भीष्मविक्रमदर्शनं तथा क्रौञ्चारुणव्यूहविधानम् | Bhīṣma’s Ascendancy and the Organization of the Krauñcāruṇa Formation
सम्पूर्ण धर्मोको अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको मुझमें त्यागकर* तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार परमेश्वरकी ही शरणमें आ जाः। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत करः ।। सम्बन्ध-- इस प्रकार भगवान् गीताके उपदेशका उपसंहार करके अब उस उपदेशके अध्यापन और अध्ययन आदिका माहात्म्य बतलानेके लिये पहले अनधिकारीके लक्षण बतलाकर उसे गीताका उपदेश युनानेका निषेध करते हैं-- इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां यो5भ्यसूयति,तुझे यह गीतारूप रहस्यमय उपदेश किसी भी कालमें न तो तपरहित मनुष्यसे कहना चाहिये, न भक्तिरहितसे और न बिना सुननेकी इच्छावालेसे ही कहना चाहिये तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहियरें
sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja | ahaṁ tvā sarva-pāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ || idaṁ te nātapaskāya nābhaktāya kadācana | na cāśuśrūṣave vācyaṁ na ca māṁ yo 'bhyasūyati ||
संपूर्ण धर्म म्हणजेच सर्व कर्तव्यकर्मे माझ्यात अर्पण करून, केवळ माझ्या—सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वराच्या—शरण ये. मी तुला सर्व पापांपासून मुक्त करीन; तू शोक करू नकोस. (संबंध—अशा प्रकारे भगवान् गीतेच्या उपदेशाचा उपसंहार करून, आता त्याच्या अध्यापन- अध्ययनादि माहात्म्य सांगण्यासाठी प्रथम अनधिकाऱ्याची लक्षणे सांगून निषेध करतात— “इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति।”)
अजुन उवाच
The core teaching is exclusive refuge in the Lord: relinquish competing claims of duty as independent saviors and surrender to God alone, trusting His promise to remove all sin and grant liberation; the teaching is to be shared only with qualified, receptive, devoted listeners.
At the close of the Gītā instruction on the battlefield, Kṛṣṇa summarizes the path of surrender and then adds a caution about teaching: this confidential doctrine should not be given to those lacking discipline, devotion, willingness to listen, or those who are hostile toward the Lord.