Adhyaya 11
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 1129 Verses

Adhyaya 11

Vāsudeva’s Upadeśa: The Inner Enemy and the Indra–Vṛtra Precedent (आत्मशत्रु-बोधः; इन्द्र-वृत्रोपाख्यानम्)

Upa-parva: Kṛṣṇa’s Consolatory Instruction to Yudhiṣṭhira (Indra–Vṛtra Upākhyāna Context)

Vaiśaṃpāyana reports that, after Vyāsa’s remarkable address, Vāsudeva begins speaking upon seeing Yudhiṣṭhira (Dharmasuta) despondent and bereaved. Kṛṣṇa frames a doctrinal contrast: crookedness (jihmatā) leads toward mortality-bound outcomes, while straightforwardness (ārjava) aligns with the ‘station of Brahman’ (brahmaṇaḥ padam), implying liberation-oriented clarity. He challenges the king’s assumption that his tasks are complete, arguing that true conquest remains unfinished if one fails to recognize the ‘enemy lodged in the body’—the self’s internal affliction or delusive tendency. To ground the instruction in authoritative precedent, Kṛṣṇa introduces the Indra–Vṛtra account: Vṛtra successively pervades and ‘seizes’ the domains of the senses—earth (smell), waters (taste), fire/light (form), wind (touch), and space (sound)—each time prompting Indra (Śatakratu) to strike with the vajra, driving Vṛtra into subtler substrates. Ultimately Vṛtra enters Indra himself, producing great delusion, until Vasiṣṭha awakens him through a chant (rathaṃtara). Indra then destroys the body-internal Vṛtra with an ‘unseen’ vajra. The chapter closes by labeling this teaching a dharma-rahasya, transmitted from Śakra to great ṛṣis and then to the narrator’s lineage, offered as a disciplined interpretive key for the king.

Chapter Arc: कुरुक्षेत्र-विजय के बाद भी धर्मराज युधिष्ठिर शोक में डूबे हैं—अपने ही बन्धु-बान्धवों के विनाश से उनका मन बुझा हुआ है, जैसे धुएँ से ढका अग्नि या ग्रहणग्रस्त सूर्य। → युधिष्ठिर की निर्विण्णता देखकर वृष्णिकुल-समुद्र श्रीकृष्ण उन्हें आश्वासन देने हेतु एक पुरातन आख्यान छेड़ते हैं—इन्द्र और वृत्रासुर का संघर्ष, जहाँ वृत्र क्रमशः इन्द्र के ‘विषय’ (इन्द्रिय-ग्रहण) को छीनता चला जाता है। → जब आकाश तक वृत्रासुरमय हो जाता है और शब्द-विषय का भी अपहरण होने लगता है, तब शतक्रतु इन्द्र अत्यन्त क्रुद्ध होकर वज्र का प्रहार करते हैं; वृत्र वज्राघात से जल, तेज, आकाश आदि तत्त्वों में सहसा प्रवेश कर विषयों को ग्रसने लगता है—युद्ध बाह्य नहीं, चेतना के क्षेत्र में निर्णायक बन जाता है। → वृत्र-ग्रस्त इन्द्र पर मोह छा जाता है; तब महर्षि वसिष्ठ रथन्तर-साम द्वारा उन्हें प्रत्यय (धैर्य/बोध) लौटाते हैं। श्रीकृष्ण इस दृष्टान्त से युधिष्ठिर को समझाते हैं कि शोक-प्रलाप से नहीं, ज्ञान और धर्म-स्थित प्रज्ञा से ही मन का विषाद कटता है। → युधिष्ठिर के भीतर उठता प्रश्न बना रहता है—क्या अपने स्वजनों के वध का भार कभी हल्का होगा, और राजा होकर प्रायश्चित्त का मार्ग क्या है?

