Vṛtra’s Cosmic Threat, Viṣṇu’s Upāya, and the Conditional Vulnerability
Udyoga-parva 10
यद् ब्रूथ तच्छुतं सर्व ममापि शृणुतानघा: । संधि: कथं वै भविता मम शक्रस्य चोभयो: । तेजसोर्हि द्वयोदेवा: सख्यं वै भविता कथम्,“इससे तुम्हें सुख मिलेगा और इन्द्रके सनातन लोकोंपर भी तुम्हारा अधिकार रहेगा।' ऋषियोंकी यह बात सुनकर महाबली वृत्रासुरने उन सबको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा--“महाभाग देवताओ! महर्षियो तथा गन्धर्वों! आप सब लोग जो कुछ कह रहे हैं, वह सब मैंने सुन लिया। निष्पाप देवगण! अब मेरी भी बात आपलोग सुनें। मुझमें और इन्द्रमें संधि कैसे होगी? दो तेजस्वी पुरुषोंमें मैत्रीका सम्बन्ध किस प्रकार स्थापित होगा?”
Śalya uvāca: yad brūtha tac chrutaṁ sarvaṁ mamāpi śṛṇutānaghāḥ | sandhiḥ kathaṁ vai bhavitā mama śakrasya cobhayoḥ | tejasor hi dvayor devāḥ sakhyaṁ vai bhavitā katham ||
ສາລະຍະ ກ່າວວ່າ: «ທຸກຢ່າງທີ່ພວກເຈົ້າໄດ້ກ່າວ ຂ້າພະເຈົ້າໄດ້ຟັງແລ້ວ; ບັດນີ້ ຂໍໃຫ້ຟັງຄໍາຂ້າພະເຈົ້າດ້ວຍ ໂອ ຜູ້ບໍ່ມີບາບ. ຈະມີສັນຍາສັນຕິ (ສັນທິ) ລະຫວ່າງຂ້າພະເຈົ້າ ແລະ ສັກຣະ (ອິນທຣະ) ໄດ້ແນວໃດ? ໂອ ເທວະທັງຫຼາຍ, ມິດຕະພາບຈະຖືກສ້າງຂຶ້ນລະຫວ່າງຜູ້ມີເທຊະອັນເຜົາໄໝ້ສອງອົງ ໄດ້ແນວໃດ?»
शल्य उवाच