Adhyaya 89
Adi ParvaAdhyaya 8914 Verses

Adhyaya 89

Paurava-vaṃśa-kathana (Account of the Paurava Lineage) | महाभारत आदि पर्व अध्याय ८९

Upa-parva: Paurava–Aila Vaṃśānucarita (Genealogical Account of the Paurava Line)

This chapter is a structured genealogical response to Janamejaya’s inquiry about the kings of Pūru’s line, with emphasis on their virtues, prowess, and continuity. Vaiśaṃpāyana enumerates major nodes of succession: Pūru’s descendants (including Pravīra and Manasyu), the prolific Anādhṛṣṭi line, and subsequent rulers such as Matināra, Taṃsu, Ilina, and Duḥṣanta, culminating in Bharata and the consolidation of the Bharata identity. The narrative then traces Bhūmanyu and Vitatha, followed by Suhotra and his royal rituals and prosperity. A key historical-ethical episode appears with Saṃvaraṇa: a period of demographic and ecological collapse and military defeat leads to exile near the Sindhu; after prolonged hardship, Vasiṣṭha arrives, is accepted as purohita, and consecrates the Paurava back to sovereignty. The genealogy proceeds to Kuru—whose tapas sacralizes Kurukṣetra—and onward to later descendants, including Pratīpa and his sons (Devāpi, Śaṃtanu, Bāhlīka), thereby linking early Aila-Paurava origins to the immediate prehistory of the Kuru house central to the epic.

Chapter Arc: स्वर्गलोक के पुण्य-लोकों से राजर्षि ययाति का तेजस्वी पतन आरम्भ होता है—सूर्यपथ से गिरते हुए उस अद्भुत प्रकाशमान पुरुष को देखकर सिद्ध-समूह विस्मित हो उठता है। → ययाति इन्द्र से कहता है कि उसने देव, मनुष्य, गन्धर्व, महर्षि—किसी में भी अपने तप के तुल्य सामर्थ्य नहीं देखा; यह आत्म-गौरव (अवमानना) उसके पुण्य-क्षय का कारण बनता है। इन्द्र उसे चेताता है कि समान-श्रेष्ठ जनों के प्रति तिरस्कार से प्राप्त लोक नश्वर हो जाते हैं और पुण्य क्षीण होते ही पतन निश्चित है। → इन्द्र का निर्णायक वचन: ‘तू सत्पुरुषों के बीच प्रतिष्ठा से च्युत हुआ है; इसलिए तेरे ये लोक अन्तवान् हैं—पुण्य क्षीण होने पर तू गिर रहा है।’ उसी क्षण ययाति का स्वर्ग से पतन प्रत्यक्ष हो जाता है। → पतित ययाति को देखकर राजर्षि अष्टक (सत्धर्म-विधान का गोप्ता) उसे सम्बोधित करता है—भय, विषाद और मोह त्यागने को कहता है, और सत्संग/सत्प्रतिष्ठा की महिमा बताता है: जैसे अग्नि में तपन-शक्ति, पृथ्वी में धारण-शक्ति, सूर्य में प्रकाश-शक्ति—वैसे ही सत्पुरुषों में आगन्तुक को संभालने और प्रतिष्ठित करने की शक्ति है। → अष्टक के प्रश्नों और ययाति के उत्तरों की ओर कथा मुड़ती है—पतन का कारण तो स्पष्ट हुआ, पर अब यह जिज्ञासा शेष है कि ययाति किस प्रकार पुनः प्रतिष्ठा/उद्धार पाएगा।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ ३ श्लोक मिलाकर कुल १७३ “लोक हैं) नशा (0) अत न अष्टाशीतितमो< ध्याय: ययातिका स्वर्गसे पतन और अष्टकका उनसे प्रश्न करना इन्द्र रवाच सर्वाणि कर्माणि समाप्य राजन्‌ गृहं परित्यज्य वनं गतो$सि । तत्‌ त्वां पृच्छामि नहुषस्य पुत्र केनासि तुल्यस्तपसा ययाते,इन्द्रने कहा--राजन्‌! तुम सम्पूर्ण कर्मोंको समाप्त करके घर छोड़कर वनमें चले गये थे। अतः नहुषपुत्र ययाते! मैं तुमसे पूछता हूँ कि तुम तपस्यामें किसके समान हो

Śakra (Indra) berkata: “Wahai raja, setelah menyempurnakan segala tugas dan urusanmu, engkau meninggalkan rumah tangga lalu pergi ke rimba. Maka aku bertanya kepadamu, wahai Yayāti putera Nahuṣa: dalam tapa (tapas), dengan siapakah engkau setara?”

