Daṇḍotpatti-kathana (Origin and Function of Daṇḍa) — वसुहोम–मान्धातृ संवाद
एवंप्रयोजनश्वैव दण्ड: क्षत्रियतां गत: । रक्षन् प्रजा: स जागर्ति नित्यं स्ववहितो$क्षर:,इस प्रकार रक्षारूपी प्रयोजन सिद्ध करनेवाला दण्ड क्षत्रियभावको प्राप्त हुआ है। वह अविनाशी होनेके कारण सदा सावधान होकर प्रजाकी रक्षाके लिये जागता रहता है
evaṁprayojanaś caiva daṇḍaḥ kṣatriyatāṁ gataḥ | rakṣan prajāḥ sa jāgarti nityaṁ svavahito'kṣaraḥ ||
अशा रीतीने रक्षण हेच ज्याचे प्रयोजन, तो दण्ड क्षत्रियत्व व क्षत्रिय-कर्तव्य धारण करतो. प्रजेचे रक्षण करत तो सदैव जागृत राहतो; अविनाशी असल्याने आपल्या नियत कार्यात अढळ व सतत सावध असतो.
भीष्म उवाच