Dyūta-āhvāna: Śakuni’s Proposal, Vidura’s Warning, and the Summons of Yudhiṣṭhira
Sabhā-parva 51
त्रिखर्व बलिमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिता: । ब्रह्मणा वाटधानाश्न गोमन्त: शतसड्घश:,महाराज! ब्राह्मणलोग तथा गाय-बैलोंका पोषण करनेवाले वैश्य और दास-कर्मके योग्य शूद्र आदि सभी महात्मा धर्मराजकी प्रसन्नताके लिये तीन खर्बके लागतकी भेंट लेकर दरवाजेपर रोके हुए खड़े थे। ब्राह्मणलोग तथा हरी-भरी खेती उपजाकर जीवन-निर्वाह करनेवाले और बहुत-से गाय-बैल रखनेवाले वैश्य सैकड़ों दलोंमें इकट्ठे होकर सोनेके बने हुए सुन्दर कलश एवं अन्य भेंट-सामग्री लेकर द्वारपर खड़े थे। परंतु भीतर प्रवेश नहीं कर पाते थे
trikharva balim ādāya dvāri tiṣṭhanti vāritāḥ | brahmaṇā vāṭadhānāś ca gomantaḥ śataśaḍghaśaḥ ||
दुर्योधन म्हणाला— तीन खर्ब किमतीचा बलि घेऊन ते द्वारीच अडवून ठेवलेले उभे आहेत; आत जाण्याची परवानगी नाही। ब्राह्मण आणि समृद्ध गृहस्थ—हिरवीगार शेती व विपुल गोधन असलेले—शेकडो तुकड्यांत सोन्याचे कुंभ इत्यादी घेऊन आले, तरीही बाहेरच थांबले आहेत।
दुर्योधन उवाच