Verse 2

ययातिरुवाच नाहं देवमनुष्येषु गन्धर्वेषु महर्षिषु । आत्मनस्तपसा तुल्यं कंचित्‌ पश्यामि वासव,ययातिने कहा--इन्द्र! मैं देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वों और महर्षियोंमेंसे किसीको भी तपस्यामें अपनी बराबरी करनेवाला नहीं देखता हूँ

Yayāti berkata: “Wahai Vāsava (Indra), antara para dewa dan manusia, antara Gandharva dan para maharṣi, aku tidak melihat sesiapa pun yang menyamai aku dalam tapa. Dengan kekuatan tapas milikku sendiri, aku tidak menemukan tandingan.”

Verse 3

इन्द्र रवाच यदावमंस्था: सदृश: श्रेयसश्न अल्पीयसश्षाविदितप्रभाव: । तस्माल्लोकास्त्वन्तवन्तस्तवेमे क्षीणे पुण्ये पतितास्यद्य राजन्‌,इन्द्र बोले--राजन्‌! तुमने अपने समान, अपनेसे बड़े और छोटे लोगोंका प्रभाव न जानकर सबका तिरस्कार किया है, अतः तुम्हारे इन पुण्यलोकोंमें रहनेकी अवधि समाप्त हो गयी; क्योंकि (दूसरोंकी निन्‍दा करनेके कारण) तुम्हारा पुण्य क्षीण हो गया, इसलिये अब तुम यहाँसे नीचे गिरोगे

Śakra (Indra) berkata: “Kerana engkau telah memandang hina orang lain—yang setara denganmu, yang lebih tinggi daripadamu, dan yang lebih rendah daripadamu—tanpa memahami kekuatan serta nilai mereka yang sebenar, maka tempoh tinggalmu di alam-alam berkat ini telah berakhir. Pahalamu telah susut dan habis oleh celaan itu; sebab itu, wahai raja, pada hari ini engkau akan jatuh dari sini.”

Verse 4

ययातिरुवाच सुरर्िगन्धर्वनरावमानात्‌ क्षयं गता मे यदि शक्र लोका: । इच्छाम्यहं सुरलोकाद्‌ विहीन: सतां मध्ये पतितुं देवराज,ययातिने कहा--देवराज इन्द्र! देवता, ऋषि, गन्धर्व और मनुष्य आदिका अपमान करनेके कारण यदि मेरे पुण्यलोक क्षीण हो गये हैं तो इन्द्रलोकसे भ्रष्ट होकर मैं साधु पुरुषोंके बीचमें गिरनेकी इच्छा करता हूँ

Yayāti berkata: “Wahai Śakra (Indra), jika kerana aku menghina para dewa, para resi, Gandharva dan manusia, maka alam-alam pahalaku telah susut dan habis, maka—setelah tersingkir dari alam surga—aku ingin turun dan berada di tengah-tengah orang yang benar. Wahai raja para dewa, biarkan aku jatuh ke dalam pergaulan orang-orang baik.”

Verse 5

इन्द्र उवाच सतां सकाशे पतितासि राजं- क्ष्युतः प्रतिष्ठां यत्र लब्धासि भूय: । एतद्‌ विदित्वा च पुनर्ययाते त्वं मावमंस्था: सदृश: श्रेयसश्ल॒,इन्द्र बोले--राजा ययाति! तुम यहाँसे च्युत होकर साधु पुरुषोंके समीप गिरोगे और वहाँ अपनी खोयी हुई प्रतिष्ठा पुन: प्राप्त कर लोगे। यह सब जानकर तुम फिर कभी अपने बराबर तथा अपनेसे बड़े लोगोंका अपमान न करना

Indra berkata: “Wahai raja, engkau akan jatuh dari sini ke dalam kalangan orang-orang berbudi; dan di sana engkau akan memperoleh kembali kehormatan yang telah hilang. Mengetahui hal ini, wahai Yayāti, jangan sekali-kali lagi memandang hina mereka yang setara denganmu—atau yang lebih tinggi daripadamu.”

