Jarāsandha-nipātana, rāja-mokṣa, and rājasūya-sāhāyya-prārthanā
Jarāsandha’s fall, liberation of kings, and request for support
यावदेतदसम्बुद्धं तावदेव भवेत् तव | विषह्ममेतदस्माकमतो राजन् ब्रवीमि ते,भूपाल! जबतक तुम इस बातको नहीं जानते थे, तभीतक तुम्हारा घमंड बढ़ रहा था। अब तुम्हारा यह अभिमान हमलोगोंके लिये असह्य हो उठा है, इसलिये मैं तुम्हें यह सलाह देता हूँ (जनमेजय उवाच किमर्थ वैरिणावास्तामुभौ तौ कृष्णमागधौ । कथं च निर्जित: संख्ये जरासंधेन माधव: ।। जनमेजयने पूछा--मुने! भगवान् श्रीकृष्ण और मगधराज जरासंध दोनों एक-दूसरेके शत्रु क्यों हो गये थे? तथा जरासंधने यदुकुलतिलक श्रीकृष्णको युद्धमें कैसे परास्त किया?। कश्न कंसो मागधस्य यस्य हेतो: स वैरवान् । एतदाचक्ष्व मे सर्व वैशम्पायन तत्त्वतः ।। कंस मगधराज जरासंधका कौन था, जिसके लिये उसने भगवानसे वैर ठान लिया। वैशम्पायनजी! ये सब बातें मुझे यथार्थरूपसे बताइये। वैशम्पायन उवाच यादवानामन्ववाये वसुदेवो महामति: । उदपद्यत वार्ष्णेयो हाुग्रसेनस्य मन्त्र भूत् ।। वैशम्पायनजीने कहा--राजन्! यदुकुलमें परम बुद्धिमान् वसुदेव उत्पन्न हुए, जो वृष्णिवंशके राजकुमार तथा राजा उग्रसेनके विश्वसनीय मन्त्री थे। उग्रसेनस्य कंसस्तु बभूव बलवान् सुतः । ज्येष्ठो बहूनां कौरव्य सर्वशस्त्रविशारद: ।। उमग्रसेनका पुत्र बलवान् कंस हुआ, जो उनके अनेक पुत्रोंमें सबसे बड़ा था। कुरुनन्दन! कंसने सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंकी विद्यामें निपुणता प्राप्त की थी। जरासंधस्य दुहिता तस्य भार्यातिविश्रुता । राज्यशुल्केन दत्ता सा जरासंधेन धीमता ।। जरासंधकी पुत्री उसकी सुप्रसिद्ध पत्नी थी, जिसे बुद्धिमान् जरासंधने इस शर्तके साथ दिया था कि इसके पतिको तत्काल राजाके पदपर अभिषिक्त किया जाय। तदर्थमुग्रसेनस्य मथुरायां सुतस्तदा । अभिषिक्तस्तदामात्यै: स वै तीव्रपराक्रम: ।। इस शुल्ककी पूर्तिके लिये उग्रसेनके उस दुःसह पराक्रमी पुत्रको मन्त्रियोंने मथुराके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। ऐश्वर्यबलमत्तस्तु स तदा बलमोहित: । निगृहा पितरं भुद्धक्ते तद् राज्यं मन्त्रिभि: सह ।। तब ऐश्वर्यके बलसे उनन््मत्त और शारीरिक शक्तिसे मोहित हो कंस अपने पिताको कैद करके मन्त्रियोंके साथ उनका राज्य भोगने लगा। वसुदेवस्य तत् कृत्यं न शूणोति स मन्दधी: । स तेन सह तदू राज्यं धर्मत: पर्यपालयत् ।। मन्दबुद्धि कंस वसुदेवजीके कर्तव्य-विषयक उपदेशको नहीं सुनता था, तो भी उसके साथ रहकर वसुदेवजी मथुराके राज्यका धर्मपूर्वक पालन करने लगे। प्रीतिमान् स तु दैत्येन्द्रो वसुदेवस्य देवकीम् । उवाह भार्या स तदा दुहिता देवकस्य या ।। दैत्यराज कंसने अत्यन्त प्रसन्न होकर वसुदेवजीके साथ देवकीका ब्याह कर दिया, जो उग्रसेनके भाई देवककी पुत्री थी। तस्यामुद्वाह्ममानायां रथेन जनमेजय । उपारुरोह वार्ष्णेयं