Jarā’s Account and the Enthronement of Jarāsandha (जरासंधोत्पत्तिः अभिषेकश्च)
स काशिराजस्य सुते यमजे भरतर्षभ । उपयेमे महावीर्यों रूपद्रविणसंयुते । तयोश्व॒कार समयं मिथ: स पुरुषर्षभ:,प्रियाभ्यामनुरूपाभ्यां करेणुभ्यामिव द्विप: । भरतकुलभूषण! महापराक्रमी राजा बृहद्रथने काशिराजकी दो जुड़वीं कन्याओंके साथ, जो अपनी रूप-सम्पत्तिसे अपूर्व शोभा पा रही थीं, विवाह किया और उन नरश्रेष्ठने एकान्तमें अपनी दोनों पत्नियोंके समीप यह प्रतिज्ञा की कि मैं तुम दोनोंके साथ कभी विषम व्यवहार नहीं करूँगा (अर्थात् दोनोंके प्रति समानरूपसे मेरा प्रेमभाव बना रहेगा)। जैसे दो हथिनियोंके साथ गजराज सुशोभित होता है, उसी प्रकार वे महाराज बृहद्रथ अपने मनके अनुरूप दोनों प्रिय पत्नियोंके साथ शोभा पाने लगे इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि जरासंधोत्पत्तौ सप्तदशो<ध्याय:
sa kāśirājasya sute yamaje bharatarṣabha | upayeme mahāvīryo rūpadraviṇasaṃyute | tayoś cakāra samayaṃ mithaḥ sa puruṣarṣabhaḥ, priyābhyām anurūpābhyāṃ kareṇūbhyām iva dvipaḥ |
भरतश्रेष्ठ! महावीर्यवान बृहद्रथाने काशिराजाच्या रूप-धनसंपन्न अशा जुळ्या कन्यांशी विवाह केला. मग त्या नरश्रेष्ठाने एकांतात दोघींशी परस्पर अशी प्रतिज्ञा केली की मी तुमच्यापैकी कोणावरही पक्षपात करणार नाही. जसा दोन अनुरूप हत्तीणींसह गजराज शोभतो, तसा तो आपल्या दोन प्रिय राण्यांसह शोभू लागला.
कृष्ण उवाच
The verse highlights marital and ethical dharma: a king should uphold fairness and avoid partiality, especially where unequal treatment would cause harm. The private pledge underscores self-restraint and responsibility in intimate relationships.
Bṛhadratha marries the twin daughters of the king of Kāśī and then promises both queens that he will treat them equally. The simile of the elephant with two she-elephants emphasizes harmony and fitting companionship.