shaped by svabhāva and diṣṭa (the stronger determining factor). Turning to moral-psychological instruction, he lists earlier adversities—Draupadī’s sabhā humiliation, exile and forest residence, distress involving Jaṭāsura, conflict with Citraseṇa, hardship involving Saindhava, and the disguised-period injury to Yājñasenī—arguing that the listener’s reluctance to recall them indicates selective cognition. The discourse culminates in the metaphor of a current ‘war’ requiring no arrows, allies, or kin: a solitary inward engagement. By conquering this, one avoids falling into desire-driven states and becomes fit to rule in accordance with ancestral precedent and proper rājadharma.

Chapter Arc: वायुदेव राजन् को बताते हैं कि व्याधि दो प्रकार की होती है—शारीरिक और मानसिक—और मन की व्याधि ही राज्य, यश और शांति को भीतर से खोखला कर देती है। → वे शरीर के गुण (शीत-उष्ण-वायु) का संतुलन ‘स्वास्थ्य’ कहते हुए मन के भीतर उठने वाले द्वंद्वों की ओर मोड़ते हैं—हर्ष शोक को दबाता है, शोक हर्ष को; सुख में मन दुःख याद करता है और दुःख में सुख। फिर वे पाण्डवों के अपमान, वनवास, अज्ञातवास और द्रौपदी के अपमान जैसी स्मृतियों को सामने रखकर पूछते हैं: क्या तुम इन्हें स्मरण नहीं करना चाहते? → वायुदेव ‘मन-युद्ध’ का उद्घोष करते हैं—यह ऐसा युद्ध है जिसमें न शर काम आते हैं, न सेवक, न बंधु; अकेले आत्मा को ही मन से लड़ना है। यदि यह युद्ध न जीता गया तो मनुष्य काम-वासना और अस्थिरता के वश हो जाएगा। → वे कौन्तेय को बुद्धि से निश्चय कर, प्राणियों के आवागमन और पितृ-पैतामह आचरण को समझकर, यथोचित धर्मपूर्वक राज्य-शासन करने की शिक्षा देते हैं—पहले मन पर विजय, फिर प्रजा पर न्याय। → क्या पार्थ अपने भीतर के इस अदृश्य रण को जीतकर स्मृति-अपमान-क्रोध के चक्र से मुक्त होकर आदर्श राजधर्म स्थापित कर पाएंगे?

Shlokas

Verse 1

अपन क्रात बछ। अर: अं द्ादशो<ड् ध्याय: भगवान्‌ श्रीकृष्णका कक मनपर विजय करनेके आदेश वायुदेव उवाच द्विविधो जायते व्याधि: शारीरो मानसस्तथा । परस्परं तयोर्जन्म निर्दधन्द्धं नोपपद्यते,भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा--कुन्तीनन्दन! दो प्रकारके रोग उत्पन्न होते हैं--एक शरीरिक दूसरा मानसिक। इन दोनोंका जन्म एक-दूसरेके सहयोगसे होता है। दोनोंके पारस्परिक सहयोगके बिना इनकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है

ବାୟୁ କହିଲେ—ବ୍ୟାଧି ଦୁଇ ପ୍ରକାରରେ ଜନ୍ମେ—ଶାରୀରିକ ଓ ମାନସିକ। ଏ ଦୁହିଁର ଜନ୍ମ ପରସ୍ପରାଶ୍ରିତ; ପରସ୍ପର ସମ୍ବନ୍ଧ ବିନା ତାଙ୍କର ଉତ୍ପତ୍ତି ସମ୍ୟକ୍ ଭାବେ ଉପପାଦିତ ହୁଏ ନାହିଁ।

Verse 2

शरीरे जायते व्याधि: शारीर: स निगद्यते । मानसे जायते व्याधिमानसस्तु निगद्यते,शरीरमें जो रोग उत्पन्न होता है, उसे शारीरिक रोग कहते हैं और मनमें जो व्याधि होती है, वह मानसिक रोग कहलाती है

