Gāndhārī’s Petition for a Vision of the Departed (गान्धार्याः प्रार्थना—दिव्यदर्शनप्रसङ्गः)
हमारे इस राज्यको धिक्कार है, बल और पराक्रमको धिककार है तथा इस क्षत्रिय- धर्मको भी धिक््कार है! जिससे आज हमलोग मृतकतुल्य जीवन बिता रहे हैं ।। सुसूक्ष्मा किल कालस्य गतिर्द्धिजवरोत्तम | यत् समुत्सृज्य राज्यं सा वनवासमरोचयत्,विप्रवर! कालकी गति अत्यन्त सूक्ष्म है, जिससे प्रेरित होकर माता कुन्तीने राज्य त्यागकर वनमें ही रहना ठीक समझा
dhig astu no rājyaṃ dhig balaṃ ca parākramaḥ | dhig ayaṃ kṣatriyadharmaḥ yenādya mṛtakatulyam iva jīvāmaḥ || susūkṣmā kila kālasya gatir dvijavarottama | yat samutsṛjya rājyaṃ sā vanavāsam arocayat ||
ଧିକ୍ ଆମ ଏହି ରାଜ୍ୟକୁ, ଧିକ୍ ବଳ ଓ ପରାକ୍ରମକୁ, ଏହି କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମକୁ ମଧ୍ୟ ଧିକ୍—ଯାହାରେ ଆଜି ଆମେ ମୃତକତୁଲ୍ୟ ଜୀବନ କାଟୁଛୁ। ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! କାଳର ଗତି ନିଶ୍ଚୟ ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୂକ୍ଷ୍ମ; ତାହାର ପ୍ରେରଣାରେ ମାତା କୁନ୍ତୀ ରାଜ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରି ବନବାସକୁ ହିଁ ଶ୍ରେୟ ମନେ କଲେ।
युधिछिर उवाच