उद्योगपर्व (अध्याय १२९) — केशवस्य वैभवप्रदर्शनम् / Krishna’s Theophanic Display in the Kuru Assembly
अशक्यमयशस्यं च सद्धिश्वापि विगर्हितम् | यथा त्वादृशको मूढो व्यवस्थेत् कुलपांसन:,“वह कर्म ऐसा है, जिसकी साधु पुरुषोंने सदा निन््दा की है। वह अपयशकारक तो है ही, तू उसे कर भी नहीं सकता; परंतु तेरे-जैसा कुलांगार और मूर्ख मनुष्य उसे करनेकी चेष्टा करता है
“Perbuatan itu mustahil dilakukan dan hanya membawa aib; bahkan orang-orang saleh pun sentiasa mencelanya. Namun orang sepertimu—bodoh, noda bagi keturunan—tetap mahu mengaturnya.”
वैशम्पायन उवाच