
मांसभक्षण-दोषाः तथा अहिंसाया माहात्म्यम् | Faults of Meat-Consumption and the Supremacy of Ahiṃsā
Upa-parva: Āhiṃsika-Dharma (Discourse on Ahiṃsā and Meat-Consumption Ethics)
Yudhiṣṭhira opens by observing that many humans display intense craving for meat, treating varied foods as secondary. He requests Bhīṣma to explain, with doctrinal clarity, the merits of abstaining from meat and the faults incurred by consuming it, including what is edible or inedible from a dharmic standpoint. Bhīṣma acknowledges meat’s immediate sensory appeal and its perceived restorative utility for the injured, fatigued, or physically depleted, but pivots to the ethical calculus of harm: increasing one’s body through another’s body is characterized as morally base, since life is universally dear. He articulates ahiṃsā as the defining mark of dharma and recommends compassionate conduct toward all beings. The chapter then differentiates regulated contexts—consecrated offerings in pitṛ and deva rites, and certain kṣatriya-associated practices such as meat obtained through valor—while criticizing non-ritual, preference-driven killing as “rākṣasa-like” conduct. The discourse expands into karmic reciprocity (one who consumes will be consumed), the inevitability of fear at death, and the superiority of giving safety (abhaya) and life (prāṇadāna). It culminates in a litany elevating ahiṃsā as supreme dharma, self-control, gift, austerity, sacrifice, strength, friendship, happiness, truth, and learning, asserting that no aggregate of ritual or charity equals non-harm.
Chapter Arc: धर्मराज युधिष्ठिर सुरगुरु बृहस्पति से पूछते हैं—अहिंसा, वेदोक्त कर्म, ध्यान, इन्द्रिय-संयम, तप, और गुरु-शुश्रूषा—इनमें कौन-सा साधन मनुष्य के विशेष कल्याण का सर्वोच्च मार्ग है? → बृहस्पति बताते हैं कि ये छहों धर्मजनक हैं, पर इनकी जड़ें और फल भिन्न-भिन्न हैं। फिर वे मनुष्य के भीतर के मूल दोषों की ओर संकेत करते हैं—काम और क्रोध को साधे बिना कोई साधना स्थिर नहीं होती; और समस्त प्राणियों में आत्म-समता का दर्शन ही धर्म का सूक्ष्म शिखर है। → धर्म का संक्षिप्त, तेजस्वी सूत्र उद्घोषित होता है—“जो अपने को प्रतिकूल लगे, वह दूसरे के प्रति न करो” (आत्मौपम्य-धर्म)। इसी आत्म-समता से दान-प्रत्याख्यान, सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय—सबके निर्णय का प्रमाण मिलता है; और जो सर्वभूतात्मभाव से देखता है, उसके मार्ग में देवता भी चकित हो जाते हैं। → बृहस्पति अहिंसा और आत्मौपम्य को धर्म का सार बताकर युधिष्ठिर के प्रश्न का उत्तर पूर्ण करते हैं—साधन अनेक हैं, पर उनका शिरोमणि वह दृष्टि है जो दूसरे के दुःख को अपना दुःख मानकर कर्म को संयत करती है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ३५ श्लोक हैं) अपन प्रात छा अर: त्रयोदशाधिकशततमो< ध्याय: बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको अहिंसा एवं धर्मकी महिमा बताकर स्वर्गलोकको प्रस्थान युधिछिर उवाच अहिंसा वैदिकं कर्म ध्यानमिन्द्रियसंयम: । तपो<थ गुरुशुश्रूषा कि श्रेय: पुरुष प्रति
युधिष्ठिर म्हणाला—अहिंसा, वैदिक कर्म, ध्यान, इंद्रियसंयम, तप आणि गुरु-शुश्रूषा—यांपैकी पुरुषासाठी खरे परम श्रेय कोणते?
Verse 2
युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्! अहिंसा, वेदोक्त कर्म, ध्यान, इन्द्रिय-संयम, तपस्या और गुरु-शुश्रूषा--इनमेंसे कौन-सा कर्म मनुष्यका (विशेष) कल्याण कर सकता है ।। ब॒हस्पतिर्वाच सर्वाण्येतानि धर्म्याणि पृथग्द्वाराणि सर्वशः । शृणु संकीर्त्यमानानि षडेव भरतर्षभ
बृहस्पती म्हणाले—भरतश्रेष्ठा! ही सर्व कर्मे धर्म्य आहेत; प्रत्येक एक स्वतंत्र द्वार आहे. हे भरतश्रेष्ठ, या सहाहींचे वर्णन ऐक.
