Adhyaya 49
Anushasana ParvaAdhyaya 4918 Verses

Adhyaya 49

Putra-Bheda: Kṣetraja, Kṛtaka, Apasada, and Saṃskāra Determinations (पुत्रभेद-निर्णयः)

Upa-parva: Putra-Dharma and Varṇa-Lineage Classifications (Paternity, Adoption, and Saṃskāra Norms)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to enumerate, distinctly, the kinds of sons spoken of in tradition and to resolve uncertainties produced by multiple doctrinal claims (1–2). Bhīṣma outlines recognized son-categories, beginning with the ‘self-born’ (ātmā/ātmāja) and proceeding through categories associated with subsequent birth, appointment (niyukta), and other socially recognized modes (3–5). Yudhiṣṭhira requests clarification of the ‘ṣaḍapadhvaṃsajāḥ’ and the apasada categories (6). Bhīṣma explains mixed-varṇa offspring classifications, indicating how many such categories are recognized relative to the father’s varṇa and listing named apasada types such as caṇḍāla, vrātya, veṇa, māgadha, vāmaka, and sūta in the described pairings (7–11). Yudhiṣṭhira then probes the equivalence or distinction between kṣetraja and retaja/śukraja sons and asks how abandonment or breach of agreement affects attribution (12–14). Bhīṣma replies that juridical paternity may attach to the ‘field-owner’ (kṣetrasvāmin) in cases of abandonment, and emphasizes the primacy of the ‘field’ criterion in certain contexts (15–17). The discussion turns to the kṛtaka (artificial/adopted) son, defined by social collection/recognition, especially a foundling whose parents are unknown (18–20). Bhīṣma states that a same-varṇa guardian who assumes ownership/care establishes a same-varṇa affiliation for the child (21). Finally, Yudhiṣṭhira asks about saṃskāra performance and marriageability (kanyā-dāna); Bhīṣma instructs that rites should be performed as for one’s own, aligned to the receiving group’s gotra/varṇa when a foundling joins a same-varṇa community, while maternal gotra/varṇa considerations govern certain determinations; he notes kānīna and adhyūḍha as ‘putra-kilbiṣa’ yet still to be ritually treated as sons, and generalizes that Brahmins and others should apply saṃskāra norms accordingly; he closes by citing Dharmaśāstra consensus (22–28).

Chapter Arc: शरशय्या पर लेटे भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि प्राचीन आचार्यों ने एक सनातन नीति गाई है—कन्याओं और स्त्रियों का वस्त्र-भूषणों से सत्कार केवल शिष्टाचार नहीं, राज्य-धर्म और कुल-कल्याण की जड़ है। → भीष्म तर्क को कठोर यथार्थ से जोड़ते हैं: यदि स्त्री की रुचि और सम्मान की पूर्ति न हो तो वह पति को प्रसन्न नहीं कर सकती; और जहाँ प्रसन्नता नहीं, वहाँ संतान-वृद्धि, गृह-स्थिरता और लोक-यात्रा डगमगा जाती है। वे पिता, भाई, श्वशुर और देवर—सबको ‘बहुकल्याण’ की इच्छा रखने वाला मानकर स्त्री-पूजा का दायित्व सौंपते हैं। → नीति का शिखर-वाक्य बनकर उभरता है—‘जहाँ स्त्रियाँ अपूजित हों, वहाँ सब क्रियाएँ निष्फल हैं’; और जहाँ उनका आदर है, वहाँ देवता प्रसन्न होकर निवास करते हैं। स्त्री-सम्मान को धर्म की कसौटी और कर्मफल की शर्त के रूप में स्थापित कर भीष्म अध्याय का निर्णायक विधान देते हैं। → भीष्म स्त्री-आश्रित गृहधर्म के तीन स्तम्भ स्पष्ट करते हैं—संतानोत्पत्ति, उत्पन्न संतान का पालन, और लोक-यात्रा का प्रीतिपूर्वक निर्वाह; साथ ही यह भी कि सम्मानित स्त्रियाँ समस्त कार्यों की सिद्धि कराती हैं। नीति ‘उपदेश’ से ‘आचरण’ की ओर मुड़ती है: सत्कार, परिचर्या, नमस्कार, और आवश्यक दान—ये घर-राज्य की समृद्धि के साधन हैं। → युधिष्ठिर के लिए संकेत छोड़ दिया जाता है कि यह उपदेश केवल गृह-नीति नहीं—राजा के शासन-धर्म में स्त्री-सुरक्षा/सम्मान की परीक्षा भी है; आगे के अध्यायों में इसी व्यापक धर्म-व्यवस्था का विस्तार होगा।

