यथा वैतरणीमुग्रां दुस्तरामकृतात्मभि: । तथा दुस्तरणीं घोरां भीरूणां भयवर्धिनीम्,रक्त ही उस नदीका जल था, रथ भँवरके समान जान पड़ते थे, हाथीरूपी ग्राहोंसे वह नदी भरी हुई थी, मनुष्य, मत्स्य और घोड़े नाकोंके समान जान पड़ते थे, सिरके बाल उसमें सेवार और घासके समान थे। कटी हुई भुजाएँ बड़े-बड़े सर्पोंका भ्रम उत्पन्न करती थीं। वह बहुत-से रत्नोंको बहाये लिये जाती थी। उसके भीतर पड़ी हुई जाँघें ग्राहोंके समान जान पड़ती थीं। मज्जा पंकका काम देती थी, मस्तक पत्थरके टुकड़ोंके समान वहाँ छा रहे थे, धनुष किनारे उगे हुए कासके समान जान पड़ते थे। बाण ही वहाँके अंकुर थे, गदा और परिघ सर्पोके समान प्रतीत होते थे। छत्र और ध्वज उसमें हंसके सदृश दिखायी पड़ते थे। पगड़ी फेनका भ्रम उत्पन्न करती थी। हार कमलवनके समान प्रतीत होते थे। धरतीकी धूल तरंगमाला बनकर शोभा दे रही थी। योद्धा ग्राह आदि जलजन्तुओं-से प्रतीत होते थे। युद्धस्थलमें बहनेवाली वह रक्तनदी यमलोककी ओर जा रही थी, वैतरणीके समान वह सदाचारी पुरुषोंके लिये सुगमतासे पार होनेयोग्य और कायरोंके लिये दुस्तर थी। पुरुषसिंह भीमसेनने क्षणभरमें वैतरणीके समान भयंकर रक्तकी नदी बहा दी थी। वह अकृतात्मा पुरुषोंके लिये दुस्तर, घोर एवं भीरु पुरुषोंका भय बढ़ानेवाली थी
sañjaya uvāca | yathā vaitaraṇīm ugrāṃ dustarām akṛtātmabhiḥ | tathā dustaraṇīṃ ghorāṃ bhīrūṇāṃ bhayavardhinīm ||
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ഉഗ്രമായ വൈതരണി ആത്മസംയമമില്ലാത്തവർക്ക് ദുഷ്കരമായതുപോലെ, ഈ ഘോര നദിയും ഭീരുക്കളുടെ ഭയം വർധിപ്പിക്കുന്ന, കടക്കാൻ പ്രയാസമായതായിരുന്നു.
संजय उवाच