
नारायणास्त्र-शमनं द्रौणि-प्रहारश्च (Pacification of the Nārāyaṇāstra and Drauni’s Renewed Assault)
Upa-parva: Nārāyaṇāstra-pratīhāra (Pacification of the Nārāyaṇāstra) Episode
Sañjaya reports that Arjuna, seeing Bhīma engulfed by Aśvatthāman’s weapon-force, veils the field with the Vāruṇāstra to blunt the radiance and render Bhīma difficult to perceive. The Nārāyaṇāstra’s pressure induces panic and disarray; Arjuna and Kṛṣṇa urgently move to Bhīma and enforce the prescribed protocol—disarmament and withdrawal from active resistance—so the weapon’s destructive agency does not intensify. Kṛṣṇa admonishes Bhīma’s refusal to desist and compels him down from the chariot; once weapons are abandoned, the astra pacifies and the directions clear, restoring composure to forces and animals. Duryodhana urges Aśvatthāman to redeploy the astra, but Aśvatthāman explains its non-repeatability and the danger of rebound upon the user, noting that Kṛṣṇa has already applied the proper countermeasure. Combat then resumes in conventional mode: Aśvatthāman, enraged by his father’s death, charges Dhṛṣṭadyumna, exchanges volleys, disables his chariot elements, and routs Pāñcāla units. Sātyaki attacks, is gravely wounded and withdrawn; Aśvatthāman continues striking multiple opponents, felling key warriors and pressing the Pāṇḍava-aligned host into flight.
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं—रणभूमि में नकुल अपनी तीव्रता से शत्रु-वाहिनी को रौंदते हुए आगे बढ़ते हैं, और उनके सामने सौबलराज शकुनि आ खड़ा होता है। → पुराने वैर से बँधे दोनों वीर एक-दूसरे के वध की आकांक्षा से, समान कौशल का प्रदर्शन करते हुए, बाण-वर्षा से बाण-वर्षा का उत्तर देते हैं—जैसे नकुल छोड़ते हैं, वैसे ही शकुनि भी ‘शिक्षा संदर्शयन्’ युद्ध-विद्या दिखाता है। उधर शिखण्डी और कृपाचार्य का घोर संग्राम भी साथ-साथ भड़कता है; रथ, घोड़े, पैदल—सब दिशाओं में धूल और अंधकार फैलाते हैं। → नकुल के प्रहारों से शकुनि की स्थिति डगमगाती है; ‘विसंज्ञ निपतित’ श्याल को गिरा देख कौरव-पक्ष में क्षणिक स्तब्धता छा जाती है। उसी उन्मादित क्षण में कृपाचार्य क्रोध से दारुण शक्ति फेंकते हैं—और शिखण्डी के साथ उनका युद्ध प्रलय-सा उग्र हो उठता है। → युद्ध का विस्तार इतना बढ़ता है कि रात्रि भी प्रदीपों से दिन-सी हो जाती है; धूल और तम से ढँकी दिशाएँ फिर प्रकाश से चमक उठती हैं। पर उस प्रकाश में भी कोलाहल ऐसा कि योद्धा ‘मैं कौन हूँ’ तक नहीं जान पाते—स्व-चेतना रण-उन्माद में गल जाती है। → प्रदीप्त रात्रि में युद्ध थमता नहीं; पृथ्वी पैदल सैनिकों की धमक से भयभीत-सी काँपती रहती है—अगले क्षण किसका पतन होगा, यह अनिश्चित रह जाता है।
Verse 1
अतड-४--क+ एकोनसप्तत्याधिकशततमो< ध्याय: नकुलके द्वारा शकुनिकी पराजय तथा शिखण्डी और कृपाचार्यका घोर युद्ध संजय उवाच नकुलं॑ रभसं युद्धे निघ्नन्तं वाहिनीं तव । अभ्ययात् सौबल: क्रुद्धस्तिष्ठ तिछेति चाब्रवीत्,संजय कहते हैं--राजन्! वेगशाली नकुल युद्धमें आपकी सेनाका संहार कर रहे थे। उनका सामना करनेके लिये क्रोधमें भरा हुआ सुबलपुत्र शकुनि आया और बोला “अरे! खड़ा रह, खड़ा रह' इस प्रकार श्रीमह्याभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके समय संकुलयुद्धविषयक एक सौ उनहठत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १६९ ॥/ नस ह्य ४-3 सप्तत्याधेकशततमो< ध्याय: धृष्टद्युम्न और द्रोणाचार्यका युद्ध, धृष्टदय्युम्नद्वारा द्रमसेनका वध, सात्यकि और कर्णका युद्ध, कर्णकी दुर्योधनको सलाह तथा शकुनिका पाण्डव-सेनापर आक्रमण संजय उवाच तस्मिन् सुतुमुले युद्धे वर्तमाने भयावहे । धृष्टद्युम्नो महाराज द्रोणमेवाभ्यवर्तत
संजय म्हणाला—राजन्! वेगवान नकुल युद्धात तुमच्या वाहिनीचा संहार करीत होते. तेव्हा क्रोधाने भरलेला सुबलपुत्र शकुनी त्यांना सामोरा आला आणि म्हणाला—“थांब! थांब!”
