Mahabharata Adhyaya 15
Ashramavasika ParvaAdhyaya 1534 Verses

Adhyaya 15

अध्याय १५ (Āśramavāsika-parva): धृतराष्ट्रस्य वनवासानुज्ञायाचनम् — Dhṛtarāṣṭra’s renewed plea for consent to forest-dwelling

Upa-parva: Āśramavāsika-parva: Dhṛtarāṣṭra’s Request for Permission and Public Mediation Episode

Vaiśaṃpāyana reports that the assembled citizens and countryside people, addressed by the aged Kuru king, become stunned and grief-stricken, repeatedly likened to those who have lost consciousness. Dhṛtarāṣṭra speaks again, presenting himself as old and bereaved, lamenting with Gāndhārī, and reminding the audience that his forest-withdrawal has already been sanctioned by his father’s lineal authority and by Kṛṣṇa-Dvaipāyana Vyāsa, alongside dharma-knowing royal approval. He bows and requests permission once more. The community weeps, covering faces, struggling to endure the sorrow of separation. After regaining composure, they coordinate a unified response and entrust their message to a single brāhmaṇa. An elder, respected Bahvṛca named Sāmbākhya begins speaking: he validates the king’s statements, emphasizes mutual goodwill, praises the Kuru lineage’s historical care for subjects, asserts that neither Dhṛtarāṣṭra nor Duryodhana committed wrong against them in their experience of protection, and directs the king to follow Vyāsa’s instruction as the highest authority. The chapter thus stages public grief, mediated counsel, and the ethical formalities of renunciation from kingship.

Chapter Arc: हस्तिनापुर की राजमार्ग-भरी गलियों से धृतराष्ट्र का काँपते हाथों से अंजलि बाँधकर निकलना—एक ऐसे राजा का प्रस्थान, जो अब राज्य नहीं, प्रायश्चित्त चुन रहा है। → वर्धमान-द्वार से बाहर जाते हुए धृतराष्ट्र बार-बार जनसमूह को लौटाते हैं; नगर की भीड़ और परिवार की भीड़—दोनों का खिंचाव बढ़ता है। पाण्डव, सेवक, अन्तःपुर की स्त्रियाँ पीछे-पीछे चलती हैं। सहदेव और अन्य पुत्र कुन्ती से विनती करते हैं कि वह बहुओं सहित लौट आएँ, पर कुन्ती का संकल्प कठोर होता जाता है। → कुन्ती का निर्णायक वचन: वह गान्धारी के साथ तपस्विनी बनकर वन में रहेगी—मैल-कीचड़ धारण कर, सास-ससुर के चरणों की सेवा करेगी; पाण्डवों के अनुरोध, राज्य की सुविधा, और पुत्र-वधुओं की संगति—सबको त्यागकर। → कुन्ती पुत्रों को अंतिम उपदेश देती है—द्रौपदी को सदा प्रिय रखना, भाइयों को संतुष्ट रखना, कुल-धर्म और मर्यादा में स्थिर रहना। पाण्डव शोक में डूबकर भी मौन-स्वीकृति की ओर झुकते हैं; धृतराष्ट्र का प्रस्थान अब अपरिवर्तनीय हो जाता है। → वन-जीवन की कठोरता और वृद्धों के तप का परिणाम क्या होगा—और यह त्याग पाण्डवों के राज्य-धर्म को किस नई परीक्षा में डालेगा?

Shlokas

Verse 1

अपर बक। ] अति: घोडशो&< ध्याय: धृतराष्ट्रका पुरवासियोंको लौटाना और पाण्डवोंके अनुरोध करनेपर भी कुन्तीका वनमें जानेसे न रुकना वैशम्पायन उवाच ततः प्रासादहर्म्येषु वसुधायां च पार्थिव । नारीणां च नराणां च नि:स्वन: सुमहानभूत्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ରାଜନ୍! ତଦନନ୍ତର ପ୍ରାସାଦ ଓ ଅଟ୍ଟାଳିକାମାନଙ୍କରେ, ଏବଂ ଭୂମି ସମଗ୍ରେ ମଧ୍ୟ, ନାରୀ ଓ ପୁରୁଷମାନଙ୍କର ରୋଦନର ଅତି ମହା କୋଳାହଳ ଉଠିଲା।