Shlokas

Verse 1

अपन क्रा छा अं क्ााज षट्चत्वारिशो5 ध्याय: स्त्रियोंके वस्त्रा भूषणोंसे सत्कार करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन भीष्म उवाच प्राचेतसस्य वचन कीर्तयन्ति पुराविद: । यस्या: किंचिन्नाददते ज्ञातयो न स विक्रय:,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! प्राचीन इतिहासके जाननेवाले विद्वान्‌ दक्षप्रजापतिके वचनोंको इस प्रकार उद्धृत करते हैं। कन्याके भाई-बन्धु यदि उसके वस्त्र-आभूषणके लिये धन ग्रहण करते हैं और स्वयं उसमेंसे कुछ भी नहीं लेते हैं तो वह कन्याका विक्रय नहीं है। वह तो उन कनन्‍्याओंका सत्कारमात्र है। वह परम दयालुतापूर्ण कार्य है। वह सारा धन जो कन्याके लिये ही प्राप्त हुआ हो, सब-का-सब कन्याको ही अर्पित कर देना चाहिये

भीष्म म्हणाले—हे युधिष्ठिर! प्राचीन परंपरांचे जाणकार विद्वान् प्रचेतस (दक्ष प्रजापती) यांचे वचन असे सांगतात. कन्येच्या वस्त्र-आभूषणांसाठी तिचे आप्त धन स्वीकारतात, पण त्यातून स्वतःसाठी काहीही घेत नाहीत, तर तो कन्येचा ‘विक्रय’ नव्हे. तो केवळ कन्येचा सत्कार—करुणेवर आधारलेले पुण्यकर्म; आणि कन्येच्या नावाने जे काही मिळते, ते सर्वच्या सर्व, अवशेष न ठेवता, तिलाच अर्पण करावे.

Verse 2

अर्हणं तत्कुमारीणामानृशंस्यतमं च तत्‌ । सर्व च प्रतिदेयं स्थात्‌ कन्‍्यायै तदशेषत:,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! प्राचीन इतिहासके जाननेवाले विद्वान्‌ दक्षप्रजापतिके वचनोंको इस प्रकार उद्धृत करते हैं। कन्याके भाई-बन्धु यदि उसके वस्त्र-आभूषणके लिये धन ग्रहण करते हैं और स्वयं उसमेंसे कुछ भी नहीं लेते हैं तो वह कन्याका विक्रय नहीं है। वह तो उन कनन्‍्याओंका सत्कारमात्र है। वह परम दयालुतापूर्ण कार्य है। वह सारा धन जो कन्याके लिये ही प्राप्त हुआ हो, सब-का-सब कन्याको ही अर्पित कर देना चाहिये

भीष्म म्हणाले—हे कन्यांसाठी योग्य असा सन्मान आहे आणि हाच सर्वाधिक करुणामय मार्ग आहे. आणि जे काही प्राप्त होईल, ते सर्व अवशेष न ठेवता कन्येलाच परत द्यावे.

Verse 3

पितृभिभ्भ्रातृभिश्चापि श्वशुरैरथ देवरै: । पूज्या भूषयितव्याश्न॒ बहुकल्याणमीप्सुभि:,बहुविध कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पिता, भाई, श्वशुर और देवरोंको उचित है कि वे नववधूका पूजन--वस्त्राभूषणोंद्वारा सत्कार करें

अनेक प्रकारचे कल्याण इच्छिणारे पिता, भाऊ, सासरे आणि दीर यांनी नववधूचे पूजन करावे व वस्त्र-आभूषणांनी तिचा सत्कार करावा.

Verse 4

यदि वै स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोदयेत्‌ । अप्रमोदात्‌ पुन: पुंस: प्रजनो न प्रवर्धते

भीष्म म्हणाले—जर स्त्रीला पुरुष रुचला नाही आणि ती त्याला आनंदित करू शकली नाही, तर त्या परस्पर-अनानंदामुळे पुरुषाची संतती वाढत नाही.

Verse 5

स्त्रियों यत्र च पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

भीष्म म्हणाले—जिथे स्त्रियांचा पूजन-सन्मान होतो, तिथे देवता आनंदाने वास करतात.