Verse 2
कृतवैरौ तु तौ वीरावन्योन्यवधकाड्क्षिणौ । शरै: पूर्णायतोत्सूष्टैरन्योन्यमभिजष्नतु:,उन दोनों वीरोंने पहलेसे ही आपसमें वैर बाँध रखा था, वे एक-दूसरेका वध करना चाहते थे; इसलिये पूर्णतः: कानतक खींचकर छोड़े हुए बाणोंसे वे एक-दूसरेको घायल करने लगे
ते दोन्ही वीर पूर्वीपासूनच वैर बांधून, एकमेकांचा वध करण्यास उद्युक्त होते; म्हणून पूर्ण ताणून सोडलेल्या बाणांनी ते परस्परांवर आघात करू लागले।
Verse 3
यथैव नकुलो राजन् शरवर्षाण्यमुज्चत । तथैव सौबलश्चापि शिक्षां संदर्शयन् युधि,राजन्! नकुल जैसे-जैसे बाणोंकी वर्षा करते, शकुनि भी वैसे-ही-वैसे युद्धविषयक शिक्षाका प्रदर्शन करता हुआ बाण छोड़ता था
राजन्! जसा नकुल सतत बाणांची वर्षा करीत होता, तसाच सौबल (शकुनी)ही रणांगणात आपली शिक्षण-प्राप्त कौशल्ये दाखवीत बाण सोडीत होता।
Verse 4
तावुभौ समरे शूरौ शरकण्टकिनौ तदा । व्यराजेतां महाराज श्वाविधौ शललैरिव,महाराज! वे दोनों शूरवीर समरांगणमें बाणरूपी कंटकोंसे युक्त होकर काँटेदार शरीरवाले साहीके समान सुशोभित हो रहे थे
महाराज! ते दोन्ही शूरवीर रणात बाणरूपी काट्यांनी भरलेले होऊन असे शोभत होते, जणू शलाकांनी आच्छादलेले दोन साही।
Verse 5
रुक्मपुड्खैरजिद्ाग्रै: शरैश्छिन्नतनुच्छदौ । रुधिरौघपरिक्लिन्नौ व्यभ्राजेतां महामृथे,सोनेके पंख और सीधे अग्रभागवाले बाणोंसे उन दोनोंके कवच छिन्न-भिन्न हो गये थे। दोनों ही उस महासमरमें खूनसे लथपथ हो सुवर्णके समान विचित्र कान्तिसे सुशोभित हो रहे थे। वे दो कल्पवृक्षों और खिले हुए दो ढाकके पेड़ोंके समान समरांगणमें प्रकाशित हो रहे थे
सोन्याच्या पिसांनी युक्त आणि सरळ, अडिग अग्रभाग असलेल्या बाणांनी त्या दोघांचे कवच व आवरण छिन्नभिन्न झाले होते. रक्तप्रवाहांनी भिजूनही त्या महासमरात ते दोघे सुवर्णासारख्या विलक्षण कांतीने झळकत होते।
Verse 6
तपनीयनिभौ चित्रौ कल्पवृक्षाविव द्रुमौ । किंशुकाविव चोत्फुल्लो प्रकाशेते रणाजिरे,सोनेके पंख और सीधे अग्रभागवाले बाणोंसे उन दोनोंके कवच छिन्न-भिन्न हो गये थे। दोनों ही उस महासमरमें खूनसे लथपथ हो सुवर्णके समान विचित्र कान्तिसे सुशोभित हो रहे थे। वे दो कल्पवृक्षों और खिले हुए दो ढाकके पेड़ोंके समान समरांगणमें प्रकाशित हो रहे थे
तप्त सुवर्णासारखे दीप्त आणि अद्भुत शोभेने युक्त ते दोघे रणांगणात दोन कल्पवृक्षांसारखे झळकत होते; तसेच पूर्ण फुललेल्या दोन किंशुक (ढाक) वृक्षांसारखे प्रकाशत होते।
Verse 7
तावुभौ समरे शूरौ शरकण्टकिनौ तदा । व्यराजेतां महाराज कण्टकैरिव शाल्मली,महाराज! जैसे काँटोंसे सेमरका वृक्ष सुशोभित होता है, उसी प्रकार वे दोनों शूरवीर समरभूमिमें बाणरूपी कंटकोंसे युक्त दिखायी देते थे
महाराज! ते दोन्ही शूरवीर रणभूमीत बाणरूपी काट्यांनी युक्त होऊन असे शोभत होते, जसे सेमर (शाल्मली) वृक्ष आपल्या काट्यांनी शोभतो।
Verse 8
सुजिह्दां प्रेक्षमाणी च राजन् विवृतलोचनौ । क्रोधसंरक्तनयनौ निर्दहन्तौ परस्परम्,राजन! वे अत्यन्त कुटिलभावसे परस्पर आँखें फाड़-फाड़कर देख रहे थे और क्रोधसे लाल नेत्र करके एक-दूसरेको ऐसे देखते थे, मानो भस्म कर देंगे
संजय म्हणाला—राजन्, ते दोघेही डोळे विस्फारून, क्रोधाने रक्तवर्ण नेत्र करून, एकमेकांकडे असे रोखून पाहत होते की जणू परस्परांना जाळून टाकतील।
Verse 9
श्यालस्तु तव संक्रुद्धो माद्रीपुत्रं हसन्निव । कर्णिनिकेन विव्याध हृदये निशितेन ह,तदनन्तर अत्यन्त क्रोधमें भरकर हँसते हुए-से आपके सालेने एक तीखे कर्णी नामक बाणसे माद्रीपुत्र नकुलकी छातीमें गहरा आघात किया
