अध्याय ६६: संजयेन जनार्दन-प्रभाववर्णनम्
Sañjaya on Janārdana’s Decisive Sovereignty
धृतराष्ट्र बोले--गवल्गणपुत्र संजय! यहाँ अपनी सेनामें जो कुछ भी प्रबलता या दुर्बलता है, उसका हमसे वर्णन करो। इसी प्रकार पाण्डवोंकी भी सारी बातें तुम अच्छी तरह जानते हो, अत: बताओ; ये किन बातोंमें बढ़े-चढ़े हैं और उनमें कौन-कौन-सी त्रुटियाँ हैं? ४ ।। त्वमेतयो: सारवित् सर्वदर्शी धर्मार्थयोर्निपुणो निश्चयज्ञ: । स मे पृष्ट: संजय ब्रूहि सर्व युध्यमाना: कतरे5स्मिन् न सन्ति,संजय! तुम इन दोनों पक्षोंके बलाबलको जाननेवाले, सर्वदर्शी, धर्म और अर्थके ज्ञानमें निपुण तथा निश्चित सिद्धान्तके ज्ञाता हो; अतः मेरे पूछनेपर सब बातें साफ-साफ कहो। युद्धमें प्रवृत्त होनेपर किस पक्षके लोग इस लोकमें जीवित नहीं रह सकते?
tvam etayoḥ sāravit sarvadarśī dharmārthayor nipuṇo niścayajñaḥ | sa me pṛṣṭaḥ sañjaya brūhi sarvaṃ yudhyamānāḥ katare 'smin na santi ||
संजया! तू दोन्ही पक्षांच्या बलाबलाचा सार जाणणारा, सर्वदर्शी, धर्म-अर्थात निपुण आणि निश्चित निर्णयाचा ज्ञाता आहेस. म्हणून माझ्या प्रश्नावर सर्व काही स्पष्ट सांग—युद्ध सुरू झाल्यावर कोणत्या पक्षाचे लोक या लोकात जिवंत राहणार नाहीत?
वैशम्पायन उवाच