अस्त्रयुद्धे द्रौणिपार्थसंघर्षः — Karṇa’s Bhārgavāstra and the Search for Yudhiṣṭhira
Chapter 45
संजय कहते हैं--भरतश्रेष्ठल तदनन्तर यह देखकर कि कुन्तीकुमारोंकी सेनाका अनुपम व्यूह बनाया गया है, जो शत्रुदलके आक्रमणको सह सकनेमें समर्थ और धृष्टद्युम्नद्वारा सुरक्षित है, शत्रुओंको संताप देनेवाला युद्धकुशल कर्ण रथकी घर्घराहट, सिंहकी-सी गर्जना तथा वाद्योंकी गम्भीर ध्वनिसे पृथ्वीको कँपाता और स्वयं भी क्रोधसे काँपता हुआ-सा आगे बढ़ा। उस महातेजस्वी वीरने शत्रुओंके मुकाबलेमें अपनी सेनाकी यथोचित व्यूह-रचना करके, जैसे इन्द्र आसुरी सेनाका संहार करते हैं, उसी प्रकार पाण्डव- सेनाका विनाश आरम्भ कर दिया और युधिष्ठिरको भी घायल करके दाहिने कर दिया ।। १ न-डें || (तानि सर्वाणि सैन्यानि कर्ण दृष्टवा विशाम्पते | बभूवु: सम्प्रहृष्टानि तावकानि युयुत्सया ।। अश्रूयन्त ततो वाचस्तावकानां विशाम्पते | प्रजानाथ! (उस समय) आपके सभी सैनिक कर्णको देखकर युद्धकी इच्छासे हर्ष और उत्साहमें भर गये। राजन! उस समय आपके योद्धाओंकी कही हुई ये बातें सुनायी देने लगीं। सैनिका ऊचु: कर्णार्जुनमहायुद्धमेतदद्य भविष्यति । अद्य दुर्योधनो राजा हतामित्रो भविष्यति ।। सैनिक बोले--आज यह कर्ण और अर्जुनका महान् युद्ध होगा। आज राजा दुर्योधनके सारे शत्रु मार डाले जायूँगे। अद्य कर्ण रणे दृष्टवा फाल्गुनो विद्रविष्यति । अद्य तावद् वयं युद्धे कर्णस्यैवानुगामिन: ।। कर्णबाणमयं भीम॑ युद्ध द्रक्ष्याम संयुगे । आज अर्जुन रणभूमिमें कर्णको देखते ही भाग खड़े होंगे। आज युद्धमें हमलोग कर्णके ही अनुगामी होकर समरांगणमें कर्णके बाणोंसे भरा हुआ भीषण संग्राम देखेंगे। चिरकालागतमिदमसद्येदानीं भविष्यति ।। अद्य द्रक्ष्याम संग्रामं घोरं देवासुरोपमम् । दीर्घकालसे जिसकी सम्भावना की जाती थी, वह आज इसी समय उपस्थित होगा। आज हमलोग देवासुर-संग्रामके समान भयंकर युद्ध देखेंगे। अद्येदानीं महद् युद्ध भविष्पति भयानकम् ।। अद्येदानीं जयो नित्यमेकस्यैकस्य वा रणे । आज अभी बड़ा भयानक युद्ध छिड़नेवाला है। आज रणभूमिमें इन दोनोंमेंसे एक-न- एककी विजय अवश्य होगी। अर्जुनं किल राधेयो वधिष्यति महारणे ।। अथवा कं नरं लोके न स्पृशन्ति मनोरथा: । निश्चय ही राधापुत्र कर्ण इस महायुद्धमें अर्जुनका वध कर डालेगा अथवा इस जगत्में किस मनुष्यके अंदर बड़े-बड़े मनसूबे नहीं उठते हैं। संजय उवाच इत्युक्त्वा विविधा वाच: कुरव: कुरुनन्दन । आजपघ्नुः पटहांश्वैव तूर्याश्रैव सहस्रश: ।। संजय कहते हैं--कुरुनन्दन! इस तरह नाना प्रकारकी बातें कहकर कौरवोंने सहस्रों नगाड़े पीटे और दूसरे-दूसरे बाजे भी बजवाये। भेरीनादांश्व विविधान् सिंहनादांश्व पुष्कलान् | मुरजानां महाशब्दानानकानां महारवान् ।। भाँति-भाँतिकी भेरी-ध्वनि हुई और बारंबार सैनिकोंद्वारा सिंहनाद किये गये। गम्भीर ध्वनि करनेवाले ढोल और मृदंगके महान् शब्द वहाँ सब ओर गूँजने लगे। नृत्यमानाश्न बहवस्तर्जमानाश्न मारिष । अन्योन्यमभ्ययुर्युद्धे युद्धरज्रगता नरा: ।। मान्यवर नरेश! युद्धके रंगभूमिमें उतरे हुए बहुसंख्यक मनुष्य नृत्य तथा गर्जन-तर्जन करते हुए एक-दूसरेका सामना करनेके लिये आगे बढ़े। तेषां पदाता नागानां पादरक्षा: समन्तत: । पट्टिशासिधरा: शूराश्चापबाण भुशुण्डिन: ।। भिन्दिपालधराश्चैव शूलहस्ता: सुचक्रिण: । तेषां समागमो घोरो देवासुररणोपम: ।।) उनमें शूरवीर पैदल सैनिक चारों ओरसे पट्टिश, खड्ग, धनुष-बाण, भुशुण्डी, भिन्दिपाल, त्रिशूल और चक्र हाथमें लेकर हाथियोंके पैरोंकी रक्षा कर रहे थे। उनमें देवासुर-संग्रामके समान भयंकर युद्ध छिड़ गया। धृतराष्ट्र रवाच कथं संजय राधेय: प्रत्यव्यूहत पाण्डवान् | धृष्टद्युम्नमुखान् सर्वान् भीमसेनाभिरक्षितान्,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! राधापुत्र कर्णने देवताओंके लिये भी अजेय तथा भीमसेनद्वारा सुरक्षित धृष्टद्युम्म आदि सम्पूर्ण महाधनुर्धर पाण्डव-वीरोंके जवाबमें किस प्रकार व्यूहका निर्माण किया? संजय! मेरी सेनाके दोनों पक्ष और प्रपक्षके रूपमें कौन- कौनसे वीर थे?
sañjaya uvāca | ity uktvā vividhā vācaḥ kuravaḥ kurunandana | ājaghnuḥ paṭahāṃś caiva tūryāṃś caiva sahasraśaḥ ||
Sanjaya berkata: “Wahai kegembiraan kaum Kuru, setelah berkata-kata dengan pelbagai cara, para Kaurava memalu ribuan gendang perang dan meniup sangkakala serta alat-alat lain yang tidak terbilang banyaknya.”
संजय उवाच
The verse highlights how words and emotions in a community quickly translate into action: collective confidence is reinforced through public ritual (war-music), which can intensify conflict. Ethically, it warns that mass enthusiasm and display can drown out sober discernment (viveka) and hasten violence.
After their soldiers voice excited predictions about the coming clash, the Kauravas respond with a surge of martial celebration—beating war-drums and sounding trumpets in great numbers—signaling readiness and raising the army’s fighting spirit as battle is about to commence.