Adhyaya 13
Anushasana ParvaAdhyaya 138 Verses

Adhyaya 13

Daśa-Karmapatha: Restraints of Body, Speech, and Mind (दश कर्मपथ)

Upa-parva: Daśa-Karmapatha (Ten Paths of Action) Instructional Unit

Yudhiṣṭhira queries what conduct sustains “lokayātrā” (the orderly continuance of communal life) and what character traits a person should cultivate. Bhīṣma responds with a structured ethical schema: three bodily transgressions to avoid (prāṇātipāta/causing death or injury, stainya/theft, paradāra/sexual misconduct involving another’s partner), four verbal transgressions to avoid (asatpralāpa/frivolous or harmful talk, pāruṣya/harsh speech, paiśunya/slanderous tale-bearing, anṛta/falsehood), and three mental disciplines to practice (anabhidhyā/non-covetousness toward others’ goods, sarvasattveṣu sauhṛdam/benevolence toward all beings, karmaṇāṃ phalam asti/affirmation of moral causality and accountability). The chapter closes by generalizing the principle: one should not enact the inauspicious through body, speech, or mind, because actions—wholesome and unwholesome—yield corresponding results. The discourse is programmatic and normative, presenting ethics as an integrated triad of outward behavior and inward intention.

Chapter Arc: शरशय्या पर लेटे भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि धर्म का आरम्भ किसी बड़े अनुष्ठान से नहीं, बल्कि देह-वाणी-मन के सूक्ष्म संयम से होता है—और वही मनुष्य के भाग्य का त्वरित निर्माता है। → भीष्म ‘दशकर्मपथ’ का विधान खोलते हैं: शरीर के तीन पाप (प्राणातिपात, स्तैन्य, परदारगमन), वाणी के चार दोष (असत्प्रलाप, पारुष्य, पैशुन्य, अनृत), और मन के तीन शुद्ध आचरण (अनभिध्या, सर्वसत्त्वेषु सौहृद, कर्मफल-श्रद्धा)। युधिष्ठिर के लिए चुनौती यह है कि राजधर्म के भारी निर्णयों के बीच यह आन्तरिक शुचिता कैसे अक्षुण्ण रहे। → भीष्म का निर्णायक वचन—‘वाक्-काय-मन से अशुभ न करे; क्योंकि शुभाशुभ कर्म का फल उसी को शीघ्र प्राप्त होता है’—अध्याय का शिखर बनता है, जहाँ नीति उपदेश नहीं, कर्म-फल की अनिवार्य न्याय-व्यवस्था के रूप में चमकता है। → अध्याय एक स्पष्ट नैतिक मानचित्र देकर समाप्त होता है: बाह्य आचरण (देह), सामाजिक प्रभाव (वाणी), और अन्तःप्रेरणा (मन)—तीनों की शुद्धि ही दान-धर्म और राजधर्म की भूमि तैयार करती है। → अगले प्रसंग की भूमिका बनती है—ब्रह्मा द्वारा देवताओं को गरुड-कश्यप-संवाद का संदर्भ, और गरुड का ऋषि-समाज में नारायण-महिमा पर अपना अनुभव—जिससे उपदेश कथा-रूप में और गहराने वाला है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २६ श्लोक मिलाकर कुल ८० श्लोक हैं) ऑपनआक्रात बा अर: 2 त्रयोदशो< ध्याय: शरीर, वाणी और मनसे होनेवाले पापोंके परित्यागका उपदेश युधिछिर उवाच कि कर्तव्यं मनुष्येण लोकयात्राहितार्थिना । कथं वै लोकयात्रां तु किंशीलश्ष समाचरेत्‌,युधिष्ठिरे पूछा--पितामह! लोकयात्राका भली-भाँति निर्वाह करनेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको क्या करना चाहिये? कैसा स्वभाव बनाकर किस प्रकार लोकमें जीवन बिताना चाहिये?

युधिष्ठिर म्हणाला—पितामह! लोकयात्रेचे हित इच्छिणाऱ्या मनुष्याने काय करावे? कोणता स्वभाव धारण करून आणि कोणत्या आचरणाने जगात जीवन व्यतीत करावे?

Verse 2

भीष्म उवाच कायेन त्रिविधं कर्म वाचा चापि चतुर्विधम्‌ | मनसा त्रिविधं चैव दशकर्मपथांस्त्यजेत्‌,भीष्मजीने कहा--राजन्‌! शरीरसे तीन प्रकारके कर्म, वाणीसे चार प्रकारके कर्म और मनसे भी तीन प्रकारके कर्म--इस तरह कुल दस तरहके कर्मोंका त्याग कर दे

भीष्म म्हणाले—राजन्! शरीराने होणारी तीन प्रकारची कर्मे, वाणीने होणारी चार प्रकारची कर्मे आणि मनाने होणारी तीन प्रकारची कर्मे—अशी ही दहा कर्मपथे त्यागावीत.

Verse 3

प्राणातिपात: स्तैन्यं च परदारानथापि च । त्रीणि पापानि कायेन सर्वतः परिवर्जयेत्‌,दूसरोंके प्राणनाश करना, चोरी करना और परायी स्त्रीसे संसर्ग रखना--ये तीन शरीरसे होनेवाले पाप हैं। इन सबका परित्याग कर देना उचित है

दुसऱ्याचा प्राणघात करणे, चोरी करणे आणि परस्त्रीगमन—ही तीन देहाने होणारी पापे आहेत. यांचा सर्वथा त्याग करावा.

Verse 4

असप्प्रलापं पारुष्यं पैशुन्यमनृतं तथा । चत्वारि वाचा राजेन्द्र न जल्पेन्नानुचिन्तयेत्‌,मुँहसे बुरी बातें निकालना, कठोर बोलना, चुगली खाना और झूठ बोलना--ये चार वाणीसे होनेवाले पाप हैं। राजेन्द्र! इन्हें न तो कभी जबानपर लाना चाहिये और न मनमें ही सोचना चाहिये

असत्य व बडबड करणे, कठोर बोलणे, चुगली करणे आणि खोटे बोलणे—ही चार वाणीची पापे आहेत. राजेंद्र! ही ना बोलावीत, ना मनातही धरावीत.

Verse 5

अनभिध्या परस्वेषु सर्वसत्त्वेषु सौहदम्‌ । कर्मणां फलमस्तीति त्रिविधं मनसा चरेत्‌,दूसरेके धनको लेनेका उपाय न सोचना, समस्त प्राणियोंके प्रति मैत्रीभाव रखना और कर्मोंका फल अवश्य मिलता है, इस बातपर विश्वास रखना--ये तीन मनसे आचरण करने योग्य कार्य हैं। इन्हें सदा करना चाहिये। (इनके विपरीत दूसरोंके धनका लालच करना, समस्त प्राणियोंसे वैर रखना और कर्मोके फलपर विश्वास न करना--ये तीन मानसिक पाप हैं--इनसे सदा बचे रहना चाहिये)

परधनाचा लोभ न धरणे, सर्व प्राणिमात्रांशी सौहार्द ठेवणे आणि कर्माचे फळ नक्की मिळते असा विश्वास ठेवणे—हे तीन मनाने आचरावयाचे धर्म आहेत; ते सदैव करावेत.

Verse 6

तस्माद्‌ वाक्कायमनसा नाचरेदशुभं नर: । शुभाशुभान्याचरन्‌ हि तस्य तस्याश्षुते फलम्‌,इसलिये मनुष्यका कर्तव्य है कि वह मन, वाणी या शरीरसे कभी अशुभ कर्म न करे; क्योंकि वह शुभ या अशुभ जैसा कर्म करता है; उसका वैसा ही फल उसे भोगना पड़ता है

म्हणून मनुष्याने मन, वाणी व देह यांद्वारे कधीही अशुभ कर्म करू नये; कारण तो जसा शुभ वा अशुभ कर्म करतो, तसाच त्याचा फल भोगतो.

Verse 12

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें भज़ास्वनका उपाख्यानविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ

अशा प्रकारे श्रीमहाभारताच्या अनुशासनपर्वातील दानधर्मपर्वात भजास्वन-उपाख्यानाचा बारावा अध्याय समाप्त झाला.

