Adhyaya 4
Svargarohana ParvaAdhyaya 424 Verses

Adhyaya 4

Svargārohaṇa-parva, Adhyāya 4 — Yudhiṣṭhira’s Vision of the Celestial Assembly (Recognition and Explanation)

Upa-parva: Svargārohaṇa (Heaven-Ascent Episode) — Recognition of the Transfigured Kin

Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira proceeds, honored by devas with ṛṣis and Maruts, to the place where eminent Kurus are present (1). He beholds Govinda (Kṛṣṇa) in a brāhma-like form, recognizable by resemblance to the known deity (2), radiant and attended by personified divine weapons such as the cakra; Arjuna (Phalguna) is depicted as reverentially attending him (3). In other regions Yudhiṣṭhira sees Karṇa, foremost among weapon-bearers, associated with the twelve Ādityas (4); Bhīmasena encircled by the Marut hosts (5); and Nakula and Sahadeva shining in the station of the Aśvins (6). He also sees Draupadī adorned with lotus-garlands, standing in a solar brilliance (7). When Yudhiṣṭhira wishes to question her, Indra explains that she is Śrī in Draupadī-form, who entered human life for his sake, described as non-womb-born and auspicious (8–9), and further notes her creation by Śūlapāṇi (10). Indra identifies Draupadī’s five sons as gandharvas of fire-like splendor (11), points out Dhṛtarāṣṭra as a gandharva-king and an elder kin (12), and clarifies Karṇa as Yudhiṣṭhira’s elder brother, the Sun’s son (13). He then gestures to further assemblies: Vṛṣṇi–Andhaka heroes (including Sātyaki) among divine groups (14), Abhimanyu with Soma (15), Pāṇḍu with Kuntī and Mādrī arriving by vimāna (16), Bhīṣma with the Vasus and Droṇa near Bṛhaspati (17), and other kings and warriors moving with gandharvas, yakṣas, and puṇyajanas; some attain guhyaka destinies through meritorious speech, thought, and action (18–19).

Chapter Arc: देव, ऋषि और मरुद्गणों के मुख से अपनी स्तुति सुनते हुए युधिष्ठिर दिव्य लोक में आगे बढ़ते हैं—जहाँ पृथ्वी के सारे शोक का उत्तर स्वर्ग के दृश्य देने वाले हैं। → स्वर्ग के तेज से दीप्त, दिव्यास्त्रों से युक्त और देवोपम रूपों में अपने प्रियजनों को क्रमशः देखते हुए भी युधिष्ठिर के भीतर प्रश्न उठता है—क्या यह वही सत्य है जिसे उन्होंने पृथ्वी पर दुःख, अपमान और युद्ध के बीच जिया था? → युधिष्ठिर दिव्य रूपों में अपने बंधुओं और सहचरों का साक्षात् दर्शन करते हैं—भीम, द्रौपदी, सात्यकि आदि वृष्णि-अन्धक वीर, चन्द्र-सम द्युति वाले अभिमन्यु, और अंततः अग्नितुल्य तेज से प्रकाशित बड़े भाई कर्ण का भी—जिससे उनके मन में बंधुत्व, न्याय और नियति का चरम बोध एक साथ उमड़ पड़ता है। → स्वर्ग में पुण्यकर्मों के फलस्वरूप प्राप्त विविध गतियों (देव-गति, गन्धर्व-यक्ष-पुण्यजन संगति, गुह्यक-गति आदि) का संकेत मिलता है; युधिष्ठिर को यह प्रत्यक्ष होने लगता है कि पृथ्वी पर जिन संबंधों को कलंक, भ्रम या शाप ने ढका था, वे यहाँ अपने सत्य रूप में प्रकाशित हैं। → युधिष्ठिर के सामने स्वर्गीय व्यवस्था का यह उजला चित्र उनके शेष संशयों को पूरी तरह शांत करेगा या किसी नए नैतिक प्रश्न को जन्म देगा—यह आगे के प्रसंग पर टिकता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माज बछ। अकाल चतुथों5 ध्याय: युधिष्ठटिरका दिव्यलोकमें श्रीकृष्ण, अर्जुन आदिका दर्शन करना वैशम्पायन उवाच ततो युधिष्छिरो राजा देवै: सर्षिमरुद्गणै: । स्तूयमानो ययौ तत्र यत्र ते कुरुपुड्रवा:

वैशंपायन म्हणाले—त्यानंतर राजा युधिष्ठिर देव, ऋषी आणि मरुद्गण यांच्याकडून स्तुती होत असताना त्या स्थानी गेला, जिथे ते कुरुपुंगव विराजमान होते।

Verse 2

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर देवताओं, ऋषियों और मरुद्गणोंके मुँहसे अपनी प्रशंसा सुनते हुए राजा युधिष्ठिर क्रमश: उस स्थानपर जा पहुँचे जहाँ वे कुरुश्रेष्ठ भीमसेन और अर्जुन आदि विराजमान थे ।। ददर्श तत्र गोविन्द ब्राह्ेण वपुषान्वितम्‌ तेनैव दृष्टपूर्वेण सादृश्येनिव सूचितम्‌,वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि भगवान्‌ श्रीकृष्ण अपने ब्राह्मविग्रहसे सम्पन्न हैं। पहलेके देखे गये सादृश्यसे ही वे पहचाने जाते हैं

वैशंपायन म्हणाले—जनमेजय! त्यानंतर देव, ऋषी आणि मरुद्गण यांच्या मुखातून आपली स्तुती ऐकत राजा युधिष्ठिर क्रमशः त्या स्थानी पोहोचला, जिथे कुरुश्रेष्ठ भीमसेन, अर्जुन इत्यादी तेजस्वीपणे विराजमान होते। तेथे त्याने गोविंदाला ब्राह्म-वपु धारण केलेला पाहिले; आणि पूर्वी पाहिलेल्या सादृश्यामुळेच त्याची ओळख पटली।

Verse 3

इस प्रकार श्रीमह्याभारत स्वर्गायेहरणपर्वमें युधिष्ठिरका देहत्यागविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ,दीप्यमानं स्ववपुषा दिव्यैरस्त्रैरुपस्थितम्‌ । चक्रप्रभृतिभिषघरिर्दिव्यै: पुरुषविग्रहै: उनके श्रीविग्रहसे अद्भुत दीप्ति छिटक रही है। चक्र आदि दिव्य एवं भयंकर अस्त्र- शस्त्र दिव्य पुरुषविग्रह धारण करके उनकी सेवामें उपस्थित हैं

ते आपल्या दिव्य स्वरूपाच्या तेजाने उजळून निघाले होते। त्यांच्या जवळ चक्र इत्यादी भयंकर दिव्य अस्त्र-शस्त्रे पुरुषविग्रह धारण करून जणू सेवेसाठी उपस्थित उभी होती।

Verse 4

उपास्यमानं वीरेण फाल्गुनेन सुवर्चसा । तथास्वरूपं कौन्तेयो ददर्श मधुसूदनम,अत्यन्त तेजस्वी वीरवर अर्जुन भगवानकी आराधनामें लगे हुए हैं। कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने भगवान्‌ मधुसूदनका उसी स्वरूपमें दर्शन किया इति श्रीमहाभारते स्वर्गारोहणपर्वणि द्रौपद्यादिस्वस्वस्थानगमने चतुर्थो5ध्याय: ।। ४ || इस प्रकार श्रीमहाभारत स्वगरिहणपर्वमें द्रौपदी आदिका अपने-अपने स्थानमें गमनविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ

वैशंपायन म्हणाले—तेजस्वी वीर फाल्गुन (अर्जुन) मधुसूदनाची उपासना करीत असता, कुंतीपुत्र युधिष्ठिराने भगवानाला त्याच स्वरूपात प्रत्यक्ष दर्शन केले.