कंसो भूमिपतिस्तदा ।। जनमेजय! जब रथपर बैठकर देवकी विदा होने लगी, तब राजा कंस भी उसे पहुँचानेके लिये वृष्णिवंश-विभूषण वसुदेवजीके पास उस रथपर जा बैठा। ततोडन््तरिक्षे वागासीद् देवदूतस्य कस्यचित् । वसुदेवश्च शुश्राव तां वाचं पार्थिवश्च स: ।। इसी समय आकाशमें किसी देवदूतकी वाणी स्पष्ट सुनायी देने लगी। वसुदेवजीने तो उसे सुना ही, राजा कंसने भी सुना। यामेतां वहमानो<द्य कंसोद्वहसि देवकीम् । अस्या यश्चाष्टमो गर्भ: स ते मृत्युर्भविष्यति ।। देवदूत कह रहा था--“कंस! आज तू जिस देवकीको रथपर बिठाकर लिये जा रहा है, उसका आठवाँ गर्भ तेरी मृत्युका कारण होगा”। सो<वतीर्य ततो राजा खड्गमुद्धृत्य निर्मलम् । इयेष तस्या मूर्धानं छेत्तुं परमदुर्मति: ।। यह आकाशवाणी सुनते ही अत्यन्त खोटी बुद्धिवाले राजा कंसने म्यानसे चमचमाती हुई तलवार खींच ली और देवकीका सिर काट लेनेका विचार किया। स सान्त्वयंस्तदा कंसं हसन् क्रोधवशानुगम् । राजन्ननुनयामास वसुदेवो महामति: ।। राजन्! उस समय परम बुद्धिमान वसुदेवजी हँसते हुए क्रोधके वशीभूत हुए कंसको सान्त्वना दे उसकी अनुनय-विनय करने लगे। अहिंस्यां प्रमदामाहु: सर्वधर्मेषु पार्थिव । अकस्मादबलां नारीं हन्तासीमामनागसीम् ।। 'पृथ्वीपते! प्रायः सभी धर्मोमें नारीको अवध्य बताया गया है। क्या तुम इस निर्बल एवं निरपराध नारीको सहसा मार डालोगे?' यच्च ते5त्र भयं राजन् शक््यते बाधितुं त्वया । इयं च शक््या पालयितुं समयश्वैव रक्षितुम् ।। “राजन! इससे जो तुम्हें भय प्राप्त होनेवाला है, उसका तो तुम निवारण कर सकते हो। तुम्हें इसकी रक्षा करनी चाहिये और मुझे इसकी प्राणरक्षाके लिये जो शर्त निश्चित हो, उसका पालन करना चाहिये। अस्यास्त्वमष्टमं गर्भ जातमात्र महीपते । विध्वंसय तदा प्राप्तमेवं परिद्वतं भवेत् ।। “राजन! इसके आठवें गर्भको तुम पैदा होते ही नष्ट कर देना। इस प्रकार तुमपर आयी हुई विपत्ति टल सकती है'। एवं स राजा कथितो वसुदेवेन भारत । तस्य तद् वचन चक्रे शूरसेनाधिपस्तदा ।। ततस्तस्यां सम्बभूवु: कुमारा: सूर्यवर्चस: । जाताज्जातांस्तु तान् सर्वाञ्जघान मधुरेश्वर: ।। भरतनन्दन! वसुदेवजीके ऐसा कहनेपर शूरसेन-देशके राजा कंसने उनकी बात मान ली। तदनन्तर देवकीके गर्भसे सूर्यके समान तेजस्वी अनेक कुमार क्रमशः उत्पन्न हुए। मथुरानरेश कंसने जन्म लेते ही उन सबको मार डालता था। अथ तस्यां समभवद् बलदेवस्तु सप्तम: । याम्यया मायया तं तु यमो राजा विशाम्पते ।। देवक्या गर्भमतुलं रोहिण्या जठरेउक्षिपत् | आकृष्य कर्षणात् सम्यक् संकर्षण इति स्मृत: ।। बलश्रेष्ठतया तस्य बलदेव इति स्मृतः । तदनन्तर देवकीके उदरमें सातवें गर्भके रूपमें बलदेवका आगमन हुआ। राजन! यमराजने यमसम्बन्धिनी मायाके द्वारा उस अनुपम गर्भको देवकीके उदरसे निकालकर रोहिणीकी कुक्षिमें स्थापित कर दिया। आकर्षण होनेके कारण उस बालकका नाम संकर्षण हुआ। बलमें प्रधान होनेसे उसका नाम बलदेव