संजय म्हणाला—अत्यंत क्रोधाने पेटून, जणू हसत असल्याप्रमाणे, तुमच्या श्यालाने कर्णिनी नावाच्या तीक्ष्ण बाणाने माद्रीपुत्र नकुलाच्या हृदयप्रदेशी घाव घातला।
Verse 10
नकुलस्तु भृशं विद्ध: श्यालेन तव धन्विना । निषसाद रथोपस्थे कश्मलं चाविशन्महत्,आपके धनुर्धर सालेके द्वारा अत्यन्त घायल किये हुए नकुल रथके पिछले भागमें बैठ गये और भारी मूर्च्छामें पड़ गये
संजय म्हणाला—तुमच्या धनुर्धर श्यालाने अत्यंत जखमी केलेला नकुल रथाच्या मागील भागात कोसळून बसला आणि त्याला मोठी मूर्च्छा आली।
Verse 11
अत्यन्तवैरिणं दृप्तं दृष्टवा शत्रुं तथागतम् । ननाद शकुनी राजंस्तपान्ते जलदो यथा,राजन! अपने अत्यन्त वैरी और अभिमानी शत्रुको वैसी अवस्थामें पड़ा देख शकुनि वर्षाकालके मेघके समान जोर-जोरसे गर्जना करने लगा
संजय म्हणाला—राजन्, आपल्या अत्यंत वैरी व गर्विष्ठ शत्रूला त्या अवस्थेत पडलेला पाहून शकुनी ग्रीष्मांताच्या मेघाप्रमाणे जोरजोराने गर्जला।
Verse 12
प्रतिलभ्य तत: संज्ञां नकुल: पाण्डुनन्दन: । अभ्ययात् सौबल भूयो व्यात्तानन इवान्तक:,इतनेमें ही पाण्डुनन्दन नकुल होशमें आकर मुँह बाये हुए यमराजके समान पुनः सुबलपुत्रका सामना करनेके लिये आगे बढ़े
संजय म्हणाला—त्यानंतर शुद्धीवर येताच पांडुनंदन नकुल, तोंड विस्फारलेल्या यमासारखा, पुन्हा सौबलपुत्रास सामोरे जाण्यास पुढे सरसावला।
Verse 13
संक्रुद्ध: शकुनिं षष्ट्या विव्याध भरतर्षभ | पुनश्चैनं शतेनैव नाराचानां स्तनान्तरे,भरतश्रेष्ठ! इन्होंने कुपित होकर शकुनिको साठ बाणोंसे घायल कर दिया। फिर उसकी छातीमें इन्होंने सौ नाराच मारे
भरतश्रेष्ठा! क्रोधाने त्याने शकुनीला साठ बाणांनी विद्ध केले. नंतर पुन्हा त्याच्या छातीत शंभर नाराच घुसविले.
Verse 14
अथास्य सशरं चापं मुष्टिदेशेडच्छिनत् तदा । ध्वजं च त्वरितं छित्त्वा रथाद् भूमावपातयत्
तेव्हा त्याने त्याचे बाणासहित धनुष्य मुठीजवळच छेदून टाकले. आणि ध्वजही तत्काळ कापून रथावरून भूमीवर पाडला.
Verse 15
तत्पश्चात् नकुलने शकुनिके बाणसहित धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट दिया और तुरंत ही उसकी ध्वजाको भी काटकर रथसे भूमिपर गिरा दिया ।। विशिखेन च तीक्ष्णेन पीतेन निशितेन च । ऊरू निर्भिद्य चैकेन नकुल: पाण्डुनन्दन:
त्यानंतर पांडुनंदन नकुलाने शकुनीचे बाणासहित धनुष्य मुठीजवळच कापून टाकले आणि तत्काळ त्याची ध्वजाही छेदून रथावरून भूमीवर पाडली. मग तीक्ष्ण, पिवळसर, धारदार अशा एका विशिखाने नकुलाने शकुनीची मांडी भेदली.
Verse 16
सो5तिविद्धो महाराज रथोपस्थ उपाविशत्
महाराज! तो अत्यंत विद्ध होऊनही रथाच्या आसनावर बसला.
Verse 17
त॑ विसंज्ञ निपतितं दृष्टवा श्यालं तवानघ
हे अनघ! तुझा श्याल मूर्च्छित होऊन पडलेला पाहून…
Verse 18
ततः संचुक्रुशुः पार्था ये च तेषां पदानुगा:,फिर तो कुन्तीके पुत्र और उनके सेवक बड़े जोरसे सिंहनाद करने लगे। इस प्रकार रणभूमिमें शत्रुको परास्त करके क्रोधमें भरे हुए शत्रुसंतापी नकुलने अपने सारथिसे कहा --'सूत! मुझे द्रोणाचार्यकी सेनाके पास ले चलो”
तेव्हा पृथापुत्र पांडव आणि त्यांचे अनुयायी मोठ्या जोराने जयघोष करू लागले. रणांगणात शत्रूचा पराभव करून, क्रोधाने ज्वलंत शत्रुतापी नकुल आपल्या सारथ्यास म्हणाला— “सूता, मला द्रोणाचार्यांच्या सेनेकडे घेऊन चल.”