Verse 5

तावुभौ पुरुषव्याप्रौ समुद्री क्ष्य युधिष्ठिरम्‌ । यथावत्‌ प्रतिपेदाते पूजया देवपूजिती,पुरुषसिंह अर्जुन और श्रीकृष्ण देवताओंद्वारा पूजित थे। इन दोनोंने युधिष्ठिरको उपस्थित देख उनका यथावत्‌ सम्मान किया

वैशंपायन म्हणाले—देवतांनीही पूजिलेले ते दोघे पुरुषव्याघ्र, अर्जुन आणि श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर उपस्थित आहे असे पाहून विधिपूर्वक त्याच्याजवळ गेले आणि यथोचित मान केला.

Verse 6

अपरस्मिन्नथोद्देशे कर्ण शस्त्रभृतां वरम्‌ द्वादशादित्यसहितं ददर्श कुरुनन्दन:,इसके बाद दूसरी ओर दृष्टि डालनेपर कुरुनन्दन युधिष्ठिरने शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्णको देखा जो बारह आदित्योंके साथ (तेजोमय स्वरूप धारण किये) विराजमान थे

वैशंपायन म्हणाले—नंतर दुसऱ्या प्रदेशाकडे पाहता कुरुनंदन युधिष्ठिराने शस्त्रधार्‍यांमध्ये श्रेष्ठ कर्णाला पाहिले; तो द्वादश आदित्यांसह तेजोमय वैभवात विराजमान होता.

Verse 7

अथापरमस्मिन्नुद्देशे मरुद्गणवृतं विभुम्‌ । भीमसेनमथापश्यत्‌ तेनैव वपुषान्वितम्‌,फिर दूसरे स्थानमें उन्होंने दिव्यरूपधारी भीमसेनको देखा जो पहलेहीके समान शरीर धारण किये मूर्तिमान्‌ वायुदेवताके पास बैठे थे। उन्हें सब ओरसे मरुद्गणोंने घेर रखा था। वे उत्तम कान्तिसे सुशोभित एवं उत्कृष्ट सिद्धिको प्राप्त थे

मग दुसऱ्या ठिकाणी त्यांनी विभू भीमसेनाला पाहिले; तो मरुद्गणांनी वेढलेला होता आणि पूर्वीप्रमाणेच त्याच देहरूपाने युक्त होता.

Verse 8

वायोर्मूर्तिमतः पाश्वें दिव्यमूर्तिसमन्वितम्‌ । श्रिया परमया युक्त सिद्धिं परमिकां गतम्‌,फिर दूसरे स्थानमें उन्होंने दिव्यरूपधारी भीमसेनको देखा जो पहलेहीके समान शरीर धारण किये मूर्तिमान्‌ वायुदेवताके पास बैठे थे। उन्हें सब ओरसे मरुद्गणोंने घेर रखा था। वे उत्तम कान्तिसे सुशोभित एवं उत्कृष्ट सिद्धिको प्राप्त थे

वैशंपायन म्हणाले—तेव्हा त्यांनी दिव्यरूपधारी भीमसेनाला मूर्तिमान वायुदेवाच्या पाश्र्वभागी बसलेला पाहिले; तो परम श्रीने युक्त होऊन परम सिद्धीस पोहोचला होता.

Verse 9

अश्रिनोस्तु तथा स्थाने दीप्यमानौ स्वतेजसा । नकुलं सहदेवं च ददर्श कुरुनन्दन:,कुरुनन्दन युधिष्ठिरने नकुल और सहदेवको अभश्विनीकुमारोंके स्थानमें विराजमान देखा जो अपने तेजसे उद्दीप्त हो रहे थे

तेव्हा अश्विनीकुमारांच्या स्थानात, स्वतेजाने दीप्तिमान असे नकुल व सहदेव यांना कुरुनंदन युधिष्ठिराने विराजमान पाहिले.

