कर्मयोग–ज्ञानयज्ञ–अवतारोपदेश
Karma-Yoga, Jñāna-Yajña, and Avatāra Instruction
सम्बन्ध--इस प्रकार मन और इन्द्रियोंको वशर्में करके अनासक्तभावसे इन्द्रियोंद्रारा व्यवहार करनेवाले साधकको युख, शान्ति और स्थितप्रज्ञ-अवस्था प्राप्त होनेकी बात कहकर अब दो श्लोकोद्वारा इससे विपरीत जिसके मन- इन्द्रिय जीते हुए नहीं हैं. ऐसे विषयासक्त मनुष्यमें युख-शान्तिका अभाव दिखलाकर विषयोंके संगसे उसकी बुद्धिके विचलित हो जानेका प्रकार बतलाते नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । न चाभावयत: शान्तिरशान्तस्य कुत: सुखम्,न जीते हुए मन और इन्द्रियोंवाले पुरुषमें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्यके अन्त:ःकरणमें भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्यको शान्ति नहीं मिलतीः और शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है?
Pada orang yang tidak terkawal tiada kebijaksanaan yang teguh; dan pada orang yang tidak bersatu dalam yoga tiada perenungan. Bagi yang tidak berperenungan tiada kedamaian; dan bagi yang tidak damai, dari mana datangnya bahagia?
अजुन उवाच