Shlokas

Verse 1

/ 2: बछ। से, एकादशोब< ध्याय: श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको इन्द्रद्वारा शरीरस्थ वृत्रासुरका संहार करनेका इतिहास सुनाकर समझाना वैशम्पायन उवाच इत्युक्ते नृपतौ तस्मिन्‌ व्यासेनाद्‌भुतकर्मणा । वासुदेवो महातेजास्ततो वचनमाददे,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अद्भुत-कर्मा वेदव्यासजीने युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा, तब महातेजस्वी भगवान्‌ श्रीकृष्ण कुछ कहनेको उद्यत हुए

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଅଦ୍ଭୁତକର୍ମା ବ୍ୟାସ ଯେତେବେଳେ ସେଇ ନୃପତିଙ୍କୁ ଏଭଳି କହିଲେ, ସେତେବେଳେ ମହାତେଜସ୍ବୀ ବାସୁଦେବ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ବଚନ ଆରମ୍ଭ କଲେ।

Verse 2

त॑ नृपं दीनमनसं निहतज्ञातिबान्धवम्‌ | उपप्लुतमिवादित्यं सधूममिव पावकम्‌,जाति-भाइयोंके मारे जानेसे युधिष्ठिरका मन शोकसे दीन एवं व्याकुल हो रहा था। वे राहुग्रस्त सूर्य और धूमयुक्त अग्निके समान निस्तेज हो गये थे। विशेषतः उनका मन राज्यकी ओरसे खिन्न एवं विरक्त हो गया था। यह सब जानकर वृष्णिवंशभूषण श्रीकृष्णने कुन्तीकुमार धर्मपुत्र युधिष्ठिको आश्वासन देते हुए इस प्रकार कहना आरम्भ किया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଜ୍ଞାତି-ବାନ୍ଧବମାନେ ନିହତ ହୋଇଥିବାରୁ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ମନ ଶୋକରେ ଦୀନ ହୋଇପଡ଼ିଥିଲା। ସେ ରାହୁଗ୍ରସ୍ତ ସୂର୍ଯ୍ୟ ପରି ଏବଂ ଧୂମାବୃତ ଅଗ୍ନି ପରି ନିଷ୍ପ୍ରଭ ଦେଖାଯାଉଥିଲେ। ବିଶେଷତଃ ରାଜ୍ୟଭାର ପ୍ରତି ତାଙ୍କ ହୃଦୟ ଖିନ୍ନ ଓ ବିରକ୍ତ ହୋଇଉଠିଥିଲା। ଏହା ଜାଣି ବୃଷ୍ଣିବଂଶଭୂଷଣ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଆଶ୍ୱାସନ ଦେଇ କହିବାକୁ ଆରମ୍ଭ କଲେ।

Verse 3

निर्विण्णमनसं पार्थ ज्ञात्वा वृष्णिकुलोदह: | आश्वासयन्‌ धर्मसुतं प्रवक्तुमुपचक्रमे,जाति-भाइयोंके मारे जानेसे युधिष्ठिरका मन शोकसे दीन एवं व्याकुल हो रहा था। वे राहुग्रस्त सूर्य और धूमयुक्त अग्निके समान निस्तेज हो गये थे। विशेषतः उनका मन राज्यकी ओरसे खिन्न एवं विरक्त हो गया था। यह सब जानकर वृष्णिवंशभूषण श्रीकृष्णने कुन्तीकुमार धर्मपुत्र युधिष्ठिको आश्वासन देते हुए इस प्रकार कहना आरम्भ किया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ପାର୍ଥ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ମନ ନିର୍ବେଦରେ ଭରିଯାଇଛି, ଶୋକରେ କ୍ଷୀଣ ହୋଇଛି ଏବଂ ବିଶେଷତଃ ରାଜ୍ୟକାର୍ଯ୍ୟ ପ୍ରତି ବିରକ୍ତ—ଏହା ଜାଣି ବୃଷ୍ଣିକୁଳଶ୍ରେଷ୍ଠ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଧର୍ମସୁତଙ୍କୁ ଆଶ୍ୱାସନ ଦେଇ କହିବାକୁ ଆରମ୍ଭ କଲେ।

Verse 4

वायुदेव उवाच सर्व जिद्ठां मृत्युपदमार्जवं ब्रह्मण: पदम्‌ । एतावान्‌ ज्ञानविषय: कि प्रलाप: करिष्यति,भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा--धर्मराज! कुटिलता मृत्युका स्थान है और सरलता ब्रह्मकी प्राप्तिका साधन है। इस बातको ठीक-ठीक समझ लेना ही ज्ञानका विषय है। इसके विपरीत जो कुछ कहा जाता है, वह प्रलाप है। भला वह किसीका क्‍या उपकार करेगा?