ବାୟୁ କହିଲେ—ଶରୀରରେ ଯେ ବ୍ୟାଧି ଜନ୍ମେ, ତାହାକୁ ଶାରୀରିକ କୁହାଯାଏ; ମନରେ ଯେ ବ୍ୟାଧି ଜନ୍ମେ, ତାହାକୁ ମାନସିକ କୁହାଯାଏ।

Verse 3

शीतोष्णे चैव वायुश्व॒ गुणा राजन्‌ शरीरजा: । तेषां गुणानां साम्यं चेत्‌ तदाहु: स्वस्थलक्षणम्‌,राजन! शीत, उष्ण और वायु--ये तीन शरीरके गुण हैं। यदि शरीरमें इन तीनों गुणोंकी समानता हो तो यह स्वस्थ पुरुषका लक्षण है

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ଶୀତ, ଉଷ୍ଣ ଓ ବାୟୁ—ଏ ତିନି ଶରୀରଜ ଗୁଣ। ଏମାନଙ୍କର ସାମ୍ୟ ଥିଲେ ତାହାକୁ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟର ଲକ୍ଷଣ ବୋଲି କୁହାଯାଏ।

Verse 4

उष्णेन बाध्यते शीतं शीतेनोष्णं च बाध्यते । सत्त्वं रजस्तमश्नेति त्रय आत्मगुणा: स्मृता:,उष्ण शीतका निवारण करता और शीत उष्णका निवारण करता है। सत्त्व, रज और तम--ये तीन अन्तःकरणके गुण माने गये हैं

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ଉଷ୍ଣ ଶୀତକୁ ଦମନ କରେ, ଶୀତ ଉଷ୍ଣକୁ ଦମନ କରେ। ଏହିପରି ଆତ୍ମ/ଅନ୍ତଃକରଣର ତିନି ଗୁଣ—ସତ୍ତ୍ୱ, ରଜ, ତମ—ବୋଲି ସ୍ମୃତ।

Verse 5

तेषां गुणानां साम्यं चेत्‌ तदाहु: स्वस्थलक्षणम्‌ । तेषामन्यतमोत्सेके विधानमुपदिश्यते,इन गुणोंकी समानता हो तो यह मानसिक स्वास्थ्यका लक्षण है। इनमेंसे किसी एककी वृद्धि होनेपर उसके निवारणका उपाय बताया जाता है

ସେହି ଗୁଣମାନଙ୍କର ସାମ୍ୟ ଥିଲେ ତାହାକୁ ସୁସ୍ଥ ଓ ସ୍ଥିର ମନର ଲକ୍ଷଣ ବୋଲି କୁହାଯାଏ। କିନ୍ତୁ ତାହାମଧ୍ୟରୁ କୌଣସି ଗୋଟିଏ ଅତିରିକ୍ତ ହେଲେ, ତାହାକୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ ଓ ଶମନ କରିବାର ବିଧି ଉପଦେଶ ହୁଏ।

Verse 6

हर्षेण बाध्यते शोको हर्ष: शोकेन बाध्यते । वक्िद्‌ दुःखे वर्तमान: सुखस्य स्मर्तुमिच्छति । वश्चित्‌ सुखे वर्तमानो दुःखस्य स्मर्तुमिच्छति,हर्षसे शोक बाधित होता है और शोकसे हर्ष। कोई दु:ःखमें पड़कर सुखकी याद करना चाहता है और कोई सुखी होकर दुःखकी याद करना चाहता है

ବାୟୁ କହିଲେ—ହର୍ଷ ଦ୍ୱାରା ଶୋକ ଦମିତ ହୁଏ, ଶୋକ ଦ୍ୱାରା ହର୍ଷ ମଧ୍ୟ ଦମିତ ହୁଏ। କେହି ଦୁଃଖରେ ପଡ଼ି ସୁଖକୁ ସ୍ମରଣ କରିବାକୁ ଚାହେ; କେହି ସୁଖରେ ଥାଇ ଦୁଃଖକୁ ସ୍ମରଣ କରିବାକୁ ଚାହେ।

