मज्चांश्व॒ कारयामासुस्तत्र जानपदा जना: । विपुलानुच्छुयोपेतान् शिबिकाश्न महाधना:,वह भूमि समतल थी। उसमें वृक्ष या झाड़-झंखाड़ नहीं थे। वह उत्तरदिशाकी ओर नीची थी। वक्ताओंमें श्रेष्ठ द्रोणने वास्तुपूुजन देखनेके लिये डिण्डिम-घोष कराके वीरसमुदायको आमन्त्रित किया और उत्तम नक्षत्रसे युक्त तिथिमें उस भूमिपर वास्तुपूजन किया। तत्पश्चात् उनके शिल्पियोंने उस रंगभूमिमें वास्तु-शास्त्रके अनुसार विधिपूर्वक एक अति विशाल प्रेक्षागहकी- नींव डाली तथा राजा और राजघरानेकी स्त्रियोंके बैठनेके लिये वहाँ सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न बहुत सुन्दर भवन बनाया। जनपदके लोगोंने अपने बैठनेके लिये वहाँ ऊँचे और विशाल मंच बनवाये तथा (स्त्रियोंको लानेके लिये) बहुमूल्य शिबिकाएँ तैयार करायीं
dhṛtarāṣṭra uvāca |
mañcāṁś ca kārayāmāsus tatra jānapadā janāḥ |
vipulān ucchrayopetān śibikāś ca mahādhanāḥ ||
धृतराष्ट्र म्हणाले—तेथे जनपदातील लोकांनी आपल्या-आपल्या ऐपतीप्रमाणे रुंद व उंच मचाणे उभारली आणि बहुमोल शिबिका तयार करून घेतल्या. महान सार्वजनिक दृश्य पाहण्याच्या उत्सुकतेने त्यांनी आसनव्यवस्था व ये-जा करण्याची साधने सज्ज केली—यातून लोकसहभागही दिसला आणि राजकीय प्रसंगाभोवतीची सामाजिक मर्यादाही प्रकट झाली।
धृतराष्ट उवाच
The verse highlights collective civic participation in a royal/public event: people contribute according to capacity, reinforcing social coordination and the ordered conduct (maryādā) expected around major ceremonies.
In preparation for a large public viewing, local people arrange elevated seating platforms and prepare expensive palanquins, indicating the scale of the gathering and the formal, hierarchical logistics of attendance.