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ— ଧର୍ମରାଜ! କୁଟିଳତା ମୃତ୍ୟୁପଦ, ଏବଂ ସରଳତା ବ୍ରହ୍ମପଦ ପ୍ରାପ୍ତିର ମାର୍ଗ। ଏତିକି ହିଁ ସତ୍ୟ ଜ୍ଞାନର ବିଷୟ। ଏହାର ବିପରୀତ ଯାହା କୁହାଯାଏ, ସେ ସବୁ ପ୍ରଲାପମାତ୍ର—ତାହା କାହାର ଉପକାର କରିବ?

Verse 5

नैव ते निछितं कर्म नैव ते शत्रवो जिता: । कथं शत्रुं शरीरस्थमात्मनो नावबुध्यसे,आपने अपने कर्तव्यकर्मको पूरा नहीं किया। आपने अभीतक शत्रुओंपर विजय भी नहीं पायी। आपका शत्रु तो आपके शरीरके भीतर ही बैठा हुआ है। आप अपने उस शत्रुको क्यों नहीं पहचानते हैं?

ବାୟୁ କହିଲେ— ତୁମେ ଯେ କର୍ତ୍ତବ୍ୟକର୍ମ କରିବାକୁ ନିଶ୍ଚୟ କରିଥିଲ, ସେଥିକୁ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପୂରା କରିନାହ; ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସତ୍ୟରେ ଜିତିନାହ। ତୁମ ଶତ୍ରୁ ତ ତୁମ ଶରୀର ଭିତରେ ହିଁ ବସିଛି—ତେବେ ତୁମେ ନିଜ ଏହି ଶତ୍ରୁକୁ କାହିଁକି ଚିହ୍ନୁନାହ?

Verse 6

अत्र ते वर्तयिष्यामि यथाधर्म यथाश्रुतम्‌ इन्द्रस्य सह वृत्रेण यथा युद्धमवर्तत,यहाँ मैं आपके समक्ष धर्मके अनुसार एक वृत्तान्त जैसा सुन रखा है, वैसा ही बता रहा हूँ। पूर्वकालमें वृत्रासुरके साथ इन्द्रका जैसा युद्ध हुआ था, वही प्रसंग सुना रहा हूँ

ଏଠାରେ ମୁଁ ଧର୍ମାନୁସାରେ ଏବଂ ଯେପରି ଶୁଣିଆସିଛି ସେପରି ହିଁ ବୃତ୍ତାନ୍ତ କହିବି—ପୂର୍ବକାଳରେ ବୃତ୍ର ସହ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ଯେପରି ଯୁଦ୍ଧ ହୋଇଥିଲା, ସେଇ ପ୍ରାଚୀନ ପ୍ରସଙ୍ଗ ମୁଁ ବର୍ଣ୍ଣନା କରୁଛି।

Verse 7

वृत्रेण पृथिवी व्याप्ता पुरा किल नराधिप । दृष्टवा स पृथिवीं व्याप्तां गन्धस्य विषये हते,नरेश्वर! कहते हैं, प्राचीन कालमें वृत्रासुरने समूची पृथ्वीपर अधिकार जमा लिया था। इन्द्रने देखा, वृत्रासुरने पृथ्वीपर अधिकार कर लिया और गन्धके विषयका भी अपहरण कर लिया और इस प्रकार पृथ्वीका अपहरण करनेसे सब ओर दुर्गनन्‍्धका प्रसार हो गया है। तब गन्धके विषयका अपहरण होनेसे शतक्रतु इन्द्रको बड़ा क्रोध हुआ

ବାୟୁ କହିଲେ—ହେ ନରାଧିପ! କୁହାଯାଏ, ପୁରାତନ କାଳରେ ବୃତ୍ର ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ବ୍ୟାପି ନିଜ ଅଧୀନ କରିଥିଲା। ଇନ୍ଦ୍ର ଯେତେବେଳେ ପୃଥିବୀ ଏଭଳି ଆକ୍ରାନ୍ତ ଦେଖିଲେ, ସେତେବେଳେ ‘ଗନ୍ଧର ବିଷୟ’ ମଧ୍ୟ ହରଣ ହୋଇ ତାହାର ଯଥାଯଥ କାର୍ଯ୍ୟ ଓ ଅଧିକାର ନଷ୍ଟ ହୋଇଛି ବୋଲି ଜାଣିଲେ। ପୃଥିବୀ ଅପହୃତ ହେବାରୁ ସବୁଦିଗରେ ଦୁର୍ଗନ୍ଧ ପ୍ରସାରିତ ହେଲା; ଗନ୍ଧବିଷୟ ହରଣ ହେବାରୁ ଶତକ୍ରତୁ ଇନ୍ଦ୍ର ମହାକ୍ରୋଧରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେଲେ।