Verse 19
निर्जित्य च रणे शत्रुं नकुल: शत्रुतापन: । अब्रवीत् सारथिं क्रुद्धों द्रोणानीकाय मां वह,फिर तो कुन्तीके पुत्र और उनके सेवक बड़े जोरसे सिंहनाद करने लगे। इस प्रकार रणभूमिमें शत्रुको परास्त करके क्रोधमें भरे हुए शत्रुसंतापी नकुलने अपने सारथिसे कहा --'सूत! मुझे द्रोणाचार्यकी सेनाके पास ले चलो”
रणात शत्रूला जिंकून शत्रुतापी नकुल क्रोधाने सारथ्यास म्हणाला— “सारथी, मला द्रोणांच्या व्यूहाकडे घेऊन चल.” मग कुंतीपुत्र नकुलाने अनुचरांसह प्रचंड सिंहनाद केला, जणू शत्रुपक्षाला आव्हान देत होता।
Verse 20
तस्य तद्ू वचन श्रुत्वा माद्रीपुत्रस्थ सारथि: । प्रायात् तेन तदा राजन् यत्र द्रोणो व्यवस्थित:,राजन! माद्रीकुमारका वह वचन सुनकर सारथि उस रथके द्वारा जहाँ द्रोणाचार्य खड़े थे, वहाँ तत्काल जा पहुँचा
राजन्! माद्रीपुत्राचे ते वचन ऐकून त्याचा सारथी त्या रथासह त्वरित तेथे गेला, जिथे द्रोणाचार्य युद्धरचनेत उभे होते।
Verse 21
शिखण्डिनं तु समरे द्रोणप्रेप्सुं विशाम्पते । कृप: शारद्वतो यत्त: प्रत्यगच्छत् सवेगित:,प्रजानाथ! द्रोणाचार्यके साथ युद्धकी इच्छावाले शिखण्डीका समरभूमिमें सामना करनेके लिये प्रयत्नशील हो शरद्वानके पुत्र कृपाचार्य बड़े वेगसे आगे बढ़े
प्रजानाथ! समरात द्रोणाचार्यांशी युद्ध करण्यास उत्सुक असलेल्या शिखंडीचा सामना करण्यासाठी शरद्वानपुत्र कृपाचार्य प्रयत्नशील होऊन मोठ्या वेगाने पुढे धावले।
Verse 22
गौतमं द्रुतमायान्तं द्रोणानीकमरिंदमम् । विव्याध नवभिर्भल्लै: शिखण्डी प्रहसन्निव,शत्रुओंको दमन करनेवाले, द्रोणरक्षक, गौतमगोत्रीय कृपाचार्यको शीघ्रतापूर्वक आते देख हँसते हुए-से शिखण्डीने उन्हें नौ भल्लोंसे बींध डाला
शत्रूंचा दमन करणारे, द्रोणांच्या व्यूहाचे रक्षक गौतमवंशी कृपाचार्य वेगाने येताना पाहून शिखंडीने जणू हसत-हसत त्यांना नऊ भल्लांनी भेदले।
Verse 23
तमाचार्यों महाराज विद्ध्वा पठ्चभिराशुगै: । पुनर्विव्याध विंशत्या पुत्राणां प्रियकृत् तव,महाराज! तब आपके पुत्रोंका प्रिय करनेवाले कृपाचार्यने शिखण्डीको पाँच बाणोंसे बींधकर फिर बीस बाणोंसे घायल कर दिया
महाराज! तुमच्या पुत्रांचे प्रिय करणारे कृपाचार्यांनी त्याला पाच वेगवान बाणांनी विद्ध करून, पुन्हा वीस बाणांनी जखमी केले।
Verse 24
महद् युद्ध तयोरासीद् घोररूपं भयानकम् । यथा देवासुरे युद्धे शम्बरामरराजयो:,पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर शम्बरासुर और इन्द्रमें जैसा युद्ध हुआ था, वैसा ही घोर भयानक एवं महान् युद्ध उन दोनोंमें भी हुआ
त्या दोघांमध्ये घोर रूपाचे, भयावह आणि महान युद्ध पेटले—जसे प्राचीन काळी देवासुर-संग्रामात शंबरासुर व अमरराज इंद्र यांच्यात झाले होते।
Verse 25
शरजालावृतं व्योम चक्रतुस्ती महारथौ । मेघाविव तपापाये वीरौ समरदुर्मदौ
समरात उन्मत्त झालेले ते दोघे वीर महारथी बाणांच्या जाळ्याने आकाश झाकू लागले; तो देखावा ग्रीष्माच्या अखेरीस जमणाऱ्या मेघांसारखा भासत होता।
Verse 26
उन दोनों रणदुर्मद वीर महारथियोंने वर्षाकालके दो मेघोंके समान आकाशको बाणसमूहोंसे व्याप्त कर दिया ।। प्रकृत्या घोररूपं तदासीद् घोरतरं पुन: । रात्रिश्व भरतश्रेष्ठ योधानां युद्शशालिनाम्
तो प्रसंग स्वभावतःच घोर होता, आणि पुन्हा अधिकच भयावह झाला; कारण, भरतश्रेष्ठा, युद्धकुशल योद्ध्यांवर रात्र उतरली।
Verse 27
शिखण्डी तु महाराज गौतमस्य महद् धनु:
महाराज! शिखंडीच्या हाती गौतमाचे ते महान धनुष्य होते।
Verse 28
तस्य क्रुद्ध: कृपो राजन् शक्ति चिक्षेप दारुणाम्
संजय म्हणाला—महाराज! त्याच्यावर क्रुद्ध होऊन कृपाने भयंकर शक्ती-शस्त्र फेकले।
Verse 29
तामापतन्तीं चिच्छेद शिखण्डी बहुभि: शरै:
संजय म्हणाला—ती धावत येत असता शिखंडीने अनेक बाणांनी तिला छिन्नभिन्न करून पाडले।
Verse 30
अथान्यद् धनुरादाय गौतमो रथिनां वर:
संजय म्हणाला—मग रथींमध्ये श्रेष्ठ गौतम (कृप) यांनी दुसरे धनुष्य उचलले।
Verse 31
प्राच्छादयच्छितैर्बाणैमहाराज शिखण्डिनम् । महाराज! तब रथियोंमें श्रेष्ठ कृपाचार्यने दूसरा धनुष हाथमें लेकर पैने बाणोंद्वारा शिखण्डीको ढक दिया ।। स च्छाद्यमान: समरे गौतमेन यशस्विना
संजय म्हणाला—महाराज! रथींमध्ये श्रेष्ठ कृपाचार्यांनी दुसरे धनुष्य हातात घेऊन तीक्ष्ण बाणांनी शिखंडीला पूर्णपणे झाकून टाकले; आणि रणात यशस्वी गौतम (कृप) यांच्या बाणवृष्टीने आच्छादित होत तो शिखंडी संकटात पडला।
Verse 32
सीदन्तं चैनमालोक्य कृप: शारद्वतो युधि
संजय म्हणाला—रणात तो खचत आहे असे पाहून कृप शारद्वताने त्याची अवस्था पाहिली।
Verse 33
विमुखं तु रणे दृष्टवा याज्ञसेनिं महारथम्
संजय म्हणाला—रणांगणात याज्ञसेनीचा तो महारथी विमुख झालेला पाहून पाहणाऱ्यांना कळले की संकल्प ढळला की महान पराक्रमही डगमगतो; धर्म-नीती व रणनितीच्या दडपणात हा अशुभ संकेत ठरला.
