Udyoga Parva, Adhyaya 31 — Yudhiṣṭhira’s Instructions to Sañjaya
Peace Appeal and Five-Village Proposal
कथं हि मन्त्राग्रयधरो मनीषी धर्मार्थयोरापदि सम्प्रणेता । एवं युक्त: सर्वमन्त्रैरहीनो नरो नृशंसं कर्म कुर्यादमूढ:,आप श्रेष्ठ मन्त्रियोंका सेवन करनेवाले हैं, स्वयं भी बुद्धिमान् हैं, आपत्तिकालमें धर्म और अर्थका उचित-रूपसे प्रयोग करते हैं, सब प्रकारकी अच्छी सलाहोंसे भी आप युक्त हैं। फिर आप-जैसे साधनसम्पन्न दिद्वान् पुरुष ऐसा क्रूरतापूर्ण कार्य कैसे कर सकते हैं?
sañjaya uvāca |
kathaṁ hi mantrāgrayadharo manīṣī dharmārthayor āpadi sampranetā |
evaṁ yuktaḥ sarvamantrair ahīno naro nṛśaṁsaṁ karma kuryād amūḍhaḥ ||
संजय म्हणाला—जो श्रेष्ठ मंत्र धारण करणारा, बुद्धिमान, आणि आपत्तीकाळी धर्म व अर्थनीती यांचा योग्य मार्ग दाखविणारा आहे; जो कोणत्याही उत्तम सल्ल्याने हीन नाही—तो अमूढ पुरुष क्रूर कर्म कसा करील?
संजय उवाच