Verse 7

सत्वं न दुःखी दुःखस्य न सुखी सुसुखस्य च | स्मर्तुमिच्छसि कौन्तेय किमन्यद्‌ दुःखविशभ्रमात्‌,कुन्तीनन्दन! आप न तो दुखी होकर दुःखकी और न सुखी होकर उत्तम सुखकी याद करना चाहते हैं। यह दुःखविभ्रमके सिवा और क्या है

ବାୟୁ କହିଲେ—ହେ କୌନ୍ତେୟ! ତୁମେ ନ ଦୁଃଖୀ ହୋଇ ଦୁଃଖକୁ ସ୍ମରଣ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛ, ନ ସୁଖୀ ହୋଇ ପରମ ସୁଖକୁ ସ୍ମରଣ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛ। ଏହା ଦୁଃଖଜନିତ ବିଭ୍ରମ ଛଡ଼ା ଆଉ କ’ଣ?

Verse 8

अथवा ते स्वभावो<यं येन पार्थावकृष्यसे । दृष्टवा सभागतां कृष्णामेकवस्त्रां रजस्वलाम्‌ । मिषतां पाण्डवेयानां न तस्य स्मर्तुमिच्छसि,अथवा पार्थ! आपका यह स्वभाव ही है, जिससे आप आदृष्ट होते हैं। पाण्डवोंके देखते-देखते एकवस्त्रधारिणी रजस्वला कृष्णा सभामें घसीट लायी गयी। आप उसे उस अवस्थामें देखकर भी अब उसकी याद करना नहीं चाहते

ନାହିଁ କି ହେ ପାର୍ଥ, ଏହା ତୁମର ସ୍ୱଭାବ ହିଁ—ଯାହା ତୁମକୁ ପଛକୁ ଟାଣେ? ପାଣ୍ଡବମାନେ ଦେଖୁଥିବାବେଳେ ଏକବସ୍ତ୍ରଧାରିଣୀ ରଜସ୍ୱଳା କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ)କୁ ସଭାକୁ ଘସିଟି ଆଣାଗଲା; ତଥାପି ଏବେ ତୁମେ ସେ ଅବସ୍ଥାକୁ ସ୍ମରଣ କରିବାକୁ ମଧ୍ୟ ଚାହୁଁନାହ?

Verse 9

प्रत्राजनं च नगरादजिनैश्न विवासनम्‌ । महारण्यनिवासश्न न तस्य स्मर्तुमिच्छसि,आपलोगोंको नगरसे निकाला गया, मृगछाला पहनाकर वनवास दिया गया और बड़े- बड़े घोर जंगलोंमें रहना पड़ा। इन सब बातोंको आप कभी याद करना नहीं चाहते हैं

ତୁମମାନଙ୍କୁ ନଗରରୁ ହଂକାଇ ଦିଆଗଲା, ମୃଗଚର୍ମ ପିନ୍ଧାଇ ବନବାସ ଦିଆଗଲା, ଏବଂ ବିଶାଳ ଭୟଙ୍କର ଅରଣ୍ୟରେ ବସିବାକୁ ପଡ଼ିଲା—ସେସବୁକୁ ମଧ୍ୟ ତୁମେ ସ୍ମରଣ କରିବାକୁ ଚାହୁଁନାହ?

Verse 10

जटासुरात्‌ परिकलेशश्रित्रसेनेन चाहव: । सैन्धवाच्च परिक्लेशो न तस्य स्मर्तुमिच्छसि,जटासुरसे जो क्लेश उठाना पड़ा, चित्रसेनके साथ जूझना पड़ा और सिन्धुराज जयद्रथसे जो अपमान और वष्ट प्राप्त हुआ, उसका स्मरण करनेकी इच्छा आपको नहीं होती है

ଜଟାସୁର ଦ୍ୱାରା ଯେ କ୍ଲେଶ ଭୋଗିଲ, ଚିତ୍ରସେନ ସହ ଯେ ଯୁଦ୍ଧ ହେଲା, ଏବଂ ସିନ୍ଧୁରାଜ (ଜୟଦ୍ରଥ) ଠାରୁ ଯେ ଅପମାନ ଓ ପୀଡ଼ା ମିଳିଲା—ସେସବୁକୁ ମଧ୍ୟ ତୁମେ ସ୍ମରଣ କରିବାକୁ ଚାହୁଁନାହ?