Verse 8

धराहरणदुर्गन्‍न्धो विषय: समपद्यत | शतक्रतुश्नुकोपाथ गन्धस्य विषये हते,नरेश्वर! कहते हैं, प्राचीन कालमें वृत्रासुरने समूची पृथ्वीपर अधिकार जमा लिया था। इन्द्रने देखा, वृत्रासुरने पृथ्वीपर अधिकार कर लिया और गन्धके विषयका भी अपहरण कर लिया और इस प्रकार पृथ्वीका अपहरण करनेसे सब ओर दुर्गनन्‍्धका प्रसार हो गया है। तब गन्धके विषयका अपहरण होनेसे शतक्रतु इन्द्रको बड़ा क्रोध हुआ

ବାୟୁ କହିଲେ—ପୃଥିବୀ ହରଣ ହେବାମାତ୍ରେ ସବୁଦିଗରେ ଦୁର୍ଗନ୍ଧର ପ୍ରଭାବ ପ୍ରସାରିତ ହେଲା। କୁହାଯାଏ, ପୁରାତନ କାଳରେ ବୃତ୍ରାସୁର ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ନିଜ ଅଧୀନ କରିଥିଲା; ଇନ୍ଦ୍ର ତାହାକୁ ବ୍ୟାପ୍ତ ଦେଖି ଗନ୍ଧବିଷୟ ମଧ୍ୟ ଅପହୃତ ହୋଇଛି ବୋଲି ଜାଣିଲେ। ତେଣୁ, ହେ ନରାଧିପ! ଗନ୍ଧବିଷୟ ନଷ୍ଟ ହେବାରୁ ଶତକ୍ରତୁ ଇନ୍ଦ୍ର ମହାକ୍ରୋଧରେ ଆବିଷ୍ଟ ହେଲେ।

Verse 9

वृत्रस्य स ततः क्रुद्धो घोरं वज़्मवासृजत्‌ । स वध्यमानो वज्ेण सुभृशं भूरितेजसा

ତାପରେ ବୃତ୍ର ଉପରେ କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ ସେ ଭୟଙ୍କର ବଜ୍ର ନିକ୍ଷେପ କଲେ। ଅପାର ତେଜରେ ଭରିଥିବା ସେହି ବଜ୍ରରେ ଆହତ ହୋଇ ବୃତ୍ର ଭୟଙ୍କର ଭାବେ ଆକ୍ରାନ୍ତ ହେଲା।

Verse 10

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रवमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ,अप्सु वृत्रगृहीतासु रसे च विषये हते

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଆଶ୍ୱମେଧିକପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଅଶ୍ୱମେଧପର୍ବରେ ସଂବର୍ତ୍ତ ଓ ରାଜା ମରୁତ୍ତଙ୍କ ଉପାଖ୍ୟାନବିଷୟକ ଦଶମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା। (ଉପସଂହାର:) ‘ଯେତେବେଳେ ଜଳଗୁଡ଼ିକୁ ବୃତ୍ର ଗ୍ରହଣ କରିଥିଲା, ଏବଂ ରସ ଓ ବିଷୟ ହତ ହୋଇଥିଲା।’

Verse 11

स वध्यमानो वज्रेण तस्मिन्नमिततेजसा,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिरका संवादविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଅମିତ ତେଜସ୍ବୀ ତାହାର ବଜ୍ରରେ ଆହତ ହୋଇ ସେ ନିହତ ହେଉଥିଲା। ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଆଶ୍ୱମେଧିକପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଅଶ୍ୱମେଧପର୍ବରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଓ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସଂବାଦବିଷୟକ ଏକାଦଶ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 12

व्याप्ते ज्योतिषि वृत्रेण रूपेडथ विषये हते

ବାୟୁ କହିଲେ— ଯେତେବେଳେ ବୃତ୍ର ଜ୍ୟୋତିର୍ମୟ ଲୋକକୁ ବ୍ୟାପିଥିଲା ଏବଂ ରୂପ-ବିଷୟର କ୍ଷେତ୍ରରେ ସେ ହତ ହେଲା, ସେତେବେଳେ ଲୋକମାନଙ୍କର ବ୍ୟବସ୍ଥା ପୁନଃ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ହେଲା।