Verse 34
पज्चाला: सोमकाश्वैव परिवद्रु: समनन््तत: । राजा द्रुपदके उस महारथी पुत्रको युद्धविमुख हुआ देख पांचालों और सोमकोंने उसे चारों ओरसे घेरकर अपने बीचमें कर लिया ।। ३३ $ || तथैव तव पुत्राश्न परिवद्र॒ुर्द्धिजोत्तमम्
संजय म्हणाला—पांचाल आणि सोमकांनी त्याला सर्व बाजूंनी वेढले. राजा द्रुपदाचा तो महारथी पुत्र युद्धापासून विमुख झालेला पाहून त्यांनी सर्व दिशांनी घेरून त्याला आपल्या मध्ये आणले—पलायन थांबवण्यासाठी आणि पक्षधर्माच्या शिस्तीत पुन्हा स्थिर करण्यासाठी.
Verse 35
रथानां च रणे राजन्नन्योन्यमभिधावताम्
हे राजन्, रणात रथ एकमेकांवर सरळ धावून येत होते.
Verse 36
द्रवतां सादिनां चैव गजानां च विशाम्पते
हे प्रजापते, पळणारे घोडेस्वार आणि हत्तीही होते.
Verse 37
पत्तीनां द्रवतां चैव पादशब्देन मेदिनी
पळणाऱ्या पायदळांच्या पावलांच्या गजराने पृथ्वी दुमदुमली.
Verse 38
रथिनो रथमारुहा प्रद्रुता वेगवत्तरम्
संजय म्हणाला—रथी रथावर आरूढ होऊन आणखी अधिक वेगाने पुढे धावले।
Verse 39
तथा गजानू प्रभिन्नांश्व॒ सम्प्रभिन्ना महागजा:
संजय म्हणाला—तसेच महागज मदोन्मत्त झाले होते; काहींच्या कपाळातून मद झरत होता आणि ते रणकोलाहलात धाव घेत होते।
Verse 40
सादी सादिनमासाद्य पत्तयश्न पदातिनम्
संजय म्हणाला—स्वार स्वाराला भिडले आणि पायदळ पायदळाशी जाऊन लागले; रथी व सारथ्यांच्या निकट येऊन पायदळही समोरासमोर उभे ठाकले।
Verse 41
धावतां द्रवतां चैव पुनरावर्ततामपि
संजय म्हणाला—कुठे ते धावत होते, कुठे पळत होते, आणि कुठे पुन्हा वळून परत येत होते।
Verse 42
दीप्यमाना: प्रदीपाश्च॒ रथवारणवाजिषु
संजय म्हणाला—रथांवर, हत्ती व घोड्यांवर जळते-झळाळते दिवे दिसत होते।
Verse 43
अदृश्यन्त महाराज महोल्का इव खाच्च्युता: । महाराज! रथों, हाथियों और घोड़ोंपर चलती हुई मशालें आकाशसे गिरी हुई बड़ी-बड़ी उल्काओंके समान दिखायी देती थीं || ४२ $ ।। सा निशा भरतश्रेष्ठ प्रदीपेरवभासिता
संजय म्हणाला—महाराज! रथांवर, हत्तीवर आणि घोड्यांवर चालत्या त्या मशाली आकाशातून पडलेल्या मोठ्या उल्कांसारख्या दिसत होत्या. हे भरतश्रेष्ठ! अशा रीतीने ती रात्र दीपांच्या प्रकाशाने उजळून निघाली.
Verse 44
आदित्येन यथा व्याप्तं तमो लोके प्रणश्यति
जसा सूर्य सर्वत्र पसरला की जगातील अंधार नष्ट होतो, तसाच प्रकाश पसरला की सर्व मोहांधार नाहीसा होतो.
Verse 45
द्यौश्वैव पृथिवी चापि दिशश्व प्रदिशस्तथा
आकाशही आणि पृथ्वीही, तसेच सर्व दिशा व उपदिशा.
Verse 46
अस्त्राणां कवचानां च मणीनां च महात्मनाम्
महात्मा योद्ध्यांची अस्त्रे, कवचे आणि मणी (यांचे वैभव).
Verse 47
अन्तर्दधु: प्रभा: सर्वा दीपैस्तैरव भासिता: । महामनस्वी योद्धाओंके अस्त्रों, कवचों और मणियोंकी सारी प्रभा उन प्रदीपोंके प्रकाशसे तिरोहित हो गयी थी ।। तस्मिन् कोलाहले युद्धे वर्तमाने निशामुखे
त्या दीपांच्या प्रकाशात सर्व प्रभा जणू अंतर्धान पावल्या. महामनस्वी योद्ध्यांच्या अस्त्रांतील, कवचांतील व मण्यांतील तेज त्या प्रदीपांच्या उजेडाने झाकोळले गेले. आणि त्या कोलाहलमय युद्धात, रात्र नुकतीच सुरू होत असताना, संग्राम चालूच होता.