Verse 10

तथा ददर्श पाज्चालीं कमलोत्पलमालिनीम्‌ | वपुषा स्वर्गमाक्रम्य तिष्ठन्तीमर्कवर्चसम्‌,तदनन्तर उन्होंने कमलोंकी मालासे अलंकृत पाज्चालराजकुमारी द्रौपदीको देखा जो अपने तेजस्वी स्वरूपसे स्वर्गलोकको अभिभूत करके विराज रही थीं। उनकी दिव्य कान्ति सूर्यदेवकी भाँति प्रकाशित हो रही थी

त्यानंतर कमळ व उत्पलांच्या माळांनी अलंकृत पाञ्चालकन्या द्रौपदीला त्यांनी पाहिले; ती आपल्या तेजस्वी देहकांतीने स्वर्गलोक व्यापून, सूर्याप्रमाणे प्रभा धारण करून उभी होती.

Verse 11

अखिल सहसा राजा प्रष्टमैच्छद्‌ युधिष्ठिर: । ततो<स्य भगवानिन्द्र: कथयामास देवराट्‌,राजा युधिष्ठिरने इन सबके विषयमें सहसा प्रश्न करनेका विचार किया। तब देवराज भगवान्‌ इन्द्र स्वयं ही उन्हें सबका परिचय देने लगे--

राजा युधिष्ठिराला सहसा सर्व काही सविस्तर विचारावेसे वाटले; तेव्हा देवराज भगवान इंद्रांनी स्वतःच त्याला सर्व कथन करायला सुरुवात केली.

Verse 12

श्रीरेषा द्रौपदीरूपा त्वदर्थे मानुषं गता । अयोनिजा लोककान्ता पुण्यगन्धा युधिछ्टिर

हे युधिष्ठिर! हीच श्री द्रौपदीचे रूप धारण करून तुझ्यासाठी मनुष्यलोकात आली होती. ही अयोनिजा, लोकांना प्रिय आणि पुण्यगंधाने सुगंधित—मंगलशक्तीची साक्षात् मूर्ती आहे.

Verse 13

'युधिष्ठिर! ये जो लोककमनीय विग्रहसे युक्त पवित्र गन्धवाली देवी दिखायी दे रही हैं, साक्षात्‌ भगवती लक्ष्मी हैं। ये ही तुम्हारे लिये मनुष्यलोकमें जाकर अयोनिसम्भूता द्रौपदीके रूपमें अवतीर्ण हुई थीं ।। रत्यर्थ भवतां होषा निर्मिता शूलपाणिना । द्रुपदस्य कुले जाता भवद्धिश्वोपजीविता

युधिष्ठिर! जी देवी तुला दिसत आहे—लोकांना मोहविणाऱ्या रूपाने युक्त व पवित्र सुगंधाने सुगंधित—ती साक्षात् भगवती लक्ष्मी आहे. तुझ्यासाठीच ती मनुष्यलोकात जाऊन अयोनिसंभूता द्रौपदीच्या रूपाने अवतरली होती. तुमच्या सहवासासाठी शूलपाणि शिवाने तिची निर्मिती केली; द्रुपदाच्या कुळात जन्म घेऊन ती तुमच्या कल्याणाचा आधार झाली.

Verse 14

“स्वयं भगवान्‌ शंकरने तुमलोगोंकी प्रसन्नताके लिये इन्हें प्रकट किया था और ये ही द्रपदके कुलमें जन्म धारणकर तुम सब भाइयोंके द्वारा अनुगृहीत हुई थीं ।। एते पठ्च महाभागा गन्धर्वा: पावकप्रभा: । द्रौपद्यास्तनया राजन्‌ युष्माकममितौजस:,“राजन! ये जो अग्निके समान तेजस्वी और महान्‌ सौभाग्यशाली पाँच गन्धर्व दिखायी देते हैं, ये ही तुमलोगोंके वीर्यसे उत्पन्न हुए द्रौधदीके अनन्त बलशाली पुत्र हुए थे