Verse 2

स राजा राजमार्गेण नूनारीसंकुलेन च | कथंचिन्निर्यया धीमान्‌ वेपमान: कृताञज्जलि:

ରାଜମାର୍ଗ ନାରୀ-ପୁରୁଷଙ୍କ ଭିଡ଼ରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା। ସେହି ପଥରେ ବୁଦ୍ଧିମାନ୍ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କଷ୍ଟକରେ ଆଗକୁ ବଢ଼ିଲେ; ହାତ ଯୋଡ଼ିଥିଲେ ଏବଂ ଦେହ କମ୍ପିତ ଥିଲା।

Verse 3

स वर्द्धमानद्वारेण निर्ययौ गजसाह्दयात्‌ । विसर्जयामास च तं जनौघं स मुहुर्मुहु:

ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ‘ବର୍ଧମାନ’ ନାମକ ଦ୍ୱାର ଦ୍ୱାରା ଗଜସାହ୍ୱୟ (ହସ୍ତିନାପୁର) ରୁ ବାହାରିଲେ। ବାହାରେ ପହଞ୍ଚି ସେ ମୁହୁର୍ମୁହୁଃ ଆଗ୍ରହ କରି ସହଯାତ୍ରୀ ଜନସମୂହକୁ ବିଦାୟ କଲେ।

Verse 4

वन॑ गन्तुं च विदुरो राज्ञा सह कृतक्षण: । संजयश्न महामात्र: सूतो गावल्गणिस्तथा,विदुर और गवल्गणकुमार महामात्र सूत संजयने राजाके साथ ही वनमें जानेका निश्चय कर लिया था

ବିଦୁର ରାଜାଙ୍କ ସହ ବନକୁ ଯିବାକୁ ନିଶ୍ଚୟ କଲେ। ସେହିପରି ମହାମାତ୍ର ସଞ୍ଜୟ ଓ ଗାବଲ୍ଗଣି (ଗାବଲ୍ଗଣଙ୍କ ପୁତ୍ର) ସୂତ ମଧ୍ୟ ରାଜାଙ୍କ ସହ ବନଗମନରେ ଦୃଢ଼ ହେଲେ।

Verse 5

कृपं निवर्तयामास युयुत्सुं च महारथम्‌ । धृतराष्ट्री महीपाल: परिदाप्य युधिष्ठिरे,महाराज धुृतराष्ट्रने कृपाचार्य और महारथी युयुत्सुको युधिष्ठिरके हाथों सौंपकर लौटाया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହୀପାଳ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କୃପଙ୍କୁ ଓ ମହାରଥୀ ଯୁଯୁତ୍ସୁଙ୍କୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ହସ୍ତେ ସମର୍ପଣ କରି ପୁନଃ ପଠାଇଲେ; ତାପରେ ସେ ନିଜେ ମଧ୍ୟ ଫେରିଗଲେ।

Verse 6

निवृत्ते पौरवर्गे च राजा सान्त:पुरस्तदा । धृतराष्ट्रा भ्यनुज्ञातो निवर्तितुमियेष ह,पुरवासियोंके लौट जानेपर अन्तःपुरकी रानियोंसहित राजा युधिष्ठिरने धृतराष्ट्रकी आज्ञा लेकर लौट जानेका विचार किया

ପୌରମାନେ ଫେରିଯାଇବା ପରେ, ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଅନ୍ତଃପୁରର ରାଣୀମାନଙ୍କ ସହ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଅନୁମତି ନେଇ, ସେତେବେଳେ ଫେରିବାକୁ ନିଶ୍ଚୟ କଲେ।

Verse 7

सो<ब्रवीन्मातरं कुन्तीं वनं तमनुजग्मुषीम्‌ । अहं राजानमन्विष्ये भवती विनिवर्तताम्‌

