Ādi Parva, Adhyāya 103 — Dhṛtarāṣṭra–Gāndhārī Vivāha: Proposal, Consent, and the Vow
वित्तेन कथितेनान्ये बलेनान्येडनुमान्य च । प्रमत्तामुपयन्त्यन्ये स्वयमन्ये च विन्दते,“कितने ही मनुष्य नियत धन लेकर कन्यादान करते हैं (यह आसुर विवाह है)। कुछ लोग बलसे कन्याका हरण करते हैं (यह राक्षस विवाह है)। दूसरे लोग वर और कन्याकी परस्पर अनुमति होनेपर विवाह करते हैं (यह गान्धर्व विवाह है)। कुछ लोग अचेत अवस्थामें पड़ी हुई कनन््याको उठा ले जाते हैं (यह पैशाच विवाह है)। कुछ लोग वर और कन्याको एकत्र करके स्वयं ही उनसे प्रतिज्ञा कराते हैं कि हम दोनों गार्हस्थ्य धर्मका पालन करेंगे; फिर कन्यापिता दोनोंकी पूजा करके अलंकारयुक्त कन्याका वरके लिये दान करता है; इस प्रकार विवाहित होनेवाले (प्राजापत्य विवाहकी रीतिसे) पत्नीकी उपलब्धि करते हैं
vaiśampāyana uvāca |
vittena kathitena anye balena anye ’numānya ca |
pramattām upayānty anye svayam anye ca vindate ||
वैशंपायन म्हणाले—काही जण ठरविलेल्या धनाने कन्या मिळवितात, काही बलाने, तर काही परस्पर संमतीने. काही जण प्रमत्त किंवा अचेत अवस्थेतील कन्येला उचलून नेतात; आणि काही जण स्वतः वर-कन्येला एकत्र करून गृहस्थधर्म पाळण्याची प्रतिज्ञा करवितात व नंतर कन्यापित्याकडून पूजित व अलंकृत कन्येचे विधिवत् दान घेऊन पत्नी प्राप्त करतात.
वैशम्पायन उवाच