नरनारायण-नारदसंवादः
Nara-Nārāyaṇa–Nārada Discourse on Vision, Elements, and Entry into Vāsudeva
ते पिबन्त: कषायांश्र सर्पीषि विविधानि च । दृश्यन्ते जरया भग्ना नगा नागैरिवोत्तमै:,वे तरह-तरहके काढ़े और नाना प्रकारके घी पीते रहते हैं, तो भी बड़े-बड़े हाथी जैसे वृक्षोंको झुका देते हैं, वैसे ही वृद्धावस्था उनकी कमर टेढ़ी कर देती है; यह देखा जाता है
te pibantaḥ kaṣāyāṁś ca sarpīṁṣi vividhāni ca | dṛśyante jarayā bhagnā nagā nāgair ivottamaiḥ ||
ते निरनिराळे काढे आणि नाना प्रकारचे तूप पित राहतात; तरीही जरेने मोडलेलेच दिसतात—जसे श्रेष्ठ हत्ती पर्वतांना वाकवून भंग करतात।
नारद उवाच