ସେତେବେଳେ ବନକୁ ତାଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଯାଉଥିବା ମାତା କୁନ୍ତୀଙ୍କୁ ସେ କହିଲେ—“ମୁଁ ରାଜାଙ୍କୁ ଖୋଜି ଆସିବି; ଆପଣ ଫେରିଯାଆନ୍ତୁ।”

Verse 8

वधूपरिवृता राज्ञि नगरं गन्तुमर्हसि । राजा यात्वेष धर्मात्मा तापस्ये कृतनिश्चय:

“ହେ ରାଣୀ, ପୁତ୍ରବଧୂମାନଙ୍କ ସହ ଆପଣ ନଗରକୁ ଫେରନ୍ତୁ। ରାଜା—ଏହି ଧର୍ମାତ୍ମା—ତପସ୍ୟା ପାଇଁ ନିଶ୍ଚୟ କରି ପ୍ରସ୍ଥାନ କରୁଛନ୍ତି।”

Verse 9

उस समय उन्होंने वनकी ओर जाती हुई अपनी माता कुन्तीसे कहा--'रानी मा! आप अपनी पुत्र-वधुओंके साथ लौटिये, नगरको जाइये। मैं राजाके पीछे-पीछे जाऊँगा; क्योंकि ये धर्मात्मा नरेश तपस्याके लिये निश्चय करके वनमें जा रहे हैं, अतः इन्हें जाने दीजिये” ।।

ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଏପରି କହିବାରେ କୁନ୍ତୀଙ୍କ ଚକ୍ଷୁ ଅଶ୍ରୁରେ ଭରିଗଲା; ତଥାପି ସେ ଗାନ୍ଧାରୀଙ୍କ ହାତ ଧରି ଆଗକୁ ଚାଲିଗଲେ।

Verse 10

कुन्त्युवाच सहदेवे महाराज माप्रसादं कृथा: क्वचित्‌ | एष मामनुरक्तो हि राजंस्त्वां चैव सर्वदा

କୁନ୍ତୀ କହିଲେ—ମହାରାଜ, ସହଦେବ ଉପରେ ତୁମେ କେବେ ବି ଅପ୍ରସନ୍ନ ହେବ ନାହିଁ। ରାଜନ, ସେ ସଦା ମୋ ପ୍ରତି ଓ ତୁମ ପ୍ରତି ଭକ୍ତିରେ ଅନୁରକ୍ତ ରହିଛି।

Verse 11

कर्ण स्मरेथा: सतत संग्रामेष्वपलायिनम्‌ । अवकीरण्णो हि समरे वीरो दुष्प्रज्ञया तदा

ଯୁଦ୍ଧରେ କେବେ ବି ପଛୁଆ ହୋଇନଥିବା ତୁମ ଭାଇ କର୍ଣ୍ଣକୁ ମଧ୍ୟ ସଦା ସ୍ମରଣ କର। କାରଣ ସେ ସମୟରେ ମୋର ଦୁର୍ବୁଦ୍ଧି ହେତୁ ସେ ବୀର ରଣରେ ନିହତ ହେଲା।

Verse 12

आयसं हृदयं नूनं मन्दाया मम पुत्रक । यत्‌ सूर्यजमपश्यन्त्या: शतधा न विदीर्यते

ପୁଅ, ମୋର ହୃଦୟ ନିଶ୍ଚୟ ଲୋହାର—ମୁଁ ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ଓ ଅଭାଗିନୀ; କାରଣ ସୂର୍ଯ୍ୟନନ୍ଦନ କର୍ଣ୍ଣକୁ ନ ଦେଖିଲେ ମଧ୍ୟ ଏହା ଶତଧା ଭାଙ୍ଗୁନାହିଁ।

Verse 13

एवं गते तु कि शक्‍यं मया कर्तुमरिंदम | मम दोषो<5यमत्यर्थ ख्यापितो यन्न सूर्यज:,शत्रुदमन! ऐसी दशामें मैं क्या कर सकती हूँ। यह मेरा ही महान्‌ दोष है कि मैंने सूर्यपुत्र कर्णका तुमलोगोंको परिचय नहीं दिया