Verse 13

स वध्यमानो वज्ेण तस्मिन्नमिततेजसा,इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि कृष्णधर्मसंवादे एकादशो< ध्याय:

ସେ ଅମିତତେଜସ୍ବୀଙ୍କ ବଜ୍ରାଘାତରେ ପୀଡିତ ହୋଇ ବଧ ହେଉଥିଲା। ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଆଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବର ଅଶ୍ୱମେଧ ପ୍ରକରଣରେ କୃଷ୍ଣ-ଧର୍ମ ସଂବାଦର ଏକାଦଶ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।

Verse 14

व्याप्ते वायौ तु वृत्रेण स्पर्शेड्थ विषये हृते

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ— ବୃତ୍ର ଯେତେବେଳେ ବାୟୁକୁ ନିଜେ ବ୍ୟାପି ଅବରୋଧ କଲା ଏବଂ ସ୍ପର୍ଶ-ବିଷୟର କ୍ଷେତ୍ରକୁ ଅପହରଣ କଲା, ସେତେବେଳେ ସ୍ପର୍ଶ କିପରି ହେବ? ମୁକ୍ତ ଗତି କିପରି ରହିବ?

Verse 15

शतक्रतुरतिक्रुद्धस्तत्र वज़्मवासृजत्‌ । जब वृत्रासुरने वायुको भी व्याप्त करके उसके स्पर्श नामक विषयका अपहरण कर लिया, तब शतक्रतुने अत्यन्त कुपित होकर वहाँ उसके ऊपर अपना वज्र छोड़ दिया ।। १४ ई | स वध्यमानो वज्रेण तस्मिन्नमिततेजसा

ବାୟୁ କହିଲେ— ଶତକ୍ରତୁ (ଇନ୍ଦ୍ର) ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ ସେଠାରେ ନିଜ ବଜ୍ର ନିକ୍ଷେପ କଲେ। ବୃତ୍ରାସୁର ବାୟୁକୁ ମଧ୍ୟ ବ୍ୟାପି ସ୍ପର୍ଶ-ବିଷୟକୁ ଅପହରଣ କରିନେଲାବେଳେ, ଶତକ୍ରତୁ ରୋଷରେ ତାହାର ଉପରେ ବଜ୍ରପ୍ରହାର କଲେ। ସେ ଅମିତତେଜସ୍ବୀଙ୍କ ବଜ୍ରାଘାତରେ ପୀଡିତ ହୋଇ, ଆକ୍ରମଣ ସହି ସହି ବଧ ହେଉଥିଲା।

Verse 16

आकाशे वृत्रभूते5थ शब्दे च विषये हते

ଯେତେବେଳେ ଆକାଶ ମନେ ହେଲା ବୃତ୍ରଦ୍ୱାରା ଅବରୋଧିତ, ଏବଂ ଶବ୍ଦ ସହ ତାହାର ବିଷୟକ୍ଷେତ୍ର ମଧ୍ୟ ନିହତ ହେଲା, ସେତେବେଳେ ସମଗ୍ର ଦୃଶ୍ୟ ସ୍ତବ୍ଧତାରେ ନିମଗ୍ନ ହୋଇଗଲା— ଯେପରି ଶ୍ରବଣର ମାଧ୍ୟମ ନିଜେ ଅଭିଭୂତ ହୋଇପଡ଼ିଛି।

Verse 17

स वध्यमानो वजेण तस्मिन्नमिततेजसा

ଅମିତତେଜସ୍ବୀ ସେଇ ଜଣଙ୍କ ବଜ୍ରାଘାତରେ ଆହତ ହୋଇ ସେ ନିହତ ହେଉଥିଲା।

Verse 18

तस्य वृत्रगृहीतस्य मोह: समभवन्महान्‌

ବୃତ୍ର ଦ୍ୱାରା ଗୃହୀତ ହେବା ସହିତ ତାହାରେ ମହାମୋହ ଉଦ୍ଭବ ହେଲା।

Verse 19

ततो वृत्रं शरीरस्थं जघान भरतर्षभ । शतक्रतुरदृश्येन वज्ञेणेतीह न: श्रुतम्‌,भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात्‌ शतक्रतुने अपने शरीरके भीतर स्थित हुए वृत्रासुरको अदृश्य वज्के द्वारा मार डाला ऐसा हमने सुना है

