वंशानुकीर्तनम् — Genealogical Recitation from Dakṣa to Yayāti and the Establishment of the Paurava Line
सचक्रवाकपुलिनां पुष्पफेनप्रवाहिनीम् । सकिन्नरगणावासां वानरफक्षनिषेविताम्,उसके तटपर चकवा-चकई किलोल कर रहे थे। नदीके जलमें बहुत-से फूल इस प्रकार बह रहे थे, मानो फेन हों। उसके तटप्रान्तमें किन्नरोंके निवास-स्थान थे। वानर और रीछ भी उस नदीका सेवन करते थे
तिच्या तीरांवर चक्रवाक-चक्रवाकी किलबिलत होते. पाण्यात असंख्य पुष्प असे वाहत होते की जणू फेनच. तटप्रांतात किन्नरगणांची वस्ती होती; आणि वानर व रीछही त्या नदीचे जल सेवन करत होते.
वैशम्पायन उवाच