Marutta’s Sacrifice and Agni’s Embassy (मरुत्त-यज्ञे दूतत्वम्)
इन्द्र वाच सर्वान् कामाननुयातो<सि वित्र यस्त्वं देवानां मन्त्रवित्सुपुरोधा: । उभौ च ते जरामृत्यू व्यतीतौ कि संवर्तस्तव कर्ताद्य विप्र,इन्द्रने कहा--ब्रह्मन! सम्पूर्ण मनोवांछित भोग आपको प्राप्त हैं; क्योंकि आप देवताओंके मन्त्रज्ञ पुरोहित हैं। आपने जरा और मृत्यु दोनोंको जीत लिया है। फिर संवर्त आपका क्या कर सकते हैं?
indra uvāca—sarvān kāmān anuyāto ’si, vipra; yas tvaṃ devānāṃ mantravit supurodhāḥ | ubhau ca te jarāmṛtyū vyatītau; kiṃ saṃvartas tava kartādya, vipra ||
इंद्र म्हणाले— हे विप्र! तुला सर्व मनोवांछित भोग प्राप्त झाले आहेत; कारण तू देवांचा मंत्रज्ञ श्रेष्ठ पुरोहित आहेस. तू जरा आणि मृत्यू—दोन्हीही ओलांडले आहेत. मग आज संवर्त तुझे काय बिघडवू शकेल?
संवर्त उवाच