Verse 6

वैशम्पायन उवाच ततः प्रहायामरराजजुष्टान्‌ पुण्याँलल्‍लोकान्‌ पतमानं ययातिम्‌ | सम्प्रेक्ष्य राजर्षिवरो5ष्टकस्त- मुवाच सद्धर्मविधानगोप्ता,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर देवराज इन्द्रके सेवन करनेयोग्य पुण्यलोकोंका परित्याग करके राजा ययाति नीचे गिरने लगे। उस समय राजर्षियोंमें श्रेष्ठ अष्टकने उन्हें गिरते देखा। वे उत्तम धर्म-विधिके पालक थे। उन्होंने ययातिसे कहा

Vaiśampāyana berkata: Kemudian, setelah meninggalkan alam-alam berkat yang sering dikunjungi Indra, Raja Yayāti pun mula jatuh ke bawah. Melihatnya jatuh demikian, yang terunggul antara para raja-resi—Aṣṭaka, penjaga ketetapan dharma yang benar—menyapa Yayāti.

Verse 7

बस * 2 <5७७५१११००७९७ ५4.4५ |./ 2... ययातिका पतन अट्क उवाच कस्त्वं युवा वासवतुल्यरूप: स्वतेजसा दीप्यमानो यथाग्नि: । पतसस्‍्युदीर्णाम्बुधरान्धकारात्‌ खात्‌ खेचराणां प्रवरो यथार्क:,अष्टकने पूछा--इन्द्रके समान सुन्दर रूपवाले तरुण पुरुष तुम कौन हो? तुम अपने तेजसे अग्निकी भाँति देदीप्यमान हो रहे हो। मेघरूपी घने अन्धकारवाले आकाशसे आकाशचरी ग्रहोंमें श्रेष्ठ सूर्यवके समान तुम कैसे गिर रहे हो?

Aṣṭaka bertanya: “Siapakah engkau, wahai pemuda yang rupamu semegah Indra, menyala dengan sinarmu sendiri bagaikan api? Dari langit yang digelapkan oleh gumpalan awan menjulang, engkau sedang jatuh—padahal engkau bersinar di antara para pengembara langit seperti matahari yang utama. Bagaimana hal ini boleh terjadi?”

Verse 8

दृष्टवा च त्वां सूर्यपथात्‌ पतन्तं वैश्वानरार्कद्युतिमप्रमेयम्‌ । कि नु स्विदेतत्‌ पततीति सर्वे वितर्कयन्त: परिमोहिता: सम:,तुम्हारा तेज सूर्य और अग्निके सदृश है। तुम अप्रमेय शक्तिशाली जान पड़ते हो। तुम्हें सूर्यके मार्गसे गिरते देख हम सब लोग मोहित होकर इस तर्क-वितर्कमें पड़े हैं कि 'यह क्या गिर रहा है?”

Melihat engkau jatuh dari laluan matahari—cahayamu laksana Vaiśvānara (api) dan matahari, dan kekuatanmu tiada terukur—kami semua dilanda kebingungan. Dalam kekalutan, kami terus berbahas sesama sendiri: “Apakah sebenarnya yang sedang jatuh ini?”

Verse 9

दृष्टवा च त्वां धिछितं देवमार्गे शक्रार्कविष्णुप्रतिमप्रभावम्‌ । अभ्युद्गतास्त्वां वयमद्य सर्वे तत्त्वं प्रपाते तव जिज्ञासमाना:,तुम इन्द्र, सूर्य और विष्णुके समान प्रभावशाली हो। तुम्हें आकाशमें स्थित देखकर हम सब लोग अब यह जाननेके लिये तुम्हारे निकट आये हैं कि तुम्हारे पतनका यथार्थ कारण क्या है?

Melihat engkau berada di laluan para dewa, bersinar dengan keagungan yang sebanding dengan Indra, Matahari dan Viṣṇu, kami semua datang mendekat kepadamu pada hari ini. Kami ingin mengetahui sebab yang sebenar atas kejatuhanmu—apakah hakikat di sebalik penurunanmu ini?

Verse 10

नचापि त्वां धृष्णुम: प्रष्टमग्रे न च त्वमस्मान्‌ पृच्छसि ये वयं सम: । तत्‌ त्वां पृच्छामि स्पृहणीयरूप कस्य त्वं वा किंनिमित्तं त्वमागा:,हम पहले तुमसे कुछ पूछनेका साहस नहीं कर सकते और तुम भी हमसे हमारा परिचय नहीं पूछते हो; कि हम कौन हैं? इसलिये मैं ही तुमसे पूछता हूँ। मनोरम रूपवाले महापुरुष! तुम किसके पुत्र हो? और किसलिये यहाँ आये हो?

