Adhyāya 123 — Droṇa’s Pedagogy: Arjuna’s Preeminence, Ekalavya’s Self-Training, and the Bhāsa-Lakṣya Trial
त॑ तोषयित्वा तपसा पुत्र लप्स्ये महाबलम् । यं दास्यति स मे पुत्र॑ं स वरीयान् भविष्यति,मैंने सुना है कि देवराज इन्द्र ही सब देवताओंमें प्रधान हैं, उनमें अधाह बल और उत्साह है। वे बड़े पराक्रमी एवं अपार तेजस्वी हैं। मैं तपस्याद्वारा उन्हींको संतुष्ट करके महाबली पुत्र प्राप्त करूँगा। वे मुझे जो पुत्र देंगे, वह निश्चय ही सबसे श्रेष्ठ होगा तथा संग्राममें अपना सामना करनेवाले मनुष्यों तथा मनुष्येतर प्राणियों (दैत्य-दानव आदि)-को भी मारनेमें समर्थ होगा। अतः मैं मन, वाणी और क्रियाद्वारा बड़ी भारी तपस्या करूँगा
taṁ toṣayitvā tapasā putra lapsye mahābalam | yaṁ dāsyati sa me putraṁ sa varīyān bhaviṣyati |
तपस्येने मी त्यांना संतुष्ट करून महाबलवान पुत्र प्राप्त करीन. ते जो पुत्र मला देतील तोच माझा पुत्र होईल, आणि तो बल व पराक्रमात सर्वश्रेष्ठ ठरेल.
वैशम्पायन उवाच