नारद–असित (देवल) संवादः — भूतप्रभवाप्यय, इन्द्रिय-गुण-विवेक, क्षेत्रज्ञ-तत्त्व
एतच्चैवाभ्यनुज्ञातं पूर्व: पूर्वतरैस्तथा । को जातु न विचिन्वीत विद्वान् स्वां शक्तिमात्मन:,पूर्ववर्ती तथा अधिक पूर्ववर्ती पुरुषोंने इन समस्त द्रव्योंको यज्ञका अंग माना है, अतः कौन दिद्दवान् मनुष्य अपनी शक्तिके अनुसार कभी किसी यज्ञको अपने लिये नहीं चुनेगा
ແລະສິ່ງນີ້ເອງ ບັນດາຜູ້ເກົ່າແກ່ ແລະຜູ້ເກົ່າແກ່ຍິ່ງກວ່ານັ້ນ ກໍໄດ້ອະນຸມັດໄວ້ແລ້ວ. ດັ່ງນັ້ນ ຜູ້ຮູ້ທັນຈະມີໃຜເລີຍ ທີ່ຈະບໍ່ພິຈາລະນາກຳລັງຂອງຕົນ ແລະບໍ່ເລືອກຍັດຍະໃຫ້ເໝາະກັບຄວາມສາມາດຂອງຕົນ?
कपिल उवाच