Verse 48
अवधीत् समरे पुत्र पिता भरतसत्तम
संजय म्हणाला—भरतश्रेष्ठा! त्या घोर संग्रामात पुत्राने पित्याचा वध केला; स्वधर्माचा उलटफेर झाला, युद्धमोहाने आपलेच आपल्यावर घाव घालू लागले।
Verse 49
पुत्रश्न पितरं मोहातू सखायं च सखा तथा । स्वस्त्रीयं मातुलश्चापि स्वस्रीयश्चापि मातुलम्
संजय म्हणाला—मोहाने पुत्र पित्याला मारू शकतो आणि मित्र मित्राला. तसेच मामा भाच्याला मारू शकतो आणि भाचा मामालाही—युद्धातील भ्रम नाती उलथवतो.
Verse 50
भरतश्रेष्ठ] उस समरांगणमें मोहवश पिताने पुत्रका वध कर डाला और पुत्रने पिताका। मित्रने मित्रके प्राण ले लिये। मामाने भानजेको मार डाला और भानजेने मामाको ।। स्वे स्वान् परे परांश्ञापि निजघ्नुरितरेतरम् । निर्मर्यादम भूद् युद्ध रात्री भीरुभयानकम्,अपने पक्षके योद्धा अपने ही सैनिकोंपर तथा शत्रुपक्षेके सैनिक भी अपने ही योद्धाओंपर परस्पर घातक प्रहार करने लगे। इस प्रकार रात्रिमें वह युद्ध मर्यादारहित होकर कायरोंके लिये अत्यन्त भयानक हो उठा
संजय म्हणाला—भरतश्रेष्ठा! त्या रात्रीच्या संग्रामात मोहाने पित्याने पुत्राचा वध केला आणि पुत्राने पित्याचा. मित्राने मित्राचे प्राण घेतले. मामाने भाच्याला मारले आणि भाच्याने मामालाही. आपल्या पक्षातील योद्धे आपल्या सैनिकांवरच, आणि शत्रुपक्षातीलही आपल्या योद्ध्यांवरच परस्पर घातक प्रहार करू लागले. अशा रीतीने तो रात्रियुद्ध मर्यादाहीन होऊन भित्र्यांसही अत्यंत भयावह झाला.
Verse 153
श्येनं सपक्ष॑ व्याधेन पातयामास तं तदा । इसके बाद एक पानीदार पैने एवं तीखे बाणसे पाण्डुनन्दन नकुलने शकुनिकी दोनों जाँघोंको विदीर्ण करके व्याधद्वारा विद्ध हुए पंखयुक्त बाज पक्षीके समान उसे गिरा दिया
संजय म्हणाला—तेव्हा पांडुनंदन नकुलाने तीक्ष्ण, धारदार बाणाने शकुनीच्या दोन्ही जांघा विदीर्ण केल्या आणि त्याला पाडले—जसा व्याधाच्या बाणाने पंखांचा बाज कोसळतो.
Verse 163
ध्वजयष्टिं परिक्लिश्य कामुक: कामिनीं यथा । महाराज! उस बाणसे अत्यन्त घायल हुआ शकुनि, जैसे कामी पुरुष कामिनीका आलिंगन करता है, उसी प्रकार ध्वज-यष्टि (ध्वजाके डंडे)-को दोनों भुजाओंसे पकड़कर रथके पिछले भागमें बैठ गया
संजय म्हणाला—महाराज! त्या बाणाने अत्यंत जखमी झालेला शकुनी, जसा कामी पुरुष कामिनीला आलिंगन देतो, तसा ध्वजदंड दोन्ही भुजांनी घट्ट धरून रथाच्या मागील भागात बसून पडला.
Verse 169
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे संकुलयुद्धे एकोनसप्तत्यधिकशततमो< ध्याय:
अशा प्रकारे श्रीमहाभारताच्या द्रोणपर्वात, घटोत्कचवधपर्वाच्या अंतर्गत, रात्रियुद्ध व संकुल (अत्यंत गुंतागुंतीच्या) संग्रामाचा एकोनसप्तत्यधिकशततम (१६९वा) अध्याय समाप्त झाला.
Verse 173
अपोवाह रथेनाशु सारथिध्व॑जिनीमुखात् । निष्पाप नरेश! आपके सालेको बेहोश पड़ा देख सारथि रथके द्वारा शीघ्र ही उसे सेनाके आगेसे दूर हटा ले गया
संजय म्हणाला—निष्पाप नरेश! तुमचा साळा मूर्च्छित पडलेला पाहून सारथ्याने रथाने त्याला सेनेच्या अग्रभागातून त्वरित दूर नेले.
Verse 263
कालरात्रिनिभा हासीद् घोररूपा भयानका । भरतश्रेष्ठ) स्वभावसे ही भयंकर दिखायी देनेवाला आकाश उस समय और भी घोरतर हो उठा। युद्धभूमिमें शोभा पानेवाले योद्धाओंके लिये वह घोर एवं भयानक रात्रि कालरात्रिके समान प्रतीत होती थी
संजय म्हणाला—ती रात्रि कालरात्रीसारखी, घोर रूपाची व भयावह होती. भरतश्रेष्ठ! स्वभावतःच भयंकर दिसणारे आकाश त्या वेळी आणखीच अधिक घोर झाले. रणभूमीत शोभा मिळवू पाहणाऱ्या योद्ध्यांना ती रात्र कालरात्रीसमान भासली.
