Droṇa-parva Adhyāya 49: Yudhiṣṭhira’s Lament and Strategic Foreboding after Abhimanyu’s Fall
विचिन्रैश्व॒ परिस्तोभै: पताकाभिश्न संवृता । चामरैश्न कुथाभिश्र प्रविद्धैश्नाम्बरोत्तमै:,सुवर्णमय पंखवाले बाणोंसे वहाँकी भूमि भरी हुई थी। रक्तकी धाराओंमें डूबी हुई थी। शूरवीरोंके कुण्डल-मण्डित तेजस्वी मस्तकों, हाथियोंके विचित्र झूलों, पताकाओं, चामरों, हाथीकी पीठपर बिछाये जानेवाले कम्बलों, इधर-उधर पड़े हुए उत्तम वस्त्रों, हाथी, घोड़े और मनुष्योंके चमकीले आभूषणों, केंचुलसे निकले हुए सर्पोके समान पैने और पानीदार खड़गों, भाँति-भाँतिके कटे हुए धनुषों, शक्ति, ऋष्टि, प्रास, कम्पन तथा अन्य नाना प्रकारके आयुधोंसे आच्छादित हुई रणभूमिकी अद्भुत शोभा हो रही थी
sañjaya uvāca | vicitraiś ca paristobhaiḥ patākābhiś ca saṃvṛtā | cāmaraiś ca kuthābhiś ca praviddhair ambarottamaiḥ ||
ສັນຊະຍະກ່າວວ່າ: «ສະໜາມຮົບຖືກປົກຄຸມດ້ວຍຄວາມຫຼາກຫຼາຍອັນແປກປະຫຼາດ—ມີທັງທຸງ ແລະສັນຍາລັກ, ມີຈາມະຣະ (ພັດຂົນ) ແລະຜ້າຄຸມຊ້າງ, ມີເຄື່ອງນຸ່ງຫົ່ມດີໆຖືກຂວ້າງກະຈາຍໄປທົ່ວທິດ».
संजय उवाच