Verse 6

तदा चैतत्‌ कुलं नास्ति यदा शोचन्ति जामय:,जब कुलकी बहू-बेटियाँ दुःख मिलनेके कारण शोकमग्न होती हैं तब उस कुलका नाश हो जाता है। वे खिन्न होकर जिन घरोंको शाप दे देती हैं, वे कृत्याके द्वारा नष्ट हुए के समान उजाड़ हो जाते हैं। पृथ्वीनाथ! वे श्रीहीन गृह न तो शोभा पाते हैं और न उनकी वृद्धि ही होती है

Bhīṣma said: “Then that lineage is as good as lost—when its womenfolk are left to grieve. When the daughters-in-law and daughters of a family are overwhelmed by sorrow due to suffering and neglect, the clan’s foundations collapse. And the households they curse in their anguish become desolate, as though destroyed by their own deeds. O lord of the earth, such homes, bereft of prosperity and auspiciousness, neither shine with dignity nor attain growth.”

Verse 7

जामीश पप्तानि गेहानि निकृत्तानीव कृत्यया । नैव भान्ति न वर्धन्ते श्रिया हीनानि पार्थिव,जब कुलकी बहू-बेटियाँ दुःख मिलनेके कारण शोकमग्न होती हैं तब उस कुलका नाश हो जाता है। वे खिन्न होकर जिन घरोंको शाप दे देती हैं, वे कृत्याके द्वारा नष्ट हुए के समान उजाड़ हो जाते हैं। पृथ्वीनाथ! वे श्रीहीन गृह न तो शोभा पाते हैं और न उनकी वृद्धि ही होती है

Bhishma said: When the women of a family—its daughters and daughters-in-law—are driven into grief by suffering, that lineage moves toward ruin. The houses they, in their dejection, curse become desolate, as though cut down by a malignant rite. O king, homes bereft of prosperity neither shine with dignity nor grow in strength.

Verse 8

स्त्रिय: पुंसां परिददे मनुर्जिगमिषुर्दिवम्‌ । अबला: स्वल्पकौपीना: सुहृद: सत्यजिष्णव:,महाराज मनु जब स्वर्गको जाने लगे तब उन्होंने स्त्रियोंको पुरुषोंके हाथमें सौंप दिया और कहा--'मनुष्यो! स्त्रियाँ अबला, थोड़ेसे वस्त्रोंस काम चलानेवाली, अकारण हितसाधन करनेवाली, सत्यलोकको जीतनेकी इच्छावाली (सत्यपरायणा), ईर्ष्यालु, मान चाहनेवाली, अत्यन्त कोप करनेवाली, पुरुषके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाली और भोली-भाली होती हैं। स्त्रियाँ सम्मान पानेके योग्य हैं, अतः तुम सब लोग उनका सम्मान करो; क्योंकि सत्री-जाति ही धर्मकी सिद्धिका मूल कारण है। तुम्हारे रतिभोग, परिचर्या और नमस्कार स्त्रियोंक ही अधीन होंगे

Bhishma said: “When Manu was about to depart for heaven, he entrusted women to the care of men. He declared that women are physically vulnerable, live with little, are naturally well-wishing, and are intent on conquering the world of truth (i.e., devoted to truth). Therefore, they are worthy of honor. Men should respect and protect women, for the welfare of society and the fulfillment of dharma depend upon them.”

Verse 9

ईर्षवो मानकामाश्च चण्डाश्न सुहृदो5बुधा: । स्त्रियस्तु मानमर्हन्ति ता मानयत मानवा:,महाराज मनु जब स्वर्गको जाने लगे तब उन्होंने स्त्रियोंको पुरुषोंके हाथमें सौंप दिया और कहा--'मनुष्यो! स्त्रियाँ अबला, थोड़ेसे वस्त्रोंस काम चलानेवाली, अकारण हितसाधन करनेवाली, सत्यलोकको जीतनेकी इच्छावाली (सत्यपरायणा), ईर्ष्यालु, मान चाहनेवाली, अत्यन्त कोप करनेवाली, पुरुषके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाली और भोली-भाली होती हैं। स्त्रियाँ सम्मान पानेके योग्य हैं, अतः तुम सब लोग उनका सम्मान करो; क्योंकि सत्री-जाति ही धर्मकी सिद्धिका मूल कारण है। तुम्हारे रतिभोग, परिचर्या और नमस्कार स्त्रियोंक ही अधीन होंगे

Bhishma said: “Women may be jealous, desirous of honor, quick to anger, affectionate as friends, and often simple-hearted. Yet women are worthy of respect. Therefore, O men, honor them.” In this ethical instruction, Bhishma emphasizes that despite human faults and emotional volatility, women deserve dignity and reverence; honoring them is presented as a support for dharma and social well-being.

