Adhyāya 6: Kaṅka (Yudhiṣṭhira) Seeks Refuge in Virāṭa’s Assembly
“तुम चार भुजाओंसे सुशोभित विष्णुरूपा और चार मुखोंसे अलंकृत ब्रह्मस्वरूपा हो। तुम्हारे नितम्ब और उरोज पीन हैं। तुमने मोरपंखका कंगन धारण किया है तथा केयूर और अंगद पहन रखे हैं। देवि! भगवान् नारायणकी धर्मपत्नी लक्ष्मीजीके समान तुम्हारी शोभा हो रही है। आकाशगमें विचरनेवाली देवि! तुम्हारा स्वरूप और ब्रह्मचर्य परम उज्ज्वल है। श्यामसुन्दर श्रीकृष्णकी छबिके समान तुम्हारी श्याम कान्ति है, इसीलिये तुम कृष्णा कहलाती हो। तुम्हारा मुख संकर्षणके समान है ।। बिभ्रती विपुलौ बाहू शक्रध्वजसमुच्छूयौ । पात्री च पड़कजी घण्टी स्त्रीविशुद्धा च या भुवि,“तुम (वर और अभय मुद्रा धारण करनेवाली) ऊपर उठी हुई दो विशाल भुजाओंको इन्द्रकी ध्वजाके समान धारण करती हो। तुम्हारे तीसरे हाथमें पात्र, चौथेमें कमल और पाँचवेंमें घण्टा सुशोभित है। छठे हाथमें पाश, सातवेंमें धनुष तथा आठवेंमें महान् चक्र शोभा पाता है। ये ही तुम्हारे नाना प्रकारके आयुध हैं। इस पृथ्वीपर स्त्रीका जो विशुद्ध स्वरूप है, वह तुम्हीं हो। कुण्डलमण्डित कर्णयुगल तुम्हारे मुखमण्डलकी शोभा बढ़ाते हैं। देवि! तुम चन्द्रमासे होड़ लेनेवाले मुखसे सुशोभित होती हो। तुम्हारे मस्तकपर विचित्र मुकुट है। बँधे हुए केशोंकी वेणी साँपकी आकृतिके समान कुछ और ही शोभा दे रही है। यहाँ कमरमें बँधी हुई सुन्दर करधनीके द्वारा तुम्हारी ऐसी शोभा हो रही है, मानो नागसे लपेटा हुआ मन्दराचल हो
bibhṛtī vipulau bāhū śakradhvaja-samucchrāyau | pātrī ca padmakā ca ghaṇṭī strī-viśuddhā ca yā bhuvi ||
വൈശംപായനൻ പറഞ്ഞു— അവൾ ഇന്ദ്രധ്വജംപോലെ ഉയർത്തിയ രണ്ടു മഹാഭുജങ്ങൾ ധരിക്കുന്നു. ഒരു കൈയിൽ പാത്രം, ഒരു കൈയിൽ പദ്മം, മറ്റൊരു കൈയിൽ ഘണ്ടയും ശോഭിക്കുന്നു. ഭൂമിയിലെ സ്ത്രീ-വിശുദ്ധിയുടെ സാക്ഷാത് രൂപം അവളുതന്നെ.
वैशम्पायन उवाच
The verse elevates the goddess as the standard of purity and auspicious power in the world, implying that dharma is safeguarded by inner and outer purity, disciplined conduct, and reverence for protective divine order.
Within Virāṭa Parva’s context of concealment and vulnerability, the narration presents a stuti-like depiction of a many-armed goddess, listing her emblems (vessel, lotus, bell) and likening her raised arms to Indra’s banner—an invocation of protection and moral steadiness.