वैशंपायन म्हणाले—राजन्! अग्नीसारखे तेजस्वी व अत्यंत भाग्यवान असे हे पाच गंधर्व खरे तर द्रौपदीचेच पुत्र आहेत—तुमच्या वीर्यापासून उत्पन्न झालेले, आणि अमित पराक्रमाने युक्त।

Verse 15

पश्य गन्धर्वराजानं धृतराष्ट्र मनीषिणम्‌ । एनं च त्वं विजानीहि भ्रातरं पूर्वजं पितु:,“इन मनीषी गन्धर्वराज धृतराष्ट्रका दर्शन करो और इन्हींको अपने पिताका बड़ा भाई समझो

वैशंपायन म्हणाले—धृतराष्ट्रा! या मनीषी गंधर्वराजाचे दर्शन घे; यालाच तू आपल्या पित्याचा ज्येष्ठ भाऊ म्हणून ओळख।

Verse 16

अयं ते पूर्वजो भ्राता कौन्तेय: पावकद्युति: । सूतपुत्राग्रज: श्रेष्ठो राधेय इति विश्रुत:

वैशंपायन म्हणाले—कौन्तेया! हा तुझा ज्येष्ठ भाऊ आहे, अग्नीसारखा तेजस्वी। सूतपुत्रांमध्ये अग्रज व श्रेष्ठ, ‘राधेय’ म्हणून प्रसिद्ध।

Verse 17

साध्यानामथ देवानां विश्वेषां मरुतामपि,'राजेन्द्र! उधर वृष्णि और अन्धककुलके सात्यकि आदि वीर महारथियों और महान्‌ बलशाली भोजोंको देखो। वे साध्यों, विश्वेदेवों तथा मरुदगणोंमें विराजमान हैं

वैशंपायन म्हणाले—राजेंद्र! तिकडे वृष्णि व अंधककुलोत्पन्न सात्यकि आदि वीर महारथी आणि महाबलवान भोजांना पाहा; ते साध्य, विश्वेदेव आणि मरुद्गणांमध्ये शोभून दिसत आहेत।

Verse 18

गणेषु पश्य राजेन्द्र वृष्ण्यन्धकमहारथान्‌ । सात्यकिप्रमुखान्‌ वीरान्‌ भोजांश्वैव महाबलान्‌,'राजेन्द्र! उधर वृष्णि और अन्धककुलके सात्यकि आदि वीर महारथियों और महान्‌ बलशाली भोजोंको देखो। वे साध्यों, विश्वेदेवों तथा मरुदगणोंमें विराजमान हैं

वैशंपायन म्हणाले—राजेंद्र! गणांमध्ये वृष्णि-अंधककुलातील महारथींना पाहा—सात्यकि-प्रमुख त्या वीरांना, आणि महाबलवान भोजांनाही।

Verse 19

सोमेन सहितं पश्य सौभद्रमपराजितम्‌ । अभिमन्युं महेष्वासं निशाकरसमद्युतिम्‌,“इधर किसीसे परास्त न होनेवाले महाधनुर्थर सुभद्राकुमार अभिमन्युकी ओर दृष्टि डालो। यह चन्द्रमाके साथ इन्हींके समान कान्ति धारण किये बैठा है

वैशंपायन म्हणाले—सोमासह बसलेला सुभद्रेचा पुत्र, अपराजित महाधनुर्धर अभिमन्यू पाहा; त्याची प्रभा चंद्रासमान आहे।

Verse 20

एष पाण्डु्महेष्वास: कुन्त्या माद्रया च संगत: । विमानेन सदाभ्येति पिता तव ममान्तिकम्‌,'ये महाधनुर्धर राजा पाण्डु हैं जो कुन्ती और माद्री दोनोंके साथ हैं। ये तुम्हारे पिता पाण्डु विमानद्वारा सदा मेरे पास आया करते हैं

वैशंपायन म्हणाले—हा महाधनुर्धर पांडू आहे, कुंती व माद्रीसह. तुझा पिता पांडू दिव्य विमानाने वारंवार माझ्याकडे येथे येत असतो.