Verse 11

पुनरज्ञातचर्यायां कीचकेन पदा वध: । याज्ञसेन्यास्तथा पार्थ न तस्य स्मर्तुमिच्छसि

ପୁଣି ଅଜ୍ଞାତବାସ ସମୟରେ କୀଚକ ପାଦାଘାତରେ ବଧ ହେଲା; ଏବଂ ଯାଜ୍ଞସେନୀ (ଦ୍ରୌପଦୀ) ମଧ୍ୟ ଅପମାନିତ ହେଲେ—ହେ ପାର୍ଥ, ସେଥିର ସ୍ମରଣ ମଧ୍ୟ ତୁମେ କରିବାକୁ ଚାହୁଁନାହ?

Verse 12

पार्थ! अज्ञातवासके दिनों कीचकने जो द्रौपदीको लात मारी थी, उसे भी आप नहीं याद करना चाहते हैं ।। यच्च ते द्रोणभीष्माभ्यां युद्धमासीदरिंदम । मनसैकेन योद्धव्यं तत्‌ ते युद्धमुपस्थितम्‌,इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि कृष्णधर्मसंवादे द्वादशो5ध्याय:

ହେ ପାର୍ଥ! ଅଜ୍ଞାତବାସ ଦିନରେ କୀଚକ ଦ୍ରୌପଦୀକୁ ପାଦାଘାତ କରିଥିଲା—ସେ ଅତ୍ୟାଚାରକୁ ମଧ୍ୟ ତୁମେ ସ୍ମରଣ କରିବାକୁ ଚାହୁଁନାହ? ଏବଂ ହେ ଅରିନ୍ଦମ, ଦ୍ରୋଣ ଓ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ସହ ତୁମର ଯେ ଯୁଦ୍ଧ ଥିଲା, ସେଇ ଯୁଦ୍ଧ ଏବେ ପୁଣି ତୁମ ସମ୍ମୁଖରେ ଉପସ୍ଥିତ; କିନ୍ତୁ ଏଥର ଯୁଦ୍ଧ କେବଳ ମନରେ ହିଁ କରିବାକୁ ପଡ଼ିବ। ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଅଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବରେ କୃଷ୍ଣ-ଧର୍ମସଂବାଦର ଦ୍ୱାଦଶ ଅଧ୍ୟାୟ।

Verse 13

शत्रुदमन! द्रोणाचार्य और भीष्मके साथ जो युद्ध हुआ था, वही युद्ध आपके सामने उपस्थित है। इस समय आपको अकेले अपने मनके साथ युद्ध करना होगा ।। तस्मादशभ्युपगन्तव्यं युद्धाय भरतर्षभ । परमव्यक्तरूपस्य पारं युक्‍त्या स्वकर्मभि:,भरतभूषण! अतः उस युद्धके लिये आपको तैयार हो जाना चाहिये। अपने कर्तव्यका पालन करते हुए योगके द्वारा मनको वशीभूत करके आप मायासे परे परब्रह्मको प्राप्त कीजिये