हुआ। पुनस्तस्यां समभवदष्टमो मधुसूदन: । तस्य गर्भस्य रक्षां तु चक्रे सो5भ्यधिकं नृपः ।। तत्पश्चात् देवकीके उदरमें आठवें गर्भके रूपमें साक्षात् भगवान् मधुसूदनका आविर्भाव हुआ। राजा कंसने बड़े यत्नसे उस गर्भकी रक्षा की। ततः काले रक्षणार्थ वसुदेवस्य सात्वत: ।। उग्र: प्रयुक्त: कंसेन सचिव: क्रूरकर्मकृत् । विमूक्रेषु प्रभावेन बालस्योत्तीर्य तत्र वै ।। उपागम्य स घोषे तु जगाम स महाद्युति: । जातमात्र वासुदेवमथाकृष्य पिता ततः ।। उपजद्ठे परिक्रीतां सुतां गोपस्य कस्यचित् | तदनन्तर प्रसवकाल आनेपर सात्वतवंशी वसुदेवपर कड़ी नजर रखनेके लिये कंसने उग्र स्वभाववाले अपने क्रूरकर्मा मन्त्रीको नियुक्त किया। परंतु बालस्वरूप श्रीकृष्णके प्रभावसे रक्षकोंके निद्रासे मोहित हो जानेपर वहाँसे उठकर महातेजस्वी वसुदेवजी बालकके साथ व्रजमें चले गये। नवजात वासुदेवको मथुरासे हटाकर पिता वसुदेवने उसके बदलेमें किसी गोपकी पुत्रीको लाकर कंसको भेंट कर दिया। मुमुक्षमाणस्तं शब्द देवदूतस्य पार्थिव: ।। जघान कंसस्तां कन्यां प्रहसन्ती जगाम सा । आर्येति वाशती शब्दं तस्मादार्येति कीर्तिता ।। देवदूतके कहे हुए पूर्वोक्त शब्दका स्मरण करके उसके भयसे छूटनेकी इच्छा रखनेवाले कंसने उस कन्याको भी पृथ्वीपर दे मारा। परंतु वह कन्या उसके हाथसे छूटकर हँसती और आर्य शब्दका उच्चारण करती हुई वहाँसे चली गयी। इसीलिये उसका नाम “'आर्या' हुआ। एवं त॑ वज्चयित्वा च राजानं स महामति: । वासुदेवं महात्मानं वर्धधामास गोकुले ।। परम बुद्धिमान् वसुदेवने इस प्रकार राजा कंसको चकमा देकर गोकुलमें अपने महात्मा पुत्र वासुदेवका पालन कराया। वासुदेवो5पि गोपेषु ववृधे5ब्जमिवाम्भसि । अज्ञायमान: कंसेन गूढो5ग्निरिव दारुषु ।। वासुदेव भी पानीमें कमलकी भाँति गोपोंमें रहकर बड़े हुए। काठमें छिपी हुई अग्निकी भाँति वे अज्ञातभावसे वहाँ रहने लगे। कंसको उनका पता न चला। विप्रचक्रेथ तान् सर्वान् वल््लवान् मधुरेश्वर: । वर्धमानो महाबाहुस्तेजोबलसमन्वित: ।। मथुरानरेश कंस उन सब गोपोंको बहुत सताया करता था। इधर महाबाहु श्रीकृष्ण बड़े होकर तेज और बलसे सम्पन्न हो गये। ततस्ते क्लिश्यमानास्तु पुण्डरीकाक्षमच्युतम् भयेन कामादपरे गणश: पर्यवारयन् ।। राजाके सताये हुए गोपगण भय तथा कामनासे झुंड-के-झुंड एकत्र हो कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णको घेरकर संगठित होने लगे। सतु लब्ध्वा बल॑ राजन्नुग्रसेनस्य सम्मत: । वसुदेवात्मज: सर्वैर्श्नातृभि: सहित॑ं पुनः ।। निर्जित्य युधि भोजेन्द्रं हत्वा कंसं महाबल: । अभ्यषिज्चत् ततो राज्य उग्रसेनं विशाम्पते ।। राजन्! इस प्रकार बलका संग्रह करके महाबली वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने उग्रसेनकी सम्मतिके अनुसार समस्त भाइयोंसहित भोजराज कंसको मारकर पुनः उम्रसेनको ही मथुराके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। ततः श्रुत्वा