ଶତ୍ରୁଦମନ, ଘଟଣା ଏପରି ହୋଇଗଲା ପରେ ମୁଁ ଏବେ କ’ଣ କରିପାରିବି? ଏହା ମୋର ଅତ୍ୟନ୍ତ ଗୁରୁତର ଦୋଷ—କର୍ଣ୍ଣ ସୂର୍ଯ୍ୟପୁତ୍ର ବୋଲି ମୁଁ ତୁମମାନଙ୍କୁ ଜଣାଇନଥିଲି।

Verse 14

तन्निमित्तं महाबाहो दान दद्यास्त्वमुत्तमम्‌ । सदैव भ्रातृभि: सार्ध सूर्यजस्यारिमर्दन,महाबाहो! शत्रुमर्दन! तुम अपने भाइयोंके साथ सदा ही सूर्यपुत्र कर्णके लिये भी उत्तम दान देते रहना

ଏହି କାରଣରୁ, ମହାବାହୁ, ଶତ୍ରୁମର୍ଦ୍ଦନ, ତୁମେ ତୁମ ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ ସଦା ସୂର୍ଯ୍ୟପୁତ୍ର କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ନିମିତ୍ତେ ମଧ୍ୟ ଉତ୍ତମ ଦାନ ଦେଇ ଯାଅ।

Verse 15

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराफ्रका नगरसे निकलनाविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ,द्रौपद्याश्न प्रिये नित्यं स्थातव्यमरिकर्शन । भीमसेनोडर्जुनश्वैव नकुलश्व कुरूद्वह

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଅରିକର୍ଷଣ! ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କ ପ୍ରତି ତୁମେ ସଦା ପ୍ରିୟ ଓ ଅଚଳ ରୁହ; ହେ କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଭୀମସେନ, ଅର୍ଜୁନ ଓ ନକୁଳ ମଧ୍ୟ ଏମିତି ରୁହନ୍ତୁ।

Verse 16

श्वश्रूश्वशुरयो: पादान्‌ शुश्रूषन्ती वने त्वहम्‌,इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि कुन्तीवनप्रस्थाने षोडशो<ध्याय:

“ମୁଁ ବନରେ ରହି ଶ୍ୱଶ୍ରୂ ଓ ଶ୍ୱଶୁରଙ୍କ ପାଦସେବାରେ ନିରତ ରହିବି।”

Verse 17

वैशम्पायन उवाच एवमुक्त: स धर्मात्मा भ्रातृभि: सहितो वशी । विषादमगमद्‌ धीमान्‌ न च किंचिदुवाच ह

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ମାତା ଏପରି କହିବା ପରେ, ମନକୁ ବଶରେ ରଖୁଥିବା ଧର୍ମାତ୍ମା ଓ ବୁଦ୍ଧିମାନ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ ଗଭୀର ବିଷାଦରେ ପତିତ ହେଲେ; କିନ୍ତୁ ମୁଖରୁ କିଛି କହିଲେ ନାହିଁ।

Verse 18

मुहूर्तमिव तु ध्यात्वा धर्मराजो युधिष्ठिर: । उवाच मातरं दीनश्रिन्ताशोकपरायण:,दो घड़ीतक कुछ सोच-विचारकर चिन्ता और शोकमें डूबे हुए धर्मराज युधिष्ठिरने मातासे दीन होकर कहा--

କିଛିକ୍ଷଣ ଧ୍ୟାନ କରିଥିବା ପରି ଚିନ୍ତା କରି, ଚିନ୍ତା ଓ ଶୋକରେ ଡୁବିଥିବା ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦୀନ ହୋଇ ମାତାଙ୍କୁ କହିଲେ।

Verse 19

किमिदं ते व्यवसित नैवं त्वं वक्तुमरहसि । न त्वामभ्यनुजानामि प्रसाद कर्तुमहसि

“ମାତା! ତୁମେ ଏ କି ନିଶ୍ଚୟ କରିଛ? ଏଭଳି କଥା କହିବା ତୁମ ପାଇଁ ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ। ମୁଁ ତୁମକୁ ବନକୁ ଯିବାର ଅନୁମତି ଦେଉନାହିଁ। ମୋପରେ କୃପା କର, ପ୍ରସନ୍ନ ହୁଅ।”

