यह सोपान ‘अहंकार-निवृत्ति और धर्म-प्रतिष्ठा’ का द्वार है। साधक-चित्त के भीतर ‘लंका’ रज-तम से घिरी दुर्ग-मानसिकता है; यहाँ राम-प्रताप का अर्थ बाह्य विजय नहीं, वरन् अधर्म (रावण-भाव) के गढ़ में विवेक (अंगद) और भक्ति-बल (हनुमान/कपीदल) द्वारा प्रवेश कर ‘अहं’ का मुकुट गिराना है। इस चरण में दूत-वाणी, नीति-उपदेश, और शत्रु-सभा में निर्भय सत्य—ये मुक्ति की सीढ़ी पर ‘वैराग्य-युक्त साहस’ की परीक्षा हैं।
यह प्रकरण ‘अहंकार-निवृत्ति’ का नाट्य-रूप है: लंका रज-तम से घिरी दुर्ग-मानसिकता, रावण उसका ‘अहं-मुकुट’। अंगद का दूत-वचन विवेक का प्रवेश है—वह मार सकने पर भी संयम रखता है, जिससे शक्ति का शील के अधीन होना ‘भक्ति-सौंदर्य’ बनता है। सभा में भय, कटुता और मुकुटों का गिरना—अहं के क्षय और सत्ता की खोखली प्रतिष्ठा के प्रतीक हैं। मंदोदरी की इतिहास-स्मृति (मारीच/बाली/खर-दूषण) ‘काल-निकटता’ का दर्पण है: जो अधर्म पर टिका है, वह स्मृति-प्रमाणों से ही ढहने लगता है। अंततः राम-पक्ष की मंत्रणा और चतुरंग-रचना बताती है कि भक्ति केवल भाव नहीं—नीति, अनुशासन, समुदाय-धर्म और धर्म-प्रतिष्ठा का संगठित रूप है।
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