अौर्ध्वदेहिक-श्राद्धे दानयज्ञविस्तारः | Expansion of the Aurdhvadehika Śrāddha and the Donation-Rite
अपन ह< बक। है २ >> एकविशो< ध्याय: धृतराष्ट्र आदिके लिये पाण्डवों तथा पुरवासियोंकी चिन्ता वैशम्पायन उवाच वनं॑ गते कौरवेन्द्रे द:ःखशोकसमन्विता: । बभूवु: पाण्डवा राजन् मातृशोकेन चान्विता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कौरवराज धृतराष्ट्रके वनमें चले जानेपर पाण्डव दुःख और शोकसे संतप्त रहने लगे। माताके विछोहका शोक उनके हृदयको दग्ध किये देता था इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि एकविंशो5ध्याय: ।। २१ |। इस प्रकार श्रीमह्ााभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २१ ॥ ऑपनआक्रा (_) अं क्ाज दाविशोद्ध्याय: माताके लिये पाण्डवोंकी चिन्ता, युधिष्ठिरकी वनमें जानेकी इच्छा, सहदेव और द्रौपदीका साथ जानेका उत्साह तथा रनिवास और सेनासहित युधिष्ठटिरका वनको प्रस्थान वैशम्पायन उवाच एवं ते पुरुषव्याप्रा: पाण्डवा मातृनन्दना: । स्मरन्तो मातरं वीरा बभूवुर्भशदु:ःखिता:
vaiśampāyana uvāca |
vanam gate kauravendre duḥkhaśokasamanvitāḥ |
babhūvuḥ pāṇḍavā rājan mātṛśokena cānvitāḥ ||
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—ഹേ രാജാവേ (ജനമേജയ)! കൗരവേന്ദ്രനായ ധൃതരാഷ്ട്രൻ വനത്തിലേക്കു പോയപ്പോൾ പാണ്ഡവർ ദുഃഖവും ശോകവും കൊണ്ട് മൂടപ്പെട്ടു; മാതൃവിയോഗത്തിന്റെ വേദന അവരുടെ ഹൃദയം നിരന്തരം ദഹിപ്പിച്ചു।
वैशम्पायन उवाच