Verse 13

[ब्रहद्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडहजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा] अमृतस्य समुत्पत्तौ देवानामसुरै: सह । षष्टिवर्षसहस््राणि देवासुरमवर्तत ।। एक समय अमृतकी उत्पत्ति हो जानेपर उसकी प्राप्तिके लिये देवताओंका असुरोंके साथ साठ हजार वर्षोतक युद्ध हुआ, जो देवासुर-संग्रामके नामसे प्रसिद्ध है ।। तत्र देवास्तु दैतेयैर्वध्यन्ते भूशदारुणै: । त्रातारं नाधिगच्छन्ति वध्यमाना महासुरै: ।। उस युद्धमें अत्यन्त भयंकर दैत्यों एवं बड़े-बड़े असुरोंकी मार खाकर देवता किसी रक्षकको नहीं पाते थे ।। आततस्ते देवदेवेशं प्रपन्ना: शरणैषिण: । पितामहं महाप्राज्ञं वध्यमाना: सुरेतरै: ।। दैत्योंद्वारा सताये जानेवाले देवता दुःखी होकर अपने लिये आश्रय ढूँढ़ते हुए देवदेवेश्वर महाज्ञानी ब्रह्माजीकी शरणमें गये ।। वैकुण्ठं शरण देवं॑ प्रतिपेदे च तैः सह ।। तब ब्रह्माजी उन सबके साथ भगवान्‌ विष्णुकी शरणमें गये ।। ततः स देवै: सहित: पद्मयोनिनरिश्वर । तुष्टाव प्राउ्जलि भूत्वा नारायणमनामयम्‌ ।। नरेश्वर! तदनन्तर देवताओंसहित कमलयोनि ब्रह्माजी हाथ जोड़कर रोग-शोकसे रहित भगवान्‌ नारायणकी स्तुति करने लगे ।। ब्रह्मोवाच त्वद्रूपचिन्तनाजन्नाम्नां स्मरणादर्चनादपि । तपोयोगादिभिश्लैव श्रेयो यान्ति मनीषिण: ।। ब्रह्माजी बोले--प्रभो! आपके रूपका चिन्तन करनेसे, नामोंके स्मरण और जपसे, पूजनसे तथा तप और योग आदिसे मनीषी पुरुष कल्याणको प्राप्त होते हैं ।। भक्तवत्सल पद्माक्ष परमेश्वर पापहन्‌ । परमात्माविकाराद्य नारायण नमोउस्तु ते ।। भक्तवत्सल! कमलनयन! परमेश्वर! पापहारी परमात्मन! निर्विकार! आदिपुरुष! नारायण! आपको नमस्कार है ।। नमस्ते सर्वलोकादे सर्वात्मामितविक्रम । सर्वभूतभविष्येश सर्वभूतमहेश्वर ।। सम्पूर्ण लोकोंके आदिकारण! सर्वात्मन्‌! अमित पराक्रमी नारायण! सम्पूर्ण भूत और भविष्यके स्वामी! सर्वभूतमहेश्वर! आपको नमस्कार है ।। देवानामपि देवस्त्वं सर्वविद्यापरायण: । जगद्वीजसमाहार जगत: परमो हासि ।। प्रभो! आप देवताओंके भी देवता और समस्त विद्याओंके परम आश्रय हैं। जगत्‌के जितने भी बीज हैं, उन सबका संग्रह करनेवाले आप ही हैं। आप ही जगत्‌के परम कारण हैं।। त्रायस्व देवता वीर दानवाद्यै: सुपीडिता: । लोकांक्ष लोकपालांश्व ऋषीं श्र जयतां वर ।। वीर! ये देवता दानव, दैत्य आदिसे अत्यन्त पीड़ित हो रहे हैं। आप इनकी रक्षा कीजिये। विजयशीलोंमें सबसे श्रेष्ठ नारायणदेव! आप लोकों, लोकपालों तथा ऋषियोंका संरक्षण कीजिये ।। वेदा: साज्रोपनिषद: सरहस्या: ससंग्रहा: । सोड्कारा: सवषट्काराः प्राहुस्त्वां यज्ञमुत्तमम्‌ ।। सम्पूर्ण अंगों और उपनिषदोंसहित वेद, उनके रहस्य, संग्रह, 3>कार और वषट्कार आपहीको उत्तम यज्ञका स्वरूप बताते हैं ।। पवित्राणां पवित्र च मड़लानां च मज्जलम्‌ | तपस्खिनां तपश्चैव दैवतं देवतास्वपि ।। आप पवित्रोंके भी पवित्र, मंगलोंके भी मंगल, तपस्वियोंके तप और देवताओंके भी देवता हैं ।। भीष्म उवाच एवमादिपुरस्कारै#क्सामयजुषां गणै: । वैकुण्ठं तुष्ठवुर्देवा: समेत्य ब्रह्मणा सह ।। भीष्मजी कहते हैं--राजन! इस प्रकार ब्रह्मासहित देवताओंने एकत्र होकर ऋक, साम और यजुर्वेदके मन्त्रोंद्वारा भगवान्‌ विष्णुकी स्तुति की ।। ततोअन्‍्तरिक्षे वागासीन्मेघगम्भीरनि:स्वना । जेष्यध्वं दानवान्‌ यूयं मयैव सह सड़रे ।। तब मेघके समान गम्भीर स्वरमें आकाशवाणी हुई--“देवताओ! तुम युद्धमें मेरे साथ रहकर दानवोंको अवश्य जीत लोगे” ।। ततो देवगणानां च दानवानां च युध्यताम्‌ । प्रादुरासीन्महातेजा: शडखचक्रगदाधर: ।। तत्पश्चात्‌ परस्पर युद्ध करनेवाले देवताओं और दानवोंके बीच शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले महातेजस्वी भगवान्‌ विष्णु प्रकट हुए ।। सुपर्णपृष्ठमास्थाय तेजसा प्रदहन्निव । व्यधमद्‌ दानवान्‌ सर्वान्‌ बाहुद्रविणतेजसा ।। उन्होंने ग़रडकी पीठपर बैठकर तेजसे विरोधियोंको दग्ध करते हुए-से अपनी भुजाओंके तेज और वैभवसे समस्त दानवोंका संहार कर डाला ।। त॑ समासाद्य समरे दैत्यदानवपुड्भवा: । व्यनश्यन्त महाराज पतज्रा इव पावकम्‌ ।। महाराज! समरभूमिमें दैत्यों और दानवोंके प्रमुख वीर भगवान्से टक्कर लेकर वैसे ही नष्ट हो गये, जैसे पतंगे आगमें कूदकर अपने प्राण दे देते हैं ।। स विजित्यासुरान्‌ सर्वान्‌ दानवांश्व महामतिः । पश्यतामेव देवानां तत्रैवान्तरधीयत ।। परम बुद्धिमान्‌ श्रीहरि समस्त असुरों और दानवोंको परास्त करके देवताओंके देखते- देखते वहीं अन्तर्धान हो गये ।। त॑ दृष्टवान्तह्तितं देवं विष्णुं देवामितद्युतिम्‌ । विस्मयोत्फुल्लनयना ब्रह्माणमिदमन्रुवन्‌ ।। अनन्त तेजस्वी श्रीविष्णुदेवको अदृश्य हुआ देख आश्वर्यसे चकित नेत्रवाले देवता ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले-- ।। देवा ऊचु: भगवन्‌ सर्वलोकेश सर्वलोकपितामह । इदमत्यदभुतं वृत्तं त्वं न: शंसितुमर्हसि ।। देवताओंने पूछा--सर्वलोकेश्वर! सम्पूर्ण जगत्‌के पितामह! भगवन्‌! यह अत्यन्त अदभुत वृत्तान्त हमें बतानेकी कृपा करें ।। को<5यमस्मान्‌ परित्राय तूष्णीमेव यथागतम्‌ । प्रतिप्रयातो दिव्यात्मा तं॑ नः शंसितुमरहसि ।। कौन दिव्यात्मा पुरुष हमारी रक्षा करके चुपचाप जैसे आया था; वैसे लौट गया? यह हमें बतानेकी कृपा करें ।। भीष्म उवाच एवमुक्तः सुरै: सर्वैर्वचनं वचनार्थवित्‌ । उवाच पद्मनाभस्य पूर्वरूप॑ प्रति प्रभो ।। भीष्मजी कहते हैं--प्रभो! सम्पूर्ण देवताओंके ऐसा कहनेपर वचनके तात्पर्यको समझानेवाले ब्रह्माजीने भगवान्‌ पद्मनाभ (विष्णु)-के पूर्वरूपके विषयमें इस प्रकार कहा -- || ब्रह्मोवाच न होनं वेद तत्त्वेन भुवनं भुवनेश्वरम्‌ । संख्यातुं नैव चात्मान॑ निर्गुणं गुणिनां वरम्‌ ।। ब्रह्माजी बोले--देवताओ! ये भगवान्‌ सम्पूर्ण भुवनोंके अधीश्चर हैं। इन्हें जगत्‌का कोई भी प्राणी यथार्थरूपसे नहीं जानता। गुणवानोंमें श्रेष्ठ निर्गुण परमात्माकी महिमाका कोई पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकता ।। अत्र वो वर्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम्‌ । सुपर्णस्य च संवादमृषीणां चापि देवता: ।। देवगण! इस विषयमें मैं तुमलोगोंको गरुड और ऋषियोंका संवादरूप प्राचीन इतिहास बता रहा हूँ ।। पुरा ब्रह्मर्षयश्चैव सिद्धाश्न भुवनेश्वरम्‌ । आश्रित्य हिमवत्पृष्ठे चक्रिरे विविधा: कथा: ।। पूर्वकालकी बात है, हिमालयके शिखरपर ब्रह्मर्षि और सिद्धगण जगदीश्वर श्रीहरिकी शरण ले उन्हींके विषयमें नाना प्रकारकी बातें कर रहे थे ।। तेषां कथयतां तत्र कथान्ते पततां वर: । प्रादुरासीन्महातेजा वाहश्चक्रगदाभृत: ।। उनकी बातचीत पूरी होते ही चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान्‌ विष्णुके वाहन महातेजस्वी पक्षिराज गरुड वहाँ आ पहुँचे ।। स तानूषीन्‌ समासाद्य विनयावनतानन: । अवतीर्य महावीर्यस्तानृषीनभिजग्मिवान्‌ ।। उन ऋषियोंके पास पहुँचकर महापराक्रमी गरुड नीचे उतर पड़े और विनयसे मस्तक झुकाकर उनके समीप गये। अभ्यर्चित: स ऋषिभि: स्वागतेन महाबल: । उपाविशत तेजस्वी भूमौ वेगवतां वर: ।। ऋषियोंने स्वागतपूर्वक वेगवानोंमें श्रेष्ठ महान्‌ बलवान्‌ एवं तेजस्वी गरुडका पूजन किया। उनसे पूजित होकर वे पृथ्वीपर बैठे ।। तमासीन महात्मानं वैनतेयं महाद्युतिम्‌ । ऋषय: परिपप्रच्छुर्महात्मानं तपस्विन: ।। बैठ जानेपर उन महाकाय, महामना और महातेजस्वी विनतानन्दन गरुडसे वहाँ बैठे हुए तपस्वी ऋषियोंने पूछा ।। ऋषय ऊचु: कौतूहलं वैनतेय परं नो हृदि वर्तते । तस्य नान्यो<स्ति वक्तेह त्वामृते पन्नगाशन ।। तदाख्यातमिहेच्छामो भवता प्रश्नमुत्तमम्‌ ऋषि बोले--विनतानन्दन गरुड! हमारे हृदयमें एक प्रश्नको लेकर बड़ा कौतूहल उत्पन्न हो गया है। उसका समाधान करनेवाला यहाँ आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है, अतः हम आपके द्वारा अपने उस उत्तम प्रश्नचका विवेचन कराना चाहते हैं ।। गरुड उवाच कि मया ब्रूत वक्तव्यं कार्य च वदतां वरा: ।। यूयं हि मां यथायुक्तं सर्वे वै देष्टमर्हथ । गरुड बोले--वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनीश्वरो! मेरे द्वारा किस विषयमें आप प्रवचन कराना चाहते हैं? यह बताइये। आप मुझे सभी यथोचित कार्योके लिये आज्ञा दे सकते हैं ।। ब्रह्मोवाच नमस्कृत्वा हानन्ताय ततस्ते हृदि सत्तमा: | प्रष्ट प्रचक्रमुस्तत्र वैनतेयं महाबलम्‌ ।। ब्रह्माजी कहते हैं--देवताओ! तदनन्तर उन श्रेष्ठठटम ऋषियोंने अन्तरहित भगवान्‌ नारायणको नमस्कार करके महाबली गरुडसे वहाँ इस प्रकार पूछना आरम्भ किया ।। ऋषय ऊचु: देवदेवं महात्मानं नारायणमनामयम्‌ | भवानुपास्ते वरदं कुतोडसौ कश्च तत्त्वतः ।। ऋषि बोले--विनतानन्दन! जिस रोग-शोकसे रहित वरदायक देवाधिदेव महात्मा नारायणकी आप उपासना करते हैं, उनका प्राकट्य कहाँसे हुआ है? तथा वे वास्तवमें कौन हैं? ।। प्रकृतिर्विकृतिर्वास्थ कीदृशी कक्‍्व नु संस्थिति: । एतद्‌ भवन्तं पृच्छामो देवो5यं क्व कृतालय: ।। उनकी प्रकृति अथवा विकृति कैसी है? उनकी स्थिति कहाँ है? तथा वे नारायणदेव कहाँ अपना घर बनाये हुए हैं? ये सब बातें हमलोग आपसे पूछते हैं ।। एष भक्तप्रियो देव: प्रियभक्तस्तथैव च । त्वं प्रियश्षास्य भक्तश्न नानय: काश्यप विद्यते ।। कश्यपकुमार! ये भगवान्‌ नारायण भक्तोंके प्रिय हैं तथा भक्त भी उन्हें बहुत प्रिय हैं और आप भी उनके प्रिय एवं भक्त हैं। आपके समान दूसरा कोई उन्हें प्रिय नहीं है ।। मुष्णन्निव मनश्नक्षूंष्पविभाव्यतनुर्वि भु: । अनादिमध्यनिधनो न विद्यैनं कुतो हासौ ।। उनका विग्रह इन्द्रियोंद्वारा प्रत्यक्ष अनुभवमें आने योग्य नहीं है। वे सबके मन और नेत्रोंको मानो चुराये लेते