Verse 3
बृहस्पतिजीने कहा--भरतश्रेष्ठ! ये छः प्रकारके कर्म ही धर्मजनक हैं तथा सब-के- सब भिन्न-भिन्न कारणोंसे प्रकट हुए हैं। मैं इन छहोंका वर्णन करता हूँ; तुम सुनो ।। हन्त नि:श्रेयसं जन्तोरहं वक्ष्याम्यनुत्तमम् । अहिंसापाश्रयं धर्म य: साधयति वै नर:,अब मैं मनुष्यके लिये कल्याणके सर्वश्रेष्ठ उपायका वर्णन करता हूँ। जो मनुष्य अहिंसायुक्त धर्मका पालन करता है, वह मोह, मद और मत्सरतारूप तीनों दोषोंको अन्य समस्त प्राणियोंमें स्थापित करके एवं सदा काम-क्रोधका संयम करके सिद्धिको प्राप्त हो जाता है
बृहस्पती म्हणाले—ऐक, मी प्राण्यासाठी परम व अनुपम कल्याणाचा उपाय सांगतो. जो मनुष्य अहिंसेवर आधारलेला धर्म साधतो, तोच त्यास सिद्ध करतो.
Verse 4
त्रीन् दोषान् सर्वभूतेषु निधाय पुरुष: सदा । कामक्रोधौ च संयम्य ततः सिद्धिमवाप्नुते,अब मैं मनुष्यके लिये कल्याणके सर्वश्रेष्ठ उपायका वर्णन करता हूँ। जो मनुष्य अहिंसायुक्त धर्मका पालन करता है, वह मोह, मद और मत्सरतारूप तीनों दोषोंको अन्य समस्त प्राणियोंमें स्थापित करके एवं सदा काम-क्रोधका संयम करके सिद्धिको प्राप्त हो जाता है
पुरुषाने ते तीन दोष सर्व प्राण्यांत आहेत असे जाणून (त्यांना ‘माझे’ म्हणून न धरता) आणि काम-क्रोध संयमून राहिले, तर तो सिद्धी प्राप्त करतो.
Verse 5
अहिंसकानि भूतानि दण्डेन विनिहन्ति यः । आत्मन: सुखमन्विच्छन् स प्रेत्य न सुखी भवेत्,जो मनुष्य अपने सुखकी इच्छा रखकर अहिंसक प्राणियोंको डंडेसे मारता है, वह परलोकमें सुखी नहीं होता है
जो मनुष्य स्वतःच्या सुखाच्या इच्छेने अहिंसक प्राण्यांना दंडाने मारतो, तो मृत्यूनंतर परलोकात सुखी होत नाही।
Verse 6
आत्मोपमस्तु भूतेषु यो वै भवति पूरुष: । न्यस्तदण्डो जितक्रोध: स प्रेत्य सुखमेधते,जो मनुष्य सब भूतोंको अपने समान समझता, किसीपर प्रहार नहीं करता (दण्डको हमेशाके लिये त्याग देता है) और क्रोधको अपने काबूमें रखता है, वह मृत्युके पश्चात् सुख भोगता है
जो पुरुष सर्व प्राण्यांना स्वतःसारखे मानतो, दंड टाकून देतो आणि क्रोध जिंकतो, तो मृत्यूनंतर सुखात वाढ पावतो।
Verse 7
सर्वभूतात्मभूतस्य सर्वभूतानि पश्यत: । देवा5पि मार्गे मुहान्ति अपदस्य पदैषिण:,जो सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा है, अर्थात् सबकी आत्माको अपनी ही आत्मा समझता है तथा जो सब भूतोंको समान भावसे देखता है, उस गमनागमनसे रहित ज्ञानीकी गतिका पता लगाते समय देवता भी मोहमें पड़ जाते हैं
जो सर्वभूतांचा आत्मा झालेला आहे, जो सर्व प्राण्यांना समदृष्टीने पाहतो—अशा गमनागमनरहित ज्ञानीची गती शोधताना देवताही मार्गात मोहग्रस्त होतात।
Verse 8
न तत् परस्य संदध्यात् प्रतिकूलं यदात्मन: । एष संक्षेपतो धर्म: कामादन्य: प्रवर्तते,जो बात अपनेको अच्छी न लगे, वह दूसरोंके प्रति भी नहीं करनी चाहिये। यही धर्मका संक्षिप्त लक्षण है। इससे भिन्न जो बर्ताव होता है, वह कामनामूलक है
जे स्वतःला प्रतिकूल वाटते ते दुसऱ्याच्या बाबतीत करू नये. हाच संक्षेपाने धर्म; याच्या विरुद्ध वर्तन कामनेतून प्रवर्तते।
Verse 9
