Yudhiṣṭhira’s Procession, Encampment (Niveśa), and Auspicious Timing for Ritual Action
(स हि देव: प्रसन्नात्मा भक्तानां परमेश्वर: । ददात्यमरतां चापि कि पुनः काउ्चन प्रभु: ।। “सदा प्रसन्नचित्त रहनेवाले वे सर्वसमर्थ परमेश्वर महादेव अपने भक्तोंको अमरत्व भी दे देते हैं; फिर सुवर्णकी तो बात ही क्या? ।। वनस्थस्य पुरा जिष्णोरस्त्रं पाशुपतं महत् । रोद्रे ब्रह्मशिरश्नादात् प्रसन्न: कि पुनर्धनम् ।। 'पूर्वकालमें वनमें रहते समय अर्जुनपर प्रसन्न होकर भगवान् शंकरने उन्हें महान् पाशुपतास्त्र, रौद्रास्त्र तथा ब्रह्मास्त्र भी प्रदान किये थे। फिर धन दे देना उनके लिये कौन बड़ी बात है ।। वयं सर्वे च॒ तद्धक्ता: स चास्माकं प्रसीदति । तत्प्रसादाद् वयं राज्यं प्राप्ता: कौरवनन्दन ।। अभिमन्योर्वधे वृत्ते प्रतिज्ञाते धनंजये । जयद्रथवधार्थाय स्वप्ने लोकगुरुं निशि ।। प्रसाद्य लब्धवानस्त्रमर्जुन: सहकेशव: । “कौरवनन्दन! हम सब लोग उनके भक्त हैं और वे हम लोगोंपर प्रसन्न रहते हैं। उन्हींकी कृपासे हमने राज्य प्राप्त किया है। अभिमन्युका वध हो जानेपर जब अर्जुनने जयद्रथको मारनेकी प्रतिज्ञा की थी, उस समय स्वप्नमें अर्जुनने श्रीकृष्णके साथ रहकर रातमें उन्हीं लोकगुरु महेश्वरको प्रसन्न करके दिव्यास्त्र प्राप्त किया था ।। ततः प्रभातां रजनीं फाल्गुनस्याग्रत: प्रभु: ।। जघान सैन्यं शूलेन प्रत्यक्षं सव्यसाचिन: । “तदनन्तर जब रात बीती और प्रातःकाल हुआ, तब भगवान् शिवने अर्जुनके आगे रहकर अपने त्रिशूलसे शत्रुओंकी सेनाका संहार किया था। यह बात अर्जुनने प्रत्यक्ष देखी थी।। कस्तां सेनां महाराज मनसापि प्रधर्षयेत् ।। द्रोणकर्णमुखैर्युक्तां महेष्वासै: प्रहारिभि: । ऋते देवान्महेष्वासाद् बहुरूपान्महेश्वरात् ।। “महाराज! द्रोणाचार्य और कर्ण-जैसे प्रहारकुशल महाथधनुर्धरोंसे युक्त उस कौरवसेनाको महान् पाशुपतधारी अनेक रूपवाले महेश्वर महादेवके सिवा दूसरा कौन मनसे भी पराजित कर सकता था ।। तस्यैव च प्रसादेन निहता: शत्रवस्तव । अश्वमेधस्य संसिद्धि स तु सम्पादयिष्यति ।।) उन्हींके कृपाप्रसादसे आपके शत्रु मारे गये हैं। वे ही अश्वमेध यज्ञको सफलतापूर्वक सम्पन्न करेंगे” ।। श्रुत्वैवं वदतस्तस्य वाक््यं भीमस्य भारत,भारत! भीमसेनका यह कथन सुनकर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुन आदिने भी बहुत ठीक कहकर उन्हींकी बातका समर्थन किया
sa hi devaḥ prasannātmā bhaktānāṁ parameśvaraḥ | dadāty amaratāṁ cāpi ki punaḥ kāñcanaṁ prabhuḥ ||
വൈശംപായനൻ പറഞ്ഞു—അവൻ പ്രസന്നാത്മാവായ ദേവൻ, ഭക്തരുടെ പരമേശ്വരൻ; അമരത്വം പോലും ദാനം ചെയ്യുന്നു—അപ്പോൾ സ്വർണം നൽകുന്നത് അവനു എന്ത് വലിയ കാര്യം?
वैशम्पायन उवाच