समन्तपञ्चक-आख्यानम् तथा अक्षौहिणी-प्रमाणनिर्णयः
Samantapañcaka Narrative and the Measure of an Akṣauhiṇī
भीमसेनार्जुनौ यत्र संरब्धान् पृथिवीपतीन् । शल्यकर्णो च तरसा जितवन्तौ महामृथे,चैत्ररथपर्वमें गंगाके तटपर अर्जुनने अंगारपर्ण गन्धर्वको जीतकर उससे मित्रता कर ली और उसीके मुखसे तपती, वसिष्ठ और और्वके उत्तम आख्यान सुने। फिर अर्जुनने वहाँसे अपने सभी भाइयोंके साथ पांचालकी ओर यात्रा की। तदनन्तर अर्जुनने पांचालनगरके बड़े-बड़े राजाओंसे भरी सभामें लक्ष्यवेध करके द्रौपदीको प्राप्त किया--यह कथा भी इसी पर्वमें है। वहीं भीमसेन और अर्जुनने रणांगणमें युद्धके लिये संनद्ध क्रोधान्ध राजाओंको तथा शल्य और कर्णको भी अपने पराक्रमसे पराजित कर दिया
bhīmasenārjunau yatra saṃrabdhān pṛthivīpatīn | śalyakarṇau ca tarasā jitavantau mahāmṛdhe ||
या प्रसंगात स्मरण केले आहे की महायुद्धाच्या मध्यात भीमसेन व अर्जुन यांनी शस्त्र उचललेल्या क्रोधान्ध राजांना वेगाने पराभूत केले आणि आपल्या पराक्रमाने शल्य व कर्ण यांनाही जिंकले. ही कथा अधोरेखित करते की राजसभांत अनियंत्रित क्रोध व गर्व संघर्षाला जन्म देतात; परंतु संयमित बळ आणि दृढ निश्चय आक्रमणासमोर व्यवस्था प्रस्थापित करून धर्माचरणाचे रक्षण करतात.
राम उवाच
The verse highlights the ethical danger of anger-driven action—kings ‘blinded’ by rage rush into violence—while also affirming the kṣatriya ideal that disciplined courage and strength may be used to check unjust aggression and re-establish order.
It points to a remembered battle scene in which Bhīma and Arjuna, facing hostile and furious kings, defeat them decisively; it also notes that even prominent warriors like Śalya and Karṇa are overcome in that great fight.