जरासंधो माधवेन हत॑ युधि । शूरसेनाधिपं चक्रे कंसपुत्रं तदा नृपः ।। राजन! जरासंधने जब यह सुना कि श्रीकृष्णने कंसको युद्धमें मार डाला है, तब उसने कंसके पुत्रको शूरसेनदेशका राजा बनाया। स सैन्यं महतुत्थाप्य वासुदेवं प्रसह च । अभ्यषिज्चत् सुतं तत्र सुताया जनमेजय ।। जनमेजय! उसने बड़ी भारी सेना लेकर आक्रमण किया और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको हराकर अपनी पुत्रीके पुत्रको वहाँ राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। उग्रसेनं च वृष्णीश्ष महाबलसमन्वित: । स तत्र विप्रकुरुते जरासंध: प्रतापवान् ।। एतद्ू वैरं कौरवेय जरासंधस्य माधवे । जनमेजय! प्रतापी जरासंध महान् बल और सैनिकशक्तिसे सम्पन्न था। वह उग्रसेन तथा वृष्णिवंशको सदा क्लेश पहुँचाया करता था। कुरुनन्दन! जरासंध और श्रीकृष्णके वैरका यही वृत्तान्त है। आशासितार्थ राजेन्द्र संरुरोध विनिर्जितान् । पार्थिवैस्तैर्न॒पतिभिय्यक्ष्यमाण: समृद्धिमान् ।। देवश्रेष्ठ महादेवं कृत्तिवासं त्रियम्बकम् । एतत् सर्व यथा वृत्तं कथितं भरतर्षभ ।। यथा तु स हतो राजा भीमसेनेन तच्छूणु ।) राजेन्द्र! समृद्धिशाली जरासंध कृत्तिवासा और त््यम्बक नामोंसे प्रसिद्ध देवश्रेष्ठ महादेवजीको भूमण्डलके राजाओंकी बलि देकर उनका यजन करना चाहता था और इसी मनोवांछित प्रयोजनकी सिद्धिके लिये उसने अपने जीते हुए समस्त राजाओंको कैदमें डाल रखा था। भरतश्रेष्ठ! यह सब वृत्तान्त तुम्हें यथावत् बताया गया। अब जिस प्रकार भीमसेनने राजा जरासंधका वध किया, वह प्रसंग सुनो। इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि जरासंधवधपर्वणि जरासंधयुद्धोद्योगे द्वाविंशो5ध्याय:
yāvad etad asambuddhaṃ tāvad eva bhavet tava | viṣahmam etad asmākam ato rājan bravīmi te, bhūpāla! |
നീ ഈ കാര്യം ഗ്രഹിക്കാതിരുന്നിടത്തോളം നിന്റെ അഹങ്കാരം വളരുകയായിരുന്നു. ഇപ്പോൾ അതേ അഹങ്കാരം ഞങ്ങൾക്ക് അസഹ്യമായി; അതിനാൽ, ഹേ രാജൻ—ഹേ ഭൂപാലൻ—ഞാൻ നിനക്കു ധർമ്മോചിതമായ ഉപദേശം പറയുന്നു.
श्रीकृष्ण उवाच
Unchecked pride born of ignorance becomes socially and morally intolerable; a king must accept counsel, restrain arrogance, and align power with dharma. The passage frames admonition as a duty when a ruler’s conduct harms others.
The surrounding section explains why Kṛṣṇa and Jarāsandha became enemies: Kaṃsa’s rise and tyranny, the prophecy about Devakī’s eighth child, the killing of Devakī’s infants, Balarāma’s transfer to Rohiṇī, Kṛṣṇa’s birth and concealment in Gokula, Kaṃsa’s death at Kṛṣṇa’s hands, Jarāsandha’s retaliatory campaigns and installation of Kaṃsa’s son, and Jarāsandha’s broader ambition of sacrificing captive kings to Śiva—setting up the later account of Jarāsandha’s death by Bhīma.