ବାୟୁ କହିଲେ—ଶତ୍ରୁଦମନ! ଦ୍ରୋଣ ଓ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ସହ ତୁମେ ଯେ ଯୁଦ୍ଧ ପୂର୍ବେ କରିଥିଲ, ସେଇ ଯୁଦ୍ଧ ଏବେ ପୁଣି ତୁମ ସମ୍ମୁଖରେ ଉପସ୍ଥିତ। କିନ୍ତୁ ଏହି ସମୟରେ ତୁମକୁ ଏକାକୀ—ନିଜ ମନ ସହ—ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ହେବ। ତେଣୁ, ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଏହି ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଆଗେଇ ଆସ। ଯଥାର୍ଥ ବିବେକ ଓ ନିଜ କର୍ତ୍ତବ୍ୟର ନିଷ୍ଠାପୂର୍ବକ ପାଳନ ଦ୍ୱାରା ପରମ ଅବ୍ୟକ୍ତର ପାର ଅତିକ୍ରମ କର। ଭରତବଂଶ-ଭୂଷଣ! ସେଇ ସଂଗ୍ରାମ ପାଇଁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହେ—ଯୋଗରେ ମନକୁ ବଶ କରି, ମାୟାତୀତ ପରବ୍ରହ୍ମକୁ ପ୍ରାପ୍ତ କର।

Verse 14

यत्र नैव शरै: कार्य न भृत्यैर्न च बन्धुभि: । आत्मनैकेन योद्धव्यं तत्‌ ते युद्धमुपस्थितम्‌,मनके साथ होनेवाले इस युद्धमें न तो बाणोंका काम है और न सेवकों तथा बन्धु- बान्धवोंका ही। इस समय इसमें आपको अकेले ही युद्ध करना है और वह युद्ध सामने उपस्थित है

ଯେଉଁଠି ନ ବାଣର କାମ, ନ ସେବକର, ନ ବନ୍ଧୁ-ବାନ୍ଧବର—ସେଠି ତୁମକୁ ଏକାକୀ ନିଜ ସହିତ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ହେବ। ସେଇ ଯୁଦ୍ଧ ଏବେ ତୁମ ସମ୍ମୁଖରେ ଉପସ୍ଥିତ।

Verse 15

तस्मिन्ननिर्जिते युद्धे कामवस्थां गमिष्यसि । एतज्ज्ञात्वा तु कौन्तेय कृतकृत्यो भविष्यसि,यदि इस युद्धमें आप मनको न जीत सके तो पता नहीं आपकी क्‍या दशा होगी। कुन्तीनन्दन! इस बातको अच्छी तरह समझ लेनेपर आप कृतकृत्य हो जायँगे

ସେଇ ଅଜିତ ଯୁଦ୍ଧରେ ଯଦି ତୁମେ ମନକୁ ଜିତିପାରିବ ନାହିଁ, ତେବେ ତୁମେ କାମବଶ ଅବସ୍ଥାକୁ ପହଞ୍ଚିବ। କିନ୍ତୁ, କୌନ୍ତେୟ! ଏହାକୁ ସ୍ପଷ୍ଟ ଭାବେ ଜାଣିନେଲେ ତୁମେ କୃତକୃତ୍ୟ ହେବ।

Verse 16

एतां बुद्धि विनिश्चित्य भूतानामागतिं गतिम्‌ । पितृपैतामहे वृत्ते शाधि राज्यं यथोचितम्‌,समस्त प्राणियोंका यों ही आवागमन होता रहता है। बुद्धिसे ऐसा निश्चय करके आप अपने बाप-दादोंके बर्तावका पालन करते हुए उचित रीतिसे राज्यका शासन कीजिये

ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କର ଆସିବା-ଯିବା ଏହିପରି ହୁଏ—ଏହି ବୁଦ୍ଧିକୁ ଦୃଢ଼ କରି ନିଶ୍ଚୟ କର; ଏବଂ ପିତୃ-ପୈତାମହ ଆଚରଣକୁ ଅନୁସରି, ଯଥୋଚିତ ଭାବେ ରାଜ୍ୟ ଶାସନ କର।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether to remain governed by grief, avoidance, and selective memory of trauma, or to accept an inward discipline that enables ethical rulership—treating self-mastery as the decisive contest.

Health is defined as balance: bodily stability through harmonized physical qualities and mental stability through sāmya among sattva, rajas, and tamas; suffering is portrayed as interdependent across body and mind.

No formal phalaśruti is stated; instead, the chapter provides an internal telos: conquering the inward ‘war’ yields readiness for kingship and a “kṛtakṛtya” state, aligning action with rājadharma and longer-term liberation-oriented discipline.