Verse 20

पुरोद्यतान्‌ पुरा हास्मानुत्साहा प्रियदर्शने । विदुलाया वचोभिस्त्व॑ नास्मान्‌ संत्यक्तुमहसि

ପ୍ରିୟଦର୍ଶନେ! ପୂର୍ବେ ଯେତେବେଳେ ଆମେ ନଗର ଛାଡ଼ିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ଥିଲୁ, ସେତେବେଳେ ବିଦୁଲାଙ୍କ ବଚନ ଦ୍ୱାରା ତୁମେ ଆମକୁ କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମ ପାଳନରେ ଉତ୍ସାହିତ କରିଥିଲ। ତେଣୁ ଆଜି ଆମକୁ ପରିତ୍ୟାଗ କରିଯିବା ତୁମ ପାଇଁ ଶୋଭନ ନୁହେଁ।

Verse 21

निहत्य पृथिवीपालानू्‌ राज्यं प्राप्तमिदं मया | तव प्रज्ञामुपश्रुत्य वासुदेवान्नरर्षभात्‌

ବହୁ ପୃଥିବୀପାଳଙ୍କୁ ନିହତ କରି ମୁଁ ଏହି ରାଜ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତ କରିଛି। ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ବାସୁଦେବଙ୍କ ଠାରୁ ଆସିଥିବା ତୁମ ପ୍ରଜ୍ଞାମୟ ପରାମର୍ଶ ଶୁଣି ମୁଁ ଏହି ପଥ ଗ୍ରହଣ କରିଥିଲି।

Verse 22

क्व सा बुद्धिरियं चाद्य भवत्या यच्छुतं मया । क्षत्रधर्मे स्थितिं चोक्त्वा तस्याश्ष्यवितुमिच्छसि

କେଉଁଠି ତୁମ ସେଇ ବୁଦ୍ଧି, ଆଉ କେଉଁଠି ଆଜିର ଏହି ଭାବ! ଆମକୁ କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମରେ ଅବସ୍ଥିତ ରହିବାକୁ କହି, ଏବେ ତୁମେ ନିଜେ ତାହାରୁ ଭ୍ରଷ୍ଟ ହେବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛ?

Verse 23

अस्मानुत्सृज्य राज्यं च स्नुषा हीमा यशस्विनि । कथं वत्स्यसि दुर्गेषु वनेष्वद्य प्रसीद मे

ଯଶସ୍ୱିନୀ ମାତା! ଆମକୁ, ଏହି ରାଜ୍ୟକୁ ଓ ତୁମ ପୁତ୍ରବଧୂମାନଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି ଆଜି ତୁମେ ସେଇ ଦୁର୍ଗମ ବନମାନେ ମଧ୍ୟରେ କିପରି ବସିପାରିବ? ଆମପ୍ରତି କୃପା କର; ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ ଏଠି ରୁହ।

Verse 24

इति बाष्पकला वाच: कुन्ती पुत्रस्य शृण्वती | सा जगामाश्रुपूर्णाक्षी भीमस्तामिदमब्रवीत्‌

ପୁତ୍ରର ଅଶ୍ରୁମିଶ୍ରିତ, ଗଦ୍ଗଦ ବଚନ ଶୁଣି କୁନ୍ତୀଙ୍କ ନୟନ ଅଶ୍ରୁରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେଲା; ତଥାପି ସେ ରୁକିଲେ ନାହିଁ, ଆଗକୁ ଚାଲିଗଲେ। ସେତେବେଳେ ଭୀମସେନ ତାଙ୍କୁ ଏହି କଥା କହିଲେ।

Verse 25

यदा राज्यमिदं कुन्ति भोक्तव्यं पुत्रनिर्जितम्‌ । प्राप्तव्या राजधर्माश्व तदेयं ते कुतो मति:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ କୁନ୍ତୀ! ପୁତ୍ରମାନେ ଜିତି ଆଣିଥିବା ଏହି ରାଜ୍ୟ ଭୋଗ କରିବାର ସମୟ ଆସିଲା, ରାଜଧର୍ମ ପାଳନର ସୁଯୋଗ ମଧ୍ୟ ନିଶ୍ଚିତ ହେଲା; ତେବେ ତୁମ ମନରେ ଏମିତି ମତି କେମିତି ଜନ୍ମିଲା?

