बक-गौतमाख्यानम् / The Baka–Gautama Account
On Gratitude and Friendship Ethics
न जम्मुः संविदं तैश्व दर्पादसुरसत्तमा: | अथ वै भगवान ब्रद्मा ब्रद्मर्षिभिरुपस्थित:,वे असुरश्रेष्ठ घमण्डमें भरकर उन प्रजाओंके साथ बातचीत भी नहीं करते थे। तदनन्तर ब्रह्मर्षियोंसहित भगवान् ब्रह्मा हिमालयके सुरम्य शिखरपर उपस्थित हुए। वह इतना ऊँचा था कि आकाशके तारे उसपर विकसित कमलके समान जान पड़ते थे। उसका विस्तार सौ योजनका था। वह मणियों तथा रत्नसमूहोंसे व्याप्त था
na jajñuḥ saṃvidaṃ taiś ca darpād asura-sattamāḥ | atha vai bhagavān brahmā brahmarṣibhir upasthitaḥ ||
ພີສະມະກ່າວວ່າ: «ເຫຼົ່າອະສຸຣະຜູ້ເປັນໃຫຍ່ເຫຼົ່ານັ້ນ ເພາະຄວາມຈອງຫອງ ບໍ່ແມ່ນແຕ່ຈະເຂົ້າໄປສົນທະນາກັບສັດເຫຼົ່ານັ້ນ. ຕໍ່ມາ ພຣະຜູ້ເປັນເຈົ້າ ພຣະພຣະຫມາ ໄດ້ປາກົດ ມີພຣະພຣະຫມະຣິສີທັງຫຼາຍເປັນບໍລິວານ.»
भीष्म उवाच