प्रत्याख्याने च दाने च सुखदुःखे प्रियाप्रिये आत्मौपम्येन पुरुष: प्रमाणमधिगच्छति,माँगनेपर देने और इनकार करनेसे, सुख और दुःख पहुँचानेसे तथा प्रिय और अप्रिय करनेसे पुरुषको स्वयं जैसे हर्ष-शोकका अनुभव होता है, उसी प्रकार दूसरोंके लिये भी समझे
मागितल्यावर देणे वा नाकारणे, सुख-दुःख पोहोचवणे, प्रिय-अप्रिय करणे—या सर्वांत पुरुष आत्मौपम्यानेच योग्य प्रमाण जाणतो; जसा हर्ष-शोक तो स्वतः अनुभवतो तसाच दुसऱ्यालाही होतो असे समजावे।
Verse 10
यथा पर: प्रक्रमते परेषु तथापरे प्रक्रमन्ते परस्मिन् । तथैव ते<स्तूपमा जीवलोके यथा धर्मो नैपुणेनोपदिष्ट:,जैसे एक मनुष्य दूसरोंपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार अवसर आनेपर दूसरे भी उसके ऊपर आक्रमण करते हैं। इसीको तुम जगत्में अपने लिये भी दृष्टान्त समझो। अतः किसीपर आक्रमण नहीं करना चाहिये। इस प्रकार यहाँ कौशलपूर्वक धर्मका उपदेश किया है
जसा एखादा मनुष्य दुसऱ्यांवर आक्रमकपणे पुढे सरसावतो, तसाच प्रसंग आला की इतरही त्याच्यावर आक्रमकपणे पुढे सरसावतात. हे जीवसृष्टीत स्वतःसाठी दृष्टांत मान. म्हणून कोणावरही आक्रमण करू नये. अशा रीतीने येथे कौशल्य व विवेकाने धर्माचा उपदेश केला आहे.
Verse 11
वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा तं सुरगुरुर्धर्मराजं॑ युधिष्ठिरम् । दिवमाचक्रमे धीमान् पश्यतामेव नस्तदा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहकर परम बुद्धिमान् देवगुरु बृहस्पतिजी उस समय हमलोगोंके देखते-देखते स्वर्गगलोकको चले गये
वैशम्पायन म्हणाले—जनमेजया! धर्मराज युधिष्ठिराला असे सांगून परम बुद्धिमान देवगुरु बृहस्पती, आम्ही पाहत असतानाच, त्या वेळी स्वर्गलोकास गेले.
Verse 112
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें संसारचक्रविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ
अशा प्रकारे श्रीमहाभारताच्या अनुशासनपर्वातील दानधर्मपर्वात संसारचक्रविषयक एकशे बारावा अध्याय समाप्त झाला.
Verse 113
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि संसारचक्रसमाप्तौ त्रयोदशाधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें संसारचक्रकी समाप्तिविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ
अशा प्रकारे श्रीमहाभारताच्या अनुशासनपर्वातील दानधर्मपर्वात संसारचक्रसमाप्तिविषयक एकशे तेरावा अध्याय समाप्त झाला.
The chapter weighs perceived benefits and taste of meat against the ethical cost of harm to living beings, asking how dharma classifies consumption, abstention, and permissible exceptions.
Ahiṃsā is asserted as the highest normative good; compassion and the act of granting safety to beings are portrayed as superior to ritual accumulation, sensory preference, or bodily gain.
Yes: abstention from consuming all meats throughout life is associated with attaining an expansive heavenly state, and more broadly the text claims incomparable merit for ahiṃsā relative to other religious acts.