सुवर्णष्ठीविनोपाख्यानम्
The Account of Suvarṇaṣṭhīvin
आयुष्मान् मे भवेत् पुत्रो भवतस्तपसा मुने । न च त॑ पर्वत: किंचिदुवाचेन्द्रव्यपेक्षया,महात्मा पर्वतका यह वचन सुनकर सूंजयने उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा करते हुए कहा --'ऐसा न हो। मुने! आपकी तपस्यासे मेरा पुत्र दीर्घजीवी होना चाहिये।” परंतु इन्द्रका ख्याल करके पर्वत मुनि कुछ नहीं बोले
āyuṣmān me bhavet putro bhavatas tapasā mune | na ca taṁ parvataḥ kiñcid uvāca indra-vyapekṣayā |
ສຸຍຊະຍະກ່າວວ່າ: «ໂອ ມຸນີ! ໂດຍຕະປະສະຍາຂອງທ່ານ ຂໍໃຫ້ລູກຊາຍຂ້າພະເຈົ້າມີອາຍຸຍືນ»। ແຕ່ພາຣະວະຕະຜູ້ຍິ່ງໃຫຍ່ ເນື່ອງຈາກຄໍານຶກເຖິງພຣະອິນທຣາ ແລະລະວັງການແຊກແຊງ ກໍບໍ່ໄດ້ກ່າວສິ່ງໃດຕໍ່ໄປອີກ।
पर्वत उवाच