वाच्यावाच्यं न जानीषे नूनं मामवमन्यसे । भीष्मद्रोणमुखान् सर्वान् कस्मान्न स विजेष्यति,“क्या कहना चाहिये और क्या नहीं, इसका तुझे ज्ञान नहीं है। निश्चय ही तू अपनी बातोंसे मेरा अपमान कर रहा है। भला, मेरा पुत्र भीष्म-द्रोण आदि समस्त वीरोंको क्यों नहीं जीत लेगा? ब्रह्मन! मित्र होनेके नाते ही मैं तुम्हारे इस अपराधको क्षमा करता हूँ। यदि जीनेकी इच्छा हो, तो फिर ऐसी बात न करना”
vācya-avācyaṁ na jānīṣe nūnaṁ mām avamanyase | bhīṣma-droṇa-mukhān sarvān kasmān na sa vijeṣyati ||
«မပြောသင့်တာနဲ့ ပြောသင့်တာကို မင်းမသိဘူး; မင်းစကားနဲ့ ငါ့ကို အရှက်ခွဲနေတယ်။ ဘီရှ္မ၊ ဒ్రೋဏ စတဲ့ ရှေ့တန်းက သူရဲကောင်းအားလုံးကို ငါ့သားက ဘာကြောင့် မအနိုင်ယူနိုင်ရမလဲ?»
वैशम्पायन उवाच