Verse 21

वसुभि: सहित पश्य भीष्मं शान्तनवं नृपम्‌ । द्रोणं बृहस्पते: पार्श्वे गुरुमेने निशामय,'शान्तनुनन्दन राजा भीष्मका दर्शन करो, ये वसुओंके साथ विराज रहे हैं। द्रोणाचार्य बृहस्पतिके साथ हैं। अपने इन गुरुदेवको अच्छी तरह देख लो

वैशंपायन म्हणाले—वसूंनी सहित विराजमान शंतनुपुत्र राजा भीष्म पाहा. आणि बृहस्पतीच्या पार्श्वभागी उभा असलेला द्रोणाचार्य पाहा—त्या पूज्य गुरूला नीट निरखून बघा.

Verse 22

एते चान्ये महीपाला योधास्तव च पाण्डव । गन्धर्वसहिता यान्ति यक्षपुण्यजनैस्तथा,'पाण्डुनन्दन! ये तुम्हारे पक्षके दूसरे भूपाल योद्धा गन्धर्वों, यक्षों तथा पुण्यजनोंके साथ जा रहे हैं

वैशंपायन म्हणाले—हे पांडवा, तुझ्या पक्षातील हे इतर राजे व योद्धेही गंधर्वांसह, तसेच यक्ष व पुण्यजनांसह पुढे जात आहेत.

Verse 23

गुहाकानां गतिं चापि केचित्‌ प्राप्ता नराधिपा: । त्यक्त्वा देहं जितः स्वर्ग: पुण्यवाग्बुद्धिकर्मभि:,किन्हीं-किन्हीं राजाओंको गुह्म॒कोंकी गति प्राप्त हुई है। ये सब युद्धमें शरीर त्यागकर अपनी पवित्र वाणी, बुद्धि और करमोके द्वारा स्वर्गलोकपर अधिकार प्राप्त कर चुके हैं'

वैशंपायन म्हणाले—काही नरेशांना गुह्यकांची गतीही प्राप्त झाली आहे. युद्धात देह त्यागून, पवित्र वाणी, बुद्धी आणि कर्म यांच्या बळावर त्यांनी स्वर्गलोक जिंकला आहे.

Verse 163

“ये रहे तुम्हारे बड़े भाई कुन्तीकुमार कर्ण जो अग्नितुल्य तेजसे प्रकाशित हो रहे हैं। ये ही सूतपुत्रोंके श्रेष्ठ अग्रज थे और ये ही राधापुत्रके नामसे विख्यात हुए थे ।। आदित्यसहितो याति पश्यैनं पुरुषर्षभम्‌ । “इन पुरुषप्रवर कर्णका दर्शन करो, ये आदित्योंके साथ जा रहे हैं

वैशंपायन म्हणाले—पहा, तुझा ज्येष्ठ भाऊ कुंतीपुत्र कर्ण, अग्नितुल्य तेजाने दीप्तिमान झाला आहे. तो सूतपुत्रांमध्ये श्रेष्ठ अग्रज होता आणि ‘राधेय’ या नावाने प्रसिद्ध होता. त्या पुरुषर्षभाला पाहा—तो आदित्यांच्या संगतीने जात आहे. त्या पुरुषप्रवर कर्णाचे दर्शन घे; तो सौर देवतांसह प्रस्थान करीत आहे.

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to correctly interpret transfigured appearances in heaven—why familiar persons are seen in unexpected forms and grouped with specific divine collectives—requiring authoritative explanation rather than inference from earthly narrative alone.

The chapter teaches that epic identity is multi-layered (human role and cosmic affiliation) and that karmic outcomes operate within a structured celestial taxonomy; therefore, ethical evaluation must account for intention, function, and divine order, not only visible historical outcomes.

No explicit phalaśruti formula appears in this unit; its meta-function is inferential—positioning Indra’s clarifications as a closing interpretive key for the epic’s moral accounting and the reader’s understanding of posthumous destinies.