बृहन्नडाप्रवेशः — Bṛhannadā’s Entry into Virāṭa’s Assembly
क्षिप्रं च गावो बहुला भवन्ति न तासु रोगो भवतीह कश्चन । तैस्तैरुपायैरविंदितं ममैत- देतानि शिल्पानि मयि स्थितानि,महात्मा राजा युधिष्ठिरको मेरे ये गुण भलीभाँति विदित थे। वे कुरुगाज युधिष्ठिर सदा मेरे ऊपर संतुष्ट रहते थे। किन-किन उपायोंसे गौओंकी संख्या शीघ्र बढ़ जाती है और उनमें कोई रोग नहीं पैदा होता, यह सब मुझे ज्ञात है। महाराज! ये ही कलाएँ मुझमें विद्यमान हैं। इनके सिवा मैं उन उत्तम लक्षणोंवाले बैलोंको भी जानता हूँ, जिनके मूत्रको सूँघ लेनेमात्रसे वन्ध्या स्त्री भी गर्भधारण एवं संतान उत्पन्न करनेयोग्य हो जाती है
kṣipraṃ ca gāvo bahulā bhavanti na tāsu rogo bhavatīha kaścana | taistair upāyair avinditaṃ mamaitad etāni śilpāni mayi sthitāni ||
သာဟဒေဝက ပြောသည်– «သင့်လျော်သော နည်းလမ်းများဖြင့် နွားတို့သည် မြန်မြန်တိုးပွားလာပြီး၊ ၎င်းတို့အတွင်း၌ ဤနေရာတွင် မည်သည့်ရောဂါမျှ မပေါ်ပေါက်။ ထိုသို့သော နည်းလမ်းများကြောင့်—ငါ့ဘက်မှ အပြစ်မရှိဘဲ—ဤလက်တွေ့ပညာရပ်များသည် ငါ၌ တည်မြဲနေသည်»။
सहदेव उवाच