Dhaumya’s Counsel on Incognito Conduct in a Royal Household (राजवसतौ आचरण-निति)
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २६ श्लोक मिलाकर कुल २५३ “लोक हैं।) #++ # ० ()) अपन असल ३. इस प्रसंगमें अर्जुनने अपनेको षण्ढक और बृहन्नला कहा है। षण्ढक शब्दका अर्थ है नपुंसक। अर्जुन इस समय उर्वशीके शापसे नपुंसक हो गये थे। बृहन्नलाका मूल शब्द बृहन्नल है। विद्वानोंने 'रर और “ल” को एक-सा माना है; अतः बृहन्नलका अर्थ बृहन्नर अर्थात् श्रेष्ठ या महान् मानव है। भगवान् नारायणके सखा होनेके कारण अर्जुन नरश्रेष्ठ हैं ही। २. परिचारिकाका एक अर्थ है सेविका और दूसरा अर्थ है सब ओर विचरण करनेवाली। इस प्रकार अर्जुनने गूढ़ अभिप्राययुक्त परिचारिका शब्दद्वारा अपनेको द्रौपदीका पति सूचित किया है। - नकुलने अपना नाम ग्रन्थिक बताया और अपनेको अश्वोंका अधिकारी कहा है। ग्रन्थिकका अर्थ है आयुर्वेद तथा अध्वर्युविद्यासम्बन्धी ग्रन्थोंको जाननेवाला। श्रुतिमें अश्विनीकुमारोंको देवताओंका वैद्य तथा अध्वर्यु कहा गया है। 'अश्विनौ वै देवाना भिषजावश्चिनावध्वर्यू” | नकुल अश्विनीकुमारोंके पुत्र हैं; अतः उनका अपनेको ग्रन्थिक कहना उपयुक्त ही है। “नास्ति श्वो येषां ते अश्वा: जिनके कलतक जीवित रहनेकी आशा न हो, वे अश्व हैं--इस व्युत्पत्तिके अनुसार जीवनकी आशा छोड़कर युद्धमें डटे रहनेवाले वीरोंको अश्व कहते हैं। नकुल उनके अधिकारी अर्थात् वीरोंमें प्रधान हैं। अत: उनका यह परिचय यथार्थ ही है। - “तस्य वाक्तन्तिर्नामानि दामानि” इस श्रुतिके अनुसार तन्ति शब्द वाणीका वाचक है। तन्तिपाल कहकर सहदेवने गूढ़रूपसे युधिष्ठिरको यह बताया कि मैं आपकी प्रत्येक आज्ञाका पालन करूँगा। साधारण लोगोंकी दृष्टिमें तन्तिपालका अर्थ है, बैलोंको बाँधनेकी रस्सीको सुरक्षित रखनेवाला। अतः सहदेवने भी अपना परिचय यथार्थ ही दिया। चतुथों5 ध्याय: धौम्यका पाण्डवोंको राजाके यहाँ रहनेका ढंग बताना और सबका अपने-अपने अभीष्ट स्थानोंको जाना युधिछिर उवाच कर्माप्युक्तानि युष्माभियानि यानि करिष्यथ । मम चापि यथा बुद्धिरुचिता विधिनिश्चयात्,युधिष्ठिर बोले--विराटके यहाँ रहकर तुम्हें जो-जो कार्य करने हैं, वे सब तुमने बताये। मुझे भी अपनी बुद्धिके अनुसार जो कार्य उचित प्रतीत हुआ, वह कह चुका। जान पड़ता है, विधाताका यही निश्चय है
yudhiṣṭhira uvāca | karmāpy uktāni yuṣmābhir yāni yāni kariṣyatha | mama cāpi yathā buddhir ucitā vidhiniścayāt ||
Yudhiṣṭhira berkata: “Kamu semua telah menyatakan, seorang demi seorang, tugas yang akan kamu pikul ketika tinggal di rumah tangga Virāṭa. Aku juga telah menyebut apa yang pada pertimbanganku tampak wajar. Nampaknya demikianlah ketetapan takdir.”
युधिछिर उवाच
Dharma in adversity requires deliberate role-based duty: each person should choose fitting work aligned with prudence, while accepting that outcomes unfold under the larger order (vidhi).
As the Pāṇḍavas prepare to live incognito in King Virāṭa’s realm during the final year of exile, they finalize and affirm their chosen disguises and duties; Yudhiṣṭhira notes that everyone has declared their roles and that this plan seems sanctioned by destiny.