Verse 26

कि वयं कारिता: पूर्व भवत्या पृथिवीक्षयम्‌ | कस्य हेतो: परित्यज्य वन॑ गन्तुमभीप्ससि,“यदि ऐसा ही करना था तो आपने इस भूमण्डलका विनाश क्‍यों करवाया? क्‍या कारण है कि आप हमें छोड़कर वनमें जाना चाहती हैं?

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯଦି ଶେଷରେ ଏହିପରି ହେବାକୁ ଥିଲା, ତେବେ ପୂର୍ବେ ତୁମେ କାହିଁକି ପୃଥିବୀର ରାଜାମାନଙ୍କ ଓ ପ୍ରଜାମାନଙ୍କ ବିନାଶ କରାଇଲ? କେଉଁ କାରଣରୁ ଏବେ ଆମକୁ ଛାଡ଼ି ବନକୁ ଯିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛ?

Verse 27

वनाच्चापि किमानीता भवत्या बालका वयम्‌ | दुःखशोकसमाविष्टौ माद्रीपुत्राविमौ तथा,“जब आपको वनमें ही जाना था, तब आप हमको और दु:ख-शोकमें डूबे हुए उन माद्रीकुमारोंको बाल्यावस्थामें वनसे नगरमें क्यों ले आयीं?

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯଦି ଶେଷରେ ତୁମକୁ ବନକୁ ଯିବାକୁ ଥିଲା, ତେବେ ଆମେ ଶିଶୁ ଥିବାବେଳେ ଆମକୁ ବନରୁ ନଗରକୁ କାହିଁକି ଆଣିଲ? ଏବଂ ଦୁଃଖ-ଶୋକରେ ଆବିଷ୍ଟ ମାଦ୍ରୀଙ୍କ ଏହି ଦୁଇ ପୁତ୍ରକୁ ମଧ୍ୟ କାହିଁକି ଏଭଳି ଆଣିଲ?

Verse 28

प्रसीद मातर्मा गास्त्वं वनमद्य यशस्विनि । श्रियं यौधिष्ठिरी मातर्भुड्क्ष्य तावद्‌ बलार्जिताम्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମାତା, ପ୍ରସନ୍ନ ହୁଅ; ହେ ଯଶସ୍ୱିନୀ! ଆଜି ବନକୁ ଯାଅନି। ମାତା, ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ତ ବଳ ଓ ପରାକ୍ରମରେ ଅର୍ଜିତ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସେଇ ରାଜଲକ୍ଷ୍ମୀକୁ ଉପଭୋଗ କର।

Verse 29

इति सा निश्चितैवाशु वनवासाय भाविनी । लालप्यतां बहुविध॑ पुत्राणां नाकरोद्‌ वच:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏଭଳି ଶୁଦ୍ଧହୃଦୟା କୁନ୍ତୀଦେବୀ ଶୀଘ୍ରେ ବନବାସ ପାଇଁ ଦୃଢ଼ ସଙ୍କଳ୍ପ କରିଥିଲେ; ତେଣୁ ପୁତ୍ରମାନେ ନାନା ପ୍ରକାରେ ବିଲାପ କରି ଅନୁରୋଧ କଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ତାଙ୍କ କଥା ମାନିଲେ ନାହିଁ।

Verse 30

द्रौपदी चान्वयाच्छवश्रृं विषण्णवदना तदा । वनवासाय गच्छन्तीं रुदती भद्रया सह

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତେବେ ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କ ମୁହଁ ମଧ୍ୟ ଶୋକରେ ଆବୃତ ହେଲା। ବନବାସକୁ ଯାଉଥିବା ଶ୍ୱଶ୍ରୁ କୁନ୍ତୀଙ୍କୁ ଦେଖି, ଦ୍ରୌପଦୀ ସୁଭଦ୍ରା ସହ କାନ୍ଦୁଥିବା ଅବସ୍ଥାରେ ତାଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଗଲେ।