हैं। उनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है। हम इनके विषयमें यह नहीं समझ पाते कि ये कहाँसे प्रकट हुए हैं? ।। वेदेष्वपि च विश्वात्मा गीयते न च विद्यहे । तत्त्वतस्तत्त्वभूतात्मा विभुर्नित्य: सनातन: ।। वेदोंमें भी विश्वात्मा कहकर इनकी महिमाका गान किया गया है, परंतु हम यह नहीं जानते कि वे तत्त्वभूतस्वरूप नित्य सनातन प्रभु वस्तुतः कैसे हैं? ।। पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्न पठचमम्‌ । गुणाश्वैषां यथासंख्यं भावाभावौ तथैव च ।। तमः सत्त्वं रजश्नैव भावाश्नैव तदात्मका: । मनो बुद्धिश्न तेजश्न बुद्धिगम्यानि तत्त्वतः ।। पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और अग्नि--ये पाँच भूत; क्रमश: इन भूतोंके गुण; भाव- अभाव; सत्त्व, रज, तम, सात््विक, राजस और तामस भाव; मन, बुद्धि और तेज-ये वास्तवमें बुद्धिगम्य हैं ।। जायन्ते तात तस्माद्धि तिष्ठते तेष्वसौ विभु: । संचिन्त्य बहुधा बुद्ध्या नाध्यवस्यामहे परम्‌ ।। तस्य देवस्य तत्त्वेन तन्न: शंस यथातथम्‌ | तात! ये सब उन्हीं श्रीहरिसे उत्पन्न होते हैं और वे भगवान्‌ इन सबमें व्यापकरूपसे स्थित हैं। हम उनके विषयमें अपनी बुद्धिके द्वारा नाना प्रकारसे विचार करते हैं तथापि किसी उत्तम निश्चयपर नहीं पहुँच पाते, अतः आप यथार्थ रूपसे हमें उनका तत्त्व बताइये ।। युपर्ण उवाच स्थूलतो यस्तु भगवांस्तेनैव स्वेन हेतुना | त्रैलोक्यस्य तु रक्षार्थ दृश्यते रूपमास्थित: ।। गरुडजीने कहा--महात्माओ! जो स्थूलस्वरूप भगवान हैं, वे तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये उसी कारणभूत अपने स्वरूपसे लोगोंको दृष्टिगोचर होते हैं ।। मया तु महदाश्चर्य पुरा दृष्टं सनातने | देवे श्रीवत्सनिलये तच्छुणुध्वमशेषत: ।। मैंने पूर्वकालमें श्रीवत्सचिह्लके आश्रयभूत सनातन-देव श्रीहरिके विषयमें जो महान्‌ आश्चर्यकी बात देखी है, वह सब बताता हूँ, सुनिये ।। न सम शक्‍्यो मया वेत्तुं न भवद्धि: कथंचन ।। यथा मां प्राह भगवांस्तथा तच्छूयतां मम । मैं या आपलोग कोई भी किसी तरह भगवानके यथार्थ स्वरूपको नहीं जान सकते। भगवानने स्वयं ही अपने विषयमें मुझसे जो कुछ जैसा कहा है, वह उसी रूपमें सुनिये ।। मयामृतं देवतानां मिषतामृषिसत्तमा: ।। ह्ृतं विपाट्य त॑ यन्त्र विद्राव्यामृतरक्षिण: । देवता विमुखीकृत्य सेन्द्रा: समरुतो मृथे ।। त॑ दृष्टवा मम विक्रान्तं वागुवाचाशरीरिणी । मुनिश्रेष्ठणण! मैंने देवताओंके देखते-देखते उनके रक्षायन्त्रको विदीर्ण करके अमृतके रक्षकोंको खदेड़कर युद्धमें इन्द्र और मरुद्गणोंसहित सम्पूर्ण देवताओंको पराजित करके शीघ्र ही अमृतका अपहरण कर लिया। मेरे उस पराक्रमको देखकर आकाशवाणीने कहा ।। अशरीरिणी वागुवाच प्रीतो5स्मि ते वैनतेय कर्मणानेन सुब्रत । अवथा तेअस्तु मद्वाक्यं ब्रूहि कि करवाणि ते ।। आकाशवाणी बोली--उत्तम व्रतका पालन करनेवाले विनतानन्दन! मैं तुम्हारे इस पराक्रमसे बहुत प्रसन्न हूँ। मेरी यह वाणी व्यर्थ नहीं जानी चाहिये; इसलिये बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा मनोरथ पूर्ण करूँ? ।। युपर्ण उवाच तामेवंवादिनीं वाचमहं प्रत्युक्तवांस्तदा । ज्ञातुमिच्छामि कस्त्वं हि ततो मे दास्यसे वरम्‌ ।। गरुड कहते हैं--ऋषिगण! आकाशवाणीकी ऐसी बात सुनकर मैंने उस समय यों उत्तर दिया--'पहले मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप कौन हैं? फिर मुझे वर दीजियेगा' ।। ततो जलदगम्भीरं प्रहस्य गदतां वर: । उवाच वरद: प्रीत: काले त्वं माभिवेत्स्यसि ।। तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ वरदायक भगवानने बड़े जोरसे हँसकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें प्रसन्नतापूर्वक कहा--“समय आनेपर मेरे विषयमें तुम सब कुछ जान लोगे ।। वाहनं भव मे साधु वरं दह्मि तवोत्तमम्‌ | न ते वीर्येण सदृश: कश्चिल्लोके भविष्यति ।। पतड़् पततां श्रेष्ठ न देवो नापि दानव: । मत्सखित्वमनुप्राप्तो दुर्धर्षश्ष भविष्यसि ।। पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड! मैं तुम्हें यह उत्तम वर देता हूँ कि देवता हो या दानव, कोई भी इस संसारमें तुम्हारे समान पराक्रमी न होगा। तुम मेरे अच्छे वाहन हो जाओ, मेरे सखाभावको प्राप्त होनेके कारण तुम सदा दुर्जय बने रहोगे” ।। तमब्रवं देवदेवं मामेवं वादिनं परम्‌ | प्रयत: प्राउजलि र्भूत्वा प्रणम्य शिरसा विभुम्‌ ।। तब मैंने हाथ जोड़ पवित्र हो उपर्युक्त बात कहनेवाले सर्वव्यापी देवाधिदेव भगवान्‌ परम पुरुषको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा-- ।। एवमेतन्महाबाहो सर्वमेतद्‌ भविष्यति । वाहनं ते भविष्यामि यथा वदति मां भवान्‌ ।। ध्वजस्ते5हं भविष्यामि रथस्थस्य न संशय: । “महाबाहो! आपका यह कथन ठीक है। यह सब कुछ आपकी आज्ञाके अनुसार ही होगा। आप मुझे जैसा आदेश दे रहे हैं, उसके अनुसार मैं आपका वाहन अवश्य होऊँगा। आप रथपर विराजमान होंगे, उस समय मैं आपकी ध्वजापर स्थित रहूँगा, इसमें संशय नहीं है! ।। तथास्त्विति स मामुक्त्वा यथाभिप्रायतो गत: ।। तब भगवानने मुझसे “तथास्तु” कहकर वे अपनी इच्छाके अनुसार चले गये ।। ततो<हं कृतसंवादस्तेन केनापि सत्तमा: | कौतूहलसमाविष्ट: पितरं काश्यपं गत: ।। साधुशिरोमणियो! तदनन्तर उन अनिर्वचनीय देवतासे वार्तालाप करके मैं कौतूहलवश अपने पिता कश्यपजीके पास गया ।। सो<हं पितरमासाद्य प्रणिपत्याभिवाद्य च । सर्वमेतद्‌ यथातथ्यमुक्तवान्‌ पितुरन्तिके ।। पिताके पास पहुँचकर मैंने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और यह सारा वृत्तान्त उनसे यथावत्‌्रूपसे कह सुनाया ।। श्रुत्वा तु भगवान्‌ महां ध्यानमेवान्वपद्यत । स मुहूर्तमिव ध्यात्वा मामाह वदतां वर: ।। यह सुनकर मेरे पूज्यपाद पिताने ध्यान लगाया। दो घड़ीतक ध्यान करके वे वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनि मुझसे बोले-- ।। धन्यो>स्म्यनुगृहीतो5स्मि यत्‌ त्वं तेन महात्मना । संवाद कृतवांस्तात गुहोन परमात्मना ।। “तात! मैं धन्य हूँ, भगवानकी कृपाका पात्र हूँ, जिसके पुत्र होकर तुमने उन महामनस्वी गुहा परमात्मासे वार्तालाप कर लिया ।। मया हि स महातेजा नान्ययोगसमाधिना । तपसोग्रेण तेजस्वी तोषितस्तपसां निधि: ।। मैंने अनन्यभावसे मनको एकाग्र करके उग्र तपस्याद्वारा उन महातेजस्वी तपस्याकी निधिरूप (प्रतापी) श्रीहरिको संतुष्ट किया था ।। ततो मे दर्शयामास तोषयजन्निव पुत्रक । श्वेतपीतारुणनिभ: कद्रूकपिलपिड्रल: ।। बेटा! तब मुझे संतुष्ट करते हुए-से भगवान्‌ श्रीहरिने मुझे दर्शन दिया। उनके विभिन्न अंगोंकी कान्ति श्वेत, पीत, अरुण, भूरी, कपिश और पिंगल वर्णकी थी ।। रक्तनीलासितनिभ: सहस्रोदरपाणिमान्‌ । द्विसाहस्रमहावक्त्र एकाक्ष: शतलोचन: ।। वे लाल, नीले और काले-जैसे भी दीखते थे। उनके सहस्रों उदर और हाथ थे। उनके महान्‌ मुख दो सहस्रकी संख्यामें दिखायी देते थे। वे एक नेत्र तथा सौ नेत्रोंसे युक्त थे ।। समासाद्य तु तं विश्वमहं मूर्ध्ना प्रणम्प च । ऋग्यजु:सामभ्रि: स्तुत्वा शरण्यं शरणं गत: ।। उन विश्वात्माको निकट पाकर मैंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और ऋक्‌, यजु:ः तथा साम-मन्त्रोंसे उनकी स्तुति करके मैं उन शरणागतवत्सल देवकी शरणमें गया ।। तेन त्वं कृतसंवाद: स्वत: सर्वहितैषिणा । विश्वरूपेण देवेन पुरुषेण महात्मना ।। तमेवाराधय क्षिप्रं तमाराध्य न सीदसि । बेटा गरुड! सबका हित चाहनेवाले उन विश्वरूपधारी अन्तर्यामी परमात्मदेवसे तुमने वार्तालाप किया है; अतः शीघ्र उन्हींकी आराधना करो। उनकी आराधना करके तुम कभी कष्टमें नहीं पड़ोगे' ।। सो5हमेवं भगवता पित्रा ब्रह्मर्षिसत्तमा: ।। अनुनीतो यथान्यायं स्वमेव भवनं गत: । सो5हमामन्त्रय पितरं तद्भावगतमानस: ।। स्वमेवालयमासाद्य तमेवार्थमचिन्तयम्‌ । ब्रह्मर्षिशिरोमणियो! इस प्रकार अपने पूज्य पिताके यथोचितरूपसे समझानेपर मैं अपने घरको गया। पितासे विदा ले अपने घर आकर मैं उन्हीं परमात्माके ध्यानमें मन लगाकर उन्हींका चिन्तन करने लगा ।। तद्भावगतभावात्मा तद्भूतगतमानस: ।। गोविन्द चिन्तयन्नास्से शाश्व॒तं परमव्ययम्‌ । मेरा भावभक्तिसे युक्त मन उन्हींकी भावनामें लगा हुआ था। मेरा चित्त उनका चिन्तन करते-करते तदाकार हो गया था। इस प्रकार मैं उन सनातन अविनाशी परम पुरुष गोविन्दके चिन्तनमें तत्पर हो बैठा रहा ।। धृतं बभूव हृदयं नारायणदिदृक्षया ।। सो हं वेगं समास्थाय मनोमारुतवेगवान्‌ । रम्यां विशालां बदरीं गतो नारायणाश्रमम्‌ ।। ऐसा करनेसे मेरा हृदय नारायणके दर्शनकी इच्छासे स्थिर हो गया और मैं मन एवं वायुके समान वेगशाली हो महान्‌ वेगका आश्रय ले रमणीय बदरीविशाल तीर्थमें भगवान्‌ नारायणके आश्रमपर जा पहुँचा ।। ततस्तत्र हरिं दृष्टवा जगत: प्रभवं विभुम्‌ गोविन्द पुण्डरीकाक्षं प्रणत: शिरसा हरिम्‌ ।। ऋग्यजु:सामभि श्वैनं तुष्टाव परया मुदा । तदनन्तर वहाँ जगत्‌की उत्पत्तिके कारणभूत सर्वव्यापी कमलनयन श्रीगोविन्द हरिका दर्शन करके मैं उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और बड़ी प्रसन्नताके साथ ऋक्‌, यजु: एवं साममन्त्रोंके द्वारा उनका स्तवन किया ।। सो5हं प्रपन्न: शरणं देवदेव॑ सनातनम्‌ । प्राउजलिर्मनसा भूत्वा वाक्यमेतत्‌ तदोक्तवान्‌ ।। तब मैं मन-ही-मन उन सनातन देवदेवकी शरणमें गया और हाथ जोड़कर इस प्रकार बोला-- || भगवन्‌ भूतभव्येश भवद्धूतकूदव्यय । शरणं सम्प्रपन्न॑ मां त्रातुमर्हस्यरिंदम ।। “भगवन्‌! भूत और भविष्यके स्वामी, वर्तमान भूतोंके निर्माता, शत्रुदमन, अविनाशी! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप मेरी रक्षा करें ।। अहं तु तत्त्वजिज्ञासु: को5सि कस्यासि कुत्र वा । सम्प्राप्त: पदवीं देव स मां संत्रातुमरहसि ।। “मैं तो “आप कौन हैं, किसके हैं और कहाँ रहते हैं? इस बातको तत्त्वसे जाननेकी इच्छा रखकर आपके चरणोंकी शरणमें आया हूँ। देव! आप मेरी रक्षा करें” ।। श्रीभगवानुवाच मम त्वं विदित: सौम्य यथावत्‌ तत्त्वदर्शने ज्ञापितश्नापि यत्‌ पित्रा तच्चापि विदितं महत्‌ ।। श्रीभगवानने कहा--सौम्य! तुम यथावत्‌्रूपसे मेरे तत्त्वका साक्षात्कार करनेके लिये सचेष्ट होओ। यह बात मुझे पहलेसे ही विदित है। तुम्हारे पिताने तुम्हें मेरे विषयमें जो कुछ ज्ञान दिया है वह सब कुछ मुझे ज्ञात है ।। वैनतेय न कस्यापि अहं वैद्य: कथंचन । मां हि विन्दन्ति विद्वांसो ये ज्ञाने परिनिष्ठिता: ।। विनतानन्दन! किसीको भी किसी तरह मेरे स्वरूपका पूर्णतः ज्ञान नहीं हो सकता। ज्ञाननिष्ठ विद्वान्‌ ही मेरे विषयमें कुछ जान पाते हैं ।। निर्ममा निरहड्कारा निराशीर्बन्धनायुता: । भवांस्तु सततं भक्तो मन्मना: पक्षिसत्तम |। स्थूल॑ मां वेत्स्यसे तस्माज्जगत: कारणे स्थितम्‌ | जो ममता और अहंकारसे रहित तथा कामनाओंके बन्धनसे मुक्त हैं, वे ही मुझे जान पाते हैं। पक्षिप्रवर! तुम मेरे भक्त हो और सदा ही मुझमें मन लगाये रखते हो। इसलिये जगत्‌के कारणरूपमें स्थित मेरे स्थूलस्वरूपका बोध प्राप्त करोगे ।। युपर्ण उवाच एवं दत्ताभयस्तेन ततो5हमृषिसत्तमा: । नष्टखेदश्रमभय: क्षणेन हाभवं तदा ।। गरुड कहते हैं--ऋषिशिरोमणियो! इस प्रकार भगवान्‌के अभय देनेपर क्षणभरमें मेरे खेद, श्रम और भय सब नष्ट हो गये ।। स शनैर्याति भगवान्‌ गत्या लघुपराक्रम: । अहं तु सुमहावेगमास्थायानुव्रजामि तम्‌ ।। उस समय शीघ्रगामी भगवान्‌ अपनी गतिसे धीरे-धीरे चल रहे थे और मैं महान्‌ वेगका आश्रय लेकर उनका अनुसरण करता था ।। स गत्वा दीर्घभध्वानमाकाशममित्दय्ुति: । मनसाप्यगमं देशमाससादात्मतत्त्ववित्‌ ।। वे अमित तेजस्वी एवं आत्मतत्त्वके ज्ञाता भगवान्‌ श्रीहरि आकाशमें बहुत दूरतकका मार्ग तै करके ऐसे देशमें जा पहुँचे जो मनके लिये भी अगम्य था ।। अथ देव: समासाद्य मनस: सदृशं जवम्‌ | मोहयित्वा च मां तत्र क्षणेनान्तरधीयत ।। तदनन्तर भगवान्‌ मनके समान वेगको अपनाकर मुझे मोहित करके वहीं क्षणभरमें अदृश्य हो गये ।। तत्राम्बुधरधीरेण भो:शब्देनानुनादिना । अयं भो5हमिति प्राह वाक्‍्यं वाक्यविशारद: ।। वहाँ मेघके समान धीर-गम्भीर स्वरमें उच्चारित 'भो” शब्दके द्वारा बोलनेमें कुशल भगवान्‌ इस प्रकार बोले--'हे गरुड! यह मैं हूँ" ।। शब्दानुसारी तु ततस्तं देशमहमाव्रजम्‌ । तत्रापश्यं ततश्चाहं श्रीमद्धंसयुतं सर: ।। मैं उसी शब्दका अनुसरण करता हुआ उस स्थानपर जा पहुँचा। वहाँ मैंने एक सुन्दर सरोवर देखा जिसमें बहुत-से हंस शोभा पा रहे थे ।। स तत्सर: समासाद्य भगवानात्मवित्तम: । भो:शब्दप्रतिसृष्टेन स्वरेणाप्रतिवादिना ।। विवेश देव: स्वां योनिं मामिदं चाभ्यभाषत | आत्मतत्त्वके ज्ञाताओंमें सर्वोत्तम भगवान्‌ नारायण उस सरोवरके पास पहुँचकर “भो' शब्दसे युक्त अनुपम गम्भीर स्वरसे मुझे पुकारते हुए अपने शयन-स्थान जलमें प्रविष्ट हो गये और मुझसे इस प्रकार बोले-- ।। श्रीभगवानुवाच विशस्व सलिल॑ सौम्य सुखमत्र वसामहे | श्रीभगवानने कहा--सौम्य! तुम भी जलमें प्रवेश करो। हम दोनों यहाँ सुखसे रहेंगे ।। युपर्ण उवाच ततक्न प्राविशं तत्र सह तेन महात्मना । दृष्टवानद्भुततरं तस्मिन्‌ सरसि भास्वताम्‌ ।। अग्नीनां सुप्रणीतानामिद्धानामिन्धनैर्विना । दीप्तानामाज्यसिक्तानां स्थानेष्वार्चिष्मतां सदा ।। गरुड कहते हैं--ऋषियो! तब मैं उन महात्मा श्रीहरिके साथ उस सरोवरमें घुसा। वहाँ मैंने अत्यन्त अद्भुत दृश्य देखा। भिन्न-भिन्न स्थानोंपर विधिपूर्वक स्थापित की हुई प्रज्वलित अग्नियाँ बिना ईँधनके ही जल रही थीं और घीकी आहुति पाकर उद्दीप्त हो उठी थीं।। दीप्तिस्तेषामनाज्यानां प्राप्ताज्यानामिवा भवत्‌ | अनिद्धानामिव सतामिद्धानामिव भास्वताम्‌ ।। घी न मिलनेपर भी उन अग्नियोंकी दीप्ति घीकी आहुति पायी हुई अग्नियोंके समान थी और बिना ईंधनके भी ईंधनयुक्त आगके तुल्य उनकी प्रभा प्रकाशित होती रहती थी ।। अथाहं वरदं देवं नापश्यं तत्र सड़तम्‌ । वहाँ जानेपर भी उन वरदायक देवता नारायण-देवका मुझे दर्शन न हो सका ।। तेषां तत्राग्निहोत्राणामीडितानां सहस्रश: ।। समीपे त्वद्भुततममपश्यमहमव्ययम्‌ ।। सहसौरों स्थानोंमें प्रशंसित होनेवाले उन अग्निहोत्रोंक समीप मैंने उन अद्भुत एवं अविनाशी श्रीहरिको दूँढ़ना आरम्भ किया ।। एषु चाग्निसमीपेषु शुश्राव सुपदाक्षरा: ।। प्रभावान्तरितानां तु प्रस्पष्टाक्षरभाषिणाम्‌ | ऋग्‌यजु:सामगानां च मधुरा: सुस्वरा गिर: । इन अग्नियोंके समीप अक्षरोंका स्पष्ट उच्चारण करनेवाले तथा अपने प्रभावसे अदृश्य रहनेवाले, ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके विद्वानोंकी सुस्वर मधुर वाणी मैंने सुनी। उनके पद और अक्षर बहुत सुन्दर ढंगसे उच्चारित हो रहे थे ।। तान्यनेकसहस्राणि परीयंस्तु महाजवात्‌ | अपश्यमानस्तं देवं ततो5हं व्यथितो5भवम्‌ ।। मैं बड़े वेगसे वहाँके हजारों घरोंमें घूम आया; परंतु कहीं भी अपने उन आराध्यदेवको न देख सका, इससे मुझे बड़ी व्यथा हुई ।। ततस्तेष्वग्निहोत्रेषु ज्वलत्सु विमलार्चिषु । भानुमत्सु न पश्यामि देवदेवं सनातनम्‌ ।। ततो<हं तानि दीप्तानि परीय व्यथितेन्द्रिय: । नान्‍्तं तेषां प्रपश्यामि येनाहमिह चोदित: ।। निर्मल ज्वालाओंसे युक्त वे अग्निहोत्र पूर्ववत्‌ प्रकाशित हो रहे थे। उनके समीप भी मुझे कहीं सनातन देवाधिदेव श्रीहरि नहीं दिखायी दिये। तब मैं उन प्रदीप्त अग्निहोत्रोंकी परिक्रमा करते-करते थक गया। मेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठीं; परंतु उनका कहीं अन्त नहीं दिखायी दिया। जिन भगवानने मुझे यहाँ आनेके लिये प्रेरित किया था, उनका दर्शन नहीं हो सका ।। एवं चिन्तासमापतन्नः प्रध्यातुमुपचक्रमे । विनयावनतो भूत्वा नमश्नक्रे महात्मने ।। अनादिनिधनायैभिनामश्रि: परमात्मने । इस तरह चिन्तामें पड़कर मैं भगवान्‌का ध्यान करने लगा; एवं विनयसे नतमस्तक होकर मैंने निम्नांकित नामोंद्वारा आदि-अन्तसे रहित परमात्मा महामनस्वी नारायणकी वन्दना आरम्भ की-- ।। नारायणाय शुद्धाय शाश्वताय ध्रुवाय च ।। भूतभव्यभवेशाय शिवाय शिवमूर्तये । शिवयोने: शिवाद्याय शिवपूज्यतमाय च ।। 'जो शुद्ध, सनातन, ध्रुव, भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी, शिवस्वरूप और मंगलमूर्ति हैं, कल्याणके उत्पत्तिस्थान हैं, शिवके भी आदिकारण तथा भगवान्‌ शिवके भी परम पूजनीय हैं, उन नारायणदेवको नमस्कार है ।। घोररूपाय महते युगान्तकरणाय च । विश्वाय विश्वदेवाय विश्वेशाय महात्मने ।। “जो कल्पका अन्त करनेके लिये अत्यन्त घोर रूप धारण करते हैं, जो विश्वरूप, विश्वदेव, विश्वेश्वर एवं परमात्मा हैं, उन श्रीहरिको नमस्कार है ।। सहस्रोदारपादाय सहस्रनयनाय च । सहस्रबाहवे चैव सहस्रवदनाय च ।। “जिनके सहस्रों उदर, सहस्रों पैर और सहसौरों नेत्र हैं, जो सहस्रों भुजाओं और सहस्रों मुखोंसे सुशोभित हैं, उन भगवान्‌ विष्णुको नमस्कार है ।। शुचिश्रवाय महते ऋतुसंवत्सराय च । ऋग्यजु:सामवकत्राय अथर्वशिरसे नम: ।। “जिनका यश पवित्र है, जो महान्‌ तथा ऋतु एवं संवत्सररूप हैं, ऋक्‌, यजु: और सामवेद जिनके मुख हैं तथा अथर्ववेद जिनका सिर है, उन नारायण-देवको नमस्कार है ।। हृषीकेशाय कृष्णाय द्रुहिणोरुक्रमाय च । ब्रह्मेन्द्रकाय तारक्ष्याय वराहायैकश्‌ड्िणे ।। “जो हृषीकेश (सम्पूर्ण इन्द्रियोंके नियन्ता), कृष्ण (सच्चिदानन्दस्वरूप), द्रुहिण (ब्रह्मा), ऊरुक्रम (बहुत बड़े डग भरनेवाले त्रिविक्रम), ब्रह्मा एवं इन्द्ररूप, गरुडस्वरूप तथा एक सींगवाले वराहरूपधारी हैं, उन भगवान्‌ विष्णुको नमस्कार है ।। शिपिविष्टाय सत्याय हरये5थ शिखण्डिने । हुतायोर्ध्वाय वक्‍त्राय रौद्रानीकाय साधवे ।। सिन्धवे सिन्धुवर्षघ्ने देवानां सिन्धवे नम: । “जो शिपिविष्ट (तेजसे व्याप्त), सत्य, हरि और शिखण्डी (मोरपंखधारी श्रीकृष्ण) आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं, जो हुत (हविष्यको ग्रहण करनेवाले अग्निरूप), ऊर्ध्वमुख, रुद्रकी सेना, साधु, सिन्धु, समुद्रमें वर्षाका हनन करनेवाले तथा देवसिन्धु (गंगास्वरूप) हैं, उन भगवान्‌ विष्णुको प्रणाम है ।। गरुत्मते त्रिनेत्राय सुधामाय वृषावृषे ।। सम्राडुग्रे संकृतये विरजे सम्भवे भवे | “जो गरुडरूपधारी, तीन नेत्रोंसे युक्त (रुद्ररूप), उत्तम धामवाले, वृषावृष, धर्मपालक, सबके सम्राट, उग्ररूपधारी, उत्तम कृतिवाले, रजोगुणरहित, सबकी उत्पत्तिके कारण तथा भवरूप हैं, उन श्रीहरिको नमस्कार है ।। वृषाय वृषरूपाय विभवे भूर्भुवाय च ।। दीप्तसृष्टाय यज्ञाय स्थिराय स्थविराय च । 'जो वृष (अभीष्ट वस्तुओंकी वर्षा करनेवाले), वृषरूप (धर्मस्वरूप), विभु (व्यापक) तथा भूलोक और भुवर्लोकमय हैं, जो तेजस्वी पुरुषोंद्वारा सम्पादित यज्ञरूप हैं, स्थिर हैं और स्थविररूप (वृद्ध) हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है ।। अच्युताय तुषाराय वीराय च समाय च ।। जिष्णवे पुरुहृताय वशिष्ठाय वराय च । “जो अपनी महिमासे कभी च्युत नहीं होते, हिमके समान शीतल हैं, जिनमें वीरत्व है, जो सर्वत्र समभावसे स्थित हैं, विजयशील हैं, जिन्हें बहुत लोग पुकारते हैं अथवा जो इन्द्ररूप हैं तथा जो सर्वश्रेष्ठ वसिष्ठ हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है ।। सत्येशाय सुरेशाय हरयेडथ शिखण्डिने ।। बर्हिषाय वरेण्याय वसवे विश्ववेधसे । 