Verse 10

स्त्रीप्रत्ययो हि वै धर्मो रतिभोगाश्ष केवला: । परिचर्या नमस्कारास्तदायत्ता भवन्तु व:,महाराज मनु जब स्वर्गको जाने लगे तब उन्होंने स्त्रियोंको पुरुषोंके हाथमें सौंप दिया और कहा--'मनुष्यो! स्त्रियाँ अबला, थोड़ेसे वस्त्रोंस काम चलानेवाली, अकारण हितसाधन करनेवाली, सत्यलोकको जीतनेकी इच्छावाली (सत्यपरायणा), ईर्ष्यालु, मान चाहनेवाली, अत्यन्त कोप करनेवाली, पुरुषके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाली और भोली-भाली होती हैं। स्त्रियाँ सम्मान पानेके योग्य हैं, अतः तुम सब लोग उनका सम्मान करो; क्योंकि सत्री-जाति ही धर्मकी सिद्धिका मूल कारण है। तुम्हारे रतिभोग, परिचर्या और नमस्कार स्त्रियोंक ही अधीन होंगे

Bhishma said: “Indeed, dharma rests upon women as its foundation. Your pleasures of love, your service, and your acts of reverence all depend upon them, O great king. Therefore let these—enjoyment, attendance, and respectful salutations—be directed with awareness of their dependence on women, and let women be honored as essential to the fulfillment of righteous life.”

Verse 11

उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम्‌ | प्रीत्यर्थ लोकयात्राया: पश्यत स्त्रीनिबन्धनम्‌

भीष्म म्हणाले—लोकजीवनातील स्त्रियांचे बंधन पाहा: अपत्याची उत्पत्ती, जन्मलेल्या बालकाचे पालन-पोषण व संरक्षण, आणि प्रेम व लोकपरंपरेच्या सातत्यासाठी गृहस्थ-यात्रेचा निर्वाह।

Verse 12

विदेहराजदुहिता चात्र श्लोकमगायत,(स्त्रियोंके कर्तव्यके विषयमें) विदेहग़ाज जनककी पुत्रीने एक श्लोकका गान किया है, जिसका सारांश इस प्रकार है--स्त्रीके लिये कोई यज्ञ आदि कर्म, श्राद्ध और उपवास करना आवश्यक नहीं है। उसका धर्म है अपने पतिकी सेवा। उसीसे स्त्रियाँ सस्‍्वर्गलोकपर विजय पा लेती हैं

भीष्म म्हणाले—येथे विदेहराजाची कन्या स्त्रियांच्या कर्तव्याविषयी एक श्लोक गात होती. जनकाची कन्या सारांशाने म्हणाली—स्त्रीसाठी यज्ञादि कर्म, श्राद्ध किंवा उपवास अनिवार्य नाहीत; तिचा धर्म म्हणजे पतीची सेवा. त्याच भक्तीने स्त्रिया स्वर्गावर विजय मिळवितात.

Verse 13

नास्ति यज्ञक्रिया काचिन्न श्राद्धं नोपवासकम्‌ | धर्म: स्वभर्तशुश्रूषा तया स्वर्ग जयन्त्युत,(स्त्रियोंके कर्तव्यके विषयमें) विदेहग़ाज जनककी पुत्रीने एक श्लोकका गान किया है, जिसका सारांश इस प्रकार है--स्त्रीके लिये कोई यज्ञ आदि कर्म, श्राद्ध और उपवास करना आवश्यक नहीं है। उसका धर्म है अपने पतिकी सेवा। उसीसे स्त्रियाँ सस्‍्वर्गलोकपर विजय पा लेती हैं

भीष्म म्हणाले—स्त्रीसाठी कोणतेही यज्ञकर्म, श्राद्ध किंवा उपवास अनिवार्य नाही. तिचा धर्म म्हणजे आपल्या पतीची सेवा; त्याच्याच बळावर स्त्रिया निश्चयाने स्वर्ग प्राप्त करतात.

Verse 14

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने । पुत्राश्न॒ स्थाविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्रयमहति,कुमारावस्थामें स्त्रीकी रक्षा उसका पिता करता है, जवानीमें पति उसका रक्षक है और वृद्धावस्थामें पुत्रणजण उसकी रक्षा करते हैं। अतः स्त्रीको कभी स्वतन्त्र नहीं करना चाहिये

भीष्म म्हणाले—कौमार्यात पिता स्त्रीचे रक्षण करतो, यौवनात पती रक्षण करतो, आणि वार्धक्यात पुत्र रक्षण करतात; म्हणून स्त्रीला स्वातंत्र्य योग्य मानलेले नाही.