Kami tidak berani menyoalmu terlebih dahulu, dan engkau juga tidak bertanya siapakah kami, walaupun kami berdiri di sini dengan adab yang setara. Maka aku bertanya kepadamu: Wahai insan yang elok rupanya, engkau anak siapa, dan atas tujuan apakah engkau datang ke sini?

Verse 11

भयं तु ते व्येतु विषादमोहौ त्यजाशु चैवेन्द्रसमप्र भाव । त्वां वर्तमानं हि सतां सकाशे नालं प्रसोढुं बलहापि शक्र:,इन्द्रके तुल्य शक्तिशाली पुरुष! तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये। अब तुम्हें विषाद और मोहको भी तुरंत त्याग देना चाहिये। इस समय तुम संतोंके समीप विद्यमान हो। बल दानवका नाश करनेवाले इन्द्र भी अब तुम्हारा तेज सहन करनेमें असमर्थ हैं

Āṭka berkata: “Biarlah ketakutanmu lenyap. Buanglah segera dukacita dan kekeliruan, wahai yang sinarnya menandingi Indra. Kerana kini engkau berdiri di hadapan orang-orang berbudi; bahkan Śakra (Indra), pembunuh Bala, tidak lagi mampu menahan cahaya gemilangmu.”

Verse 12

सन्त: प्रतिष्ठा हि सुखच्युतानां सतां सदैवामरराजकल्प । ते संगता: स्थावरजड्रमेशा: प्रतिष्ठितस्त्वं सदृशेषु सत्सु,देवेश्वर इन्द्रके समान तेजस्वी महानुभाव! सुखसे वंचित होनेवाले साधु पुरुषोंके लिये सदा संत ही परम आश्रय हैं। वे स्थावर और जंगम सब प्राणियोंपर शासन करनेवाले सत्पुरुष यहाँ एकत्र हुए हैं। तुम अपने समान पुण्यात्मा संतोंके बीचमें स्थित हो

Āṭka berkata: “Bagi orang-orang berbudi yang terjatuh dari kebahagiaan, para suci itulah tempat berlindung yang kekal dan sandaran yang teguh—sentiasa laksana raja para dewa. Di sini telah berhimpun mereka yang benar, yang memiliki kewibawaan yang sah atas segala makhluk, yang tidak bergerak mahupun yang bergerak. Dan engkau, wahai yang berjiwa agung, bersinar seperti Indra, berdiri teguh di tengah para suci yang setara denganmu dalam kebajikan.”

Verse 13

प्रभुरग्नि: प्रतपने भूमिरावपने प्रभु: । प्रभु: सूर्य: प्रकाशित्वे सतां चाभ्यागत: प्रभु:,जैसे तपनेकी शक्ति अग्निमें है, बोये हुए बीजको धारण करनेकी शक्ति पृथ्वीमें है, प्रकाशित होनेकी शक्ति सूर्यमें है, इसी प्रकार संतोंपर शासन करनेकी शक्ति केवल अतिथिगमें है

Api itu tuan pada daya membakar; bumi itu tuan pada daya menampung benih yang disemai; matahari itu tuan pada daya menerangi. Demikian juga, kuasa untuk menundukkan para orang suci hanyalah milik Atithi—tetamu yang datang bertandang.

Verse 88

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते अष्टाशीतितमो<ध्याय: ।। ८८ ॥। इस प्रकार श्रीमयहाभारत आदिपव॑के अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक अद्ठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, di bawah Ādi Parva dan khususnya dalam Sambhava Parva, tamatlah bab yang kelapan puluh lapan—mengenai kisah Uttara dan Yāyāti. (Ini ialah kolofon penutup bab).

Frequently Asked Questions

The chapter frames a legitimacy dilemma rather than a single personal choice: how a dynasty retains rightful sovereignty when faced with collapse (famine, mortality, invasion) and defeat—answered through re-alignment with dharma, competent counsel, and ritually validated restoration.

Political continuity is depicted as conditional: lineage alone is insufficient without dharmic governance, social stability, and recognized authority structures (purohita, consecration). Crisis becomes a test of institutional resilience and ethical order.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s meta-function is archival—establishing a reliable dynastic memory that authorizes later narrative claims about the Kuru house and the sanctity of Kurukṣetra within the epic’s broader soteriological and historical frame.