'जो सत्य और देवताओंके स्वामी हैं, हरि (श्यामसुन्द) और शिखण्डी (मोरमुकुटधारी) हैं, जो कुशापर बैठनेवाले सर्वश्रेष्ठ वसुरूप हैं, उन विश्वस्रष्टा भगवान्‌ विष्णुको नमस्कार है ।। किरीटिने सुकेशाय वासुदेवाय शुष्मिणे ।। बृहदुक्थसुषेणाय युग्ये दुन्दुभये तथा । जो किरीटधारी, सुन्दर केशोंसे सुशोभित तथा पराक्रमी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णरूप हैं, बृहदुक्थ साम जिनका स्वरूप है, जो सुन्दर सेनासे युक्त हैं, जुएका भार सँभालनेवाले वृषभरूप हैं तथा दुन्दुभि नामक वाद्यविशेष हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है ।। भवेसखाय विभवे भरद्वाजाभयाय च ।। भास्कराय वरेन्द्राय पद्मना भाय भूरिणे । “जो इस जगतमें जीवमात्रके सखा हैं, व्यापकरूप हैं, भरद्वाजको अभय देनेवाले हैं, सूर्यरूपसे प्रभाका विस्तार करनेवाले हैं, श्रेष्ठ पुरुषोंके स्वामी हैं, जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है और जो महान्‌ हैं, उन भगवान्‌ नारायणको नमस्कार है ।। पुनर्वसुभूतत्वाय जीवप्रभविषाय च ।। वषट्काराय स्वाहायै स्वधायै निधनाय च । ऋचे च यजुषे साम्ने त्रैलोक्यपतये नमः ।। 'जो पुनर्वसु नामक नक्षत्रसे पालित और जीवमात्रकी उत्पत्तिके स्थान हैं, वषट्कार, स्वाहा, स्वधा और निधन--ये जिनके ही नाम और रूप हैं तथा जो ऋक्‌, यजुष्‌, सामवेद- स्वरूप हैं और त्रिलोकीके अधिपति हैं, उन भगवान्‌ विष्णुको मेरा प्रणाम है ।। श्रीपदड्मायात्मसदृशे धरणे धारणे परे । सौम्याय सौम्यरूपाय सौम्ये सुमनसे नमः ।। “जो शोभाशाली कमलको हाथमें लिये रहते हैं, जो अपने समान स्वयं ही हैं, जो धारण करने और करानेवाले परम पुरुष हैं, जो सौम्य, सौम्यरूपधारी तथा सौम्य एवं सुन्दर मनवाले हैं, उन श्रीहरिको नमस्कार है ।। विश्वाय च सुविश्वाय विश्वरूपधराय च । केशवाय सुकेशाय रश्मिकेशाय भूरिणे ।। 'जो विश्वरूप, सुन्दर विश्वके निर्माता तथा विश्वरूपधारी हैं, जो केशव, सुन्दर केशोंसे युक्त किरणरूपी केशवाले और अधिक बलशाली हैं, उन भगवान्‌ विष्णुको मेरा प्रणाम है ।। हिरण्यगर्भाय नम: सौम्याय वृषरूपिणे । नारायणाग्रवपुषे पुरुहृताय वज्िणे ।। धर्मिणे वृषसेनाय धर्मसेनाय रोधसे । “जो हिरण्यगर्भ, सौम्य, वृषरूपधारी, नारायण, श्रेष्ठ शरीरधारी, पुरुहृत (इन्द्र) तथा वज्र धारण करनेवाले हैं, जो धर्मात्मा, वृषसेन, धर्मसेन तथा तटरूप हैं, उन भगवान्‌ श्रीहरिको नमस्कार है ।। मुनये ज्वरमुक्ताय ज्वराधिपतये नम: ।। अनेत्राय त्रिनेत्राय पिड्लाय विडूूर्मिणे | “जो मननशील मुनि, ज्वर आदि रोगोंसे मुक्त तथा ज्वरके अधिपति हैं, जिनके नेत्र नहीं हैं अथवा जिनके तीन नेत्र हैं, जो पिंगलवर्णवाले तथा प्रजारूपी लहरोंकी उत्पत्तिके लिये महासागरके समान हैं, उन भगवान्‌ विष्णुको नमस्कार है ।। तपोब्रह्म॒निधानाय युगपर्यायिणे नमः ।। शरणाय शरण्याय शक्तेष्शशरणाय च । नम: सर्वभवेशाय भूतभव्यभवाय च ।। “जो तप और वेदकी निधि हैं, बारी-बारीसे युगोंका परिवर्तन करनेवाले हैं, सबके शरणदाता, शरणागतवत्सल और शक्तिशाली पुरुषके लिये अभीष्ट आश्रय हैं, सम्पूर्ण संसारके अधीश्वर एवं भूत, वर्तमान और भविष्यरूप हैं, उन भगवान्‌ नारायणको नमस्कार है ।। पाहि मां देवदेवेश को5प्यजोडसि सनातन । एवं गतो5सि शरणं शरण्यं ब्रह्मयोनिनाम्‌ ।। “देवदेवेश्वर! आप मेरी रक्षा करें। सनातन परमात्मन्‌! आप कोई अनिर्वचनीय अजन्मा पुरुष हैं, ब्राह्मणोंके शरणदाता हैं; मैं इस संकटमें पड़कर आपकी ही शरण लेता हूँ ।। स्तव्यं स्तवं स्तुतवतस्तत्‌ तमो मे प्रणश्यत । शृणोमि च गिरं दिव्यामन्तर्धानगतां शिवाम्‌ | इस प्रकार स्तवनीय परमेश्वरकी स्तुति करते ही मेरा वह सारा दुःख नष्ट हो गया। तत्पश्चात्‌ मुझे किसी अदृश्य शक्तिके द्वारा कही हुई यह मंगलमयी दिव्य वाणी सुनायी दी ।। श्रीभगवानुवाच मा भैर्गरुत्मन्‌ दान्तो$सि पुन: सेन्द्रानू दिवौकस: ।। स्वं चैव भवन गत्वा द्रक्ष्यसे पुत्रबान्धवान्‌ । श्रीभगवान्‌ बोले--गरुड! तुम डरो मत। तुमने मन और इन्द्रियोंको जीत लिया है। अब तुम पुनः इन्द्र आदि देवताओंके सहित अपने घरमें जाकर पुत्रों और भाई-बन्धुओंको देखोगे ।। युपर्ण उवाच ततस्तस्मिन्‌ क्षणेनैव सहसैव महाद्युति: ।। प्रत्यदृश्यत तेजस्वी पुरस्तात्‌ स ममान्तिके । गरुडजी कहते हैं--मुनियो! तदनन्तर उसी क्षण वे परम कान्तिमान्‌ तेजस्वी नारायण सहसा मेरे सामने अत्यन्त निकट दिखायी दिये ।। समागम्य ततस्तेन शिवेन परमात्मना ।। अपश्य॑ चाहमायान्तं नरनारायणाश्रमे । चतुर्द्धिगुणविन्यासं तं च देव॑ं सनातनम्‌ ।। तब उन मंगलमय परमात्मासे मिलकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर मैंने देखा, वे आठ भुजाओंवाले सनातनदेव पुन: नर-नारायणके आश्रमकी ओर आ रहे हैं ।। यजततस्तानृषीन्‌ देवान्‌ वदतो ध्यायतो मुनीन्‌ | युक्तान्‌ सिद्धान्‌ नैष्ठिकांकश्ष जपतो यजतो गृहीन्‌ ।। वहाँ मैंने देखा, ऋषि यज्ञ कर रहे हैं, देवता बातें कर रहे हैं, मुनिलोग ध्यानमें मग्न हैं, योगयुक्त सिद्ध और नैछ्लिक ब्रह्मचारी जप करते हैं तथा गृहस्थलोग यज्ञोंके अनुष्ठानमें संलग्न हैं ।। पुष्पपूरपरिक्षिप्तं धूपितं दीपितं हितम्‌ । वन्दितं सिक्तसम्मृष्टं नरनारायणाश्रमम्‌ ।। नर-नारायणका आश्रम धूपसे सुगन्धित और दीपसे प्रकाशित हो रहा था। वहाँ चारों ओर ढेर-के-ढेर फूल बिखरे हुए थे। वह आश्रम सबके लिये हितकर एवं सत्पुरुषोंद्वारा वन्दित था। झाड़-बुहारकर स्वच्छ बनाया और सींचा गया था ।। तदद्भुतमहं दृष्टवा विस्मितो5स्मि तदानघा: । जगाम शिरसा देवं प्रयतेनान्तरात्मना ।। निष्पाप मुनियो! उस अदभुत दृश्यको देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ और मैंने पवित्र एवं एकाग्र हृदयसे मस्तक झुकाकर उन भगवान्‌की शरण ली ।। तदत्यद्भधुतसंकाशं किमेतदिति चिन्तयन्‌ नाध्यगच्छ परं दिव्यं तस्य सर्वभवात्मन: ।। वह सब अदभुत-सा दृश्य क्या था, यह बहुत सोचनेपर भी मेरी समझमें नहीं आया। सबकी उत्पत्तिके कारणभूत उन परमात्माके परम दिव्य भावको मैं नहीं समझ सका ।। प्रणिपत्य सुदुर्धर्ष पुन: पुनरुदीक्ष्य च । शिरस्यञ्जलिमाधाय विस्मयोत्फुल्ललोचन: ।। अवोचं तमदीनार्थ श्रेष्ठानां श्रेष्ठमुत्तमम्‌ । उन दुर्जय परमात्माको बारंबार प्रणाम करके उनकी ओर देखकर मेरे नेत्र आश्वर्यसे खिल उठे और मैंने मस्तकपर अंजलि बाँधे उन श्रेष्ठ पुरुषोंमें भी सर्वश्रेष्ठ एवं उदार पुरुषोत्तमसे कहा-- |। नमस्ते भगवन्‌ देव भूतभव्यभवत्प्रभो ।। यदेतदद्धुतं देव मया दृष्ट॑ त्वदाश्रयम्‌ । अनादिमध्यपर्यन्तं कि तच्छंसितुमर्हसि ।। “भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी भगवान्‌ नारायणदेव! आपको नमस्कार है। देव! मैंने आपके आश्रित जो यह अद्भुत दृश्य देखा है, इसका कहीं आदि, मध्य और अन्त नहीं है। वह सब क्या है, यह बतानेकी कृपा करें ।। यदि जानासि मां भक्त यदि वानुग्रहो मयि । शंस सर्वमशेषेण श्रोतव्यं यदि चेन्मया ।। “यदि आप मुझे अपना भक्त समझते हैं अथवा यदि आपका मुझपर अनुग्रह है तो यह सब यदि मेरे सुननेयोग्य हो तो पूर्णरूपसे बताइये ।। स्वभावस्तव दुर्ज्ञेय: प्रादुर्भावो5भवस्य च । भवद्धूतभविष्येश सर्वथा गहनो भवान्‌ ।। “आपका स्वभाव दुर्ज़्य है। आप अजन्मा परमेश्वरका प्रादुर्भाव भी समझमें आना कठिन है। भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी नारायण! आप सर्वथा गहन (अगम्य) हैं ।। ब्रूहि सर्वमशेषेण तदाश्चर्य महामुने । किं तदत्यद्धुतं वृत्तं तेष्वग्निषु समन्‍्ततः ।। “महामुने! वह सारा आश्चर्यजनक एवं अदभुत वृत्तान्त जो उन अग्नियोंके चारों ओर देखा गया, क्या था? यह पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा करें ।। कानि तान्यग्निहोत्राणि केषां शब्द: श्रुतो मया । शृण्वतां ब्रह्म सततमदृश्यानां महात्मनाम्‌ ।। “वे अग्निहोत्र कौन थे? निरन्तर वेदोंका श्रवण और पाठ करनेवाले वे अदृश्य महात्मा कौन थे, जिनका शब्दमात्र मैंने सुना था? ।। एतन्मे भगवन्‌ कृष्ण ब्रूहि सर्वमशेषत: । गृणन्त्यग्निसमीपेषु के च ते ब्रह्मराशय: ।। “भगवान्‌ श्रीकृष्ण! यह सब आप पूर्णरूपसे मुझे बताइये। जो लोग अग्निके समीप वेदोंका पारायण कर रहे थे, वे ब्राह्मणसमूह महात्मा कौन थे?” ।। श्रीभगवानुवाच मां न देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसा: । विदुस्तत्त्वेन तत्त्वस्थं सूक्ष्मात्मानमवस्थितम्‌ ।। श्रीभगवान्‌ बोले--गरुड! मुझे न तो देवता, न गन्धर्व, न पिशाच और न राक्षस ही तत्त्वसे जानते हैं। मैं सम्पूर्ण तत्त्वोंमें उनके सूक्ष्म आत्मारूपसे अवस्थित हूँ ।। चतुर्धाहं विभक्तात्मा लोकानां हितकाम्यया । भूतभव्यभविष्यादिरनादिर्विश्वकृत्तम: ।। लोकोंके हितकी कामनासे मैंने अपने आपको चार स्वरूपोंमें विभक्त कर रखा है। मैं भूत, वर्तमान और भविष्यका आदि हूँ। मेरा आदि कोई नहीं है। मैं ही सबसे बड़ा विश्वस्रष्टा हूँ ।। पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्न पठचमम्‌ । मनो बुद्धिश्न तेजश्च॒ तमः सत्त्वं रजस्तथा ।। प्रकृतिरविकृतिश्नेति विद्याविद्ये शुभाशुभे । मत्त एतानि जायन्ते नाहमेभ्य: कथंचन ।। पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, मन, बुद्धि, तेज (अहंकार), सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण, प्रकृति, विकृति, विद्या, अविद्या तथा शुभ और अशुभ--ये सब मुझसे ही उत्पन्न होते हैं। मैं इनसे किसी प्रकार उत्पन्न नहीं होता ।। यत्‌ किंचिच्छेयसा युक्त: श्रेष्ठभावं व्यवस्यति । धर्मयुक्तं च पुण्यं च सो5हमस्मि निरामय: ।। मनुष्य कल्याणभावनासे युक्त हो जिस किसी पवित्र, धर्मयुक्त एवं श्रेष्ठ भावका निश्चय करता है वह सब मैं निरामय परमेश्वर ही हूँ ।। यः स्वभावात्मतत्त्वजै: कारणैरुपलक्ष्यते । अनादिमध्यनिधन: सोडन्‍्तरात्मास्मि शाश्वत: ।। स्वभाव एवं आत्माके तत्त्वको जाननेवाले पुरुष विभिन्न हेतुओंद्वारा जिसका साक्षात्कार करते हैं, वह आदि, मध्य