Verse 15

श्रिय एता: स्त्रियो नाम सत्कार्या भूतिमिच्छता । पालिता निगृहीता च श्री: स्त्री भवति भारत

भीष्म म्हणाले—स्त्रिया जणू श्रीस्वरूप आहेत; म्हणून जो कल्याण व समृद्धी इच्छितो त्याने त्यांचा सत्कार करावा. हे भारत! त्या रक्षित असतील आणि धर्ममर्यादेत यथोचित संयमितही असतील, तर स्त्रीद्वारेच घरात श्री वास करते.

Verse 46

पूज्या लालयितव्याश्ष स्त्रियो नित्यं जनाधिप । नरेश्वर! यदि स्त्रीकी रुचि पूर्ण न की जाय तो वह अपने पतिको प्रसन्न नहीं कर सकती और उस अवस्थामें उस पुरुषकी संतानवृद्धि नहीं हो सकती। इसलिये सदा ही स्त्रियोंका सत्कार और दुलार करना चाहिये,भरतनन्दन! स्त्रियाँ ही घरकी लक्ष्मी होती हैं। उन्नति चाहनेवाले पुरुषको उनका भलीभाँति सत्कार करना चाहिये। अपने वशमें रखकर उनका पालन करनेसे स्त्री श्री (लक्ष्मी)-का स्वरूप बन जाती है ।। इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मे स्त्रीप्रशंसा नाम षट्चत्वारिंशो5ध्याय:

भीष्म म्हणाले—हे जनाधिप! स्त्रिया सदैव पूज्य आहेत आणि स्नेहाने लाड करण्यास योग्य आहेत. नरेश्वर! स्त्रीची रुची व इच्छा पूर्ण केली नाही तर ती पतीवर प्रसन्न राहू शकत नाही; आणि अशा अवस्थेत त्या पुरुषाची संततीवृद्धीही होत नाही. म्हणून, हे भरतनंदन! स्त्रियांचा नेहमी सत्कार व मृदु स्नेह करावा. स्त्रियाच घराची लक्ष्मी आहेत. जो पुरुष उन्नती इच्छितो त्याने त्यांचा यथोचित मान राखावा; घरच्या मर्यादेत ठेवून त्यांचे पालन-पोषण व संरक्षण केल्यास स्त्रीच श्री (लक्ष्मी)चे स्वरूप बनते.

Verse 56

अपूजिताश्च यत्रैता: सर्वास्तित्राफला: क्रिया: । जहाँ स्त्रियोंका आदर-सत्कार होता है वहाँ देवतालोग प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं तथा जहाँ इनका अनादर होता है वहाँकी सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं

जिथे स्त्रिया अपूजित राहतात तिथली सर्व कर्मे निष्फळ होतात. जिथे त्यांचा आदर-सत्कार होतो तिथे देव प्रसन्न होऊन निवास करतात; आणि जिथे त्यांचा अनादर होतो तिथे यज्ञ, धर्म, कर्तव्य व सर्व प्रयत्न निष्फळ ठरतात.

Verse 113

सम्मान्यमानाश्ैता हि सर्वकार्याण्यवाप्स्यथ । 'संतानकी उत्पत्ति, उत्पन्न हुए बालकका लालन-पालन तथा लोकयात्राका प्रसन्नतापूर्वक निर्वाह--इन सबको स्त्रियोंक ही अधीन समझो। यदि तुमलोग स्त्रियोंका सम्मान करोगे तो तुम्हारे सब कार्य सिद्ध होंगे”

भीष्म म्हणाले—तुम्ही या स्त्रियांचा सन्मान केलात तर तुमची सर्व कामे सिद्ध होतील. संततीची उत्पत्ती, जन्मलेल्या बालकाचे पालन-पोषण व संरक्षण, तसेच घर-संसार व समाजजीवनाचा प्रसन्नतेने निर्वाह—हे सर्व स्त्रियांच्या अधीन आहे असे जाणावे. म्हणून, स्त्रियांना यथोचित मान दिल्यास तुमचे सर्व प्रयोजन पूर्ण होतील.

Frequently Asked Questions

How dharma discourse distinguishes types of sons—by birth, appointment, abandonment, adoption/foundling recognition—and how these distinctions regulate lineage attribution and social-ritual standing.

If a child of unknown parentage is accepted and maintained by a same-varṇa household/community, saṃskāra is to be performed as for one’s own, aligned to the receiving group’s gotra/varṇa rules as stated in the chapter.

No explicit phalaśruti appears here; instead, the closure functions as a normative seal by appealing to Dharmaśāstra visibility/consensus (dharmashāstreṣu… niścayaḥ), indicating the chapter’s role as procedural clarification.