Verse 273
अर्धचन्द्रेण चिच्छेद सज्यं सविशिखं तदा । महाराज! शिखण्डीने उस समय अर्धचन्द्राकार बाण मारकर प्रत्यंचा और बाणसहित कृपाचार्यके विशाल धनुषको काट दिया
संजय म्हणाला—महाराज! त्या वेळी शिखंडीने अर्धचंद्राकार बाणाने प्रत्यंचा व बाणासहित कृपाचार्यांचे विशाल धनुष्य छेदून टाकले.
Verse 286
स्वर्णदण्डामकुण्ठाग्रां कर्मारपरिमार्जिताम् । राजन्! तब कृपाचार्यने कुपित होकर सोनेके दण्ड और अप्रतिहत धारवाली तथा कारीगरके द्वारा साफ की हुई एक भयंकर शक्ति उसके ऊपर चलायी
संजय म्हणाला—राजन्! मग कृपाचार्य क्रोधित होऊन, सोन्याचा दंड असलेली, अकुंठ अग्राची व कारागिराने चकाकवलेली अशी एक घोर शक्ती त्याच्यावर फेकून मारली.
Verse 296
सा5पतन्मेदिनीं दीप्ता भासयन्ती महाप्रभा | अपने ऊपर आती हुई उस शक्तिको शिखण्डीने बहुत-से बाण मारकर काट दिया। वह अत्यन्त कान्तिमती एवं प्रकाशमान शक्ति खण्डित हो सब ओर प्रकाश बिखेरती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ी
संजय म्हणाला—अतिदीप्त, महाप्रभा अशी ती शक्ति सर्वत्र प्रकाश पसरवीत पृथ्वीवर कोसळू लागली. ती शिखण्डीवर धावून येताच शिखण्डीने अनेक बाणांनी तिला मारून छिन्नभिन्न केले. खंडित झालेली ती अत्यंत तेजस्वी शक्ति सर्व दिशांना प्रकाश उधळीत भूमीवर पडली.
Verse 316
न्यषीदत रथोपस्थे शिखण्डी रथिनां वर: । समरभूमिमें यशस्वी कृपाचार्यद्वारा बाणोंसे आच्छादित किया जाता हुआ रथियोंमें श्रेष्ठ शिखण्डी रथके पिछले भागमें शिथिल होकर बैठ गया
संजय म्हणाला—रणभूमीवर कृपाचार्यांच्या बाणांनी सर्व बाजूंनी आच्छादित होत असताना रथीश्रेष्ठ, यशस्वी शिखण्डी शिथिल झाला आणि रथाच्या आसनावर, रथाच्या मागील भागाकडे झुकून बसला.
Verse 326
आजलेने बहुभिर्बाणर्जिघांसन्निव भारत । भरतनन्दन! युद्धस्थलमें शिखण्डीको शिथिल हुआ देख शरद्वानके पुत्र कृपाचार्यने उसपर बहुत-से बाणोंका प्रहार किया, मानो वे उसे मार डालना चाहते हों
संजय म्हणाला—भरतनंदना! रणांगणात शिखण्डी शिथिल झालेला पाहून शरद्वानपुत्र कृपाचार्य जणू त्याला ठार मारण्याच्या हेतूने त्याच्यावर असंख्य बाणांचा वर्षाव करू लागला.
Verse 343
महत्या सेनया सार्ध ततो युद्धमवर्तत । इसी प्रकार आपके पुत्रोंने भी विशाल सेनाके साथ आकर द्विजश्रेष्ठ कृपाचार्यको अपने बीचमें कर लिया। फिर दोनों दलोंमें घोर युद्ध होने लगा
संजय म्हणाला—त्यानंतर विशाल सेनेसमवेत युद्धास प्रारंभ झाला. तसेच तुमचे पुत्रही मोठ्या सैन्यासह येऊन द्विजश्रेष्ठ कृपाचार्याला मध्ये ठेवून उभे राहिले; मग दोन्ही दलांत घोर संग्राम पेटला.
Verse 353
बभूव तुमुल: शब्दो मेघानां गर्जतामिव । राजन! रणभूमिमें परस्पर धावा करनेवाले रथोंकी घर्घराहटका भयंकर शब्द मेघोंकी गर्जनाके समान जान पड़ता था
संजय म्हणाला—राजन्! रणभूमीवर मेघांच्या गर्जनेसारखा तुमुल नाद उठला. एकमेकांवर धावून जाणाऱ्या रथांच्या घर्घराटीचा भयंकर आवाज जणू ढगांच्या गडगडाटासमान वाटत होता.
Verse 363
अन्योन्यमभितो राजन् क्रूरमायोधनं बभौ । प्रजापालक नरेश! चारों ओर एक-दूसरेपर आक्रमण करनेवाले घुड़सवारों और हाथीसवारोंके संघर्षसे वह रणभूमि अत्यन्त दारुण प्रतीत होने लगी
संजय म्हणाला—राजन्, सर्व बाजूंनी एकमेकांवर तुटून पडल्याने युद्ध अत्यंत क्रूर व निर्दय झाले. प्रजापालक नरेश! घोडेस्वार व हत्तीस्वारांच्या घोर संघर्षामुळे ती रणभूमी अत्यंत दारुण भासू लागली.
Verse 383
अगृह्नन् बहवो राजन् शलभान् वायसा इव | राजन! जैसे कौए दौड़-दौड़कर टिड्डियोंको पकड़ते हैं, उसी प्रकार रथपर बैठकर बड़े वेगसे धावा करनेवाले बहुसंख्यक रथी शत्रुपक्षके सैनिकोंको दबोच लेते थे
संजय म्हणाला—राजन्, जसे कावळे धावाधाव करून टोळ पकडतात, तसेच रथावर बसून प्रचंड वेगाने धावा करणारे असंख्य रथी शत्रुपक्षातील सैनिकांना पकडून टाकीत.
