Śalya’s Consecration as Senāpati and Kṛṣṇa’s Counsel to Yudhiṣṭhira (शल्यस्य सेनापत्यभिषेकः)
ततो दुर्योधन: स्थित्वा रथे रथवरोत्तमम् । सर्वयुद्धविभावज्ञमन्तकप्रतिमं युधि,तमभ्येत्यात्मजस्तुभ्यमश्च॒त्थामानमबत्रवीत् । राजन्! तब आपका पुत्र दुर्योधन रथपर बैठकर अश्व॒त्थामाके निकट गया। अश्वत्थामा महारथियोंमें श्रेष्ठ, युद्धविषयक सभी विभिन्न भावोंका ज्ञाता और युद्धमें यमराजके समान भयंकर है। उसके अंग सुन्दर हैं, मस्तक केशोंसे आच्छादित है और कण्ठ शंखके समान सुशोभित होता है। वह प्रिय वचन बोलनेवाला है। उसके नेत्र विकसित कमलदलके समान सुन्दर और मुख व्याप्रके समान भयंकर है। उसमें मेरुपर्वतकी-सी गुरुता है। स्कन्ध, नेत्र, गति और स्वरमें वह भगवान् शंकरके वाहन वृषभके समान है। उसकी भुजाएँ पुष्ट, सुगठित एवं विशाल हैं। वक्ष:स्थलका उत्तमभाग भी सुविस्तृत है। वह बल और वेगमें गरुड़ एवं वायुकी बराबरी करनेवाला है। तेजमें सूर्य और बुद्धिमें शुक्राचार्यके समान है। कान्ति, रूप तथा मुखकी शोभा--इन तीन गुणोंमें वह चन्द्रमाके तुल्य है। उसका शरीर सुवर्णमय प्रस्तरसमूहके समान सुशोभित होता है। अंगोंका जोड़ या संधिस्थान भी सुगठित है। ऊरु, कटिप्रदेश और पिण्डलियाँ--ये सुन्दर और गोल हैं। उसके दोनों चरण मनोहर हैं। अंगुलियाँ और नख भी सुन्दर हैं, मानो विधाताने उत्तम गुणोंका बारंबार स्मरण करके बड़े यत्नसे उसके अंगोंका निर्माण किया हो। वह समस्त शुभलक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त कार्योमें कुशल और वेदविद्याका समुद्र है। अश्वत्थामा शत्रुओंपर वेगपूर्वक विजय पानेमें समर्थ है। परंतु शत्रुओंके लिये बलपूर्वक उसके ऊपर विजय पाना असम्भव है। वह दसों* अंगोंसे युक्त चारों: चरणोंवाले धरनुर्वेदको ठीक-ठीक जानता है। छहों अंगोंसहित चार वेदों और इतिहास-पुराण-स्वरूप पंचम वेदका भी अच्छा ज्ञाता है। महातपस्वी अश्वत्थामाको उसके पिता अयोनिज द्रोणाचार्यने बड़े यत्नसे कठोर व्रतोंद्वारा तीन नेत्रोंवाले भगवान् शंकरकी आराधना करके अयोनिजा कृपीके गर्भसे उत्पन्न किया था। उसके कर्मोकी कहीं तुलना नहीं है। इस भूतलपर वह अनुपम रूप-सौन्दर्यसे युक्त है। सम्पूर्ण विद्याओंका पारंगत विद्वान् और गुणोंका महासागर है। उस अनिन्दित अश्वत्थामाके निकट जाकर आपके पुत्र दुर्योधनने इस प्रकार कहा--
tato duryodhanaḥ sthitvā rathe rathavarottamam | sarvayuddhavibhāvajñam antakapratimaṃ yudhi | tam abhyetya ātmajastubhyaṃ aśvatthāmānam abravīt ||
Sañjaya berkata: Lalu Duryodhana, setelah berdiri di atas kereta perangnya yang unggul, mendekati Aśvatthāmā—yang mengetahui segala ragam dan selok-belok peperangan, dan di medan tempur menggerunkan laksana Maut. Setelah menghampirinya, puteramu pun berkata kepada Aśvatthāmā demikian.
संजय उवाच
The verse highlights how, amid war, leaders seek security through the most formidable warriors; it implicitly raises an ethical tension: admiration for destructive prowess can eclipse reflection on dharma, making alliance and power appear more urgent than moral restraint.
Sañjaya reports that Duryodhana mounts his excellent chariot, goes to Aśvatthāmā—renowned for mastery of warfare and terrifying in combat—and begins to speak to him, setting up a request or counsel involving Aśvatthāmā’s participation.