ତାପରେ, ହେ ଭରତବୃଷଭ, ଶତକ୍ରତୁ (ଇନ୍ଦ୍ର) ନିଜ ଶରୀରମଧ୍ୟରେ ଅବସ୍ଥିତ ବୃତ୍ରକୁ—ଏଠାରେ ଆମେ ଯେପରି ଶୁଣିଛୁ—ଅଦୃଶ୍ୟ ବଜ୍ରଦ୍ୱାରା ନିହତ କଲେ।

Verse 20

इदं धर्म्य रहस्यं वै शक्रेणोक्तं महर्षिषु । ऋषिभिक्ष मम प्रोक्त तन्निबोध जनाधिप,जनेश्वर! यह धर्मसम्मत रहस्य इन्द्रने महर्षियोंको बताया और महर्षियोंने मुझसे कहा। वही रहस्य मैंने आपको सुनाया है। आप इसे अच्छी तरह समझें

ହେ ଜନାଧିପ, ଏହି ଧର୍ମ୍ୟ ରହସ୍ୟକୁ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ମହର୍ଷିମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ କହିଥିଲେ; ଋଷିମାନେ ତାହା ମୋତେ କହିଲେ, ଏବଂ ମୁଁ ସେଇ ରହସ୍ୟ ତୁମକୁ କହିଛି—ଏହାକୁ ଭଲଭାବେ ବୁଝ।

Verse 96

विवेश सहसा तोयं जग्राह विषयं ततः । तत्पश्चात्‌ उन्होंने कुपित हो वृत्रासुरके ऊपर घोर वज्रका प्रहार किया। महातेजस्वी वज्जसे अत्यन्त आहत हो वह असुर सहसा जलमें जा घुसा और उसके विषयभूत रसको ग्रहण करने लगा

ସେ ସହସା ଜଳରେ ପ୍ରବେଶ କଲା ଏବଂ ପରେ ଜଳକୁ ନିଜର ବିଷୟ (ଭୋଗ୍ୟ) ଭାବେ ଗ୍ରହଣ କଲା।

Verse 103

शतक्रतुरतिक्रुद्धस्तत्र वज़्मवासृजत्‌ । जब जलपर भी वृत्रासुरका अधिकार तथा रसरूपी विषयका अपहरण हो गया, तब अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए इन्द्रने वहाँ भी उसपर वज्रका प्रहार किया

ଯେତେବେଳେ ଜଳ ଉପରେ ମଧ୍ୟ ବୃତ୍ରାସୁରଙ୍କ ଅଧିକାର ହୋଇଗଲା ଏବଂ ରସରୂପ ବିଷୟ ଅପହୃତ ହେଲା, ସେତେବେଳେ ଶତକ୍ରତୁ ଇନ୍ଦ୍ର ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧରେ ଭରି ତାହାଁରେ ତାଙ୍କ ଉପରେ ବଜ୍ର ପ୍ରହାର କଲେ।

Verse 126

शतक्रतुरतिक्रुद्धस्तत्र वज़्मवासृजत्‌ । वृत्रासुरके द्वारा तेजपर भी अधिकार कर लिया गया और उसके रूप नामक विषयका अपहरण हो गया, यह जानकर शतक्रतुके क्रोधकी सीमा न रह गयी। उन्होंने वहाँ भी वृत्रासुरपर वज्ञका प्रहार किया

ବୃତ୍ରାସୁର ତେଜ ଉପରେ ମଧ୍ୟ ଅଧିକାର କରିନେଇଛି ଏବଂ ରୂପ-ନାମରୂପ ବିଷୟ ଅପହୃତ ହୋଇଛି—ଏହା ଜାଣି ଶତକ୍ରତୁ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ କ୍ରୋଧର ସୀମା ରହିଲା ନାହିଁ। ସେ ତାହାଁରେ ବୃତ୍ରାସୁର ଉପରେ ପୁନଃ ବଜ୍ର ପ୍ରହାର କଲେ।

Verse 136

विवेश सहसा वायुं जग्राह विषयं ततः । उस तेजमें स्थित हुआ वृत्रासुर अमिततेजस्वी वज्रके प्रहारसे पीड़ित हो सहसा वायुमें समा गया और उसके स्पर्श नामक विषयको ग्रहण करने लगा

ବଜ୍ର ପ୍ରହାରରେ ପୀଡିତ ଅମିତତେଜସ୍ବୀ ବୃତ୍ରାସୁର ସହସା ବାୟୁରେ ଲୀନ ହେଲା; ତାପରେ ସେ ବାୟୁର ବିଷୟ—ସ୍ପର୍ଶ—କୁ ଗ୍ରହଣ କଲା।

