Droṇācārya’s Assessment of the Pāṇḍavas: Nīti, Kāla, and Intelligence (विराटपर्व, अध्याय २६)
एते चान्ये च भूयांसो देशाद् देशं यथाविधि । नतु तेषां गतिर्वासः प्रवृत्तिश्नोपलभ्यते,“ये तथा और भी बहुत-से लोग एक देशसे दूसरे देशमें विधिपूर्वक खोज करें। अभीतक तो पाण्डवोंके गन्तव्य स्थान, निवास तथा प्रवृत्तिका कुछ भी पता नहीं लग रहा है
ete cānye ca bhūyāṃso deśād deśaṃ yathāvidhi | na tu teṣāṃ gatir vāsaḥ pravṛttiś copalabhyate ||
हे लोक आणि आणखी बरेच जण विधिपूर्वक देशोदेशी शोध करोत; तरीही पांडवांची गती, निवासस्थान व प्रवृत्ती यांचा काहीच ठावठिकाणा लागत नाही।
वैशम्पायन उवाच