Verse 396
तस्मिन्नेव पदे यत्ता निगृह्नन्ति सम भारत । भरतनन्दन! मदस्रावी विशाल हाथी मदकी धारा बहानेवाले दूसरे गजराजोंसे सहसा भिड़कर एक-दूसरेको यत्नपूर्वक काबूमें कर लेते थे
भरतनंदना! त्याच जागी समरात गुंतलेले मदस्रावी विशाल हत्ती, मदधारा वाहणाऱ्या दुसऱ्या गजराजांशी सहसा भिडून एकमेकांना प्रयत्नपूर्वक आवरू लागले.
Verse 403
समासाद्य रणेडन्योन्यं संरब्धा नातिचक्रमु: । रणभूमिमें घुड़सवार घुड़सवारोंसे और पैदल पैदलोंसे भिड़कर परस्पर कुपित होते हुए भी एक-दूसरेको लाँधघकर आगे नहीं बढ़ पाते थे
रणांगणात एकमेकांजवळ येऊन, क्रोधाने पेटलेले असूनही ते विरोधकांना लांघून पुढे जाऊ शकत नव्हते. घोडेस्वार घोडेस्वारांशी आणि पायदळ पायदळाशी भिडत राहिले; दोन्ही बाजू ताठ उभ्या राहिल्या.
Verse 413
बभूव तत्र सैन्यानां शब्द: सुविपुलो निशि । उस रात्रिके समय दौड़ते, भागते और पुनः लौटते हुए सैनिकोंका महान् कोलाहल सुनायी पड़ता था
त्या रात्री तेथे सैन्यांचा अत्यंत प्रचंड शब्द उठला. धावणारे, पळणारे आणि पुन्हा परत येणारे सैनिक यांचा महान् कोलाहल ऐकू येत होता.
Verse 436
दिवसप्रतिमा राजन् बभूव रणमूर्थनि । भरतभूषण नरेश! प्रदीपोंसे प्रकाशित हुई वह रात्रि युद्धके मुहानेपर दिनके समान हो गयी थी
संजय म्हणाला—राजन्, रणभूमीच्या अग्रभागी ती रात्र दीपांच्या प्रकाशाने दिवसासारखी झाली. भरतभूषण नरेश, युद्धाच्या तोंडाशी अंधार नाहीसा झाला; जणू संग्रामच अखंड जागरूकता आणि कठोर निर्धार मागत होता.
Verse 443
तथा नष्ट तमो घोरें दीपैर्दीप्तैरितस्ततः । जैसे सूर्यके प्रकाशसे सम्पूर्ण जगत्में फैला हुआ अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार इधर-उधर जलती हुई मशालोंसे वहाँका भयानक अँधेरा नष्ट हो गया था
संजय म्हणाला—जसा सूर्यप्रकाशाने सर्व जगातील अंधार नष्ट होतो, तसाच इथे-तिथे पेटलेल्या मशालींनी तेथील भयंकर काळोख दूर झाला. युद्धाच्या भय व गोंधळात हा प्रकाश केवळ संरक्षणाचा उपाय नव्हे, तर विवेकाने संकटावर मिळवलेल्या विजयाचे प्रतीकही होता.
Verse 456
रजसा तमसा व्याप्ता द्योतिता: प्रभया पुन: । धूल और अन्धकारसे व्याप्त आकाश, पृथ्वी, दिशा और विदिशाएँ प्रदीपोंकी प्रभासे पुनः प्रकाशित हो उठी थीं
संजय म्हणाला—धूळ व अंधाराने व्यापलेले आकाश, पृथ्वी, दिशा व विदिशा पुन्हा दीपांच्या प्रभेने उजळून निघाले. संग्रामाच्या गोंधळातही कधी कधी स्पष्टता परत येते—हे दृश्य त्याचेच द्योतक होते.
Verse 473
न किंचिद् विदुरात्मानमयमस्मीति भारत । भारत! उस रात्रिके समय जब वह भयंकर कोलाहलपूर्ण संग्राम चल रहा था, तब योद्धाओंको कुछ भी पता नहीं चलता था। वे अपने-आपके विषयमें भी यह नहीं जान पाते थेकि “मैं अमुक हूँ
संजय म्हणाला—हे भारत, त्या रात्री भयंकर कोलाहलमय संग्राम सुरू असताना योद्ध्यांना काहीच स्पष्ट कळत नव्हते. गोंधळात ते स्वतःलाही ओळखू शकत नव्हते—“मी अमुक आहे” असेही नाही.
Verse 3736
अकम्पत महाराज भयत्रस्तेव चाड़ना | महाराज! दौड़ते हुए पैदल सैनिकोंके पैरोंकी धमकसे यह पृथ्वी भयभीत अबलाके समान काँपने लगी
संजय म्हणाला—महाराज, धावणाऱ्या पायदळांच्या पावलांच्या धडकेत पृथ्वी भयभीत अबलेसारखी थरथर कापू लागली. त्यांच्या पदाघाताच्या गर्जनेने पीडित भूमी कंप पावली, जणू भयाने तिला जखडले होते.
The dilemma is whether heroic persistence (continuing to fight) is ethically valid when a weapon’s injunction requires non-resistance for communal survival; Bhīma’s impulse to continue is checked by Kṛṣṇa’s insistence on protocol.
Power is bounded by rule: even in sanctioned conflict, restraint and procedural compliance can be the highest form of duty when escalation risks indiscriminate harm and compounded karmic consequence.
No explicit phalaśruti appears; the meta-commentary functions implicitly through the narrative logic that correct observance of astra-protocol restores order, whereas defiance amplifies danger and disorder.