Verse 156

आकाशमभिदुद्राव जग्राह विषयं ततः । वायुके भीतर अमित तेजस्वी वज्ञसे पीड़ित हो वृत्रासुर भागकर आकाशमें जा छिपा और उसके विषयको ग्रहण करने लगा

ବଜ୍ରରେ ପୀଡିତ ଅମିତତେଜସ୍ବୀ ବୃତ୍ରାସୁର ବାୟୁର ଶକ୍ତିକୁ ଭୟ କରି ଦୌଡ଼ି ଆକାଶରେ ଯାଇ ଲୁଚିଲା; ତାପରେ ସେ ଆକାଶର ବିଷୟକୁ ଗ୍ରହଣ କଲା।

Verse 173

विवेश सहसा शक्रं जग्राह विषयं ततः । आकाशके भीतर अमित तेजस्वी वज्रसे पीड़ित हो वृत्रासुर सहसा इन्द्रमें समा गया और उनके विषयको ग्रहण करने लगा

ଆକାଶରେ ବଜ୍ରରେ ପୀଡିତ ଅମିତତେଜସ୍ବୀ ବୃତ୍ରାସୁର ସହସା ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ମଧ୍ୟରେ ଲୀନ ହେଲା; ତାପରେ ସେ ତାଙ୍କର ବିଷୟ ଓ ଅଧିକାର-ବଳକ୍ଷେତ୍ରକୁ ଗ୍ରହଣ କଲା।

Verse 183

रथन्तरेण तं तात वसिष्ठ: प्रत्ययोधयत्‌ । तात! वृत्रासुरसे गृहीत होनेपर इन्द्रके मनपर महान्‌ मोह छा गया। तब महर्षि वसिष्ठने रथन्तर सामके द्वारा उन्हें सचेत किया

ବାୟୁ କହିଲେ—ବତ୍ସ, ବସିଷ୍ଠ ଋଷି ରଥନ୍ତର ସାମଗାନରେ ତାଙ୍କୁ ସଚେତନ କଲେ। ବୃତ୍ରାସୁର-ବଧଜନିତ ପାପରେ ଇନ୍ଦ୍ର ଗୃହୀତ ହେଲେ ତାଙ୍କ ମନକୁ ମହାମୋହ ଆବୃତ କଲା; ତେବେ ମହର୍ଷି ବସିଷ୍ଠ ରଥନ୍ତର ସାମଦ୍ୱାରା ତାଙ୍କୁ ଜାଗ୍ରତ କରିଲେ।

Verse 1136

विवेश सहसा ज्योतिर्जग्राह विषयं तत: । जलमें अमिततेजस्वी वज्रकी मार खाकर वृत्रासुर सहसा तेजस्तत्त्वमें घुस गया और उसके विषयको ग्रहण करने लगा

ବାୟୁ କହିଲେ—ସେ ସହସା ଜ୍ୟୋତି-ତତ୍ତ୍ୱରେ ପ୍ରବେଶ କଲା; ତାପରେ ତାହାର ବିଷୟ (କାର୍ଯ୍ୟକ୍ଷେତ୍ର) କୁ ଗ୍ରହଣ କଲା।

Verse 1636

शतक्रतुरभिक्रुद्धस्तत्र वज़मवासृजत्‌ । जब आकाश वृत्रासुरमय हो गया और उसके शब्दरूपी विषयका अपहरण होने लगा, तब शतक्रतु इन्द्रको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने वहाँ भी उसपर वज्रका प्रहार किया

ବାୟୁ କହିଲେ—ଶତକ୍ରତୁ ଇନ୍ଦ୍ର ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ ସେଠାରେ ହିଁ ବଜ୍ର ନିକ୍ଷେପ କଲେ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether post-war remorse justifies withdrawal from duty, or whether ethical leadership requires confronting internal confusion and continuing action under disciplined discernment.

The sequence teaches that disorder can migrate into progressively subtler levels—culminating in the self—so victory is incomplete without inner clarity; rectitude (ārjava) and awakened awareness are presented as the decisive instruments.

Yes: it is explicitly framed as a dharma-rahasya, attributed to Śakra and transmitted through ṛṣi tradition, signaling interpretive authority and positioning the lesson as a key for restoring composure and right action.