और अन्तसे रहित सर्वान्तरात्मा सनातन पुरुष मैं ही हूँ ।। यत्‌ तु मे परम॑ गुहां रूप॑ सूक्ष्मार्थदर्शिभि: । गृह्ते सूक्ष्मभावज्जै: स विभाव्यो5स्मि शाश्वत: ।। सूक्ष्म अर्थको देखने और समझनेवाले तथा सूक्ष्मभावको जाननेवाले ज्ञानी पुरुष मेरे जिस परम गुह्य रूपको ग्रहण करते हैं, वह चिन्तनीय सनातन परमात्मा मैं ही हूँ ।। यत्‌ तु मे परमं गुह्ां येन व्याप्तमिदं जगत्‌ । सो<हं गत: सर्वसत्त्व: सर्वस्य प्रभवो5प्यय: ।। जो मेरा परम गुह् रूप है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत्‌ व्याप्त है, वह सर्वसत्त्वरूप परमात्मा मैं ही हूँ, मैं ही सबका अविनाशी कारण हूँ ।। मत्तो जातानि भूतानि मया धार्यन्त्यहर्निशम्‌ । मय्येव विलयं यान्ति प्रलये पन्नगाशन ।। गरुड! सम्पूर्ण भूत प्राणी मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं, मेरे ही द्वारा वे अहर्निश जीवन धारण करते हैं और प्रलयके समय सब-के-सब मुझमें ही लीन हो जाते हैं। यो मां यथा वेदयति तस्य तस्यास्मि काश्यप । मनोबुद्धिगत: श्रेयो विदधामि विहजड्भम ।। काश्यप! जो मुझे जैसा जानता है, उसके लिये मैं वैसा ही हूँ। विहंगम! मैं सभीके मन और बुद्धिमें रहकर सबका कल्याण करता हूँ ।। मां तु ज्ञातुं कृता बुद्धिर्भवता पक्षिसत्तम | शृणु यो5हं यतश्चाहं यदर्थ चाहमुद्यत:ः ।। पक्षिप्रवर! तुमने मेरे तत््वको जाननेका विचार किया था; अतः मैं कौन हूँ? कहाँसे आया हूँ? और किस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये उद्यत हुआ हूँ? यह सब बताता हूँ, सुनो ।। ये केचिन्नियतात्मानस्त्रेताग्निपरमा द्विजा: । अग्निकार्यपरा नित्यं जपहोमपरायणा: ।। आत्मन्यग्नीन्‌ समाधाय नियता नियतेन्द्रिया: । अनन्यमनसस्ते मां सर्वे वै समुपासते ।। यजन्तो जपयज़ैर्मा मानसैश्न सुसंयता: । अग्नीनश्युद्ययु: शश्वदग्निष्वेवाभिसंस्थिता: ।। अनन्यकार्या: शुचयो नित्यमग्निपरायणा: । य एवं बुद्धयो धीरास्ते मां गच्छन्ति तादृशा: ।। जो कोई ब्राह्मण अपने मनको वशमें करके त्रिविध अग्नियोंकी उपासना करते हैं, नित्य अन्निहोत्रमें तत्रर और जप-होममें संलग्न हैं, जो नियमपूर्वक रहकर अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अपने-आपमें ही अग्नियोंका आधान कर लेते हैं तथा सब-के-सब अनन्यचित्त होकर मेरी ही उपासना करते हैं, जो अपनेको पूर्ण संयममें रखकर जप, यज्ञ और मानसयज्ञोंद्वारा मेरी आराधना करते हैं, जो सदा अग्निहोत्रमें ही तत्यर रहकर अग्नियोंका स्वागत करते हैं तथा अन्य कार्यमें रत न होकर शुद्धभावसे सदा अग्निकी परिचर्या करते हैं; ऐसी बुद्धिवाले धीर पुरुष वैसे भक्तिभावसे सम्पन्न होते हैं, वे मुझे प्राप्त कर लेते हैं ।। अकामहतसंकल्तपा ज्ञाने नित्यं समाहिता: । आत्मन्यग्नीन्‌ समाधाय निराहारा निराशिष: ।। विषयेषु निरारम्भा विमुक्ता ज्ञानचक्षुष: । अनन्यमनसो धीरा: स्वभावनियमान्विता: ।। जिन्होंने निष्कामभावके द्वारा अपने सारे संकल्पोंको नष्ट कर दिया है, जो सदा ज्ञानमें ही चित्तको एकाग्र किये रहते हैं और अग्नियोंको अपने आत्मामें ही स्थापित करके आहार (भोग) और कामनाओंका त्याग कर देते हैं, विषयोंकी उपलब्धिके लिये जिनकी कोई प्रवृत्ति नहीं होती, जो सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त एवं ज्ञानदृष्टिसे सम्पन्न हैं, वे स्‍्वभावतः नियमपरायण एवं अनन्यचित्तसे मेरा चिन्तन करनेवाले धीर पुरुष मुझे ही प्राप्त होते हैं ।। यत्‌ तद्‌ वियति दृष्टं तत्‌ सर: पद्मोत्पलायुतम्‌ । तत्राग्नय: संनिहिता दीप्यन्ते सम निरिन्धना: ।। तुमने जो आकाशमें कमल और उत्पलसे भरा हुआ सुन्दर सरोवर देखा था, उसके समीप स्थापित हुई अग्नियाँ बिना ईंधनके ही प्रज्वलित होती हैं ।। ज्ञानामलाशयास्तस्मिन्‌ ये च चन्द्रांशुनिर्मला: । उपासीना गृणन्तो<ग्निं प्रस्पष्टाक्षभाषिण: ।। आकाडुक्षमाणा: शुचयस्तेष्वग्निषु विहज्भम | जिनके अन्तःकरण ज्ञानके प्रकाशसे निर्मल हो गये हैं, जो चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल हैं, वे ही वहाँ स्पष्ट अक्षरका उच्चारण करते हुए वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक अग्निकी उपासना करते हैं। विहंगम! वे पवित्रभावसे रहकर उन अग्नियोंकी परिचर्याकी ही इच्छा रखते हैं ।। ये मया भावितात्मानो मस्येभिरता: सदा ।। उपासते च मामेव ज्योतिर्भूता निरामया: । तै्हि तत्रेव वस्तव्यं नीरागात्मभिरच्युतै: ।। मेरा चिन्तन करनेके कारण जिनका अन्तःकरण पवित्र हो गया है, जो सदा मेरी ही उपासनामें रत हैं, वे ही वहाँ रोग-शोकसे रहित एवं ज्योति:स्वरूप होकर मेरी ही उपासना किया करते हैं। वे अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होकर वीतराग हृदयसे सदा वहीं निवास करेंगे ।। निराहारा हानिष्यन्दाश्वन्द्रांशुसदृशप्रभा: । निर्मला निरहंकारा निरालम्बा निराशिष: ।। मद्धक्ता: सततं ते वै भक्तस्तानपि चाप्यहम्‌ | उनकी अंगकान्ति चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल है। वे निराहार, श्रमविन्दुओंसे रहित, निर्मल, अहंकारशून्य, आलम्बनरहित और निष्काम हैं। उनकी सदा मुझमें भक्ति बनी रहती है तथा मैं भी उनका भक्त (प्रेमी) बना रहता हूँ ।। चतुर्धाहं विभक्तात्मा चरामि जगतो हितः ।। लोकानां धारणार्थाय विधानं विद्धामि च । यथावत्तदशेषेण श्रोतुमहति मे भवान्‌ ।। मैं अपनेको चार स्वरूपोंमें विभक्त करके जगत्‌के हितसाधनमें तत्पर हो विचरता रहता हूँ। सम्पूर्ण लोक जीवित एवं सुरक्षित रहें--इसके लिये मैं विधान बनाता हूँ। वह सब तुम यथार्थरूपसे सुननेके अधिकारी हो ।। एका मूर्तिर्निर्गुणाख्या योगं परममास्थिता । द्वितीया सृजते तात भूतग्रामं चराचरम्‌ ।। तात! मेरी एक निर्गुण मूर्ति है जो परम योगका आश्रय लेकर रहती है। दूसरी वह मूर्ति है जो चराचर प्राणिसमुदायकी सृष्टि करती है ।। सृष्ट संहरते चैका जगत्‌ स्थावरजड्रमम्‌ | जातात्मनिष्ठा क्षपयन्‌ मोहयन्निव मायया ।। तीसरी मूर्ति स्थावर-जड़म जगत्‌का संहार करती है और चौथी मूर्ति आत्मनिष्ठ है, जो आसुरी शक्तियोंको मायासे मोहित-सी करके उन्हें नष्ट कर देती है ।। क्षिपन्ती मोहयन्ती च ह्यात्मनिष्ठा स्वमायया । चतुर्थी मे महामूर्तिर्जगद्वृद्धिं ददाति सा ।। रक्षते चापि नियता सो5हमस्मि नभश्षर । अपनी मायासे दुष्टोंकी मोहित और नष्ट करनेवाली जो मेरी चौथी आत्मनिष्ठ महामूर्ति है, वह नियम-पूर्वक रहकर जगत्‌की वृद्धि और रक्षा करती है। गरुड! वही मैं हूँ ।। मया सर्वमिदं व्याप्तं मयि सर्व प्रतिष्ठितम्‌ ।। अहं सर्वजगद्दीजं सर्वत्रगतिरव्यय: । मैंने इस सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर रखा है। सारा जगत्‌ मुझमें ही प्रतिष्ठित है। मैं ही सम्पूर्ण जगत्‌का बीज हूँ। मेरी सर्वत्र गति है और मैं अविनाशी हूँ ।। यानि तान्यग्निहोत्राणि ये च चन्द्रांशुराशय: । गृणन्ति वेद सततं तेष्वग्निषु विहड़म ।। क्रमेण मां समायान्ति सुखिनो ज्ञानसंयुता: । तेषामहं तपो दीप्तं तेज: सम्यक्‌ समाहितम्‌ | नित्यं ते मयि वर्तन्ते तेषु चाहमतन्द्रित: ।। विहंगम! वे जो अग्निहोत्र थे तथा जो चन्द्रमाकी किरणोंके पुंज-जैसी कान्तिवाले पुरुष निरन्तर उन अग्नियोंके समीप बैठकर वेदोंका पाठ करते थे, वे ज्ञानसम्पन्न एवं सुखी होकर क्रमश: मुझे प्राप्त होते हैं। मैं ही उनका उद्दीप्त तप और सम्यक्‌ रूपसे संचित तेज हूँ। वे सदा मुझमें विद्यमान हैं और मैं उनमें सावधान हुआ रहता हूँ ।। सर्वतो मुक्तसड्रेन मय्यनन्यसमाधिना । शकक्‍्य: समासादयितुमहं वै ज्ञानचक्षुषा ।। जो सब ओरसे आसक्तिशून्य है, वह मुझमें अनन्यभावसे चित्तको एकाग्र करके ज्ञानदृष्टिसे मेरा साक्षात्कार कर सकता है ।। एकान्तिनो ध्यानपरा यतिभावाद्‌ व्रजन्ति माम्‌ । जो संन्यासका आश्रय लेकर अनन्यभावसे मेरे ध्यानमें तत्पर रहते हैं, वे मुझे ही प्राप्त होते हैं ।। सत्त्वयुक्ता मतिर्येषां केवलात्मविनिश्चिता ।। ते पश्यन्ति स्वमात्मानं परमात्मानमव्ययम्‌ | जिनकी बुद्धि सत्त्वगुणसे युक्त है और केवल आत्मतत्त्वका निश्चय करके उसीके चिन्तनमें लगी हुई है, वे अपने आत्मरूप अविनाशी परमात्माका दर्शन करते हैं ।। अहिंसा सर्वभूतेषु तेष्ववस्थितमार्जवम्‌ ।। तेष्वेवच समाधाय सम्यगेति स मामजम्‌ | उन्हींका समस्त प्राणियोंके प्रति अहिंसाभाव होता है, उन्हींमें 'सरलता” नामक सदगुणकी स्थिति होती है और उन्हीं गुणोंमें स्थित हुआ जो चित्तको मुझ परमात्मामें भलीभाँति समाहित कर देता है वह मुझ अजन्मा परमेश्वरको प्राप्त होता है ।। यदेतत्‌ परमं गुहयमाख्यानं परमाद्भुतम्‌ ।। यत्नेन तदशेषेण यथावच्छोतुमरहसि । यह जो परम गोपनीय एवं अत्यन्त अद्भुत आख्यान है, इसे पूर्णतः यत्नपूर्वक यथावत्‌ रूपसे श्रवण करो ।। ये त्वग्निहोत्रनियता जपयज्ञपरायणा: ।। ये मामुपासते शभश्चदेतांस्त्वं दृष्टटानसि । जो अन्निहोत्रमें संलग्न और जप-यज्ञपरायण होते हैं, जो निरन्तर मेरी उपासना करते रहते हैं; उन्हींका तुमने प्रत्यक्ष दर्शन किया है ।। शास्त्रदृष्टविधानज्ञा असक्ता: क्वचिदन्यथा ।। शक्योऊहं वेदितुं तैस्तु यन्मे परममव्ययम्‌ । जो शास्त्रोक्त विधिके ज्ञाता होकर अनासक्त-भावसे सत्कर्म करते हैं, कभी शास्त्रविपरीत--असत्‌ कर्ममें नहीं लगते, उनके द्वारा ही मैं जाना जा सकता हूँ। मेरा जो अविनाशी परम तत्त्व है, उसे भी वे ही जान सकते हैं ।। तस्माजउज्ञानेन शुद्धेन प्रसन्नात्मात्मविच्छुचि: ।। आसादयति तदू्‌ ब्रह्म यत्र गत्वा न शोचति | इसलिये विशुद्ध ज्ञानके द्वारा जिसका चित्त प्रसन्न (निर्मल) है, जो आत्मतत्त्वका ज्ञाता और पतवित्र है, वह ज्ञानी पुरुष ही उस ब्रह्मको प्राप्त होता है, जहाँ जाकर कोई शोकमें नहीं पड़ता ।। शुद्धाभिजनसम्पन्ना: श्रद्धायुक्तेन चेतसा ।। मद्धवत्या च द्विजश्रेष्ठा गच्छन्ति परमां गतिम्‌ । जो शुद्ध कुलमें उत्पन्न हैं, जो श्रेष्ठ द्विज श्रद्धायुक्त चित्तसे मेरा भजन करते हैं, वे मेरी भक्तिद्वारा परम गतिको प्राप्त होते हैं ।। यद्‌ गुहां परम बुद्धेरलिड्रग्रहणं च यत्‌ ।। तत्‌ सूक्ष्मं गृहाते विप्रैर्यतिभिस्तत्त्वदर्शभि: । जो बुद्धिके लिये परम गुह्य रहस्य है, जो किसी आकृतिसे गृहीत नहीं होता-- अनुभवमें नहीं आता उस सूक्ष्म परब्रह्मका तत्त्वदर्शी यति ब्राह्मण साक्षात्कार कर लेते हैं ।। न वायु: पवते तत्र न तस्मिन्‌ ज्योतिषां गति: ।। न चाप: पृथिवी नैव नाकाशं न मनोगति: । वहाँ यह वायु नहीं चलती, ग्रहों और नक्षत्रोंकी पहुँच नहीं होती तथा जल, पृथ्वी, आकाश और मनकी भी गति नहीं हो पाती है ।। तस्माच्चैतानि सर्वाणि प्रजायन्ते विहड्गम ।। सर्वेभ्यश्ष स तेभ्यश्व प्रभवत्यमलो विभु: । विहंगम! उसी ब्रह्मसे ये सारी वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं। वह निर्मल एवं सर्वव्यापी परमात्मा उन सबके द्वारा ही सबको उत्पन्न करनेमें समर्थ है ।। स्थूलदर्शनमेतन्मे यद्‌ दृष्टं भवतानघ ।। एतत्‌ सूक्ष्मस्य च द्वारं कार्याणां कारणं त्वहम्‌ । अनघ! तुमने जो मेरा यह स्थूल रूप देखा है, यही मेरे सूक्ष्म स्वरूपमें प्रवेश करनेका द्वार है। समस्त कार्योंका कारण मैं ही हूँ ।। दृष्टो वै भवता तस्मात्‌ सरस्यमितविक्रम ।। अमित पराक्रमी गरुड! इसीलिये तुमने उस सरोवरमें मेरा दर्शन किया है ।। मां यज्ञमाहुर्यज्ञज्ञा वेदं वेदविदो जना: । मुनयश्चापि मामेव जपयज्ञं प्रचक्षते ।। यज्ञके ज्ञाता मुझे यज्ञ कहते हैं। वेदोंके विद्वान्‌ मुझे ही वेद बताते हैं और मुनि भी मुझे ही जप-यज्ञ कहते हैं ।। वक्ता मन्ता रसयिता प्राता द्रष्टा प्रदर्शक: । बोद्धा बोद्धयिता चाहं गन्ता श्रोता चिदात्मक: ।। मैं ही वक्ता, मनन करनेवाला, रस लेनेवाला, सूँघनेवाला, देखने और दिखानेवाला, समझने और समझानेवाला तथा जाने और सुननेवाला चेतन आत्मा हूँ ।। मामिष्ट्वा स्वर्गमायान्ति तथा चाप्रुवते महत्‌ | ज्ञात्वा मामेव चैवं ते नि:सड्रेनान्तरात्मना ।। मेरा ही यजन करके यजमान स्वर्गमें आते और महान्‌ पद पाते हैं। इसी प्रकार जो अनासक्त हृदयसे मुझे ही जान लेते हैं, वे मुझ परमात्माको ही प्राप्त होते हैं ।। अहं तेजो द्विजातीनां मम तेजो द्विजातय: । मम यस्तेजसा देह: सो<ग्निरित्यवगम्यताम्‌ ।। मैं ब्राह्मणोंका तेज हूँ और ब्राह्मण मेरे तेज हैं। मेरे तेजसे जो शरीर प्रकट हुआ है, उसीको तुम अग्नि समझो ।। प्राणपाल: शरीरे5हं योगिनामहमी श्वर: । सांख्यानामिदमेवाग्रे मयि सर्वमिदं जगत्‌ ।। मैं ही शरीरमें प्राणोंका रक्षक हूँ। मैं ही योगियोंका ईश्वर हूँ। सांख्योंका जो यह प्रधान तत्त्व है, वह भी मैं ही हूँ। मुझमें ही यह सम्पूर्ण जगत्‌ स्थित है ।। धर्ममर्थ च काम च मोक्ष चैवार्जव॑ जपम्‌ । तमः सत्त्वं रजश्चैव कर्मजं च भवाप्ययम्‌ ।। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, सरलता, जप, सत्त्वगुण, तमोगुण, रजोगुण तथा कर्मजनित जन्म-मरण--सब मेरे ही स्वरूप हैं ।। स तदाहं तथारूपस्त्वया दृष्ट: सनातन: । ततस्त्वहं परतर: शक्‍्य: कालेन वेदितुम्‌ ।। मम यत्‌ परमं गुह्यो शाश्वतं ध्रुवमव्ययम्‌ । तदेवं परमो गुह्मों देवो नारायणो हरि: ।। उस समय तुमने मुझ सनातन पुरुषका उस रूपमें दर्शन किया था। उससे भी उत्कृष्ट जो मेरा स्वरूप है, उसे तुम समयानुसार जान सकते हो। मेरा जो परम गोपनीय, शाश्वत, ध्रुव एवं अव्यय पद है, उसका ज्ञान भी तुम्हें समयानुसार हो सकता है। इस प्रकार मैं नारायणदेव एवं हरिनामसे प्रसिद्ध परमेश्वर परम गोपनीय माना गया हूँ ।। न तच्छक्यं भुजड़्ारे वेत्तुमभ्युयान्वितै: । निरारम्भनमस्कारा निराशीर्बन्धनास्तथा ।। गच्छन्ति तं महात्मानं परं ब्रह्म सनातनम्‌ । गरुड! जो लौकिक अभ्युदयमें आसक्त हैं, वे मेरे उस स्वरूपको नहीं जान सकते। जो कर्मोके आरम्भका मार्ग छोड़ चुके हैं, नमस्कारसे दूर हो गये हैं और कामनाओंके बन्धनसे मुक्त हैं, वे यतिजन उन सनातन परमात्मा परब्रह्मको प्राप्त होते हैं ।। स्थूलो5हमेवं विहग त्वया दृष्टस्तथानघ ।। एतच्चापि न वेत्त्यन्यस्त्वामृते पन्नगाशन । निष्पाप पक्षिराज गरुड! इस प्रकार तुमने मेरे स्थूल स्वरूपका दर्शन किया है। परंतु तुम्हारे सिवा दूसरा कोई इस स्वरूपको भी नहीं जानता ।। मा मतिस्तव गान्नाशमेषा गतिरनुत्तमा ।। मद्धभक्तो भव नित्यं त्वं ततो वेत्स्यसि मे पदम्‌ | तुम्हारी बुद्धिका नाश न हो--यही सर्वोत्तम गति है। तुम नित्य-निरन्तर मेरी भक्तिमें लगे रहो। इससे तुम्हें मेरे स्वरूपका यथार्थ बोध हो जायगा ।। एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं रहस्यं दिव्यमानुषम्‌ ।। एतच्छेय: पर चैतत्‌ पन्थान विद्धि मोक्षिणाम्‌ | यह सब तुम्हें बताया गया। यह देवताओं और मनुष्योंके लिये भी रहस्यकी बात है। यही परम कल्याण है। तुम इसे मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंका मार्ग समझो ।। युपर्ण उवाच एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ।। पश्यतो मे महायोगी जगामात्मगतिगतिम्‌ | गरुड कहते हैं--ऋषियो! ऐसा कहकर वे भगवान्‌ वहीं अन्तर्धान हो गये। वे महायोगी तथा आत्मगतिरूप परमेश्वर मेरे देखते-देखते अदृश्य हो गये ।। एतदेवंविध॑ तस्य महिमानं महात्मन: ।। अच्युतस्याप्रमेयस्य दृष्टवानस्मि यत्‌ पुरा । इस प्रकार मैंने पूर्वकालमें अप्रमेय महात्मा अच्युतकी महिमाका साक्षात्कार किया था। एतद्‌ व: सर्वमाख्यातं चेष्टितं तस्य धीमत: ।। मयानुभूत॑ प्रत्यक्ष दृष्टवा चादूभुतकर्मण: । अदभुतकर्मा परम बुद्धिमान्‌ भगवान्‌ श्रीहरिकी यह सारी लीला जो मैंने प्रत्यक्ष देखकर अनुभव की है, आपको बता दी ।। ऋषय ऊचु: अहो श्रावितमाख्यानं भवतात्यद्भुतं महत्‌ ।। पुण्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्य स्वस्त्ययनं महत्‌ । ऋषियोंने कहा--अहो! आपने यह बड़ा अदभुत एवं महत्त्वपूर्ण आख्यान सुनाया। यह परम पवित्र प्रसंग यश, आयु एवं स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला तथा महान्‌ मंगलकारी है ।। एतत्‌ पवित्र देवानामेतद्‌ गुह्ं परंतप ।। एतजज्ञानवतां ज्ञेयमेषा गतिरनुत्तमा | परंतप गरुडजी! यह पवित्र विषय देवताओंके लिये भी गुह्य रहस्य है। यही ज्ञानियोंका ज्ञेय है और यही सर्वोत्तम गति है ।। य इमां श्रावयेद्‌ विद्वान्‌ कथां पर्वसु पर्वसु ।। स लोकान प्राप्त॒ुयात्‌ पुण्यान्‌ देवर्षिभिरभिष्टतान्‌ । जो विद्वान्‌ प्रत्येक पर्वके अवसरपर इस कथाको सुनायेगा वह देवर्षियोंद्वारा प्रशंसित पुण्य-लोकोंको प्राप्त होगा ।। श्राद्धकाले च विप्राणां य इमां श्रावयेच्छुचि: ।। न तत्र रक्षसां भागो नासुराणां च विद्यते | जो श्राद्धके समय पवित्रभावसे ब्राह्मणोंको यह प्रसंग सुनायेगा, उस श्राद्धमें राक्षसों और असुरोंको भाग नहीं मिलेगा ।। अनसूयुर्जितक्रोध: सर्वसत्त्वहिते रत: ।। यः पठेत्‌ सतत युक्त: स व्रजेत्‌ तत्सलोकताम्‌ | जो दोषदृष्टिसे रहित हो क्रोधको जीतकर समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर हो सदा योगयुक्त रहकर इसका पाठ करेगा वह भगवान्‌ विष्णुके लोकमें जायगा ।। वेदान्‌ पारयते विप्रो राजा विजयवान्‌ भवेत्‌ ।। वैश्यस्तु धनधान्याद्य: शूद्र: सुखमवाप्लनुयात्‌ । इसका पाठ करनेवाला ब्राह्मण वेदोंका पारंगत विद्वान्‌ होगा। क्षत्रियको इसका पाठ करनेसे युद्धमें विजयकी प्राप्ति होगी। वैश्य धन-धान्यसे सम्पन्न और शूद्र सुखी होगा ।। भीष्म उवाच ततस्ते मुनयः सर्वे सम्पूज्य विनतासुतम्‌ । स्वानेव चाश्रमान्‌ जम्मुर्बभूवु: शान्तितत्परा: ।। भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर वे सम्पूर्ण महर्षि विनतानन्दन गरुडकी पूजा करके अपने-अपने आश्रमको चले गये और वहाँ शम-दमके साधनमें तत्पर हो गये ।। स्थूलदर्शिभिराकृष्टो दुर्जेयो हकृतात्मभि: । एषा श्रुतिर्महाराज धर्म्या धर्मभूतां वर ।। सुराणां ब्रह्मणा प्रोक्ता विस्मितानां परंतप । धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाराज युधिष्ठिर! जिनका मन अपने वशमें नहीं है, उन स्थूलदर्शी पुरुषोंके लिये भगवान्‌ श्रीहरिके तत्त्वका ज्ञान होना अत्यन्त कठिन है। यह धर्मसम्मत श्रुति है। परंतप! इसे ब्रह्माजीने आश्वर्यचकित हुए देवताओंको सुनाया था ।। ममाप्येषा कथा तात कथिता मातुरन्तिके ।। वसुभि: सत्त्वसम्पन्नै: तवाप्येषा मयोच्यते । तात! तत्त्वज्ञानी वसुओंने मेरी माता गंगाजीके निकट मुझसे यह कथा कही थी और अब तुमसे मैंने कही है ।। तदग्निहोत्रपरमा जपयज्ञपरायणा: ।। निराशीर्बन्धना: सन्त: प्रयान्त्यक्षरसात्मताम्‌ | जो अन्निहोत्रमें तत्पर, जप-यज्ञमें संलग्न तथा कामनाओंके बन्धनसे मुक्त होते हैं, वे अविनाशी परमात्माके स्वरूपको प्राप्त हो जाते हैं ।। आरम्भयज्ञानुत्सूज्य जपहोमपरायणा: । ध्यायन्तो मनसा विष्णुं गच्छन्ति परमां गतिम्‌ ।। जो क्रियात्मक यज्ञोंका परित्याग करके जप और होममें तत्पर हो मन-ही-मन भगवान्‌ विष्णुका ध्यान करते हैं वे परम गतिको प्राप्त होते हैं ।। तदेव परमो मोक्षो मोक्षद्वारं च भारत । यदा विनिश्चितात्मानो गच्छन्ति परमां गतिम्‌ ।। भरतनन्दन! जब निश्चित बुद्धिवाले पुरुष परमात्म-तत्त्वको जानकर परम गतिको प्राप्त हो जाते हैं, वही परम मोक्ष या मोक्षद्वार कहलाता है ।। इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि लोकयात्राकथने त्रयोदशो 5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्या भारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें लोकयात्राके निर्वाहिकी विधिका वर्णनविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ

भीष्म म्हणाले—अमृत उत्पन्न झाल्यावर त्याच्या प्राप्तीसाठी देव आणि असुर यांच्यात साठ हजार वर्षे युद्ध झाले; तेच देवासुर-संग्राम म्हणून प्रसिद्ध आहे. त्या रणात भयंकर दानव-दैत्यांच्या आघातांनी देवता पीडित झाले; महाबलाढ्य असुरांकडून मार खात असूनही त्यांना कोणताही रक्षक मिळेना. म्हणून शरण शोधीत, दुःखी देवता देवदेवेश, महाप्राज्ञ पितामह ब्रह्म्याच्या शरणास गेले. मग ब्रह्मा त्यांच्यासह वैकुण्ठात—भगवान विष्णू, नारायण—यांच्या शरणी गेला. या प्रसंगाचा धर्मार्थ स्पष्ट आहे: जेव्हा बळ आणि नीतीही अपुरी पडते, तेव्हा धर्मात्मे गर्व वाढवत नाहीत; ते नारायणाने धारण केलेल्या विश्वधर्मात शरणागती स्वीकारतात.

Frequently Asked Questions

The dilemma is practical rather than situational: how an individual can sustain social order (lokayātrā) while navigating desire, conflict, and speech—resolved by adopting a rule-set that constrains harm across body, speech, and mind.

Ethics is holistic: bodily non-harm, verbal integrity, and mental discipline are mutually reinforcing, and karmic consequence is presented as the rational basis for choosing auspicious conduct over harmful conduct.

A concise meta-principle functions as the chapter’s phala-orientation: one who performs auspicious or inauspicious actions through body, speech, and mind correspondingly experiences their results, underscoring moral accountability rather than promising a ritualized reward.