Garuḍa’s Breach of the Amṛta-Guard and Boons with Viṣṇu; Encounter with Indra (Ādi-parva, Adhyāya 29)
सो<5लम्बं तीर्थमासाद्य देववृक्षानुपागमत् । ते भीता: समकम्पन्त तस्य पक्षानिलाहता:,उड़कर वे फिर अलम्बतीर्थमें जा पहुँचे। वहाँ (मेरुगिरिपर) बहुत-से दिव्य वृक्ष अपनी सुवर्णमय शाखा-प्रशाखाओंके साथ लहलहा रहे थे। जब गरुड उनके पास गये, तब उनके पंखोंकी वायुसे आहत होकर वे सभी दिव्य वृक्ष इस भयसे कम्पित हो उठे कि कहीं ये हमें तोड़ न डालें। गरुड रुचिके अनुसार फल देनेवाले उन कल्पवृक्षोंको काँपते देख अनुपम रूप-रंग तथा अंगोंवाले दूसरे-दूसरे महावृक्षोंकी ओर चल दिये। उनकी शाखाएँ वैदूर्य मणिकी थीं और वे सुवर्ण तथा रजतमय फलोंसे सुशोभित हो रहे थे। वे सभी महावृक्ष समुद्रके जलसे अभिषिक्त होते रहते थे
so 'lambaṁ tīrtham āsādya devavṛkṣān upāgamat | te bhītāḥ samakampanta tasya pakṣānilāhatāḥ ||
उडत तो अलंब तीर्थास जाऊन पोहोचला आणि तेथील देववृक्षांजवळ गेला. त्याच्या पंखांच्या वाऱ्याने आघात झाल्याने ते दिव्य वृक्ष भयाने थरथर कापू लागले.
कश्यप उवाच
Great power can cause harm indirectly; therefore strength should be paired with mindfulness and restraint, especially around those who are vulnerable.
Garuḍa arrives at Alamba-tīrtha and nears the celestial trees; the gusts from his wings buffet them, and they tremble in fear that he might break them.