Verse 31

सा पुत्रान्‌ रुदतः सर्वान्‌ मुहुर्मुहुरवेक्षती । जगामैव महाप्राज्ञा वनाय कृतनिश्चया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାପ୍ରାଜ୍ଞା କୁନ୍ତୀ ବନକୁ ଯିବାରେ ଦୃଢ଼ନିଶ୍ଚୟ କରିଥିଲେ; ତେଣୁ କାନ୍ଦୁଥିବା ସମସ୍ତ ପୁତ୍ରଙ୍କୁ ସେ ମୁହୁର୍ମୁହୁର୍ ଦେଖୁଥିଲେ, ତଥାପି ଆଗକୁ ଆଗକୁ ଚାଲିଗଲେ।

Verse 32

अन्वयु: पाण्डवास्तां तु सभृत्यान्त:पुरास्तथा । ततः प्रमृज्य साश्रूणि पुत्रान्‌ वचनमब्रवीत्‌

ପାଣ୍ଡବମାନେ ମଧ୍ୟ ସେବକମାନଙ୍କୁ ଓ ଅନ୍ତଃପୁରର ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ସହ ନେଇ ତାଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଗଲେ। ତାପରେ କୁନ୍ତୀ ଆଖିର ଲୁହ ପୁଛି ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଏଭଳି କହିଲେ।

Verse 153

समाधेयास्त्वया राजंस्त्वय्यद्य कुलधूर्गता । शत्रुसूदन! मेरी बहू द्रौपदीका भी सदा प्रिय करते रहना। कुरुश्रेष्ठ. तुम भीमसेन, अर्जुन और नकुलको भी सदा संतुष्ट रखना। आजसे कुरुकुलका भार तुम्हारे ही ऊपर है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ, ଏବେ ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟ ବ୍ୟବସ୍ଥା କରିବା ତୁମର; ଆଜିଠାରୁ କୁଳର ଭାର ତୁମ ଉପରେ ନ୍ୟସ୍ତ। ଶତ୍ରୁସୂଦନ, ମୋର ବହୁ ଦ୍ରୌପଦୀକୁ ସଦା ସ୍ନେହରେ ରଖ। କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଭୀମସେନ, ଅର୍ଜୁନ ଓ ନକୁଳକୁ ମଧ୍ୟ ସଦା ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ରଖ। ଆଜିଠାରୁ କୁରୁବଂଶର ଦାୟିତ୍ୱ କେବଳ ତୁମର ଏକାର।

Verse 163

गान्धारीसहिता वत्स्ये तापसी मलपड्किनी । अब मैं वनमें गान्धारीके साथ शरीरपर मैल एवं कीचड़ धारण किये तपस्विनी बनकर रहूँगी और अपने इन सास-ससुरके चरणोंकी सेवामें लगी रहूँगी

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମୁଁ ଗାନ୍ଧାରୀ ସହ ବନରେ ରହିବି; ଶରୀରରେ ଧୂଳି ଓ କାଦୁଆ ଧାରଣ କରି ତପସ୍ୱିନୀ ହୋଇ। ଏହି ଶ୍ୱଶୁର-ଶ୍ୱଶ୍ରୁଙ୍କ ଚରଣସେବାରେ ମୁଁ ସଦା ନିୟୁକ୍ତ ରହିବି।

Frequently Asked Questions

The dilemma is balancing civic attachment to a familiar ruler with the dharmic legitimacy of renunciation: the community must decide whether emotional dependence should delay a withdrawal already framed as ethically authorized.

Orderly counsel should transform collective grief into dharma-aligned action: the spokesman validates shared bonds yet prioritizes adherence to authoritative guidance (Vyāsa) and to established protocols for life-stage transition.

No explicit phalaśruti appears in the provided passage; the chapter’s meta-function is structural—documenting how communal authorization and authoritative counsel legitimize renunciation within the epic’s ethical closure.

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