निरय-परमस्थान-वर्णनम्
Niraya and the Supreme Station: A Metaphysical Re-reading
भरद्वाज उवाच यदेतद् भवताभिहितं सुखानां परमा स्थितिरिति न तदुपगृह्नीमो न होषामृषीणां महति स्थितानामप्राप्प एष काम्यो गुणविशेषो न चैनमभिलषन्ति च तपसि श्रूयते त्रिलोककृद् ब्रह्मा प्रभुरेकाकी तिष्ठति । ब्रह्मचारी न कामसुखेष्वात्मानमवदधाति । अपि च भगवान् विश्वेश्वर उमापति: काममभिवर्तमानमनड्गत्वेन शममनयत् । तस्माद् ब्रूमो न तु महात्मभिरयं प्रतिगृहीतो न त्वेषां तावद्विशिष्टो गुणविशेष इति । नैतद् भगवतः: प्रत्येमि भगवता तूक्त सुखान्न परमस्तीति लोकप्रवादो हि द्विविध: फलोदय: सुकृतात् सुखमवाप्यते दुष्कृताद् दुःखमिति,भरद्वाजने पूछा--प्रभो! आपने जो यह बताया है कि सुखोंका ही सबसे ऊँचा स्थान है--सुखसे बढ़कर त्रिवर्गकका और कोई फल नहीं है, आपकी यह बात हमारे मनमें ठीक नहीं जँचती है; क्योंकि जो महान् तपमें स्थित ऋषिगण हैं, उनके लिये यह वाउ्छनीय गुणविशेष सुख यद्यपि प्राप्त हो सकता है, तो भी वे इसे नहीं चाहते हैं। सुना जाता है कि तीनों लोकोंकी सृष्टि करनेवाले भगवान् ब्रह्मा अकेले ही रहते हैं, ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं और कामसुखमें कभी मन नहीं लगाते हैं। भगवती उमाके प्राणवल्लभ भगवान् विश्वनाथने भी अपने सामने आये हुए कामको जलाकर शान्त कर दिया और उसे अनंग बना दिया; इसलिये हम कहते हैं कि महात्मा पुरुषोंने कभी इसे स्वीकार नहीं किया है। उनके लिये यह कामसुख अर्थात् सांसारिक भोगोंका सुख सबसे बढ़कर सुखविशेष नहीं है; परंतु आपकी बातोंसे मुझे ऐसी प्रतीति नहीं होती है। आपने तो यह कहा है कि इस सुखसे बढ़कर दूसरा कोई फल नहीं है। लोकमें ऐसा कहा जाता है कि फलकी उत्पत्ति दो प्रकारकी होती है। पुण्यकर्मसे सुख प्राप्त होता है और पापकर्मसे दुःख
bharadvāja uvāca | yad etad bhavatābhihitaṃ sukhānāṃ paramā sthitir iti na tad upagṛhṇīmo na hoṣām ṛṣīṇāṃ mahati sthitānām aprāpya eṣa kāmyo guṇaviśeṣo na cainam abhilaṣanti ca | tapasi śrūyate trilokakṛd brahmā prabhur ekākī tiṣṭhati | brahmacārī na kāmasukheṣv ātmānam avadadhāti | api ca bhagavān viśveśvara umāpatiḥ kāmam abhivartamānam anaṅgatvena śamam anayat | tasmād brūmo na tu mahātmabhir ayaṃ pratigṛhīto na tv eṣāṃ tāvad viśiṣṭo guṇaviśeṣa iti | naitad bhagavataḥ pratyemi bhagavatā tūktam sukhān na param astīti | lokapravādo hi dvividhaḥ phalodayaḥ | sukṛtāt sukham avāpyate duṣkṛtād duḥkham iti ||
भरद्वाज म्हणाले—प्रभो! आपण जे सांगितले की सुखांची परम अवस्था म्हणजेच सुख, ते आम्ही मान्य करीत नाही. तपात स्थित महर्षींना हा काम्य गुणविशेष (भोगसुख) मिळू शकला तरी ते त्याची इच्छा करीत नाहीत. असे ऐकिवात आहे की त्रिलोकनिर्माता प्रभु ब्रह्मा एकाकी ब्रह्मचर्य पाळून राहतात व कामसुखांत मन लावत नाहीत. तसेच उमा-पती विश्वेश्वर शंकरांनी समोर आलेल्या कामदेवाला शांत करून अनंग केले. म्हणून आम्ही म्हणतो—महात्म्यांनी हे स्वीकारलेले नाही; त्यांच्या दृष्टीने हा सर्वोच्च गुणविशेष नाही. म्हणून, भगवन्, ‘सुखापेक्षा श्रेष्ठ काही नाही’ हे आपले म्हणणे मला मान्य होत नाही. लोकप्रवाद असा आहे की फलोत्पत्ती द्विविध असते—पुण्याने सुख मिळते आणि पापाने दुःख।
भरद्वाज उवाच
Bharadvāja challenges the claim that pleasure is the highest human end, arguing that exemplary ascetics do not seek sensual enjoyment even when available. He reinforces a moral causality: happiness arises from merit and suffering from demerit, implying that ethical and ascetic ideals stand above mere pleasure.
In a philosophical exchange in Śānti Parva, Bharadvāja responds to a prior speaker who has elevated pleasure as the supreme attainment. He counters by citing paradigmatic figures—Brahmā’s solitary restraint and Śiva’s destruction of Kāma—to show that the greatest beings exemplify control over desire rather than indulgence.