Duḥṣantasya Vana-praveśaḥ
King Duḥṣanta’s Entry into the Forest Hunt
(ततः सत्यवती हृष्टा जगाम स्वं निवेशनम् । तस्यास्त्वायोजनाद् गन्धमाजिध्रन्ति नरा भुवि ।। दाशराजस्तु तद्गन्धमाजिप्रन् प्रीतिमावहत् ।) तदनन्तर सत्यवती प्रसन्नतापूर्वक अपने घरपर गयी। उस दिनसे भूमण्डलके मनुष्य एक योजन दूरसे ही उसकी दिव्य गन्धका अनुभव करने लगे। उसका पिता दाशराज भी उसकी गन्ध सूँघकर बहुत प्रसन्न हुआ। दाश उवाच (त्वामाहुर्मत्स्यगन्धेति कथं बाले सुगन्धता । अपास्य मत्स्यगन्धत्वं केन दत्ता सुगन्धता ।।) दाशराजने पूछा--बेटी! तेरे शरीरसे मछलीकी-सी दुर्गन्ध आनेके कारण लोग तुझे “मत्स्यगन्धा" कहा करते थे, फिर तुझमें यह सुगन्ध कहाँसे आ गयी? किसने यह मछलीकी दुर्गन््ध दूर कर तेरे शरीरको सुगन्ध प्रदान की है? सत्यवत्युवाच (शक्ति: पुत्रो महाप्राज्ञ: पराशर इति स्मृत: ।। नावं वाहयमानाया मम दृष्टवा सुगर्हितम् । अपास्य मत्स्यगन्धत्वं योजनाद् गन्धतां ददौ ।। ऋषे: प्रसाद दृष्टवा तु जना: प्रीतिमुपागमन् ।) सत्यवती बोली--पिताजी! महर्षि शक्तिके पुत्र महाज्ञानी पराशर हैं, (वे यमुनाजीके तटपर आये थे; उस समय) मैं नाव खे रही थी। उन्होंने मेरी दुर्गग्धताकी ओर लक्ष्य करके मुझपर कृपा की और मेरे शरीरसे मछलीकी गन्ध दूर करके ऐसी सुगन्ध दे दी, जो एक योजन दूरतक अपना प्रभाव रखती है। महर्षिका यह कृपाप्रसाद देखकर सब लोग बड़े प्रसन्न हुए। पादापसारिणं धर्म स तु विद्वान युगे युगे । आयु: शक्ति च मर्त्यानां युगावस्थामवेक्ष्य च,विद्वान् द्वैपायनजीने देखा कि प्रत्येक युगमें धर्मका एक-एक पाद लुप्त होता जा रहा है। मनुष्योंकी आयु और शक्ति क्षीण हो चली है और युगकी ऐसी दुरवस्था हो गयी है। यह सब देख-सुनकर उन्होंने वेद और ब्राह्मणोंपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे वेदोंका व्यास (विस्तार) किया। इसलिये वे व्यास नामसे विख्यात हुए
tataḥ satyavatī hṛṣṭā jagāma svaṃ niveśanam | tasyāstv āyojanād gandham ājighranti narā bhuvi || dāśarājas tu tad gandham ājighran prītim āvahat || dāśa uvāca | tvām āhur matsyagandheti kathaṃ bāle sugandhatā | apāsya matsyagandhatvaṃ kena dattā sugandhatā || satyavaty uvāca | śaktiḥ putro mahāprajñaḥ parāśara iti smṛtaḥ | nāvaṃ vāhayamānāyā mama dṛṣṭvā sugarhitaṃ | apāsya matsyagandhatvaṃ yojanād gandhatāṃ dadau | ṛṣeḥ prasādaṃ dṛṣṭvā tu janāḥ prītim upāgaman ||
त्यानंतर सत्यवती आनंदित होऊन आपल्या घरी परतली. त्या दिवसापासून पृथ्वीवरील लोक एक योजन दूरूनही तिचा दिव्य सुगंध अनुभवू लागले. तिचा पिता दाशराजही तो गंध घेऊन अत्यंत प्रसन्न झाला. दाशराज म्हणाला—“बाळे! पूर्वी माशासारख्या दुर्गंधामुळे लोक तुला ‘मत्स्यगंधा’ म्हणत; मग आता ही सुगंधता कशी आली? कोणाने तुझी दुर्गंध दूर करून हा सुगंध दिला?” सत्यवती म्हणाली—“पिताजी! महर्षी शक्तीचे पुत्र, महाप्राज्ञ पराशर—मी नाव चालवीत असता त्यांनी मला पाहून कृपा केली. त्यांनी माझ्या देहातील मत्स्यगंध दूर करून असा सुगंध दिला की तो एक योजनपर्यंत पसरतो. ऋषींच्या या प्रसादामुळे लोकही आनंदित झाले.”
दाश उवाच
The passage highlights how compassionate grace (prasāda) can transform social stigma into dignity: Satyavatī’s former identity marked by an offensive odor is changed through a sage’s favor, suggesting that inner worth and destiny need not be confined by birth or reputation.
After receiving a boon from the sage Parāśara, Satyavatī returns home emitting a far-reaching fragrance. Her father Dāśarāja, surprised because she was known as ‘Matsyagandhā’ (fish-smelling), asks the cause; she explains that Parāśara removed the fish-odor and granted her a fragrance perceptible from a yojana away.